महर्षि दयानन्द और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम


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राम और कृष्ण मानवीय संस्कृति के आदर्श पुरुष हैं। कुछ बंधुओं के मन में अभी भी यह धारणा है कि महर्षि दयानन्द और उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज राम और कृष्ण को मान्यता नहीं देता है।
प्रत्येक आर्य अपनी दाहिनी भुजा ऊँची उठाकर साहसपूर्वक यह घोषणा करता है कि आर्यसमाज राम-कृष्ण को जितना जानता और मानता है, उतना संसार का कोई भी आस्तिक नहीं मानता। कुछ लोग जितना जानते हैं, उतना मानते नहीं और कुछ विवेकी-बंधु उन्हें भली प्रकार जानते भी हैं, उतना ही मानते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के संबंध में महर्षि दयानन्द ने लिखा है-
प्रश्न-रामेश्वर को रामचन्द्र ने स्थापित किया है। जो मूर्तिपूजा वेद-विरुद्ध होती तो रामचन्द्र मूर्ति स्थापना क्यों करते और वाल्मीकि जी रामायण में क्यों लिखते?
उत्तर- रामचन्द्र के समय में उस मन्दिर का नाम निशान भी न था किन्तु यह ठीक है कि दक्षिण देशस्थ ‘राम’ नामक राजा ने मंदिर बनवा, का नाम ‘रामेश्वर’ धर दिया है। जब रामचन्द्र सीताजी को ले हनुमान आदि के साथ लंका से चले, आकाश मार्ग में विमान पर बैठ अयोध्या को आते थे, तब सीताजी से कहा है कि-
अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः।
सेतु बंध इति विख्यातम्।।
वा0 रा0, लंका काण्ड (देखिये- युद्ध काण्ड़, सर्ग 123, श्लोक 20-21)
‘हे सीते! तेरे वियोग से हम व्याकुल होकर घूमते थे और इसी स्थान में चातुर्मास किया था और परमेश्वर की उपासना-ध्यान भी करते थे। वही जो सर्वत्र विभु (व्यापक) देवों का देव महादेव परमात्मा है, उसकी कृपा से हमको सब सामग्री यहॉं प्राप्त हुई। और देख! यह सेतु हमने बांधकर लंका में आ के, उस रावण को मार, तुझको ले आये।’ इसके सिवाय वहॉं वाल्मीकि ने अन्य कुछ भी नहीं लिखा।
द्रष्टव्य- सत्यार्थ प्रकाश, एकादश समुल्लासः, पृष्ठ-303
इस प्रकार उक्त उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान राम स्वयं परमात्मा के परमभक्त थे। उन्होंने ही यह सेतु बनवाया था। सेतु का परिमाप अर्थात् रामसेतु की लम्बाई- चौड़ाई को लेकर भारतीय धर्मशास्त्रों में दिए गए तथ्य इस प्रकार हैं-
दस योजनम् विस्तीर्णम् शतयोजन- मायतम्’ -वा0रा0 22/76
अर्थात् राम-सेतु 100 योजन लम्बा और 10 योजन चौड़ा था।
शास्त्रीय साक्ष्यों के अनुसार इस विस्तृत सेतु का निर्माण शिल्प कला विशेषज्ञ विश्वकर्मा के पुत्र नल ने पौष कृष्ण दशमी से चतुर्दशी तिथि तक मात्र पॉंच दिन में किया था। सेतु समुद्र का भौगोलिक विस्तार भारत स्थित धनुष्कोटि से लंका स्थित सुमेरू पर्वत तक है। महाबलशाली सेतु निर्माताओं द्वारा विशाल शिलाओं और पर्वतों को उखाड़कर यांत्रिक वाहनों द्वारा समुद्र तट तक ले जाने का शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध है। भगवान श्रीराम ने प्रवर्षण गिरि (किष्किंद्दा) से मार्गशीर्ष अष्टमी तिथि को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र और अभिजीत मुहूर्त में लंका विजय के लिए प्रस्थान किया था।
महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रंथों में राम, कृष्ण, शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह तथा वीर बघेलों (गुजरात) का गर्वपूर्वक उल्लेख किया है। इस प्रकार महर्षि दयानन्द के राम राजपुत्र, पारिवारिक मर्यादाओं को मानने वाले, ऋषि मुनियों के भक्त, परम आस्तिक तथा विपत्तियों में भी न घबराने वाले महापुरुष थे। श्रीराम की मान्यता थी कि विपत्तियॉं वीरों पर ही आती हैं और वे उन पर विजय प्राप्त करते हैं। वीर पुरुष विपत्तियों पर विपत्तियों के समान टूट पड़ते हैं और विजयी होते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश का यह दुर्भाग्य रहा कि पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता और संस्कारों से प्रभावित कुछ भारतीय नेताओं ने पोरस के हाथियों के समान भारतीय मानक, इतिहास और महापुरुषों के सम्बन्ध में विवेकहीनता धारण कर भ्रमित विचार प्रकट करने प्रारम्भ कर दिये। साम्यवादी विचारद्दारा से प्रभावित व्यक्तियों के अनुसार और ‘स्त्री एक सम्पत्ति है, इसमें आत्मतत्व विद्यमान नहीं है।’ ऐसे अपरिपक्व मानसिकता वाले तत्व यदि राम के अस्तित्व और महिमा के संबंध में नकारात्मक विचार रखें, तो उनके मानसिक दिवालियापन की बात ही कही जाएगी— किन्तु भारत में जन्मे, यहॉं की माटी में लोट-पोट कर बड़े हुए तथा बार-एट लॉ की प्रतिष्ठापूर्ण उपाधिधारी जब सन्तुष्टीकरण को आद्दार बनाकर ‘राम’ को मानने से ही इंकार कर दें, राम-रावण को मन के सतोगुण-तमोगुण का संघर्ष कहने लग जाएं तो हम किसे दोषी या अपराधी कहेंगे? अपनी समाधि पर ‘हे राम!’ लिखवाने वाले विश्ववंद्य गांधीजी ने राम के संबंध में ‘हरिजन’ के अंकों में लेख लिख कर कैसे विचार प्रकट किये, यह तो ‘हरिजन’ के पाठक ही जान सकते हैं। इस स्वतन्त्र राष्ट्रमें अपने आप्त महापुरुषों के अस्तित्त्व पर नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वालों की बुद्धि पर दया ही आती है और कहना पड़ता है- धियो यो नः प्रचोदयात्। महर्षि दयानन्द ने राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम के पौरुष तथा उनके गुणों का विचारणीय एवं महत्वपूर्ण वर्णन किया है। महर्षि दयानन्द ने राम को महामानव, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ आत्मा, परमात्मा का परम भक्त, धीर-वीर पुरुष, विजय के पश्चात् भी विनम्रता आदि गुणों से विभूषित बताया है। महर्षि दयानन्द का राम एक ऐसा महानायक था, जिसने सद्गृहस्थ रहते हुए तपस्या द्वारा मोक्ष के मार्ग को अपनाया था। राम और कृष्ण; दोनों ही सद्गृहस्थ तथा आदर्श महापुरुष थे। आज राष्ट्र को ऐसे ही आदर्श महापुरुषों की आवश्यकता है, जिनके आदर्श को आचरण में लाकर हम अपने राष्ट्रª की स्वतन्त्रता, अखण्डता, सार्व भौमिकता तथा स्वायत्तता की रक्षा कर सकते हैं।

साभार

शांतिधर्मी मासिक हिंदी पत्रिका

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बेरोजगार हिन्दुओं के लिए बिज़नस प्लान


allah malik

बेरोजगार हिन्दुओं के लिए बिज़नस प्लान

बिलकुल मुफ्त

हमारे देश में लाखों हिन्दू बेरिजगार हैं। उनके लिए मैं एक दम परफेक्ट १००% रोजगार की गारन्टी के साथ, चंद महीनों में लखपति बनने का बिज़नस प्लान लेकर आया हूँ।

किसी भी सुनसान जगह पर जो किसी हाईवे पर हो शहर की समीप ही हो छोटा सा चबूतरा बना कर ४ मूर्तियों की स्थापना कर दो

साई बाबा शिरडी वाले की, शनि देव की ,हनुमान की और शिव की मूर्तियाँ वहाँ पर स्थापित कर दो।

१. साई बाबा शिरडी वाला- उसकी तो सबसे बड़ी मूर्ति लगाओ। वीरवार के दिन तो मेला ही लग जायेगा।

अंधे भगत मन में यही मन्नत लेकर आएँगे की उन्हें कुछ न करना पड़े सब कुछ साई ही कर दे। जिसके पास कुछ नहीं हो जोकि कंगला हो वो तो मिलने की इच्छा से आयेगा, जिसके पास हो वो इस भय से आयेगा की उसका कोई छीन न ले।

कोई यह नहीं जानना चाहता की साई जीवन भर मस्जिद में रहा, नमाज अदा करने और माँस खाने के उसे शोक थे। कोई यह भी नहीं जानना चाहता था की अध्यातम मार्किट गुरु साई बाबा के सभी चमत्कार महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव तक ही क्यूँ सीमित रहे जबकि पूरे भारत में उसके जीवन काल में अंग्रेजों का राज रहा और करोड़ो भारतीय भयानक अकाल,प्लेग, भूकंप ,हैजा और अगर फिर भी कोई बच गए तो अंग्रेजों के अत्याचार से अपनी अकाल मौत मारे गए।

बोलो अध्यातम मार्किट गुरु साई बाबा की जय।

२. शनि देव की मूर्ति- चंद वर्षों पहले तक तो कोई उसे भगवान ही नहीं मानता था, अब तो हजारों लीटर के सरसों के तेल से शनि की मूर्ति को स्नान करवाया जाता हैं। गज़ब भगवान हैं चंद सिक्कों और तेल से क्रोध एक दम शांत। अरे भई यह तो सोचो की ईश्वर को कब क्रोध आने लगा। जो जैसा करेगा वो वैसा भरेगा।

सारे हफ्ते भर भर कर पाप करो और वीकेन्ड पर शनिवार को जाकर तेल चढ़ा कर रिश्वत दे दो की शनि महाराज बचा लेना।

और हा शनि मंदिर से घर जाते ही दोस्त लोग मुर्गे-दारू (कहीं कहीं लड़की) के साथ आपका इन्तजार भी कर रहे होंगे। उन्हें मत भूलना।

यह हो गया हो गया अध्यातम गंगा में स्नान।

३. हनुमान जी की मूर्ति- एक समय बल, ब्रहमचर्य , नैतिक आचार के प्रतीक के रूप में वीर वर हनुमान जी ने ख्याति प्राप्त की थी।

आज तो साई और शनि के आगे इन बेचारों की मार्किट डाउन हैं।

मर्यादा पुरुषोतम श्री राम चन्द्र जी महाराज और उनके महान चरित्र से तो सन २००० के बाद पैदा हुई एक पूरी पीढ़ी लगभग अनभिज्ञ ही हैं। उनके लिए तो साई और शनि ही भगवान हैं। थोड़े बहुत के लिए यह अंग्रेजी में ape god हैं।

थोड़ी बहुत कृपा कार्टून चैनल ने हनुमान जी के कार्टून बना कर कर दी हैं पर व्यावहारिक रूप से तो मंगलवार के केवल एक ही महत्व हमें दीखता हैं। वह हैं इस दिन अंडे,माँस और शराब को हाथ नहीं लगाना।

यह भी कुछ कुछ वैसा ही हैं की सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। पूरे हफ्ते जम कर ऐश मंगलवार को दोनों कान पकड़ लो की आज नहीं खायेंगे। शायद समझ रहे होते हैं की ईश्वर को बनाना हैं जबकि सत्य यह हैं की यह अपने आपको बेवकूफ बनाने से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

वैसे तो मंगलवार के दिन ज्यादा भीड़ नहीं होगी पर फिर भी कुछ भूले भटके आ जायेंगे इसलिए हमारे बिज़नस प्लान में हनुमान को हमने शामिल कर लिया हैं।

४. बेचारे शिव भगवान को सोमवार का दिन मिला हैं। हफ्ते की शुरुआत हैं। बोनी का दिन होता हैं।

पहले बहुत लोग आते थे। कुँवारे सुन्दर पत्नी माँगने आते थे, लडकियाँ १६ सोमवार का व्रत रखकर अपने लिए पति मांगती थी।

अब धीरे धीरे इनकी मार्किट पर भी साई बाबा का कब्ज़ा हो गया हैं।

घरों से तो पिता शिव की जगह उनके पुत्र गणेश ने ले ली हैं।

मंदिरों में साई बाबा आ विराजे हैं।

कैलाश पर चीन का कब्ज़ा हो गया हैं।

अब जंगल ही ठिकाना बचा हैं। वो भी कटते जा रहे हैं।

वर्ष में केवल सावन में अपनी खोई प्रतिष्ठा वापिस मिलती हैं। जब भंग का नशा करने वालो के मुख से बम बम सुनाई देता हैं।

सोमवार,मंगलवार, वीरवार और शनिवार के अलावा रविवार तो फुल डे आना जाना रहेगा। इसलिए बिज़नस बढ़िया रहने की उम्मीद हैं।

केवल बुधवार और शुक्रवार को रेस्ट डे मिलेगा जोकि आवश्यक हैं।
अगर इससे भी टारगेट यानि की लक्ष्य की पूर्ति न हो तो नवरात्रों में वर्ष में दो बार देवी की मूर्ति लगाने से नो दिन बहार ही बहार रहेगी।

ज्यादा मन करे तो देवी की भेंटें गाने वाले सलीम को बुला लेना। चन्दा खूब जमा हो जायेगा।

इससे भी मन न भरे तो साई संध्या करवा लो। और बुलाओ किसे ?

हिन्दुओं को कैसे मुसलमान बनाया जाये इस विषय पर लिखी गयी पुस्तक “दाइये इस्लाम” के लेखक, गाँधी को इस्लाम की दावत के लेखक निजामुद्दीन दरगाह के ख़वाजा हसन निजामी के खादिमों में से एक के वंशज हमसर हयात निज़ामी को बुलाकर साई संध्या करवाना हिन्दू समाज में सेक्युलर होने का प्रतीक बन गया हैं।

अरे मुर्ख हिन्दू कौम तुझे १००० साल से भी ज्यादा पिटने के बाद, भारत को दो टुकड़े करवाने के बाद, करोड़ो हिन्दू भाइयों को इस्लाम/ईसाइयत ग्रहण करवाने के बाद भी अगर यह समझ नहीं आया की आर्य वैदिक धर्म क्या हैं तो कब आयेगा।

इसलिए आँखे खोल और पहचान की तेरा असली शत्रु तेरी अज्ञानता हैं जिसके कारण अन्धविश्वास और पाखंड को अपनाकर तू अपना नाश करने पर तुला हुआ हैं।

यह लेख हिन्दू समाज में हो रही अध्यात्मिक दुर्गति को दर्शाता हैं।

पाठक निष्पक्ष रूप से पढ़ कर चिंतन मनन करे।

डॉ विवेक आर्य

हिन्दू समाज में अन्धविश्वास


bansal and superstitions

हिन्दू समाज में अन्धविश्वास

भारत सरकार के रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने अपने पद से भ्रष्टाचार के कारण त्याग पत्र दे दिया हैं।

यह तो समय ही बताएगा की सत्य क्या हैं।

पर एक खबर और सामने आई की ज्योतिषियों की सलाह पर अपना पद बचाने के लिए उन्होंने बकरी की बलि दे दी फिर भी कुर्सी हाथ से चली गई।

मेरे जैसे सभी जिज्ञासु व्यक्तियों के मन में कुछ शंकाओं ने जन्म ले लिया।

समझदार लोग हमारी इन शंकाओं का समाधान कर हम पर कृपा करेगे ऐसा विचार हैं।

१. क्या बकरी, भेड़ आदि की बलि से किसी के सर पर जो विपत्ति होती हैं वह टल जाती हैं? रेलमंत्री के मामले में तो बलि देने के बाद भी उनकी कुर्सी चली गयी।

२. एक निरीह, मूक प्राणी का क्या दोष हैं जिसके लिए उसकी बलि दे दी जाती हैं?

३. क्या बकरी आदि की बलि देने से पाप कर्म नहीं कहा जायेगा? जिसका फल भोगना अनिवार्य हैं।

४. जब कर्म-फल का वैदिक सिद्धांत वेदों में स्पष्ट कहा गया हैं की जो जैसा करेगा वैसा भरेगा तो उसे नकार कर बलि प्रथा, जादू-टोना आदि अन्धविश्वास अज्ञानता के प्रतीक नहीं तो और क्या हैं?

५. जब सोमनाथ, गुजरात के मंदिर पर आक्रमण किया गया तब मंदिर के पूजारियों ने वीर राजपूतों को मुहम्मद गज़नी का सामना करने से यह कहकर मना कर दिया था की मंदिर युद्ध होने से अपवित्र हो जायेगा। मंदिर की रक्षा और शत्रुओं के संहार के लिए भगवान शिव भैरव और नन्दी को भेज देंगे। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और मंदिर विधर्मियों द्वारा नष्ट कर दिया गया। अन्धविश्वास के कारण हमें इतने दुःख और कष्ट भोगने पड़े हैं फिर भी हम अन्धविश्वास को त्यागने का क्यूँ नाम नहीं लेते।

६. कई बार सुनने में आता हैं की एक तांत्रिक ने एक महिला जिसके पुत्र उत्पन्न पैदा नहीं होता था के लिए दूसरे के पुत्र की बलि दे दी। क्या मर्यादावान समाज में इस प्रकार के अन्धविश्वास के लिए कोई स्थान हैं?

७. हिन्दू समाज के अन्धविश्वास को देखकर अनेक विधर्मी उनका परिहास करने का , निंदा करने का प्रयास करते हैं जिससे अनेक बुद्धिजीवी लोग हिन्दू धर्म को त्यागकर या तो विधर्मी बन जाते हैं अथवा नास्तिक बनकर भोगवादी बन जाते हैं। इससे हिन्दू समाज के बड़े पैमाने पर क्षति हुई हैं और हो रही हैं।

८. समाज में पठित वर्ग एक से बढ़कर एक अन्धविश्वास में लिप्त हैं जिसके कारण उनका अनुसरण करने वाले अपठित वर्ग में यह बीमारी विकराल रूप धारण कर लेती हैं। एक भ्रष्टाचारी अपनी काली कमाई के भय के कारण बढ़ चढ़ कर अन्धविश्वास में भाग लेता हैं। उसकी काले धन से हुई आर्थिक उन्नति को देखकर सामान्य वर्ग इस भ्रम में पड़ जाता हैं की उसकी उन्नति का कारण अन्धिविश्वास के रूप में किया गया कोई कार्य हैं। जबकि सत्य यह हैं की ईमानदारी से किया गया परिश्रम सदा सुख देने वाला हैं।

९. कोई भी अन्धविश्वास विज्ञान के अनुकूल नहीं हैं। फिर इस पाखंड में लिप्त होना अज्ञानता नहीं तो और क्या हैं। वेदों में पशु बलि आदि के विधान के बारे में जो बताया जाता हैं वो असत्य हैं क्यूंकि वेदों में सभी प्राणीयों के साथ मित्र के समान व्यवहार करने का आदेश हैं नाकि उनकी बलि देने का आदेश हैं। मध्य काल में कुछ मांस भोगी अज्ञानी लोगो ने वेद मन्त्रों के गलत अर्थ निकल कर वेदों में बलि प्रथा, माँसाहार और जादू टोन आदि को दर्शाने का असफल प्रयास किया हैं।

१० . मनुष्य के जीवन का उद्देश्य दुखों से छुटना हैं और सुख की प्राप्ति हैं। अन्धविश्वास का केवल और केवल एक ही परिणाम हैं वह हैं दुःख। धर्म की मूल परिभाषा पुरुषार्थ करते हुए जीवन में श्रेष्ठ कार्य करते हुए मोक्ष अर्थात सुख को प्राप्त करना हैं।

आशा हैं की पाठक अन्धविश्वास के विरुद्ध आवाज़ उठायेंगे जिससे अज्ञान का नाश हो और सत्य की स्थापना हो सके।

डॉ विवेक आर्य

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।


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चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।‍‍‌

जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है,जिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है
जिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका है,उसी देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका है
तवारीख के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो । नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके पर्वत खेत घाटियों में अक्षय क्षमता है,जिसकी नदियों की भी हम पर माँ जैसी ममता है
जिसकी गोद भरी रहती है, माटी सदा सुहागिन,ऐसी स्वर्ग सरीखी धरती पीड़ित या हतभागिन ?
तो चाहे तुम रेशम धारो या पहने खादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके लहराते खेतों की मनहर हरियाली से,रंग-बिरंगे फूल सुसज्जित डाली-डाली से
इस भौतिक दुनिया का भार ह्रदय से उतरा है,उसी धरा को अगर किसी मनहूस नज़र से खतरा है
तो दौलत ने चाहे तुमको हर सुविधा लादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

अगर देश मर गया तो बोलो जीवित कौन रहेगा?और रहा भी अगर तो उसको जीवित कौन कहेगा?
माँग रही है क़र्ज़ जवानी सौ-सौ सर कट जाएँ,पर दुश्मन के हाथ न माँ के आँचल तक आ पाएँ
जीवन का है अर्थ तभी तक जब तक आज़ादी हो।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

चाहे हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिरी वासी हो, चाहे राजा रंगमहल के हो या सन्यासी हो
चाहे शीश तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे,चाहे मंदिर गुरूद्वारे में भक्ति तुम्हारी जागे
भले विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो। नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

वन्दे मातरम गीत और राष्ट्रीयता


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अभी हाल ही में बसपा संसद शाफिकुर्रहमान बर्क द्वारा संसद में सत्र के समापन के दौरान वन्दे मातरम के गान के समय राष्ट्रीय गीत का बहिष्कार यह कहकर कर दिया गया की वन्दे मातरम का गान करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ हैं और मैं करोड़ो मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं कर सकता। गौरतलब हैं की उक्त सांसद का यह चौथा कार्यकाल हैं एवं वह इससे पहले ऐसे सत्रों में भाग लेते आये हैं। दुनिया में शायद भारत ही ऐसा पहल मुल्क होगा जिसमे राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान न केवल दोनों अलग अलग हैं अपितु ऐसा पहला मुल्क भी होगा जिसमें लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए सांसद ने भारतीय संविधान के अंतर्गत अपने पद और उसकी गरिमा की शपथ ग्रहण करने के बाद उसकी अवहेलना करने का दुस्साहस भी किया हैं। देखा जाये तो यह कदम भारतीय संविधान की अनुपालना न करने के कारण दंडनीय होना चाहिए। परन्तु हमारे देश सबसे बड़ा दुर्भाग्य अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के नाम पर तुष्टिकरण का भी हैं। अगर उक्त सांसद के विरुद्ध कोई भी राजनितिक दल (भाजपा को छोड़कर) सख्त कदम उठाने की मांग करता हैं तो उसके अन्य मुस्लिम सांसद एवं मुस्लिम वोटों के नाराज होने का खतरा हैं। पर विषय यहाँ पर नाराज होने का नहीं हैं अपितु तुष्टिकरण के नाम पर हर नाजायज माँग को दूसरो के सर पर थोपने की मानसिक बीमारी का हैं चाहे उसके लिए भारतीय संविधान को भी नकार देना कहाँ तक जायज हैं।

भारत जैसे विशाल देश को हजारों वर्षों की गुलामी के बाद आजादी के दर्शन हुए थे। वन्दे मातरम वह गीत हैं जिससे सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और अर्ध शताब्दी तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। इस गीत के कारण बंग-भंग के विरोध की लहर बंगाल की खाड़ी से उठ कर इंग्लिश चैनल को पार करती हुई ब्रिटिश संसद तक गूंजा आई थी। जो गीत गंगा की तरह पवित्र , स्फटिक की तरह निर्मल और देवी की तरह प्रणम्य हैं उस गीत की तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाना राष्ट्रीयता का परिहास ही तो हैं जबकि इतिहास इस बात का गवाह हैं की भारत का विभाजन इसी तुष्टिकरण के कारण हुआ था। इस लेख के माध्यम से हम वन्दे मातरम के इतिहास को समझने का प्रयास करेगे।

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वन्दे मातरम के रचियता बंकिम चन्द्र

बहुत कम लोग यह जानते हैं की वन्दे मातरम के रचियता बंकिम बाबु का परिवार अंग्रेज भगत था। यहाँ तक की उनके पैतृक गृह के आगे एक सिंह की मूर्ति बनी हुई थी जिसकी पूँछ को दो बन्दर खिंच रहे थे पर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। यह सिंह ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक था जबकि बन्दर भारतवासी थे। ऐसा मानसिकता वाले घर में बंकिम जैसे राष्ट्रभक्त का पैदा होना निश्चित रूप से उस समय की क्रांति कारी विचारधारा का प्रभाव कहा जायेगा। आनंद मठ में बंकिम बाबु ने वन्देमातरम गीत को प्रकाशित किया। आनंद मठ बंगाल में नई क्रांति के सूत्रपात के रूप में उभरा था।

congress session 1885

congress session 1885

वन्दे मातरम और कांग्रेस

कांग्रेस की स्थापना के द्वितीय वर्ष १८८६ में ही कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। १८९६ में कांग्रेस के १२ वें अधिवेशन में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा गाया गया था। लोक मान्य तिलक को वन्दे मातरम में इतनी श्रद्धा थी की शिवाजी की समाधी के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। १९०१ के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम गया जाने लगा।

६ अगस्त १९०५ को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में वन्दे मातरम को विरोध के रूप में करीब तीस हज़ार भारतीयों द्वारा गाया गया था। स्थान स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी कपड़ा और अन्य वस्तुओं का उपयोग भारतीय जनमानस द्वारा किया जाने लगा।

यहाँ तक की बंग भंग के बाद वन्दे मातरम संप्रदाय की स्थापना भी हो गई थी। वन्दे मातरम की स्वरलिपि रविन्द्र नाथ टैगोर जीने भी दी थी।

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राष्ट्र कवि/लेखक और वन्दे मातरम

राष्ट्रीय कवियों और लेखकों द्वारा अनेक रचनाएँ वन्दे मातरम को प्रसिद्द करने के लिए रची गई जो उसके महत्व की सिद्ध करती हैं।

स्वदेशी आन्दोलन चाई आत्मदान

वन्दे मातरम गाओ रे भाई – श्री सतीश चन्द्र

मागो जाय जेन जीवन चले

शुधु जगत माझे तोमार काजे

वन्दे मातरम बले- श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद

भइया देश का यह क्या हाल

खाक मिटटी जौहर होती सब

जौहर हैं जंजाल बोलो वन्दे मातरम-श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद

अक्टूबर १९०५ में ‘वसुधा’ में जितेंदर मोहम बनर्जी ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था।

१९०६ के चैत्र मास के बम्बई के ‘बिहारी अखबार’ में वीर सावरकर ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था।

२२ अप्रैल को मराठा में ‘तिलक महोदय’ ने वन्दे मातरम पर ‘शोउटिंग ऑफ़ वन्दे मातरम’ के नाम से लेख लिखा था।

कुछ ईसाई लेखक वन्दे मातरम की प्रसिद्धि से जल भून कर उसके विरुद्ध अपनी लेखनी चलते हैं जैसे

पिअरसन महोदय ने तो यहाँ तक लिख दिया की मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल हैं और बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया हैं।

अपनी जन्म भूमि को माता या जननी कहने की गरिमा तो भारत वर्ष में उस काल से स्थापित हैं जब धरती पर ईसाइयत या इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।

वेदों में इस तथ्य को इस प्रकार ग्रहण किया गया हैं –

वह माता भूमि मुझ पुत्र के लिए पय यानि दूध आदि पुष्टि प्रद पदार्थ प्रदान करे। – अथर्ववेद १२/१/२०

भूमि मेरी माता हैं और मैं उसका पुत्र हूँ। – अथर्ववेद १२-१-१५

वाल्मीकि रामायण में “जननी जन्मभूमि ” को स्वर्ग के समान तुल्य कहा गया हैं।

ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला की वन्दे मातरम राजनैतिक डकैतों का गीत हैं।

english

वन्दे मातरम और बंगाल में कहर

बंगाल की अंग्रेजी सरकार ने कुख्यात सर्कुलर जारी किया की अगर कोई छात्र स्वदेशी सभा में भाग लेगा अथवा वन्दे मातरम का नारा लगाएगा तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा।

बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के सभी २०० छात्रों पर वन्दे मातरम का नारा लगाने के लिए ५-५ रुपये का दंड किया गया था।

पूरे बंगाल में वन्दे मातरम के नाम की क्रांति स्थापित हो गयी। इस संस्था से जुड़े लोग हर रविवार को वन्दे मातरम गाते हुए चन्दा एकत्र करते थे। उनके साथ रविन्द्र नाथ टैगोर भी होते थे। यह जुलुस इतना बड़ा हो गया की इसकी संख्या हजारों तक पहुँच गयी। १६ अक्टूबर १९०६ को बंग भंग विरोध दिवस बनाने का फैसला किया गया। उस दिन कोई भी बंगाली अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगा ऐसा निश्चय किया गया। बंग भंग के विरोध में सभा हुई और यह निश्चय किया गया की जब तक चूँकि सरकार बंगाल की एकता को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं इसके विरोध में हर बंगाली विदेशी सामान का बहिष्कार करेगा। हर किसी की जबान पर वन्दे मातरम का नारा था चाहे वह हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो, चाहे ईसाई हो।

वन्दे मातरम से आम जनता को कितना प्रेम हो गया था इसका उदहारण हम इस वाकया से समझ सकते हैं। किसी गाँव में, जो ढाका जिले के अंतर्गत था, एक आदमी गया और कहने लगा की में नवाब सलीमुल्लाह का आदमी हूँ। इसके बाद वन्दे मातरम गाने वाले और नारे लगाने वालो की निंदा करने लगा। इतना सुन्ना था की पास की एक झोपड़ी से एक बुढ़िया झाड़ू लेकर बहार आई और बोली वन्दे मातरम गाने वाले लड़को ने मुझे बचाया हैं। वे सब राजा बेटा हैं। उस वक्त तेरा नवाब कहाँ था?

फूलर के असफल प्रयास

फूलर उस समय बंगाल का गवर्नर बना। वह अत्यन्त छोटी सोच वाला व्यक्ति था। उसने का की मेरी दो बीवी हैं एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम और मुझे दूसरी ज्यादा प्रिय हैं। फुलर का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था। फुलर के इस घटिया बयान के विपक्ष में क्रान्तिकारी और कवि अश्वनी कुमार दत ने अपनी कविता में लिखा

“आओ हे भारतवासी! आओ, हम सब मिलकर भारत माता के चरणों में प्रणाम करें। आओ! मुसलमान भाइयों, आज जाती पाती का झगड़ा नहीं हैं। इस कार्य में हम सब भाई भाई हैं।इस धुल में तुम्हारे अकबर हैं और हमारे राम हैं।”

फूलर ने बंगाल के मुस्लिम जमींदारों को भड़का कर दंगा करवाने का प्रयास किया पर उसके प्रयास सफल न हुए।

अंग्रेज सरकार के मन में वन्दे मातरम को लेकर कितना असंतोष था की उन्होंने सभी विद्यालाओं को सरकारी आदेश जारी किया की सभी छात्र अपनी अपनी नोटबुक में ५०० बार यह लिखे की “वन्दे मातरम चिल्लाने में अपना समय नष्ट करना मुर्खता और अभद्रता हैं। ”

वारिसाल में कांग्रेस का अधिवेशन और वन्दे मातरम

१४ अप्रैल १९०६ के दिन वारिसाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयता से लाठीचार्ज किया। निर्दयता की हालत यह थी की एक मकान की खूंटी पर वन्दे मातरम लिखा था तो उस मकान को गिर दिया गया। १० -११ वर्ष का एक बालक रसोई में वन्देमातरम गा रहा था तो उसे घर से निकलकर कोर्ट के सामने चाबुक से पिता गया। दो हलवाइयों की दुकान पर यह नारा लिखा था तो उनके सर फोड़ दिए गए। सुरेंदर नाथ बनर्जी की गिरफ्तार कर २०० रुपये जुर्माने और अलग से कोर्ट की अवमानना पर २०० रुपये का दंड लेकर छोड़ दिया गया। इतनी निर्दयता के बावजूद भीड़ वन्दे मातरम का गान करते हुए अपने सभापति महोदयरसूल साहिब को लेकर सभास्थल पर पहुँच गई।

मंच पर हिन्दू नेताओं के साथ मुस्लमान नेताओं में सर्वश्री इस्माइल चौधरी, मौलवी अब्दुल हुसैन, मौलवी हिदायत बक्श, मौलवी हमिजुद्दीन अहमद, मौलवी दीन मुहम्मद, मौलवी मोथार हुसैन, मौलवी मोला चौधरी उपस्थित थे। वन्दे मातरम के गान से सभा का आरम्भ हुआ था। सभापति महोदय ने देश की आज़ादी के लिए सभी हिन्दू-मुसलमान को आपस में मिलकर लड़ने का आवाहन किया।

इतने में सुरेंदर नाथ बनर्जी अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर जा पहुँचे जिससे वन्दे मातरम के गगन भेदी नारों के साथ सम्पूर्ण सभा स्थल गूँज उठा। सभा में ब्रिटिश सरकार के द्वारा वन्दे मातरम को लेकर किये जा रहे अत्याचार को घोर निंदा की गयी। जिस स्थान पर सुरेंदरनाथ बनर्जी को वन्दे मातरम गाने के लिए गिरफ्तार किया गया था उस स्थान पर वन्दे मातरम स्तंभ बनाने के प्रस्ताव को सभा में पारित किया गया। अगले दिन के सभी समाचार पत्र वरिसाल के वन्दे मातरम संघर्ष की प्रशंसा और अंग्रेज सरकार की निंदा से भरे पड़े थे। वारिसाल की घटना के कारण लार्ड कर्जन को भारत के वाइसराय के पद से त्याग देना पड़ा।

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वन्दे मातरम और योगी अरविन्द

वन्दे मातरम के नाम से पत्र आरंभ हुआ जिसे पहले विपिन चन्द्र पाल ने सम्पादित किया बाद में श्री अरविन्द ने। श्री अरविन्द ने इस पत्र से यह भली भांति सिद्ध कर दिया की तलवार से ज्यादा तीखी लेखनी होती हैं और उसकी ज्वाला से क्रूर शाशन भी भस्मीभूत हो सकता हैं। अरविन्द के पत्र के बारे में स्टेट्समैन अखबार लिखता हैं की “अखबार की हर लाइन के बीच भरपूर राजद्रोह दीखता हैं पर वह इतनी दक्षता से लिखा होता हैं की उस पर क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती। ”

श्री अरविन्द ने वन्दे मातरम गीत के बारे में कहा हैं की बंकिम ने ही स्वदेश को माता की संज्ञा दी हैं। वन्दे मातरम संजीवनी मंत्र हैं। हमारी स्वाधीनता का हथियार वन्दे मातरम हैं। उन्होंने कहा की वन्दे मातरम साधारण गीत नहीं हैं। बल्कि एक ऐसा मंत्र हैं जो हमें मातृभूमि की वंदना करने की सीख देता हैं। उनकें इस व्यक्तव्य के कारण ही बंग-भंग के क्रांतिकारियों के लिए वन्दे मातरम का यह नारा वह गीत मंत्र बन गया।

अपनी पत्नी को ३० अगस्त १९०८ को एक पत्र में श्री अरविन्द लिखते हैं “मेरा तीसरा पागलपन यह हैं की जहाँ दुसरे लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ,खेत,मैदान,पहाड़, जंगल और नदी समझते हैं , वहां मैं अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझता हूँ। उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ।माँ की छाती पर बैठ कर अगर कोई उसका खून चूसने लगे तो बीटा क्या करता हैं ? क्या वह चुपचाप बैठा हुआ भोजन करता हैं या स्त्री पुरुष के साथ रंगरलिया बनता हैं या माँ को बचाने के लिए दौड़ जाता हैं।”

श्री अरविन्द को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे देश में वन्दे मातरम की लहर चल पड़ी।

१९०६ को धुलिया, महाराष्ट्र में वन्दे मातरम के नारे से सभा ही रूक गयी। नासिक में वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिस जिस ने प्रतिबन्ध को तोडा तो उसे पीटा गया गया। कई गिरफ्तारियाँ हुई। इस कांड का तो नाम ही वन्दे मातरम कांड बन गया।

फरवरी १९०७ को तमिल नाडू में मजदूरों ने हड़ताल कर दी और ब्रिटिश नागरिकों को घेर कर उन्हें भी वन्दे मातरम के नारे लगाने को बाध्य किया।

मई १९०७ को रावलपिंडी में भी स्वदेशी के नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवकों ने वन्दे मातरम के नारे को लगाते हुए लाठियाँ खाई।

२६ अगस्त ,१९०७ को वन्दे मातरम के एक लेख के कारण बिपिन चन्द्र पाल को अदालत में सजा हुई तो उनका स्वागत हजारों की भीड़ ने वन्दे मातरम से किया। यह देखकर पुलिस अँधाधुंध लाठीचार्ज करने लगी। यह देखकर एक १५ वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ने एक पुलिस वाले मुँह पर मुक्का मार दिया। उस वीर बालक को १५ बेतों की सजा सुनाई गई थी। सुशील की इस सजा की प्रशंसा करते हुए संध्या में एक लेख छपा “सुशील की कुदान भरी, फिरंगी की नानी मरी”

सुशील युगांतर पार्टी के सदस्य थे। उनकी चर्चा सुरेंदर नाथ बनर्जी तक पहुँची तो उन्होंने उसे सोने का तमगा देकर सम्मानित किया।

अब युगांतर पार्टी के सदस्यों ने सुशील को सजा देने वाले अत्याचारी किंग्स्फोर्ड को यमालय भेजने की ठानी। यह कार्य प्रफुल्ल चन्द्र चाकी और खुदी राम बोस को सोंपा गया।

षड़यंत्र असफल हो जाने पर चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम ने फाँसी का फन्दा चूम कर सबसे कम उम्र में शहीद होने का सम्मान प्राप्त किया। इसी केस में श्री अरविन्द को भी सजा हुई थी।

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वन्दे मातरम और राष्ट्रीय झंडा

कांग्रेस का लम्बे समय तक कोई निजी झंडा नहीं था।कांग्रेस के अधिवेशन में यूनियन जैक को फहराकर भारत के अंग्रेज भगत प्रसन्न हो जाते थे। १९०६ में कोलकता में कांग्रेस के अधिवेशन में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद १८ अक्टूबर, १९०७ को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली ” यह हैं भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा हैं। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका हैं। सदस्यगन, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ की आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे। ”

सर्व प्रथम झंडे पर वन्दे मातरम को अंकित करने से पाठक उस काल में वन्दे मातरम के भारतीय जन समुदाय पर प्रभाव को समझ सकते हैं।

वन्दे मातरम का भारत व्यापी प्रभाव

मोतीलाल नेहरु ने जवाहरलाल नेहरु को १९०५ में एक पत्र में लिखा था की हम ब्रिटिश भारत के इतिहास की सबसे संकट पूर्ण अवधि से गुजर रहे हैं। इलाहाबाद में भी वन्दे मातरम आम अभिनन्दन बन गया हैं। यदि अभियान चलता रहा तो यहाँ लौटने पर भारत को , जब तुम गये, उससे बिलकुल बदला पाओगे।

२५ नवम्बर १९०५ को ट्रिब्यून अखबार लिखता हैं “बंगाल में लोगो ने वन्दे मातरम का जयघोष शुरू किया हैं। इन शब्दों का अर्थ हैं माता की वन्दना। इसमें कुछ भी भयंकर नहीं हैं। फिर दमनशाही द्वारा वन्दे मातरम की मनाही क्यूँ हैं? अब तो पंजाब में सुशिक्षित लोग एक दुसरे से भेंट होने पर वन्दे मातरम कहकर अभिनन्दन करते हैं। इस प्रकार सारे हिंदुस्तान में असंख्य मुखों से निरन्तर निकलते वन्दे मातरम को बंद करने में सरकार को कितने सिपाहियों और अधिकारीयों की आवश्यकता होगी? पूर्वी बंगाल की जनता के साथ सारे हिंदुस्तान की सहानभूति हैं।

 जब हैदराबाद के निज़ाम के धर्मान्ध अत्याचारों के विरुद्ध आर्य समाज ने १९३९ में हैदराबाद सत्याग्रह किया था तब जेल में रामचन्द्र के नाम से एक आर्यवीर को बंद कर दिया गया था। अपनी क्रूरता की धाक जमाने के लिए जेल में आर्य सत्याग्रहियों पर अत्याचार किया जाता था। जेल में दरोगा जब भी वीर रामचंद्र को बेंत मारते तो उनके मुख से वन्दे मातरम का नारा निकलता था। दरोगा जब तक मरते रहते जब तक की रामचंद्र बेहोश न हो गए पर उनके मुख से बेहोशी में भी नारा निकलता रहा।

ऐसा अनुराग था देश और धर्म प्रेमियों को वन्दे मातरम के साथ।

वन्दे मातरम विदेश में

जुलाई १९०९ को मदन लाल धींगरा को लन्दन में जब फाँसी दी गई तो उनके अंतिम शब्द थे “वन्दे मातरम”।

१९०९ को जिनेवा से एक पत्रिका वन्दे मातरम का का प्रकाशन आरंभ हुआ। अपने प्रथम अंक में पत्रिका ने कहा ‘विदेशी अत्याचार के विरुद्ध हमारे बहादुर और बुद्धिमान नेताओं ने बंगाल में जो यशस्वी अभियान शुरू किया हैं, वन्दे मातरम के माध्यम से हम उसे पूर्ण शक्ति और दृढ़ता के साथ में चलायेगे ‘

कनाडा से आ रहे जहाज कमागातामारू के झंडे पर वन्दे मातरम, सत श्री अकाल और अल्लाह हो अकबर के नारे लिखे थे।

साउथ अफ्रीका से जब महात्मा गाँधी भारत लौटे तो उन्होंने भारत आकार वन्दे मातरम गीत की प्रशंसा करी थी।(हरिजन १ जुलाई १ ९९३८)

१९२२ में जब गोखले अफ्रीका गए तो हजारों भारत वासियों ने उनका स्वागत वन्दे मातरम से किया था।

१९३७ में तुर्की के अदान नगर में भारतीय मस्जिद पर वन्दे मातरम लिखा था। मस्जिद पर भारतीय तिरंगा लगा था और हर नमाज के साथ वन्दे मातरम का घोष किया जाता था।

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भारतीय क्रांतिकारी और वन्दे मातरम

सन १९२० में लाला लाजपत राय ने दिल्ली से दैनिक वन्दे मातरम का प्रकाशन शुरू किया था।

सन १९३० में चन्द्र शेखर आजाद अपने पिता को पत्र लिखने समय वन्दे मातरम सबसे ऊपर लिखते हैं।

सन १९२० का असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह में भी वन्दे मातरम का बोलबाला था।

रामचंद्र बिस्मिल ने काकोरी कांड में फाँसी पर लटकने से पहले वन्दे मातरम कहा था।

चटगांव सशस्त्र संघर्ष में वीर सूर्यसेन को फाँसी देने से पहले जब भी मार पड़ती तो वे वन्दे मातरम का जय घोष करते थे। उन्हें इतना मार गया था की वे बेहोश हो गए और अचेत अवस्था में ही उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था।

इसके अतिरिक्त अनेक सन्दर्भ हमे भारत की आज़ादी की लड़ाई में वन्दे मातरम को प्रेरणा के स्रोत्र के रूप में पाते हैं।

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वन्दे मातरम का विरोध

वन्दे मातरम का विरोध जो लोग कर रहे हैं उनका अरबी, फारसी भाषा के शब्द मादरे वतन (हे माता तुझे सलाम करता हूँ), उम्मु कौरा (ग्राम्य जननी),उम्मुल मोमेनीन (विश्वासियो की जननी) और उम्मुल कैताब (ग्रन्थ जननी) आदि शब्द के बारे में उनका क्या कहना हैं।

कुछ मुसलमानों ने जो नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नारे जय हिन्द का भी विरोध किया था पर वन्दे मातरम की तरह यह नारा धार्मिक नहीं अपितु देश भक्ति को बुलंद करने के लिए था।

अब बर्क साहब जीवन भर इस्लामिक टोपी के स्थान पर गाँधी टोपी लगाते आये हैं। क्या यह इस्लाम की अवमानना नहीं हैं? नहीं क्यूंकि गाँधी टोपी आज़ादी की लड़ाई की , संघर्ष के प्रतीक के रूप में हमारा मार्ग दर्शन करती हैं। उसी प्रकार वन्दे मातरम का गान भी इस्लाम की अवमानना नहीं हैं अपितु राष्ट्रीयता की भावना का सम्मान हैं जो की इस्लाम की मान्यताओं के कहीं से भी विपरीत नहीं हैं। और अगर ऐसा होता तो अपनी माँ का सम्मान करना भी इस्लाम की शिक्षा के विरुद्ध होता जो असत्य हैं।

ब्रिटिश काल में उन क्रांतिकारियों से पूछा जाये की वन्दे मातरम का उनके लिए क्या महत्व हैं तब वे यही कहेंगे की वन्दे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा हैं , उसके प्राण हैं और उसके लिए सर्वस्व अर्पण हैं।

डॉ विवेक आर्य

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नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।‍‍‌जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है,जिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है
जिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका है,उसी देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका है
तवारीख के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो । नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके पर्वत खेत घाटियों में अक्षय क्षमता है,जिसकी नदियों की भी हम पर माँ जैसी ममता है
जिसकी गोद भरी रहती है, माटी सदा सुहागिन,ऐसी स्वर्ग सरीखी धरती पीड़ित या हतभागिन ?
तो चाहे तुम रेशम धारो या पहने खादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके लहराते खेतों की मनहर हरियाली से,रंग-बिरंगे फूल सुसज्जित डाली-डाली से
इस भौतिक दुनिया का भार ह्रदय से उतरा है,उसी धरा को अगर किसी मनहूस नज़र से खतरा है
तो दौलत ने चाहे तुमको हर सुविधा लादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

अगर देश मर गया तो बोलो जीवित कौन रहेगा?और रहा भी अगर तो उसको जीवित कौन कहेगा?
माँग रही है क़र्ज़ जवानी सौ-सौ सर कट जाएँ,पर दुश्मन के हाथ न माँ के आँचल तक आ पाएँ
जीवन का है अर्थ तभी तक जब तक आज़ादी हो।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

चाहे हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिरी वासी हो, चाहे राजा रंगमहल के हो या सन्यासी हो
चाहे शीश तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे,चाहे मंदिर गुरूद्वारे में भक्ति तुम्हारी जागे
भले विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो। नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

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