सनातन धर्मरक्षक महान सम्राट – पुष्यमित्र शुंग


सुमित कुमार उपाध्याय

मोर्य वंश के महान सम्राट चन्द्रगुप्त के पोत्र महान अशोक (?) ने कलिंग युद्ध के पश्चात् बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक अगर राजपाठ छोड़कर बौद्ध भिक्षु बनकर धर्म प्रचार में लगता तब वह वास्तव में महान होता । परन्तु अशोक ने एक बौध सम्राट के रूप में लग भाग २० वर्ष तक शासन किया। अहिंसा का पथ अपनाते हुए उसने पूरे शासन तंत्र को बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में लगा दिया। अत्यधिक अहिंसा के प्रसार से भारत की वीर भूमि बौद्ध भिक्षुओ व बौद्ध मठों का गढ़ बन गई थी। उससे भी आगे जब मोर्य वंश का नौवा अन्तिम सम्राट व्रहद्रथ मगध की गद्दी पर बैठा ,तब उस समय तक आज का अफगानिस्तान, पंजाब व लगभग पूरा उत्तरी भारत बौद्ध बन चुका था । जब सिकंदर व सैल्युकस जैसे वीर भारत के वीरों से अपना मान मर्दन करा चुके थे, तब उसके लगभग ९० वर्ष पश्चात् जब भारत से बौद्ध धर्म की अहिंसात्मक निति के कारण वीर वृत्ति का लगभग ह्रास हो चुका था, ग्रीकों ने सिन्धु नदी को पार करने का साहस दिखा दिया।
सम्राट व्रहद्रथ के शासनकाल में ग्रीक शासक मिनिंदर जिसको बौद्ध साहित्य में मिलिंद कहा गया है ,ने भारत वर्ष पर आक्रमण की योजना बनाई। मिनिंदर ने सबसे पहले बौद्ध धर्म के धर्म गुरुओं से संपर्क साधा,और उनसे कहा कि अगर आप भारत विजय में मेरा साथ दें तो में भारत विजय के पश्चात् में बौद्ध धर्म स्वीकार कर लूँगा। बौद्ध गुरुओं ने राष्ट्र द्रोह किया तथा भारत पर आक्रमण के लिए एक विदेशी शासक का साथ दिया।
सीमा पर स्थित बौद्ध मठ राष्ट्रद्रोह के अड्डे बन गए। बोद्ध भिक्षुओ का वेश धरकर मिनिंदर के सैनिक मठों में आकर रहने लगे। हजारों मठों में सैनिकों के साथ साथ हथियार भी छुपा दिए गए।
दूसरी तरफ़ सम्राट व्रहद्रथ की सेना का एक वीर सैनिक पुष्यमित्र शुंग अपनी वीरता व साहस के कारण मगध कि सेना का सेनापति बन चुका था । बौद्ध मठों में विदेशी सैनिको का आगमन उसकी नजरों से नही छुपा । पुष्यमित्र ने सम्राट से मठों कि तलाशी की आज्ञा मांगी। परंतु बौद्ध सम्राट वृहद्रथ ने मना कर दिया।किंतु राष्ट्रभक्ति की भावना से ओत प्रोत शुंग , सम्राट की आज्ञा का उल्लंघन करके बौद्ध मठों की तलाशी लेने पहुँच गया। मठों में स्थित सभी विदेशी सैनिको को पकड़ लिया गया,तथा उनको यमलोक पहुँचा दिया गया,और उनके हथियार कब्जे में कर लिए गए। राष्ट्रद्रोही बौद्धों को भी ग्रिफ्तार कर लिया गया। परन्तु वृहद्रथ को यह बात अच्छी नही लगी।
पुष्यमित्र जब मगध वापस आया तब उस समय सम्राट सैनिक परेड की जाँच कर रहा था। सैनिक परेड के स्थान पर ही सम्राट व पुष्यमित्र शुंग के बीच बौद्ध मठों को लेकर कहासुनी हो गई।सम्राट वृहद्रथ ने पुष्यमित्र पर हमला करना चाहा परंतु पुष्यमित्र ने पलटवार करते हुए सम्राट का वध कर दिया। वैदिक सैनिको ने पुष्यमित्र का साथ दिया तथा पुष्यमित्र को मगध का सम्राट घोषित कर दिया।
सबसे पहले मगध के नए सम्राट पुष्यमित्र ने राज्य प्रबंध को प्रभावी बनाया, तथा एक सुगठित सेना का संगठन किया। पुष्यमित्र ने अपनी सेना के साथ भारत के मध्य तक चढ़ आए मिनिंदर पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीर सेना के सामने ग्रीक सैनिको की एक न चली। मिनिंदर की सेना पीछे हटती चली गई । पुष्यमित्र शुंग ने पिछले सम्राटों की तरह कोई गलती नही की तथा ग्रीक सेना का पीछा करते हुए उसे सिन्धु पार धकेल दिया। इसके पश्चात् ग्रीक कभी भी भारत पर आक्रमण नही कर पाये। सम्राट पुष्य मित्र ने सिकंदर के समय से ही भारत वर्ष को परेशानी में डालने वाले ग्रीको का समूल नाश ही कर दिया। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वैदिक सभ्यता का जो ह्रास हुआ,पुन:ऋषिओं के आशीर्वाद से जाग्रत हुआ। डर से बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले पुन: वैदिक धर्म में लौट आए। कुछ बौद्ध ग्रंथों में लिखा है की पुष्यमित्र ने बौद्दों को सताया .किंतु यह पूरा सत्य नही है। सम्राट ने उन राष्ट्रद्रोही बौद्धों को सजा दी ,जो उस समय ग्रीक शासकों का साथ दे रहे थे।
पुष्यमित्र ने जो वैदिक धर्म की पताका फहराई उसी के आधार को सम्राट विक्र्मद्वित्य व आगे चलकर गुप्त साम्रराज्य ने इस धर्म के ज्ञान को पूरे विश्व में फैलाया।

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Posted on October 4, 2011, in Legends. Bookmark the permalink. 8 Comments.

  1. Pratap chauhan

    Bauddhon ke ahinsavad ne rashtra ko kayar banaya. Yogdarshan ke vyasbhashy me ahinsa ka arth ‘vair-tyag’ kiya gaya hai. Ham kisi se vair na karen, ye ahinsa hai. Agar koi dusht hamare rashtra par aakraman kare to rashtra ki raksha hetu uska vadh karna pratyek rashtravasi ka kartvya hai.
    Bauddhon ne apni napunsakta ko ahinsa ke choge me chhipaya aur hamesa unka sath diya, jo lutere, hinsak aur hatyare the.
    Sindh ke raja dahir par aakraman karne vale ibn-kasim ki sahayata bhi bauddhon ke mukhiya sarvedas ne ki thi. Jise bad me trilochanpal namak rashtrabhakt yuva ne yamlok bheja tha.

  2. Bhimrao Changdeo Tayde

    पुष्यमित्र शुंगकी जो कहाणी यहां रटी गई वो सारासार इतिहाससे मेल नही खाती. क्योंकी उसके बाद वैदिक धर्मानुसार संस्कृती जागृत की गई. षड्यंत्र रचा गया और बादमे मनुस्मृती आई. उसके बाद अनेक परदेशीओंका आक्रमण हूवा. फिर अंग्रेज आये. क्या ये बुद्धधम्म का प्रभाव था. हिंदू धर्म के भेदाभेद, जातीयता, उच्चनीचता और ब्राम्ह्नोकी षंढता ही उसका कारण बनी थी.
    जो छितरे हुये लोग थे, बादमे अस्पृश्य बने थे वे शूरवीर थे इसका उपयोग धर्ममार्तोंडोने नही किया. वे उनकेलिये मानव प्राणी नही थे. वो तो शूरवीर थे. अगर उन्हे समान दर्जा दिया गया होता तो परतंत्र की नौबत नही आती, और आज का भारत, भारत नही रहता वो जंबूद्वीप ही रहता.

    • Bhimrao ji

      very before pushyamitra shung the degradation of hindus had started.

      It seems that you are interested to know that when did varna vyastha means assignment of job according to quality changed into castism means job on basis of birth or hiearchy.

      a very simple example of Ramayan and Mahabharat explains us about social and cultural degradation in history.

      In Ramayan Lord Rama went to exile when his step mother demanded the throne for her real son. All these events happened when King Dasratha was about to handle his throne to Lord Rama. When younger brother of Lord Rama Bharat heard about the deeds of his mother he rejected her offer and himself accepted a ascitic life for fourteen years.

      The whole Ramayana theme gives us a very important message

      “RIGHT JOB TO RIGHT PERSON”

      This is known as Varn Vyastha means according to Dasratha after discussing with Sage Vashistha (A passage comes in Valmiki Ramayan where Rishi Vashistha discuss about qualities of Lord Rama during study period with Lord Dasratha. This explains they were analysing him fit for his job or not.) as well as other people of Ayodhya Lord Rama was most suitable person to rule the kingdom according to his qualities.If he was denied kingdom for fourteen years his brother also rejected the offer to rule ayodhyaya.

      This is Varn Vyavastha .

      Now if we analyse Mahabharta Kauravas and Pandvas fought for kingdom.

      Duryodhan who was not a suitable candidate if compared with Yudhister

      (Even passages comes in Mahabhartha that duryodhan was a drunkyard, characterless who kept prostitutes with him whereever he went)

      This is an example of castism means son of a king if do not qualifies for job of a king then even wanted to become king by using his muscle power.

      The whole mahabharta war was a sort of war for Castism vs Varn Vyavastha means Wrong vs Right.

      In ages of Ramayan the morality was followed while in ages of mahabhartha morality was lost.

      Slowly varn vyavastha was changing to castism.

      In Mahabharta war our country suffered a lot, we lost ksatriya defencing power , we lost brahman means learning and intellectual power of country which lead to fast degradation of country.

      Atlast Varn Vyavastha changed into castism.

      Ramrajya changed into Ravan Rajya

      Dr Vivek Arya

  3. Bhimrao Changdeo Tayde

    रामायण और महाभारत ये इतिहास नही है, बल्की साहित्य कृती है. दोनो साहित्यकृतीओंका कालखंड का भी निश्चित मान्यता न होनेपरभी सभी राय ली जाये तो ई.स. सदी २ से ५ होती है. पाठ्कोने एक एक करके जादह से जादह विद्वानोकी, संशोधनकर्ता की साहित्यकृती का अध्ययन/ चिंतन करना जरुरी है.

  4. bhimrao ji

    claiming ramayan and mahabharta as a myth is again a conspiracy planned first by christian western indologists and later being promoted by atheistis like karunanaidhi . motive was very simple to create disrespect among our country man so that they can create new grounds of conversion to christianity.

    read following links to know that

    Who was Rama – Myth or Historical Hero

    and

    western indologists a study in motoves

    http://agniveer.com/wp-content/uploads/2010/09/western-indologists2.pdf

    http://agniveer.com/2164/rama-myth-or-hero/

  5. यह सरासर झुठ है,बौधधर्म को बदनाम करने की साजिश है।

  6. AshokKumar Sharma

    जो भी हो, प्रयास बहुत अच्छा है..यदि यह माना जाए कि धर्म वह नहीं जो आप महसूस करते हैं..बल्कि वह है जो दुसरे लोग समझ पाते हैं..तो हिन्दू धर्म की जितनी ऐसी की तैसी होगी उससे ज़्यादा एनी मजहबों की होगी..समझा कीजिये.. ज़रूरी थोडे ही है कि सब खुल्लम खुल्ला कहा जाए…

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