स्वर्ग का रास्ता भी तो लम्बा होता है


जितेन्द्र सिंह शेखावत- सदैव ‘राष्ट्रवादी’

मैं अपने एक  मित्र के बीमार पिता से मिलने उसके घर गया था. यह नितांत पहली बार था जब मैं उसके घर जा रहा था. मुख्य सड़क से गली के अन्दर मैं अपने मित्र के  साथ हीं जा रहा था. अचानक जो दिखा वो हतप्रभ करने वाला था. वह एक मुस्लिम बहुल मोहल्ले में रहता था, यह तो मुझे पहले से हीं पता  था. मोहल्ले के पहले घर के दरवाजे पर हीं एक विशालकाय गाय उलटी टंगी थी. असाधारण बदबू! मैं सहन नहीं कर पा रहा था. मैंने नाक पर रुमाल रखीं चाही तो मेरे दोस्त ने मना कर दिया (ऐसा करने से मुसलमान नाराज हो जाते हैं) . गली में लगभग  दो सौ मीटर अन्दर उसका घर रहा होगा. इस दो सौ मीटर की दुरी कम से कम पांच गाय उल्टी टंगी हुई मिली. जैसे तैसे जब मैं उसके घर पहुंचा तो बीमार पिता के हालचाल जानने कि बजाये खुद हीं उल्टी करने लगा. घर के अन्दर तक दुर्गन्ध आ रही थी. कुछ देर बाद मेरे मित्र की दादी जो कि अत्यंत वृद्ध थीं, उन्होंने मुझसे बांग्ला में कहा कि कोई भी जब पहली बार उनके घर आता है तो उसकी यही स्थिति होती है (मैं पश्चिम बंगाल में कोलकाता के एक उपनगरीय इलाके में रहता हूँ). मैंने उनसे पूछा कि वे लोग क्यों एक मुस्लिम बहुल इलाके में रहते हैं तो वे रो पड़ीं. उन्होंने ने बताया  कि वे लोग पूर्वी पाकिस्तान (अब बंगलादेश)  से आये हैं. पूर्वी पाकिस्तान के चटगाँव में उनकी एक बड़ी सी हवेली थी. सैकड़ों एकड़ जमीन थी और वे एक संपन्न परिवार की महिला थी. 1947 के बटवारे ने सब कुछ छीन लिया. उनके पुत्री और मेरे मित्र के बुआ के साथ बलात्कार हुआ. उनके भाई और देवर कि हत्या कर दी गयी. और सब कुछ छोड़ कर हजार समस्याएं  झेलते हुए वे लोग कोलकाता पहुंचे.  किसी तरह थोड़ी  सी जमीन खरीद कर एक छोटा सा घर बनाया. तब इलाका हिन्दू बहुल था. लेकिन मार्क्सवादी नेता और एक जनसंघी के लड़ाई में यहाँ के समीकरण बिगड़  गए. मार्क्सवादी नेता ने अपना वर्चस्व कायम करने  के लिए वहां मुसलमानों को बसाना शुरू किया. कुछ वर्षों में हीं वहां मुसलमानों कि बहुलता हो गयी. फिर गो-हत्या  जैसी चीजे खुलेआम होने लगे. हिन्दुओ कि लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार आम होने लगा. हिन्दुओं के त्योहारों के समय उनके घरों में खिरकी से गो मांस फ़ेंक दिया जाता. वक्त के साथ मार्क्सवादी ताकतवर होते गए और जनसंघी बंगाल में कमजोड होते गए. कोई हिन्दुओं कि बात सुनने वाला नहीं था. फलतः एक एक कर के हिन्दू परिवार इलाका छोड़ते  गए. अब वे हीं एकमात्र हिन्दू बचे हैं वहां. संसाधन की  कमी के कारण वे दूसरी जगह घर नहीं ले सकते और इस घर को बेचने से उचित कीमत नहीं मिलेगी, क्योंकि  कोई भी इस इलाके में रहना नहीं चाहता. मजबूरन उन्हें इन्ही मुसलमानों को औने पौने दामो पर बेचना पड़ेगा. उनका अंतिम वाक्य बिलकुल तिलमिला देने वाला था. वे पूछती हैं कि जब यही सब होना था तो पूर्वी बंगाल हीं क्या बुरा था (बंगाली आज भी बंगलादेश को पूर्वी बंगाल हीं कहते हैं, शायद यादे छूटती नहीं). वे भगवन श्री कृष्ण की तस्वीर  अपने हाथ में लेकर इस जीवन से मुक्ति मांग रही हैं.

इस व्यथा को वही समझ सकता है जो इस कष्ट को भुगत रहा है, लेकिन मैं तो यह दृश्य अधिक देर तक देख नहीं पाया और उलटे पाँव वापस लौट आया. कई दिनों तक नींद नहीं आई. मुझे हमेशा वही सब दिखता रहता था. मैं परेशान हो कर एक संघी से मिला और अपनी व्यथा सुने और अपने मित्र के लिए मदद  मांगी. सुनकर वे बहुत द्रवित हुए, लेकिन कुछ करने में असमर्थता जताई.  बंगाल में जब कि सत्ता पक्ष से लेकर प्रमुख विपक्षी दल तक मुसलमानों कि दलाली में लगे हुए हैं तो ऐसे किसी भी कोशिश का परिणाम रासुका जैसे कानून हीं होंगे. लेकिन उन्होंने मुझे हिन्दुओं के हाथ मजबूत  करने कि सलाह दी और आज मैं उसी रास्ते पर चल रहा हूँ. मै यहाँ बता देना चाहता हूँ कि मैंने अभी तक अपने जन्मदिन कि रजत जयंती नहीं मनाई है अर्थात २५ साल से कम उम्र का हूँ. लेकिन मैं नास्तिक से मार्क्सवादी, मार्क्सवाद से धर्मनिरपेक्ष कांग्रेसी लोगों के सांगत में रह चूका हूँ . लेकिन इस घटना ने मेरे सामने स्पष्ट कर दिया कि धर्मनिरपेक्षा वास्तव में राष्ट्रद्रोह का हीं एक रूप है. और यह हिन्दुओ को इस बात की  सजा है क्यों वह गजनी और गोरी के भय से मुसलमान नहीं हुआ और हिन्दू बना रहा. सचमुच देश के हिन्दू अभी गुलाम हैं. और जब तक मातृभूमि के यह सपूत गुलाम हैं. यह मातृभूमि भी गुलाम है.   जिन्ना  ने कहा था – ” हिन्दू और मुस्लिम दो संप्रदाय नहीं बल्कि दो अलग विचारधारा है, अलग सभ्यताये हैं . एक का आदर्श क्षत्रपति शिवाजी तो दुसरे का चंगेज खान है. ये दो विचारधराये कभी एक साथ नहीं रह सकती.” मैं मानता हूँ कि जिन्ना ने सही कहा था. सचमुच ये दो विचारधाराएँ एक साथ नहीं रह  सकती. तो होना तो ये चाहिए था कि वे लोग भारत भूमि  छोड़कर अपने देश को लौट जाते. लेकिन अंग्रेजो ने उन्हें भारत का सीना चीरकर दे दिया. करोडो  हिन्दू बेघर हो गए. लेकिन हिन्दुओ के दुखो का अंत यहीं नहीं हुआ. जो भारत हिन्दुओ के लिए बचा भी उसमे कांग्रेस वालों ने जमाई रख लिया. और वो घर-जमाई अब घर के मालिक बन बैठे हैं. ये घर-जमाई खाते तो यहाँ का हैं लेकिन गुण कहीं और का हीं गाते हैं. भारत पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच चल रहा हो तो ये मस्जिद में भारत के हार की दुआ करते हैं.

वे लोग स्वप्न में जीते हैं जो कहते हैं कि भिन्न भिन्न धर्म इश्वर के पास पहुँचाने के भिन्न भिन्न रास्ते हैं. ऐसा नहीं है, ये इस्लाम धर्म नहीं है सभ्यता है. और हर सभ्यता दुसरे कि मौत पर फलना  और फूलना चाहता है. कभी भी कोई  सच्चा मुसलमान इस देश के लिए  उस तरह का प्रेम और आदर नहीं रख सकता जैसा कि हम हिन्दू रखते हैं. जो युद्ध और पराजय हमारे दिल पर आज भी जख्म के तौर पर मौजूद हैं वही इन मुसलमानों के लिए भारत में उद्भव का कारण है.

इसलिए हमें समझ लेना चाहिए कि देश कि एकता अखंडता और भव्यता के लिए इसका हिन्दू राष्ट्र होने अतिअवाश्यक है. लेकिन यह कैसे हो? इसके लिए हमें समझना होगा कि भारत के मुस्लिमों कि प्रकृति क्या है. हमारे देश में दो तरह के मुस्लिम हैं. एक जो गजनी, गोरी, और बाबर जैसे लुटेरों के साथ आये, दुसरे जिन्होंने इनके अत्याचार से परेशान होकर अथवा किसी लोभवश अपना धर्म परिवर्तन कर लिया. यद्यपि कुछ ऐसे भी मुस्लिम हैं जो व्यापार इत्यादि के उद्देश्य से आये और यहीं के होकर रह गए लेकिन उनकी संख्या नगण्य है. ऐसे में हमें यह तो तय कर हीं लेना चाहिए कि हमें इन मुसलमानों से किसी प्रकार की सहानुभूति रखने कि जरूरत नहीं है.

हम सब ने एक कहानी पढ़ी है कि शिक्षक ने बच्चे को एक श्यामपट (blackboard)  पर दो लकीर खींचकर कहा कि एक लकीर लम्बी कर दो. सबने दुसरे लकीर को मिटाया और एक ने पहले लकीर को बढाया. कहने कि जरूरत नहीं पहले लकीर को बड़ा करने वाले को विजेता घोषित किया गया. यदि इस शिक्षा को यहाँ लगायें तो तात्पर्य है कि हिन्दू अधिकाधिक संतान को जन्म दें. लेकिन मैं इससे सहमत नहीं हूँ. इससे बड़ी मात्र में संसाधनों का अकाल पड़ेगा और बेरोजगारी और गरीबी के कारण स्थिति पाकिस्तान और बंगलादेश जैसी हो जाएगी. मैं दुसरे तरीके का कायल हूँ. अपनी लकीर बड़ी करने के लिए दुसरे कि लकीर छोटी कर दी जाये. इसकेलिए कई स्तर पर काम करना होगा.

एक यह हो कि सभी अल्पसंख्यक शिक्षण सन्सथानो को बंद कर देना होगा. दूसरा संसद में कानून बनाकर हिन्दू धर्म के अतिरिक्त किसी भी धर्म में धर्मपरिवर्तन को असंभव कर देना होगा. इसके बाद हिन्दू सनागाथानो को मुसलमानों खासकर उस समुदाय को जो हिन्दू से मुस्लिम हुआ है उसे अपने धर्म में वापस लाने के प्रयत्न करने होंगे. यदपि हम इसमे बहुत अधिक सफल नहीं हो सकेंगे, लेकिन आगे का रास्ता आसन हो जायेगा. भारत बंगलादेश से सिख सकता है कि कैसे 1971 तक 30 प्रतिशत हिन्दू आबादी वाले बंगलादेश में आज 90 प्रतिशत से अधिक मुसलमान हैं. यह कैसे है सबको मालूम है और उसी तरीको को यहाँ भी प्रयोग में लाना होगा. लेकिन यह होगा कैसे? क्या बकरी के तरह मिमियाने वाले मनमोहनी सरकार के तत्वाधान में ? या फिर इटालियन माता के कुसंसकारी संतानों के भरोसे?

नहीं!  यह तो तभी होगा जब कोई हिन्दू कुल शिरोमणी इस देश का प्रधानमंत्री होगा. वैसा शेर तो आज के समय में नरेन्द्र मोदी हीं हैं . यही हमारे हजार साल से अधिक के गुलामी के कलंक को मिटा सकते हैं. मैं यह दावा करता हूँ कि यदि ठीक समय पर मोदी जी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया जाये तो भाजपा, 2014 के अम्म चुनाव के पश्चात्  अपने 1999 के 181 सीटों में 100 कि बढ़ोतरी कर के 281 सीटों के साथ केंद्र की सत्ता में आरुढ़ होगी. यदि सही तरीके से प्रयत्न हुआ तो 2030 तक भारत में 90 प्रतिशत से अधिक जनसँख्या हिन्दुओ कि होगी. 2030 का समय भारत के लिए निर्णायक होगा.

यदि 2030 तक हिन्दू जनसँख्या को 95 प्रतिशत के ऊपर पहुंचा दे तो भारत कि 95 प्रतिशत आतंरिक समस्यायों का समाधान हो जायेगा. यह वो समय होगा जब चीन की  ताकत बहुत अधिक बढ़ चुकी होगी और वह सीधे तौर पर अमेरिका को चुनौती दे रहा होगा. अमेरिका पाकिस्तान के रवैये के कारण अफगानिस्तान की लड़ाई  लगभग हार चूका होगा. पाकिस्तान में चीन का हस्तक्षेप बहुत बढ़ चूका होगा और अमेरिका सहित सभी पश्चिमी देश यह समझ चुके होंगे कि चीन को संभालना उनके बस में नहीं है. तब वे इस लड़ाई को भारत के नेतृत्व में लड़ेंगे क्योंकि पश्चिमी देशों के लिए भारत कभी उतना बड़ा खतरा नहीं रहा जितना बड़ा चीन. भारत पश्चिमी देशों के मदद से पाकिस्तान से चीन को बाहर करने  के लिए आगे बढेगा और यह लड़ाई पाकिस्तानी जमीन पर हीं होगी नतीजा पाकिस्तान कि 90 प्रतिशत जनता इस लड़ाई में मारी जाएगी और भारत का पाकिस्तान पर कब्ज़ा हो जायेगा. इसी समय बंगलादेश अपनी बढाती जनसँख्या और इस्लामिक कट्टरता  के कारण असाध्य रोग हो चूका होगा और पाकिस्तान में हुए नरसंहार का बदला लेने के लिए वह भारत पर आक्रमण करेगा.

आप तो जानते हीं हैं कि जब गिदर कि मौत आती है तो वह शहर कि तरफ भागता है. फिर भारत के पास बंगलादेश पर एक परमाणु बम डालने का पर्याप्त कारण होगा. इस तरह अखंड भारत का पुनः एकीकरण होगा. देश से मुस्लिमों का विनाश होगा और देश फिर से अपने वास्तविक भौगोलिक और सांस्कृतिक स्वरुप में आ जायेगा. इस तरह हम भारतीय 1100 साल के कलंक को धो डालेंगे. यादें तो फिर भी रह जाएँगी लेकिन जख्मों के दाग धुल जायेंगे. एक चीज हमें समझना होगा कि 2030 का निर्णायक समय तो आएगा हीं आएगा. इसके लक्षण अभी से दिखने लगे हैं. लेकिन हमें इस परीक्षा कि घरी में कितने खरे उतरते हैं यह हमें सोचना है.

इसीलिए मैं दक्षिनापंथी भाइयों से कहना चाहता हूँ कि हिम्मत ना हारे. अच्छा समय आने वाला है.   जब यह सब हो जायेगा तो हम फिर से स्वामी विवेकानंद का वह नारा दोहरा सकेंगे ” क्या मैं चाहता हूँ कि हिन्दू धर्म के अतरिक्त सभी धर्म समाप्त हो जाए. कतई नहीं. वरन मैं तो चाहता हूँ कि सभी धर्मों कि पताकाएं एक साथ लहराए.”  सचमुच हमें इरान और इराक में इस्लाम को नहीं मिटाना हमें अमेरिका और इंग्लैंड के इसाई होने से भी कोई समस्या नहीं. हमारा भारत भारतीय रहे बस इतना चाहते हैं हम. अभी यह दोहराएंगे तो लोग कहेंगे ” क्षमा  शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो”. तो पहले गरल (विष) हो फिर क्षमा करें.

एक हिन्दू राष्ट्रवादी !!

रास्ता लम्बा है लेकिन क्या यह स्वर्ग को नहीं जाता ?      

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Posted on October 11, 2011, in Islam. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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