दयानन्द क्या था


दयानन्द को गर समझ पाएंगे हम
जादू सा वैसा ही कर पाएँगे हम

भारत की भू पर छाया वह जैसे
सकल विश्व पर वैसे, छा जाएंगे हम

बला बन के वह, हर‌ कुरीती पे झपटा
न पाया किसी ने सिरा पैर उसका

वह हरदम गरजता रहा ढोंगियों पर
न ड्रर था उसे कुछ,किसी भी तरहं का

परमात्मा से जो हरदम मिला था
बन आत्मशक्ति, हरपल निर्भय चला था
न कुछ भी असंभव उसके लिये था

दिया ज्ञान प्रभु का,सृष्टी को उसने
बरसों से जो जाने कैसे छुपा था

किया अर्थ वेदों का ऋषियों के सुर में
अमृत कलष भर भर सबको दिया था

न दीनों अनाथों, न नारी न विधवा
दिया त्राण सबको न कोई बचा था

भला ही भला उसने सब का किया था
यही मन्त्र आर्यों को उसने दिया था

करो सबकी उन्नती, यही आपकी है
नहीं राह कोई भी इसके सिवा है।।

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Posted on October 8, 2011, in poems. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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