वेद में आर्य-दास-युद्ध सम्बन्धी पाश्चात्य मत का खंडन


डॉ विवेक आर्य


वेद में आर्य-दास-युद्ध सम्बन्धी पाश्चात्य मत का खंडन

इतिहास की छठी कक्षा की पुस्तक को उठा कर देखे तो उसमे लिखा मिलेगा की आर्य लोग बाहर से इस देश में आये और उन्होंने इस देश में रह रहे मूलनिवासियो जैसे द्रविड़, कोल, संथाल जिन्हें दस्यु या दास कहा जाता था उन्हें युद्ध में हरा दिया ,उनकी बस्तियों का विध्वंश कर दिया और उन्हें दक्षिण भारत की और धकेल दिया.आर्य गौर वर्ण के थे जबकि दस्यु काले रंग और (अनास) चपटी नाक वाले थे. आर्य देवताओं की पूजा करते थे जबकि दस्यु लिंग पूजा  (शीशनदेव) की पूजा करते थे. आर्य संस्कृत बोलते थे जबकि दस्यु विभिन्न भाषा बोलते थे.आर्य लोगो ने दस्युओ के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया और उनसे कठिन और नीचा कार्य भी करवाया.
इस मिथक कल्पना का श्रेय मूल रूप से पाश्चात्य विद्वानों? को जाता हैं जिन्होंने दो प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए इस मिथक को प्रोत्साहित किया. सर्वप्रथम तो अंग्रेजो की फुट डालो और राज करो की निति थी दूसरी वेदों के प्रति साधारण जनमानस की रुचि को कम कर ईसाइयत का प्रचार प्रसार कर धरमांतरण को बढ़ावा देना था. १९४७ में अंग्रेज तो चले गए पर इस मिथक को सत्य बताकर आज भी विश्व विद्यालाओ में शोध हो रहे हैं और राजनितिक दल अपनी अपनी रोटिया सकने में लगे हुए हैं. डॉ आंबेडकर जो जातिवाद के खिलाफ थे ने ब्राह्मणों का प्रतिवाद करने के लिए शुद्र वर्ण को मूलनिवासी और स्वर्ण वर्ण को बाहर से आया हुआ आर्य घोषित कर दिया,दक्षिण भारतीय नेताओं जैसे पेरियार आदि ने भाषा और संस्कृति के नाम पर आर्य-द्रविड़ की रेखा खिंच कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकनी चाही, ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार करने वाले नास्तिक कम्युनिस्ट विचारधारा वालो को वेदों की व्यर्थ निंदा का मौका मिल गया, आदिवासी इलाको में हिन्दुओं का धरमांतरण कर ईसाई बनाने में लगी हुई चर्च को सत्य से अनभिज्ञ भोले भोले वनवासिओ को भड़काने का मौका मिल गया.
इस प्रकार अगर समग्र रूप से सोचे तो इस  मिथक से हमारे देश , हमारी जाति , हमारे संसाधन, हमारी शक्ति का कितना ह्रास हुआ इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. अगर यही ऊर्जा राष्ट्रहित और जाति के उत्थान में लगती तो उससे समस्त मानव जाति का कल्याण होता.

“किसी संस्कृत ग्रन्थ में वा इतिहास में नहीं लिखा की आर्य लोग इरान से आये और यहाँ के जंगलियो को लरकर जय पा के निकाल के इस देश के राजा हुए”
सत्यार्थ प्रकाश – ८ सम्मुलास – स्वामी दयानंद

“जो आर्य श्रेष्ठ और दस्यु दुष्ट मनुष्यों को कहते हैं वैसे ही मैं भी मानता हूँ”
“आर्याव्रत देश इस भूमि का नाम इसलिए हैं की इसमें आदि सृष्टि से आर्य लोग निवास करते हैं परन्तु इसकी अवधि उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पश्चिम में अटक और पूर्व में ब्रहमपुत्र नदी हैं इन चारों के बीच में जितना प्रदेश हैं उसको आर्याव्रत कहते और जो इसमें सदा रहते हैं उनको भी आर्य कहते हैं”

सव-मंतव्य-अमंतव्य -प्रकाश-स्वामी दयानंद

स्वामी दयानंद जी ने सत्यार्थ प्रकाश में आर्य, दस्यु और आर्यव्रत शब्द पर प्रकाश डाला तदन्तर वेद भाष्य करते हुए मंत्रो के भाष्य में आर्य- दस्यु की परिभाषा और युद्ध, आदिवासिओ का स्वरुप एवं पूजा का विधान आदि विषयों पर प्रकाश डाला हैं.

१. आर्य-दास-दस्यु शब्द की समीक्षा

आर्य शब्द कोई जातिवाचक शब्द नहीं हैं अपितु गुणवाचक शब्द हैं. आर्य शब्द का अर्थ होता हैं “श्रेष्ठ” अथवा बलवान, ईश्वर का पुत्र, ईश्वर के ऐश्वर्य का स्वामी, उत्तम गुणयुक्त, सद्गुण परिपूर्ण आदि.
आर्य शब्द का प्रयोग वेदों में निम्नलिखित विशेषणों के लिए हुआ हैं.

श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए (ऋक १/१०३/३, ऋक १/१३०/८ ,ऋक १०/४९/३)
इन्द्र का विशेषण (ऋक ५/३४/६ , ऋक १०/१३८/३)
सोम का विशेषण (ऋक ९/६३/५)
ज्योति का विशेषण (ऋक १०/४३/४)
व्रत का विशेषण (ऋक १०/६५/११)
प्रजा का विशेषण (ऋक ७/३३/७)
वर्ण का विशेषण (ऋक ३/३४/९) के रूप में हुआ हैं.

दास शब्द का अर्थ अनार्य, अज्ञानी, अकर्मा, मानवीय व्यवहार शुन्य, भृत्य, बल रहित शत्रु के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाति के लोगों के लिए.

दास शब्द का अर्थ मेघ (ऋक ५/३०/७ , ऋक ६/२६/५ , ऋक ७/१९/२ ),अनार्य (ऋक १०/२२/८ ), अज्ञानी, अकर्मा, मानवीय व्यवहार शुन्य (ऋक १०,२२,८), भृत्य (ऋक ), बल रहित शत्रु  (ऋक १०/८३/१) के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाति अथवा स्थान के लोगों के लिए.

दस्यु शब्द का अर्थ उत्तम कर्म हीन व्यक्ति (ऋक ७/५/६) अज्ञानी, अव्रती (ऋक १०/२२/८) मेघ (१/५९/६)  आदि के लिए हुआ हैं न की किसी विशेष जाती अथवा स्थान के लोगो के लिए.

२. आदिवासीओ का स्वरुप और धार्मिक विश्वास

पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों के अनुसार आदिवासीओ को काले वर्ण वाला, अनास यानि चपटी नाक वाला और लिंग देव अर्थात शीशनदेव की पूजा करने वाला लिखा हैं जबकि आर्यों को श्वेत वर्ण वाला सीधी नाक वाला और देवताओं की पूजा करने वाला लिखा हैं.

Macdonnel लिखते हैं The term Das, Dasyu properly the name of the dark aborigines अर्थात दास, दस्यु काले रंग के आदिवासी ही हैं.

Griffith Rigveda 1/10/1 – The dark aborignes who opposed the aryans  अर्थात काले वर्ण के आदिवासी जो आर्यों का विरोध करते थे.

Vedic  mythology page  151,152 में भी आर्यों द्वारा कृष्ण वर्ण वाले दस्युओ को हरा कर उनकी भूमि पर अधिकार करने की बात कही गयी हैं.

ऋग्वेद के १/१०१/१, १/१३०/८,२/२०/७ और ४/१६/१३ मंत्रो का हवाला देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया हैं की भारत के मूल निवासी कृष्ण वर्ण के थे.

ऋग्वेद ७/१७/१४ में सायण ने कृष्ण का अर्थ मेघ की काली घटा किया हैं.

अन्य सभी मंत्रो में इसी प्रकार इन्द्र के वज्र का मेघ रुपी बादलों से संघर्ष का वर्णन हैं. बादलों के कृष्ण वर्ण की आदिवासियो के कृष्ण वर्ण से तुलना कर बिजली (इन्द्र के वज्र) और बादल (मेघ) के संघर्ष के मूल अर्थ को छुपाकर उसे आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना करना कुटिलता नहीं तो और क्या हैं.

वैदिक इंडेक्स के लेखक ने ऋग्वेद ५/२९/१० में अनास शब्द  की चपटी नाक वाले द्रविड़ आदिवासी की व्याख्या की हैं. ऋग्वेद ५/२९/१० मंत्र में दासो को द्वेषपूर्ण वाणी वाले या लराई के बोल बोलने वाले कहाँ हैं.

ऋग्वेद ५/२९/१० में अनास शब्द का अर्थ चपटी नाक वाला नहीं अपितु शब्द न करने वाला अर्थात मूक मेघ हैं जिसे इन्द्र अपने वज्र (बिजली) से छिन्न भिन्न कर देता हैं.
यहाँ भी अपनी कुटिलता से द्रविड़ आदिवासियो को आर्यों से अलग दिखने का कुटिल प्रयास किया गया हैं.

वैदिक इंडेक्स के लेखक ने ऋग्वेद ७/२१/५ और १०/९९/३ के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया हैं की दस्यु लोगो की पूजा पद्यति विभिन्न थी और वे शिश्नपूजा अर्थात लिंग पूजा करते थे.

यास्काचार्य ने ७/२१/५ मंत्र में शिश्न पूजा का अर्थ किया हैं अब्रहमचर्य  अर्थात जो कामी व्यभिचारी व्यक्ति हो किया हैं. ऋग्वेद के ७/२१/५ और १०/९९/३ में भी कहा गया हैं की लोगों को पीड़ा पहुचने वाले, कुटिल, तथा शिश्नदेव (व्यभिचारी) व्यक्ति हमारे यज्ञो को प्राप्त न हो अर्थात दुस्त व्यक्तियों का हमारे धार्मिक कार्यो में प्रवेश न हो.

वैदिक इंडेक्स के लेखक इन मंत्रो के गलत अर्थ को करके भ्रान्ति उत्पन्न कर रहे हैं की दस्यु लोग लिंग पूजा करते हैं एवं आर्य लोग उनसे विभिन्न पूजा पद्यति को मानने वाले हैं.
सत्य अर्थ यह हैं की दस्यु शब्द किसी वर्ग या जाती विशेष का नाम नहीं हैं बल्कि जो भी व्यक्ति दुर्गुण युक्त हैं वह दस्यु हैं और दुर्गुण व्यक्ति किसी भी समुदाय में हो दूर करने योग्य हैं.

३. आर्यों और दस्युओ का युद्ध

वैदिक इंडेक्स के लेखको ने यह भी सिद्ध करने का प्रयास किया हैं की वेद में आर्य और दस्युओ के युद्ध का वर्णन हैं.वेद में दासों के साथ युद्ध करने का वर्णन तो मिलता हैं पर वह मानवीय नहीं प्राकृतिक युद्ध हैं.जैसे इन्द्र और वृत्र का युद्ध. इन्द्र बिजली का नाम हैं जबकि वृत्र मेघ का नाम हैं. इन दोनों का परस्पर संघर्ष प्राकृतिक युद्ध के जैसा हैं. यास्काचार्य ने भी निरुक्त २/१६  में इन्द्र-वृत्र युद्ध को प्राकृतिक माना हैं.इसलिए वेद में जिन भी स्थलों पर आर्य-दस्यु युद्ध की कल्पना की गयी हैं उन स्थलों को प्रकृति में होने वाली क्रियाओ को उपमा अलंकार से दर्शित किया गया हैं.उनके वास्तविक अर्थ को न समझ कर अज्ञानता से अथवा जान कर वेदों को बदनाम करने के लिए एवं आर्य द्रविड़ के विभाजन की निति को पोषित करने के लिए युद्ध की परिकल्पना कई गयी हैं जो की गलत हैं.

इस लेख को लिखने का प्रयोजन केवल मात्र आर्य दस्यु के नाम पर जो खाई खोदी जा रही हैं उसे भरना हैं. तभी द्रविड़, कोल, भील, संथाल आदि जन जातियो के मन से सवर्णों के लिए घृणा मिटेगी और वेद विरोधी विचारधारा का नाश होने से भारत देश का कल्याण होगा.


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Posted on August 4, 2011, in Philosophy, Swami Dayanand, Vedas. Bookmark the permalink. 4 Comments.

  1. आर्य और अनार्य या दस्यु आदि जातिवाचक संज्ञाएँ नहीं हैं, गुणवाचक हैं; और आर्यों से पूर्व यहां – हमारे इस देश में – कोई मनुष्य प्रजा का वास नहीं था | यहाँ कोई मूल-प्रजा या मूल-निवासी नहीं रहते थे | आर्यों ने ही इस “आर्यावर्त” देश को बसाया, इस भूखंड को “आर्यावर्त्त” नाम प्रदान किया | आर्य लोग ही यहाँ के मूल निवासी हैं | ये बातें महर्षि दयानंद ने सर्वप्रथम विश्व के समक्ष रखीं | उनका यह अमूल्य प्रदान माना जाएगा | लोकमान्य तिलक और स्वामी विवेकानंद जैसे महापुरुष भी इन विषयों में भ्रांत थे |
    कोई भी प्रजा अपने इतिहास ग्रंथों में अपनी विजयगाथा को लिखना नहीं भूलती | आर्यों ने वास्तव में यहां के तथाकथित मूल निवासियों को मार भगाया होता तो अपने ग्रंथों में उसका उल्लेख अवश्य करते | मगर किसी भी पुरातन संस्कृत ग्रन्थ में इस प्रकार की कथा-वार्ता नहीं दिखाई देती |
    देश की एकता- अखण्डता के लिए दयानन्दीय द्रष्टिकोण का प्रचार आवश्यक है | डो० विवेक का यह लेख इस द्रष्टि से पर्याप्त उपयोगी सिद्ध होगा |
    = भावेश मेरजा

  2. विज्ञान ने भी आर्य-द्रविड़ के भेद को नकारा
    नई दिल्लीः 8 दिसंबर, 2009। सदियों से भारतीय इतिहास पर छायी आर्य आक्रमण सम्बन्धी झूठ की चादर को विज्ञान की खोज ने एक झटके में ही तार-तार कर दिया है।
    विज्ञान की आंखों ने जो देखा है उसके अनुसार तो सच यह है कि आर्य आक्रमण नाम की चीज न तो भारतीय इतिहास के किसी कालखण्ड में घटित हुई और ना ही आर्य तथा द्रविड़ नामक दो पृथक मानव नस्लों का अस्तित्व ही कभी धरती पर रहा है।
    इतिहास और विज्ञान के मेल के आधार पर हुआ यह क्रांतिकारी जैव-रासायनिक डीनएनए गुणसूत्र आधारित अनुसंधान फिनलैण्ड के तारतू विश्वविद्यालय, एस्टोनिया में हाल ही में सम्पन्न हुआ है।
    कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉं. कीवीसील्ड के निर्देशन में एस्टोनिया स्थित एस्टोनियन बायोसेंटर, तारतू विश्वविद्यालय के शोधछात्र ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिध्द किया है कि सारे भारतवासी जीन अर्थात गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संतानें हैं, आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्रों के आधार पर नहीं मिलता है, और तो और जो अनुवांशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डीएनए गुणसूत्र दुनिया के किसी अन्य देश में नहीं पाए गए।

    शोधकार्य में अखण्ड भारत अर्थात वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल की जनसंख्या में विद्यमान लगभग सभी जातियों, उपजातियों, जनजातियों के लगभग 13000 नमूनों के परीक्षण-परिणामों का इस्तेमाल किया गया। इनके नमूनों के परीक्षण से प्राप्त परिणामों की तुलना मध्य एशिया, यूरोप और चीन-जापान आदि देशों में रहने वाली मानव नस्लों के गुणसूत्रों से की गई।
    इस तुलना में पाया गया कि सभी भारतीय चाहे वह किसी भी धर्म को मानने वाले हैं, 99 प्रतिशत समान पूर्वजों की संतानें हैं। भारतीयों के पूर्वजों का डीएन गुणसूत्र यूरोप, मध्य एशिया और चीन-जापान आदि देशों की नस्लों से बिल्कुल अलग है और इस अन्तर को स्पष्ट पहचाना जा सकता है ।
    जेनेटिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया
    ज्ञानेश्वर चौबे को जिस बिन्दु पर शोध के लिए पीएच.डी. उपाधि स्वीकृत की गई है उसका शीर्षक है- ‘डेमॉग्राफिक हिस्ट्री ऑफ साउथ एशिया: द प्रिवेलिंग जेनेटिक कांटिनिटी फ्रॉम प्रीहिस्टोरिक टाइम्स’ अर्थात ‘दक्षिण एशिया का जनसांख्यिक इतिहास: पूर्वऐतिहासिक काल से लेकर अब तक की अनुवांशिकी निरंतरता’। संपूर्ण शोध की उपकल्पना ज्ञानेश्वर के मन में उस समय जागी जब वह हैदराबाद स्थित ‘सेन्टर फॉर सेल्यूलर एंड मोलेक्यूलर बायोलॉजी’ अर्थात सीसीएमबी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के ख्यातलब्ध भारतीय जैव वैज्ञानिक डॉ. लालजी सिंह और डॉ के. थंगराज के अन्तर्गत परास्नातक बाद की एक शोधपरियोजना में जुटे थे।
    ज्ञानेश्वर के मन में विचार आया कि जब डीएनए जांच के द्वारा किसी बच्चे के माता-पिता के बारे में सच्चाई का पता लगाया जा सकता है तो फिर भारतीय सभ्यता के पूर्वज कौन थे, इसका भी ठीक-ठीक पता लगाया जा सकता है। बस फिर क्या था, उनके मन में इस शोधकार्य को कर डालने की जिद पैदा हो गई। ज्ञानेश्वर बताते हैं-बचपन से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि हमारे पूर्वज कौन थे? बचपन में जो पाठ पढे़, उससे तो भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी कि क्या हम आक्रमणकारियों की संतान हैं? दूसरे एक मानवोचित उत्सुकता भी रही। आखिर प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी तो यह जानने की उत्सुकता पैदा होती ही है कि उसके परदादा-परदादी कौन थे, कहां से आए थे,उनका मूलस्थान कहां है और इतिहास के बीते हजारों वर्षों में उनके पुरखों ने प्रकृति की मार कैसे सही, कैसे उनका अस्तित्व अब तक बना रहा है? ज्ञानेश्वर के अनुसार, पिछले एक दशक में मानव जेनेटिक्स और जीनोमिक्स के अध्ययन में जो प्रगति हुई है उससे यह संभव हो गया है कि हम इस बात का पता लगा लें कि मानव जाति में किसी विशेष नस्ल का उद्भव कहां हुआ, वह उद्विकास प्रक्रिया में दुनिया के किन-किन स्थानों से गुजरी, कहां-कहां रही और उनके मूल पुरखे कौन रहे हैं?

    उनके अनुसार- माता और पिता दोनों के डीएनए में ही उनके पुरखों का इतिहास भी समाया हुआ रहता है। हम जितनी गहराई से उनके डीएनए संरचना का अध्ययन करेंगे, हम यह पता कर लेंगे कि उनके मूल जनक कौन थे? और तो और इसके द्वारा पचासों हजार साल पुराना अपने पुरखों का इतिहास भी खोजा जा सकता है।
    कैंब्रिज के डॉ. कीवीसील्ड ने किया शोध निर्देशन
    हैदराबाद की प्रयोगशाला में शोध करते समय उनका संपर्क दुनिया के महान जैव वैज्ञानिक प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ आया। प्रो. कीवीसील्ड संसार में मानव नस्लों की वैज्ञानिक ऐतिहासिकता और उनकी बसावट पर कार्य करने वाले उच्चकोटि के वैज्ञानिक माने जाते हैं। इस नई सदी के प्रारंभ में ही प्रोफेसर कीवीसील्ड ने अपने अध्ययन में पाया था कि दक्षिण एशिया की जनसांख्यिक संरचना अपने जातीय एवं जनजातीय स्वरूप में न केवल विशिष्ट है वरन् वह शेष दुनिया से स्पष्टत: भिन्न है। संप्रति प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के बायोसेंटर का निर्देशन कर रहे हैं।
    प्रोफेसर डॉ. कीवीसील्ड की प्रेरणा से ज्ञानेश्वर चौबे ने एस्टोनियन बायोसेंटर में सन् 2005 में अपना शोधकार्य प्रारंभ किया। और देखते ही देखते जीवविज्ञान सम्बंधी अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध जर्नल्स में उनके दर्जनों से ज्यादा शोध पत्र प्रकाशित हो गए। इसमें से अनेक शोध पत्र जहां उन्होंने अपने गुरूदेव प्रोफेसर कीवीसील्ड के साथ लिखे वहीं कई अन्य शोधपत्र अपने उन साथी वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से लिखे जो इसी विषय से मिलते-जुलते अन्य मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

    अपने अनुसंधान के द्वारा ज्ञानेश्वर ने इसके पूर्व हुए उन शोधकार्यों को भी गलत सिद्ध किया है जिनमें यह कहा गया है कि आर्य और द्रविड़ दो भिन्न मानव नस्लें हैं और आर्य दक्षिण एशिया अर्थात् भारत में कहीं बाहर से आए। उनके अनुसार, ‘पूर्व के शोधकार्यों में एक तो बहुत ही सीमित मात्रा में नमूने लिए गए थे, दूसरे उन नमूनों की कोशिकीय संरचना और जीनोम इतिहास का अध्ययन ‘लो-रीजोलूशन’ अर्थात न्यून-आवर्धन पर किया गया। इसके विपरीत हमने अपने अध्ययन में व्यापक मात्रा में नमूनों का प्रयोग किया और ‘हाई-रीजोलूशन’ अर्थात उच्च आवर्धन पर उन नमूनों पर प्रयोगशाला में परीक्षण किया तो हमें भिन्न परिणाम प्राप्त हुए।’
    माइटोकांड्रियल डीएनए में छुपा है पुरखों का इतिहास
    ज्ञानेश्वर द्वारा किए गए शोध में माइटोकांड्रियल डीएनए और वाई क्रोमासोम्स और उनसे जुड़े हेप्लोग्रुप के गहन अध्ययन द्वारा सारे निष्कर्ष प्राप्त किए गए हैं। उल्लेखनीय है कि माइटोकांड्रिया मानव की प्रत्येक कोशिका में पाया जाता है। जीन अर्थात मानव गुणसूत्र के निर्माण में भी इसकी प्रमुख भूमिका रहती है। प्रत्येक मानव जीन अर्थात गुणसूत्र के दो हिस्से रहते हैं। पहला न्यूक्लियर जीनोम और दूसरा माइटोकांड्रियल जीनोम। माइटोकांड्रियल जीनोम गुणसूत्र का वह तत्व है जो किसी कालखण्ड में किसी मानव नस्ल में होने वाले उत्परिवर्तन को अगली पीढ़ी तक पहुंचाता है और वह इस उत्परिर्तन को आने वाली पीढ़ियों में सुरक्षित भी रखता है।

    इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि माइटोकांड्रियल डीएनए वह तत्व है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक माता के पक्ष की सूचनाएं अपने साथ हूबहू स्थानांतरित करता है। यहां यह समझना जरूरी है कि किसी भी व्यक्ति की प्रत्येक कोशिका में उसकी माता और उनसे जुड़ी पूर्व की हजारों पीढ़ियों के माइटोकांड्रियल डीएनए सुरक्षित रहते हैं।
    इसी प्रकार वाई क्रोमोसोम्स पिता से जुड़ी सूचना को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित करते हैं। वाई क्रोमोसोम्स प्रत्येक कोशिका के केंद्र में रहता है और किसी भी व्यक्ति में उसके पूर्व के सभी पुरूष पूर्वजों के वाई क्रोमोसोम्स सुरक्षित रहते हैं। इतिहास के किसी मोड़ पर किसी व्यक्ति की नस्ल में कब और किस पीढ़ी में उत्परिवर्तन हुआ, इस बात का पता प्रत्येक व्यक्ति की कोशिका में स्थित वाई क्रोमोसोम्स और माइटोकांड्रियल डीएनए के अध्ययन से आसानी से लगाया जा सकता है। यह बात किसी समूह और समुदाय के संदर्भ में भी लागू होती है।
    एक वंशवृक्ष से जुड़े हैं सभी भारतीय
    ज्ञानेश्वर ने अपने अनुसंधान को दक्षिण एशिया में रहने वाले विभिन्न धर्मों-जातियों की जनसांख्यिकी संरचना पर केंद्रित किया। शोध में पाया गया है कि तमिलनाडु की सभी जातियों-जनजातियों, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश जिन्हें पूर्व में कथित द्रविड़ नस्ल से प्रभावित माना गया है, की समस्त जातियों के डीनएन गुणसूत्र तथा उत्तर भारतीय जातियों-जनजातियों के डीएनए का उत्पत्ति-आधार गुणसूत्र एकसमान है।
    उत्तर भारत में पाये जाने वाले कोल, कंजर, दुसाध, धरकार, चमार, थारू, क्षत्रिय और ब्राह्मणों के डीएनए का मूल स्रोत दक्षिण भारत में पाई जाने वाली जातियों के मूल स्रोत से कहीं से भी अलग नहीं हैं। इसी के साथ जो गुणसूत्र उपरोक्त जातियों में पाए गए हैं वहीं गुणसूत्र मकरानी, सिंधी, बलोच, पठान, ब्राहुई, बुरूषो और हजारा आदि पाकिस्तान में पाये जाने वाले समूहों के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं।
    प्रस्तुति- राकेश उपाध्याय

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