स्वामी दयानंद की वेद भाष्य को दें भाग ९


वेदों की विषय में प्रचलित कुछ भ्रांतियों का निवारण

डॉ विवेक आर्य

वेदों की विषय में कुछ ऐसी भ्रांतियां भी प्रचारित करी गयी हैं जो पाठकों को वेदों के विषय में शंका उत्पन्न कर भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं. कुछ भ्रांतियों के जनक सायण, महीधर आदि के भाष्य हैं जबकि कुछ के जनक पाश्चात्य विद्वान जैसे मेक्समूलर, ग्रिफ्फिथ, ब्लूमफिल्ड आदि हैं.

ऐसी कुछ भ्रांतियां इस प्रकार हैं

१. क्या वेद तीन हैं और क्या अथर्ववेद बाद में सम्मिलित किया गया था?

२. क्या वेदों की शाखाएं भी वेद हैं?

३. क्या यजुर्वेद में कृष्ण और शुक्ल यह दो भेद हैं?

४. क्या वेदों में पुनरुक्ति दोष हैं?

५. क्या वेदों में पुनर्जन्म का सिद्धांत विदित नहीं हैं?

हम एक एक कर इन भ्रांतियों का निवारण करेगें.

१. क्या वेद तीन हैं और क्या अथर्ववेद बाद में सम्मिलित किया गया था?

संस्कृत वांग्मय में कई स्थानों पर ऐसा प्रतीत होता हैं की क्या वेद तीन हैं? क्यूंकि वेदों को त्रयी विद्या के नाम से पुकारा गया हैं और त्रयी विद्या में ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीन का ग्रहण किया गया हैं.

उदहारण में शतपथ ब्राह्मण ६.१.१.८, शतपथ ब्राह्मण १०.४.२.२२, छान्दोग्य उपनिषद् ३.४.२, विष्णु पुराण ३.१६.१

परन्तु यहाँ चार वेदों को त्रयी कहने का रहस्य क्या हैं?

इस प्रश्न का उत्तर चारों वेदों की रचना तीन प्रकार की हैं. वेद के कुछ मंत्र ऋक प्रकार से हैं, कुछ मंत्र साम प्रकार से हैं और कुछ मंत्र यजु: प्रकार से हैं. ऋचाओं के सम्बन्ध में ऋषि जैमिनी लिखते हैं पादबद्ध वेद मन्त्रों को ऋक या ऋचा कहते हैं (२.१.३५), गान अथवा संगीत की रीती के रूप में गाने वाले मन्त्रों को साम कहा जाता हैं (२.१.३६), और शेष को यजु; कहा जाता हैं. (२.१.३७)

ऋग्वेद प्राय: पद्यात्मक हैं, सामवेद गान रूप हैं और यजुर्वेद मुख्यत: गद्य रूप हैं और इन तीनों प्रकार के मंत्र अथर्ववेद में मिलते हैं. इस प्रकार के रचना की दृष्टि से वेदों को त्रयी विद्या कहाँ गया हैं.

इसका प्रमाण भी स्वयं आर्ष ग्रन्थ इस प्रकार से देते हैं

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों वेद श्वास- प्रश्वास की भांति सहज भाव से परमात्मा ने प्रकट कर दिए थे- शतपथ ब्राह्मण १४.५.४.१०

मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ये चारों वेद, ये चारों वेद भी पढ़े हैं- छान्दोग्य उपनिषद् ७.१.२ और छान्दोग्य उपनिषद् ७.७.१

इसी प्रकार बृहदअरण्यक उपनिषद् (४.१२), तैत्रय उपनिषद् (२.३), मुंडक उपनिषद (१.१.५), गोपथ ब्राह्मण (२.१६), आदि में भी वेदों को चार कहाँ गया हैं.

२. क्या वेदों की शाखाएं भी वेद हैं?

पतंजलि ऋषि के महाभाष्य में ऋग्वेद की २१, यजुर्वेद की १०१, सामवेद की १००० और अथर्ववेद की ९ शाखायों का वर्णन आता हैं. जिनकी कुल संख्या ११३१ बनती हैं. स्वामी दयानंद ४ वेदों के अलावा ११२७ शाखाएँ मानते हैं. अब यह सभी शाखाएँ उपलब्ध नहीं हैं. ऋग्वेद की शाकल और बाष्कल, यजुर्वेद की वाजसनेयी मध्यनिन्दनी तथा काण्व शाखा,सामवेद की राणायनीय, जैमिनीय तथा कोथुम और अथर्ववेद की पैप्पलाद तथा शौनकीय शाखा उपलब्ध हैं. वेदों की शाखाओं का विशेष रूप से वर्णन करने की पीछे हमारा उद्देश्य वेदों की विषय में एक भ्रान्ति का समाधान करना हैं . वह भ्रान्ति हैं की असली वेद अब लुप्त हो चुके हैं अर्थात जो वेद अब विद्यमान हैं वे असली नहीं हैं.

सत्य यह हैं की वेदों की शाखाएँ लुप्त हुई हैं नाकि वेद. वेद तो श्रुति परम्परा से सुरक्षित हैं इसलिए उनके लुप्त होने का प्रश्न ही नहीं उठता. वेदों की शाखाएँ परमेश्वर कृत नहीं अपितु ऋषि- मुनि कृत हैं जो की एक प्रकार से वेदों के व्याख्यान भर हैं.

इस विषय में यह प्रमाण भी वेद केवल चार हैं की पुष्टि करते हैं-

१. न्रसिंह पुर्वार्तापिनी उपनिषद् में कहा गया हैं की ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चारों वेद अपने अंगों सहित तथा अपनी शाखाओं सहित चार पद बनते हैं (१.२)

२. बृहज्जाबालोपनिषद में कहाँ गया हैं की जो इस बृहज्जाबालोपनिषद को नित्य पढता हैं वह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद इन चारों को पढता हैं और इनके साथ ही शाखाओं और कल्पों को भी पढता हैं.८.५

अन्य प्रमाण भी इस तर्क की पुष्टि करते हैं जिससे यह सिद्ध होता हैं की वेद चार हैं और वेद की शाखाएँ उससे विभिन्न हैं.

३. क्या यजुर्वेद में कृष्ण और शुक्ल यह दो भेद हैं?

स्वामी दयानंद के आगमन से पूर्व यजुर्वेद के दो भेद एक कृष्ण और एक शुक्ल हैं ऐसी मान्यता प्रचलित थी. यजुर्वेद के दो भेद कैसे हो गया इसके पीछे विष्णु पुराण के तृतीय अंक के चतुर्थ अध्याय के वेद विभक्ति नामक शीर्षक से यह वर्णन आता हैं. ऋषि वैशम्पायन का, देवरात का पुत्र याज्ञवल्क्य नामक एक शिष्य था जोकि बड़ा धर्मज्ञ और गुरु सेवापरायण था, एक बार किसी बात से नाराज होकर वैशम्पायन ने कहा की मेरे से पढ़े को त्याग दो. याज्ञवल्क्य ने योगविद्या से सब उलटी करके फैक दिया, रुधिर से सने हुए उन मंत्रो को कुछ शिष्यों ने तितर बन कर चुग लिया जिससे वे तैतिरीय कहलाये, बुद्धि की मलिनता से वे मंत्र कृष्ण हो गए. इसके पश्चात याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना करके उनसे शुक्ल यजुर्वेद के मंत्र प्राप्त किये जो शुक्ल कहलाये.

इस कथा में अनेक अविश्वसनीय बातें हैं जैसे की कोई विद्या को वमन कर नहीं निकाल सकता, कोई तितर बन कर विद्या को नहीं चुग सकता, इसलिए यह एक गप मात्र हैं.

वस्तुत: यजुर्वेद का नाम शुक्ल यजुर्वेद और तैतरीय संहिता का नाम कृष्ण यजुर्वेद होने का कारण कुछ और ही हैं.

वह हैं इन दोनों की अपनी शुद्धता और अशुद्धता. मूल वेद शुक्ल यजुर्वेद ही हैं उसकी शुद्धता के कारण उसका नाम श्वेत अथवा निर्मल से दिया गया था जबकि तैतरीय संहिता में मिश्रण होने के कारण उसका नाम अशुद्ध अर्थात कृष्ण हो गया.

कृष्ण यजुर्वेद में अनेक स्थानों पर यजुर्वेद के मन्त्रों के स्वरुप में परिवर्तन कर दिया गया हैं. कुछ के क्रम में परिवर्तन हैं (१.१.३), कुछ स्थानों पर एक मंत्र के अनेक मंत्र बना दिए गए हैं, कई स्थानों पर दो मंत्र का एक बना दिया गया हैं (१.१.३ ).

इस प्रकार के परिवर्तन से यजुर्वेद के अपने शुद्ध रूप का लोप होने से ततित्र्य संहिता ही कृष्ण यजुर्वेद कहलाता हैं.

इसलिए कृष्ण यजुर्वेद मान्य और प्रमाणिक नहीं हैं.

४. क्या वेदों में पुनरुक्ति दोष हैं?

वेदों का स्वाध्याय करते हुए हमारा ध्यान इस तरफ जाता हैं की एक ही मंत्र को एक से अधिक वेदों में दोहराया गया हैं अथवा एक ही मंत्र में एक ही शब्द एक बार से अधिक आया हैं. अथर्ववेद के बीसवें कांड के १४३ सूक्तों का करीब ९५८ मन्त्रों में से कुंताप सूक्त के १४६ मन्त्रों को छोड़कर शेष सभी ऋग्वेद में भी हैं. इसी प्रकार सामवेद के १८७५ मन्त्रों में से १०४ मन्त्रों को छोड़ कर शेष सभी ऋग्वेद में भी हैं.लोग इसे पुनरुक्ति कह कर वेदों के रचियता का दोष सिद्ध करने का प्रयास करते हैं.

निरुक्त के रचियता यास्काचार्य ने निरुक्त १०.२१.१५ में वेदों में पुनरुक्ति विषय पर विचार किया हैं.

ऋग्वेद ४.५७.२ मंत्र में मधुमन्तं और मधुश्चुतम यह दो समानान्तर शब्द प्रयुक्त होने के कारण पुनरुक्ति प्रतीत होते हैं परन्तु इसका अर्थ होता हैं जो मधुयुक्त होगा वह मधु बरसाने वाला होगा. अर्थ के भाव से विषय स्पष्ट हो जाता हैं.

इसी प्रकार ऋग्वेद २.३५.१० में हिरण्यरूप और हिरण्यसंद्र्क यह दो सामानांतर शब्दों का जो स्वर्ग जैसे सुंदर रूप वाला होगा वह स्वर्ग जैसा सुंदर दिखाई देने वाला होगा ही अर्थ किया हैं.

ऋषि दयानंद नें वेदों का भाष्य करते हुए एक ही मंत्र में दिए गए एक ही शब्द के अलग अलग अर्थ किये हैं अथवा एक ही मंत्र के दुसरे वेद में भी प्रसंग अनुसार अलग अलग अर्थ किये हैं.

यजुर्वेद के ३७.८ मंत्र में मख शब्द १५ बार प्रयुक्त हुआ हैं. इस शब्द का अर्थ स्वामी दयानंद ने ब्रहमचर्य रुपी यज्ञ, विद्या ग्रहण अनुष्ठान, ज्ञान, मनन, गार्हस्थ व्यवहार, गृह, गृहस्थकार्य संगतीकारण, सद व्यवहार सिद्धि, योग्याभ्यास, संग-उपांग योग तथा ऐश्वर्या प्रद यह अर्थ किये हैं.इस प्रकार एक शब्द के अनेक अर्थ प्रसंग अनुसार हो जाते हैं.

एक अन्य उदहारण ॐ अग्नये नय सुपथा मंत्र जोकि यजुर्वेद में ५.३६, ७.४३, ४०.१६ तीन स्थानों पर आता हैं. स्वामी दयानंद हर स्थान पर उसका अर्थ विभिन्न विभिन्न किया हैं.इसका कारण प्रकरण भेद हैं.

इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता हैं की पुनरुक्ति मन्त्रों के प्रकरण भेद से विभिन्न विभिन्न अर्थ हो जाते हैं नाकि यह वेदों के रचियता का दोष हैं.

५. क्या वेदों में पुनर्जन्म का सिद्धांत विदित नहीं हैं?

कुछ पाश्चात्य विद्वानों की यह धारणा रही हैं की वेद पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन नहीं करते हैं.इसका एक कारण तो वेदों के अर्थो को सूक्षमता से नहीं समझना हैं और दूसरा कारण मुख्यत: रूप से सभी पाश्चात्य विद्वान ईसाई मत के थे इसलिए पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के कारण चूँकि ईसाई मत वेदों में वर्णित कर्म फल व्यस्था और पुनर्जन्म को नहीं मानता इसलिए वेदों में भी पुनर्जन्म के न होने का समर्थन करते रहे. आज इस्लाम मत से सम्बन्ध रखने वाले अपने प्रचार माध्यमों से यहीं जोर देने पर लगे हुए हैं की वेदों में पुनर्जन्म के सिद्धांत का समर्थन नहीं हैं. स्वामी दयानंद अपने प्रसिद्द ग्रन्थ ऋग्वेददि भाष्यभूमिका में पुनर्जन्म के वेदों से स्पष्ट प्रमाण देते हैं.

वे इस प्रकार हैं

१. हे सुखदायक परमेश्वर आप कृपा करे पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्र आदि सब इन्द्रिया स्थापित कीजिये – ऋग्वेद ८.१.२३.६

२. परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दुःख निवारण करने वाली पथ्य रूप स्वस्ति को देवे- ऋग्वेद ८.१.२३.७

३. परमेश्वर सब बुरे कामों और सब दुखों से पुनर्जन्म में दूर रखे- यजुर्वेद ४.१५

४. हे जगदीश्वर आपकी कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रिया मुझे प्राप्त हो – अथर्ववेद ७.६.६७.१

५. जो मनुष्य पुनर्जन्म में धर्म आचरण करता हैं उस धर्म आचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता हैं- अथर्ववेद ५.१.१.२

६. जीव पाप- पुण्य के आधार पर अगले जन्म में मनुष्य या पशु आदि बनते हैं- यजुर्वेद १९.४७

७.इसी प्रकार अथर्ववेद १०.८.२७-२८, ऋग्वेद १.२४.१-२, अथर्ववेद ११.८.३३ में भी पुनर्जन्म के सिद्धांत का प्रतिपादन हैं.

इस प्रकार वेदों की विषय में पुनर्जन्म के विषय में अनेक प्रमाण होने से इस भ्रान्ति का भी निवारण हो जाता हैं.

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Posted on September 14, 2011, in Philosophy, Swami Dayanand, Vedas. Bookmark the permalink. 1 Comment.

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