शूरता की मिसाल – पंडित लेखराम आर्य मुसाफिर


डॉ विवेक आर्य

पंडित लेखराम इतिहास की उन महान हस्तियों में शामिल हैं जिन्होंने धर्म की बलिवेदी पर प्राण न्योछावर कर दिए. जीवन के अंतिम क्षण तक आप वैदिक धर्म की रक्षा में लगे रहे.. आपके पूर्वज महाराजा रंजित सिंह की फौज में थे इसलिए वीरता आपको विरासत में मिली थी. बचपन से ही आप स्वाभिमानी और दृढ विचारो के थे. एक बार आपको पाठशाला में प्यास लगी. मौलवी से घर जाकर पानी पीने की इजाजत मांगी. मौलवी ने जूठे मटके से पानी पीने को कहाँ. आपने न दोबारा मौलवी से घर जाने की इजाजत मांगी और न ही जूठा पानी पिया. सारा दिन प्यासा ही बिता दिया. पढने का आपको बहुत शोक था. मुंशी कन्हयालाल अलाख्धारी की पुस्तकों से आपको स्वामी दयानंद जी का पता चला. अब लेखराम जी ने ऋषि दयानंद के सभी ग्रंथो का स्वाध्याय आरंभ कर दिया. पेशावर से चलकर अजमेर स्वामी दयानंद के दर्शनों के लिए पंडित जी पहुँच गए. जयपुर में एक बंगाली सज्जन ने पंडित जी से एक प्रश्न किया था की आकाश भी व्यापक हैं और ब्रह्मा भी , दो व्यापक किस प्रकार एक साथ रह सकते हैं ? पंडित जी से उसका उत्तर नहीं बन पाया था. पंडित जी ने स्वामी दयानंद से वही प्रश्न पुछा. स्वामी जी ने एक पत्थर उठाकर कहा की इसमें अग्नि व्यापक हैं या नहीं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं, फिर कहाँ की क्या मिटटी व्यापक हैं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं, फिर कहाँ की क्या जल व्यापक हैं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं. फिर कहाँ की क्या आकाश और वायु ? मैंने कहाँ की व्यापक हैं, फिर कहाँ की क्या परमात्मा व्यापक हैं? मैंने कहाँ की व्यापक हैं.फिर स्वामी जी बोले कहाँ की देखो. कितनी चीजें हैं परन्तु सभी इसमें व्यापक हैं. वास्तव में बात यहीं हैं की जो जिससे सूक्षम होती हैं वह उसमे व्यापक हो जाती हैं. ब्रह्मा चूँकि सबसे अति सूक्षम हैं इसलिए वह सर्वव्यापक हैं. यह उत्तर सुन कर पंडित जी की जिज्ञासा शांत हो गयी. आगे पंडित जी ने पुछा जीव ब्रह्मा की भिन्नता में कोई वेद प्रमाण बताएँ. स्वामी जी ने कहाँ यजुर्वेद का ४० वां अध्याय सारा जीव ब्रह्मा का भेद बतलाता हैं. इस प्रकार अपनी शंकाओ का समाधान कर पंडित जी वापस आकार वैदिक धर्म के प्रचार प्रसार में लग गए.

शुद्धि के रण में

कोट छुट्टा डेरा गाजी खान (अब पाकिस्तान ) में कुछ हिन्दू युवक मुस्लमान बनने जा रहे थे. पंडित जी के व्याखान सुनने पर ऐसा रंग चड़ा की आर्य बन गए और इस्लाम को तिलांजलि दे दी.इनके नाम थे महाशय चोखानंद, श्री छबीलदास व महाशय खूबचंद जी ,जब तीनो आर्य बन गए तो हिन्दुओं ने उनका सामाजिक बहिष्कार कर दिया.कुछ समय के बाद महाशय छबीलदास की माता का देहांत हो गया. उनकी अर्थी को उठाने वाले केवल ये तीन ही थे. महाशय खूबचंद की माता उन्हें वापस ले गयी. आप कमरे का ताला तोड़ कर वापिस संस्कार में आ मिले. तीनो युवको ने वैदिक संस्कार से दाह कर्म किया. पौराणिको ने एक चल चली यह प्रसिद्ध कर दिया की आर्यों ने माता के शव को भुन कर खा लिया हैं. यह तीनो युवक मुसलमान बन जाये तो हिन्दुओं को कोई फरक नहीं पड़ता था परन्तु पंडित लेखराम की कृपा से वैदिक धर्मी बन गए तो दुश्मन बन गए. इस प्रकार की मानसिकता के कारण तो हिन्दू आज भी गुलामी की मानसिकता में जी रहे हैं.

जम्मू के श्री ठाकुरदास मुस्लमान होने जा रहे थे. पंडित जी उनसे जम्मू जाकर मिले और उन्हें मुसलमान होने से बचा लिया.

१८९१ में हैदराबाद सिंध के श्रीमंत सूर्यमल की संतान ने इस्लाम मत स्वीकार करने का मन बना लिया. पंडित पूर्णानंद जी को लेकर आप हैदराबाद पहुंचे. उस धनी परिवार के लड़के पंडित जी से मिलने के लिए तैयार नहीं थे. पर आप कहाँ मानने वाले थे. चार बार सेठ जी के पुत्र मेवाराम जी से मिलकर यह आग्रह किया की मौल्वियो से उनका शास्त्राथ करवा दे. मौलवी सय्यद मुहम्मद अली शाह को तो प्रथम बार में ही निरुत्तर कर दिया.उसके बाद चार और मौल्वियो से पत्रों से विचार किया. आपने उनके सम्मूख मुस्लमान मौल्वियो को हराकर उनकी धर्म रक्षा की.

वही सिंध में पंडित जी को पता चला की कुछ युवक ईसाई बनने वाले हैं. आप वहा पहुच गए और अपने भाषण से वैदिक धर्म के विषय में प्रकाश डाला. एक पुस्तक आदम और इव पर लिख कर बांटी जिससे कई युवक ईसाई होने से बच गए.

गंगोह जिला सहारनपुर की आर्यसमाज की स्थापना पंडित जी से दीक्षा लेकर कुछ आर्यों ने १८८५ में करी थी.कुछ वर्ष पहले तीन अग्रवाल भाई पतित होकर मुस्लमान बन गए थे. आर्य समाज ने १८९४ में उन्हें शुद्ध करके वापिस वैदिक धर्मी बना दिया. आर्य समाज के विरुद्ध गंगोह में तूफान ही आ गया. श्री रेह्तूलाल जी भी आर्यसमाज के सदस्य थे. उनके पिता ने उनके शुद्धि में शामिल होने से मन किया पर वे नहीं माने. पिता ने बिरादरी का साथ दिया. उनकी पुत्र से बातचीत बंद हो गयी. पर रेह्तुलाल जी कहाँ मानने वाले थे उनका कहना था गृह त्याग कर सकता हु पर आर्यसमाज नहीं छोड़ सकता हूँ. इस प्रकार पंडित लेखराम के तप का प्रभाव था की उनके शिष्यों में भी वैदिक सिद्धांत की रक्षा हेतु भावना कूट-कूट कर भरी थी.

घासीपुर जिला मुज्जफरनगर में कुछ चौधरी मुस्लमान बनने जा रहे थे. पंडित जी वह एक तय की गयी तिथि को पहुँच गए. उनकी दाड़ी बढ़ी हुई थी और साथ में मुछे भी थी. एक मौलाना ने उन्हें मुस्लमान समझा और पूछा क्यों जी यह दाढ़ी तो ठीक हैं पर इन मुछो का क्या राज हैं. पंडित जी बोले दाढ़ी तो बकरे की होती हैं मुछे तो शेर की होती हैं. मौलाना समाज गया की यह व्यक्ति मुस्लमान नहीं हैं. तब पंडित जी ने अपना परिचय देकर शास्त्रार्थ के लिए ललकारा. सभी मौलानाओ को परास्त करने के बाद पंडित जी ने वैदिक धर्म पर भाषण देकर सभी चौधरियो को मुस्लमान बन्ने से बचा लिया.

१८९६ की एक घटना पंडित लेखराम के जीवन से हमें सर्वदा प्रेरणा देने वाली बनी रहेगी. पंडित जी प्रचार से वापिस आये तो उन्हें पता चला की उनका पुत्र बीमार हैं. तभी उन्हें पता चला की मुस्तफाबाद में पांच हिन्दू मुस्लमान होने वाले हैं. आप घर जाकर दो घंटे में वापिस आ गए और मुस्तफाबाद के लिए निकल गए. अपने कहाँ की मुझे अपने एक पुत्र से जाति के पांच पुत्र अधिक प्यारे हैं. पीछे से आपका सवा साल का इकलोता पुत्र चल बसा. पंडित जी के पास शोक करने का समय कहाँ था. आप वापिस आकार वेद प्रचार के लिए वजीराबाद चले गए.

पंडित जी की तर्क शक्ति गज़ब थी. आपसे एक बार किसी ने प्रश्न किया की हिन्दू इतनी बड़ी संख्या में मुस्लमान कैसे हो गए. अपने सात कारण बताये. १. मुस्लमान आक्रमण में बलातपूर्वक मुसलमान बनाया गया २. मुसलमानी राज में जर, जोरू व जमीन देकर कई प्रतिष्ठित हिन्दुओ को मुस्लमान बनाया गया ३. इस्लामी कल में उर्दू, फारसी की शिक्षा एवं संस्कृत की दुर्गति के कारण बने ४. हिन्दुओं में पुनर्विवाह न होने के कारण व सती प्रथा पर रोक लगने के बाद हिन्दू औरतो ने मुस्लमान के घर की शोभा बढाई तथा अगर किसी हिन्दू युवक का मुस्लमान स्त्री से सम्बन्ध हुआ तो उसे जाति से निकल कर मुस्लमान बना दिया गया. ५. मूर्तिपूजा की कुरीति के कारण कई हिन्दू विधर्मी बने ६. मुसलमानी वेशयायो ने कई हिन्दुओं को फंसा कर मुस्लमान बना दिया ७. वैदिक धर्म का प्रचार न होने के कारण मुस्लमान बने.

अगर गहराई से सोचा जाये तो पंडित जी ने हिन्दुओं को जाति रक्षा के लिए उपाय बता दिए हैं, अगर अब भी नहीं सुधरे तो हिन्दू कब सुधरेगे.

पंडित जी और गुलाम मिर्जा अहमद

पंडित जी के काल में कादियान , जिला गुरुदासपुर पंजाब में इस्लाम के एक नए मत की वृद्धि हुई जिसकी स्थापना मिर्जा गुलाम अहमद ने करी थी. इस्लाम के मानने वाले मुहम्मद साहिब को आखिरी पैगम्बर मानते हैं, मिर्जा ने अपने आपको कभी कृष्ण, कभी नानक, कभी ईसा मसीह कभी इस्लाम का आखिरी पैगम्बर घोषित कर दिया तथा अपने नवीन मत को चलने के लिए नई नई भविष्यवानिया और इल्हामो का ढोल पीटने लगा.

एक उदहारण मिर्जा द्वारा लिखित पुस्तक “वही हमारा कृष्ण ” से लेते हैं इस पुस्तक में लिखा हैं – उसने (ईश्वर ने) हिन्दुओं की उन्नति और सुधर के लिए निश्कलंकी अवतार को भेज दिया हैं जो ठीक उस युग में आया हैं जिस युग की कृष्ण जी ने पाहिले से सुचना दे रखी हैं. उस निष्कलंक अवतार का नाम मिर्जा गुलाम अहमद हैं जो कादियान जिला गुरुदासपुर में प्रकट हुए हैं. खुदा ने उनके हाथ पर सहस्त्रो निशान दिखये हैं. जो लोग उन पर इमान लेट हैं उनको खुदा ताला बड़ा नूर बख्शता हैं. उनकी प्रार्थनाए सुनता हैं और उनकी सिफारिश पर लोगो के कास्ट दूर करता हैं. प्रतिष्ठा देता हैं. आपको चाहिए की उनकी शिक्षाओ को पढ़ कर नूर प्राप्त करे. यदि कोई संदेह हो तो परमात्मा से प्रार्थना करे की हे परमेश्वर? यदि यह व्यक्ति जो तेरी और से होने की घोषणा करता हैं और अपने आपको निष्कलंक अवतार कहता हैं. अपनी घोषणा में सच्चा हैं तो उसके मानने की हमे शक्ति प्रदान कर और हमारे मन को इस पर इमान लेन को खोल दे. पुन आप देखेगे की परमात्मा अवश्य आपको परोक्ष निशानों से उसकी सत्यता पर निश्चय दिलवाएगा. तो आप सत्य हृदय से मेरी और प्रेरित हो और अपनी कठिनाइयों के लिए प्रार्थना करावे अल्लाह ताला आपकी कठिनाइयों को दूर करेगा और मुराद पूरी करेगा. अल्लाह आपके साथ हो. पृष्ठ ६,७.८ वही हमारा कृष्ण.

पाठकगन स्वयं समझ गए होंगे की किस प्रकार मिर्जा अपनी कुटिल नीतिओ से मासूम हिन्दुओं को बेवकूफ बनाने की चेष्ठा कर रहा था पर पंडित लेखराम जैसे रणवीर के रहते उसकी दाल नहीं गली.

पंडित जी सत्य असत्य का निर्णय करने के लिए मिर्जा के आगे तीन प्रश्न रखे.

१. पहले मिर्जा जी अपने इल्हामी खुदा से धारावाही संस्कृत बोलना सीख कर आर्यसमाज के दो सुयोग्य विद्वानों पंडित देवदत शास्त्री व पंडित श्याम जी कृष्ण वर्मा का संस्कृत वार्तालाप में नाक में दम कर दे.

२. ६ दर्शनों में से सिर्फ तीन के आर्ष भाष्य मिलते हैं. शेष तीन के अनुवाद मिर्जा जी अपने खुदा से मंगवा ले तो मैं मिर्जा के मत को स्वीकार कर लूँगा.

३. मुझे २० वर्ष से बवासीर का रोग हैं . यदि तीन मास में मिर्जा अपनी प्रार्थना शक्ति से उन्हें ठीक कर दे तो में मिर्जा के पक्ष को स्वीकार कर लूँगा.

पंडित जी ने उससे पत्र लिखना जारी रखा. तंग आकर मिर्जा ने लिखा की यहीं कादियान आकार क्यों नहीं चमत्कार देख लेते. सोचा था की न पंडित जी का कादियान आना होगा और बला भी टल जाएगी.पर पंडित जी अपनी धुन के पक्के थे मिर्जा गुलाम अहमद की कोठी पर कादियान पहुँच गए. दो मास तक पंडित जी क़दियन में रहे पर मिर्जा गुलाम अहमद कोई भी चमत्कार नहीं दिखा सका.

इस खीज से आर्यसमाज और पंडित लेखराम को अपना कट्टर दुश्मन मानकर मिर्जा ने आर्यसमाज के विरुद्ध दुष्प्रचार आरंभ कर दिया.

मिर्जा ने ब्राहिने अहमदिया नामक पुस्तक चंदा मांग कर छपवाई. पंडित जी ने उसका उत्तर तकज़ीब ब्राहिने अहमदिया लिखकर दिया.

मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या (आर्यों की आंख का सुरमा) लिखा जिसका पंडित जी ने उत्तर नुस्खाये खब्ते अहमदिया (अहमदी खब्त का ईलाज) लिख कर दिया. मिर्जा ने सुरमाये चश्मे आर्या में यह भविष्यवाणी करी की एक वर्ष के भीतर पंडित जी की मौत हो जाएगी. मिर्जा की यह भविष्यवाणी गलत निकली और पंडित इस बात के ११ वर्ष बाद तक जीवित रहे.

पंडित जी की तपस्या से लाखों हिन्दू युवक मुस्लमान होने से बच गए. उनका हिन्दू जाती पर सदा उपकार रहेगा.

पंडित जी का अमर बलिदान

मार्च १८९७ में एक व्यक्ति पंडित लेखराम के पास आया. उसका कहना था की वो पहले हिन्दू था बाद में मुस्लमान हो गया अब फिर से शुद्ध होकर हिन्दू बनना चाहता हैं. वह पंडित जी के घर में ही रहने लगा और वही भोजन करने लगा. ६ मार्च १८९७ को पंडित जी घर में स्वामी दयानंद के जीवन चरित्र पर कार्य कर रहे थे . तभी उन्होंने एक अंगराई ली की उस दुष्ट ने पंडित जी को छुरा मर दिया और भाग गया. पंडित जी को हस्पताल लेकर जाया गया जहाँ रात को दो बजे उन्होंने प्राण त्याग दिए. पंडित जी को अपने प्राणों की चिंता नहीं थी उन्हें चिंता थी तो वैदिक धर्म की. उनका आखिरी सन्देश भी यही थे की “तहरीर (लेखन) और तकरीर (शास्त्रार्थ) का काम बंद नहीं होना चाहिए ” .पंडित जी का जीवन आज के हिन्दू युवको के लिए प्रेरणा दायक हैं की कभी विधर्मियो से डरे नहीं और जो निशक्त हैं उनका सदा साथ देवे.

– डॉ विवेक आर्य

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Posted on July 11, 2011, in Legends. Bookmark the permalink. 8 Comments.

  1. नमस्ते डॉ॰ विवेक जी,

    बहुत अच्छा लेख लिखा है । आप को शतशः धन्यवाद ।

  2. Rajeshkumar Arya

    Pt Lekhram was one of the true disciples of Swami Dayanand Saraswati.
    His pen was so mighty that the Kadiyani Masiha could not dare to refute him.
    Below are some of the works by Pt Lekhram:

    Maharshi Dayanand Saraswati ka Jivanchritra
    Kuliyat Arya Musafir (Granth Sangrah)
    Swami Shraddhanand (Lala Munshi Ram)
    Itihas ke Pariprekshya me Anveshan
    Srishti ka Itihas
    Punarjanm Praman
    Devi Bhagvat Pariksha
    Nishchal Mat Darpan
    Patitoddhar
    Arya Hindu aur Namaste ki Khoj
    Satya Dharm ka Sandesh
    Niyog ka Mantavya
    Sanch Ko Anch Nahi
    Aina e Shafayat (Kshama Darpan)
    Ramchandrji ka Sachcha Darshan
    Shri Krushn ka Jivan Charitra
    Murti Prakash
    Stri Shiksha
    Christian Mat Darpan
    Kya Adam aur Hauva Hamare Purvapurush the?
    Jihad
    Muhammadio ka Muta
    Hujat – ul – Islam
    Nuskha Khabte Ahmadiya
    Takjibe Burahine Ahmadiya

  3. कोई लेखराम जैसा आर्यवीर आज होवे ।

    सनातन वैदिक धर्म की जय हो
    ओ३म्!!

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