क्या वेद में इतिहास हैं और अश्लीलता हैं?


डॉ विवेक आर्य

[अथर्व ८/६/७ में incest  के विरुद्ध स्पष्ट प्रमाण हैं तो फिट वेदों पर बहन-भाई, पिता पुत्री के बीच अनैतिक सम्बन्ध लगाने का आरोप बेबुनियाद हैं.

हे स्त्री जो कोई तेरे पास सोते में भाई और पिता के समान आ जाये तो हे बलि पुरुष उसको तुम पोरुष रहित (हिजड़ा) कर दे.]

वेदों पर भाष्य करते समय स्वामी दयानंद के समक्ष एक विचित्र सा विषय आया. वेदों में वर्णित विभिन्न शब्दों जैसे इन्द्र , महावीर, राम, कृष्ण, दशरथ, अयोध्या आदि की कल्पना स्वर्ग के राजा इन्द्र, जैन धर्म के महावीर, आर्य राजा श्री राम , श्री कृष्ण आदि से करी गयी, जिससे यह प्रतीत होने लगा की वेदों में इतिहास का वर्णन हैं. इसका परिणाम यह हुआ की पश्चिम विद्वानों ने वेदों में आर्य- द्रविड़ युद्ध का वर्णन दर्शा कर भारत को दो हिस्सों उत्तर और दक्षिण भारत में विभाजित करने का कुत्सित प्रयास किया जिससे उनकी तोड़ो और राज करो की कूटनीति का पालन हो सके. इसका अनुसरण कर विभिन्न मत-मतान्तर अपने अपने मत के जनक को वेदों में दिखाने का निरर्थक प्रयास करते हैं जैसे ऋग्वेद १/३२/६ में महावीर शब्द आया हैं जिसका अर्थ इन्द्र हैं जबकि जैन मत का पालन करने वाले उससे महावीर तीर्थंकर को दर्शाने की कोशिश करते हैं. इसी प्रकार वेदों में कविर्मनीषी शब्द आया हैं जिसका अर्थ ईश्वर हैं जबकि कबीरपंथी वेदों में इसे कबीर साहिब का वर्णन मानते हैं. वेदों में इतिहास दिखाने के चक्कर में वेदों का अश्लील भाष्य तक कर डाला गया जैसे प्रजापति का दुहिता (बेटी) से सम्बन्ध,इन्द्र का अहिल्या से अवैध सम्बन्ध आदि. गया ,पुष्कर आदि तीर्थ,गंगा ,यमुना , सरस्वती आदि नदिओं का वर्णन वेदों में कर उनके सम्बन्ध में पुराणों में भी अनेक कहानिया लिख दी गयी जो असत्य हैं.

वेदों में अश्लीलता दिखा कर विधर्मियो ने वेदों को अपमानित करने का प्रयास किया जिससे अपने मत में शामिल करने के उनके प्रयासों को बढ़ावा मिल सके.

स्वामी दयानंद ने अपने ग्रन्थ ऋगवेदादीभाष्य-भूमिका में ग्रन्थ प्रमाण-अप्रमाण विषय में वेदों में इतिहास विषय पर प्रकाश डाला हैं. उसी को आधार बना कर हम वेदों में इतिहास विषय में फैली हुई भ्रान्तियो का निवारण करेगे.

१. प्रजापति का अपनी दुहिता (बेटियो) से सम्बन्ध.

ऋग्वेद १/१६४/३३ और ऋग्वेद ३/३१/१ में प्रजापति का अपनी दुहिता (पुत्री) उषा और प्रकाश से सम्भोग की इच्छा करना बताया गया हैं जिसे रूद्र ने विफल कर दिया जिससे की प्रजापति का वीर्य धरती पर गिर कर नाश हो गया.

इन मंत्रो के अश्लील अर्थो को दिखाकर विधर्मी लोग वेदों में पिता-पुत्री के अनैतिक संबंधो पर व्यर्थ आक्षेप करते हैं.

स्वामी दयानंद इन मंत्रो का निरुक्त एवं शतपथ का प्रमाण देते हुए अर्थ करते हैं की प्रजापति कहते हैं सूर्य को और उसकी दो पुत्री उषा (प्रात काल में दिखने वाली लालिमा) और प्रकाश हैं. सभी लोकों को सुख देने के कारण सूर्य पिता के सामान हैं और मान्य का हेतु होने से पृथ्वी माता के सामान हैं. जिस प्रकार दो सेना आमने सामने होती हैं उसी प्रकार सूर्य और पृथ्वी आमने सामने हैं और प्रजापति पिता सूर्य मेघ रूपी वीर्य से पृथ्वी माता पर गर्भ स्थापना करता हैं जिससे अनेक औषिधिया आदि उत्पन्न होते हैं जिससे जगत का पालन होता हैं. यहाँ रूपक अलंकार हैं जिसके वास्तविक अर्थ को न समझ कर प्रजापति की अपनी पुत्रियो से अनैतिक सम्बन्ध की कहानी गढ़ की गयी.

रूपक अलंकार का सही प्रयोग इन्द्र अहिल्या की कथा में भी नहीं हुआ हैं.

इन्द्र अहिल्या की कथा का उल्लेख ब्राह्मण ,रामायण, महाभारत, पूरण आदि ग्रंथो में मिलता हैं जिसमें कहा गया हैं की स्वर्ग का राजा इन्द्र गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या पर आसक्त होकर उससे सम्बोघ कर बैठता हैं. उन दोनों को एकांत में गौतम ऋषि देख लेते हैं और शाप देकर इन्द्र को हज़ार नेत्रों वाला और अहिल्या को पत्थर में बदल देते हैं. अपनी गलती मानकर अहिल्या गौतम ऋषि से शाप की निवृति के लिया प्रार्थना करती हैं तो वे कहते हैं की जब श्री राम अपने पाव तुमसे लगायेगे तब तुम शाप से मुक्त हो जायोगी.

यहाँ इन्द्र सूर्य हैं, अहिल्या रात्रि हैं और गौतम चंद्रमा हैं. चंद्रमा रूपी गौतम रात्रि अहिल्या के साथ मिलकर प्राणियो को सुख पहुचातें हैं. इन्द्र यानि सूर्य के प्रकाश से रात्रि निवृत हो जाती हैं अर्थात गौतम और अहिल्या का सम्बन्ध समाप्त हो जाता हैं.

सही अर्थ को न जानने से हिन्दू धर्म ग्रंथो की निंदा करने से विधर्मी कभी पीछे नहीं हटे इसलिए सही अर्थ का महत्व आप जान ही गए होंगे.

२. इन्द्र वृत्रासुर की कथा

ऋग्वेद के १/३२/१ से १/३२/७ तक के मंत्रो में इन्द्र और वृत्रासुर की कथा का उल्लेख हैं जिसमें कहा गया हैं की त्वस्ता का पुत्र वृत्रासुर ने देवों के राजा इन्द्र को युद्ध में निगल लिया. तब सब देवता भय से विष्णु के पास गए और विष्णु ने उसे मरने का उपाय बताया की में समुद्र के फेन में प्रविष्ट हो जाऊंगा. तुम लोग उस फेन को उठा कर वृत्रासुर को मरना , वह मर जायेगा.

स्वामी दयानंद इसका सही अर्थ करते हुए कहते हैं की इन्द्र सूर्य का नाम हैं और वृत्रासुर मेघ को कहते हैं. आकाश में मेघ कभी सूर्य को निगल लेते हैं कभी सूर्य अपनी किरणों से मेघों को हटा देता हैं. यह संग्राम तब तक चलता हैं जब तक मेघ वर्षा बनकर पृथ्वी पर महीन बरस जाते हैं और फिर उस जल की नदियाँ बनकर सागर में जाकर मिल जाती हैं.

३. दधिची की हड्डियो से वृत्र को मारने की कथा

ऋग्वेद १/८४/१३ के आधार पर एक कथा प्रसिद्द हैं की एक बार वृत्र नमक राक्षस ने सारी त्रिलोकी में उपद्रव मचा रखा था. देवता भी उससे तंग आ गए थे. तब सभी देवता विष्णु जी की शरण में गए. उन्होंने बताया की दधिची ऋषि की हड्डियों से बने वज्र से वृत्र को मारा जा सकता हैं. तब देवो की प्रार्थना पर दधिची ने अपना शरीर त्याग दिया. इन्द्र ने उनकी हड्डियों से वज्र तैयार किया जिससे वृत्र मारा गया.

निरुक्त के आधार पर इस मंत्र का अधिदेविक अर्थ इस प्रकार हैं की दधिची कहते हैं सूर्य को और उसकी हड्डिया उसकी किरणे हैं और वृत्र का अर्थ हैं मेघ. जब सब जगत में मेघ छा जाते हैं टी सूर्य अपनी किरणों से मेघो को छेद कर वर्षा कर देता हैं. इसका अद्यात्मिक अर्थ इस प्रकार हैं की इन्द्र का अर्थ आत्मा हैं, दधिची का अर्थ हैं मन, दधिची की हड्डिया हैं उच्च मनोवृतिया और वृत्र हैं पाप वासना विचार. अर्थात आत्मा अपने मन के उच्च विचारो से पाप वासना आदि कुविचारो का नास कर देता हैं.

वेदों के सही अर्थ को न जानकर उससे इतिहास की कहानियां गढ़ लेने से वेदों की उच्च शिक्षा से हम वंचित हो जाते हैं. यही वेदों में इतिहास मानने का सबसे बड़ा दोष हैं.

४. देवापि -शंतनु की कहानी

ऋग्वेद १०/९८/७ के आधार पर एक कथा प्रचलित हैं की देवापि और शंतनु दोनों भाई थे. शंतनु छोटे थे पर राजा बन गए जिससे नाराज होकर देवापि वन जाकर तपस्या में लीन हो गए.राजा शंतनु के राज्य में १२ वर्ष तक वर्षा नहीं हुई. उन्होंने ब्राह्मणों से पूछा तो बताया की राज्य पर अधिकार देवापि का था जिस कारण वर्षा नहीं हुई. शंतनु वन जाकर देवापि को बनाने की कोशिश करते हैं. वह मना कर देते पर यज्ञ का पुरोहित बनना स्वीकार करते हैं जिससे वर्षा हो सके फिर शंतनु ने देवापि को बुलाकर वृष्टि यज्ञ कराया.जिससे राज्य में वर्षा हुई.

निरुक्त २/१२ के आधार पर शंतनु शब्द का अर्थ होता हैं जो राजा ऐसा प्रयत्न करता हैं की उसके राज्य में सबको सुख प्राप्त हो , सब शरीर निरोग, प्रसन्न, सुखी रहे और उसी प्रकार प्रजा भी यह चाहती हो की हमारा राजा भी स्वस्थ, सुखी , निरोगी होता हुआ युगों युगों तक जीवित रहे, उस राजा को शंतनु कहते हैं और देवापि अर्थात उस गुण वाले व्यक्ति को जिसमें देवता समान गुण हो उसे यज्ञ का पुरोहित बना कर वृष्टि यज्ञ करवाने से यज्ञ सफल होता हैं.

वेदों की यह शैली हैं की किसी गूढ़ अर्थ को किसी शब्द से प्रस्तुत कर सन्देश देते हैं ऐसा ही शंतनु और देवापि के माध्यम से राजा और पुरोहित कैसा हो सन्देश देना हैं.

इसे इतिहासिक कथा से जोड़ने से वेदों के सही अर्थ का लोप हो गया और एक निरर्थक कहानी प्रचलित हो गयी.

५. मित्र-वरुण और उर्वशी से वसिष्ठ की उत्पत्ति

ऋग्वेद ७.३३.११ के आधार पर एक कथा प्रचलित कर दी गयी की मित्र-वरुण का उर्वशी अप्सरा को देख कर वीर्य सखलित हो गया , वह घरे में जा गिरा जिससे वसिष्ठ ऋषि पैदा हुए.

ऐसी अश्लील कथा से पढने वाले की बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती हैं.

इस मंत्र का उचित अर्थ इस प्रकार हैं .अथर्व वेद ५/१८/१५ के आधार पर मित्र और वरुण वर्षा के अधिपति यानि वायु माने गए हैं , ऋग्वेद ५/४१/१८ के अनुसार उर्वशी बिजली हैं और वसिष्ठ वर्षा का जल हैं. यानि जब आकाश में ठंडी- गर्म हवाओं (मित्र-वरुण) का मेल होता हैं तो आकाश में बिजली (उर्वशी) चमकती हैं और वर्षा (वसिष्ठ) की उत्पत्ति होती हैं.

वेदों के अश्लील अर्थ कर वेदों में सामान्य जन की आस्था को किस प्रकार कुछ मूर्खो ने नुकसान पहुचाया हैं इसका यह साक्षात् प्रमाण हैं.आशा हैं वेदों में इतिहास का वर्णन और अश्लीलता होने के मिथक को पठाकगन समझ गए होगे और वेदों के सही अर्थ को समझ कर अपना कल्याण करेगे.

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Posted on August 2, 2011, in Philosophy, Swami Dayanand, Vedas. Bookmark the permalink. 4 Comments.

  1. डॉ. विमला मिश्रा

    डॉक्टर साहब , ह्रदय से धन्यवाद इस प्रकार सत्य का ज्ञान कराने के लिए !

  2. अविनाश

    आप वेद की असलियत अलग बताते है इतिहास अलग बताते है .

  3. अविनाश

    आप वेद की असलियत अलग बताते है इतिहास अलग बताते है .
    .

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