जिहाद : क्या और क्यों ?


इस्लाम एक धर्म-प्रेरित मुहम्मदीय राजनैतिक आन्दोलन है, कुरान जिसका दर्शन, पैगम्बर मुहम्मद जिसका आदर्श, हदीसें जिसका व्यवहार शास्त्र, जिहाद जिसकी कार्य प्रणाली, मुसलमान जिसके सैनिक, मदरसे जिसके प्रशिक्षण केन्द्र, गैर-मुस्लिम राज्य जिसकी युद्ध भूमि और विश्व इस्लामी साम्राज्य जिसका अन्तिम उद्‌देश्य है। इसीलिए जिहाद की यात्रा अन्तहीन है।

डॉ के. वी. पालीवाल

प्राक्कथन

जिहाद इस्लाम का केन्द्र बिन्दु है। जिहाद के बिना इस्लाम का कोई अस्तित्व नहीं है या यह कहना/ज्यादा उचित है कि जिहाद ही इस्लाम है और इस्लाम ही जिहाद है। जिहाद से विश्व भर के गैर-मुसलमान सबसे अधिक प्रभावित हैं। इसलिए गैर-मुसलमानों के सन्दर्भ में जिहाद के सही स्वरूप को समझना बहुत आवश्यक है।

पिछले कुछ वर्षों में इस्लाम के कट्‌टर-पंथियों ने जिहाद के नाम पर इस्लामी और गैर-इस्लामी सभी प्रकार के देशों पर बम विस्फोटों से अनेक फ़ियादीन हमले किए जिनमें हजारों निरपराध लोग मारे गए। इस धर्म-प्रेरित आतंकवाद की निष्पक्ष लोगों ने बड़े कड़े शब्दों में भर्त्सना की। साथ ही उत्सुकतावश पूछा कि क्या निपराध लोगों की हत्या करना ही इस्लाम है? दूसरी ओर मुसलमानों का कहना है कि इस्लाम तो शान्ति का मज़हब है। इसका आतंकवाद से कुछ लेना-देना नहीं है। पर साथ ही कहते हैं कि ‘अल्लाह के लिए जिहाद करना’ प्रत्येक मुसलमान का एक अनिवार्य धार्मिक कर्त्तव्य है। यह अल्लाह के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। परन्तु फिर जिहाद को भी इस्लाम के पाँच प्रमुख स्तम्भों-‘एक परमेश्वर अल्लाह, माज़, रोज़ा, हज्ज और ज़कात’ में शामिल नहीं किया गया है। आखिर क्यों ?

इस रहस्यमय प्रश्न के अनेक पहलू हैं जैसे-जिहाद किससे, क्यों, कब, कैसे, कहाँ, कब तक आदि ? आज सारा विश्व इस्लामी जिहाद से पीड़ित है। अतः इन प्रश्नों को इस्लामी धर्म शास्त्रों के आधार पर समझना अत्यन्त आवश्यक है। हम यहाँ इन प्रश्नों की, विशेषकर गैर-मुसलमानों के सन्दर्भ में, इस्लामी धर्मशस्त्रों, कुरान, हदीसों एवं विधि शास्त्रों, शब्दकोशें, विश्वज्ञानकोशों, मुस्लिम और गैर-मुस्लिम इस्लाम के विद्वानों, इस्लाम के इतिहास आदि के आधार पर जिहाद के शाब्दिक और व्यवहारिक अर्थ की समीक्षा करेगें और इसके उद्‌देश्यों को समझने का प्रयास करेंगे।

कुरान में जिहाद


जिहाद शब्द की उत्पत्ति-‘

जिहाद’ शब्द अरबी भाषा के ‘जुहद’ शब्द से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘कोशिश करना’। मगर इस्लाम के धार्मिक अर्थों में जो शब्द प्रयोग होता है वह है-‘जिहाद फीसबी लिल्लाह’ यानी ‘अल्लाह के लिए’ या ‘अल्लाह के मार्ग में जिहाद करना’। (जिहाद फिक्जेशन, पृ. ११)। जिहाद का कोई पर्यायवाची या समानार्थक शब्द नहीं है। इसलिए इसका शाब्दिक अर्थ नहीं किया जा सकता है बल्कि इसकी व्याखया ही की जा सकती है।

जिहाद का महत्व

इस्लाम के सभी विद्वान मानते हैं कि इस्लाम के धर्मग्रन्थों यानी कुरान और हदीसों में जिहाद का जितना विस्तृत वर्णन किया गया है, उतना अन्य किसी विषय का नहीं है। कुरान में ‘जिहाद की सबी लिल्लाह’ शब्द पैंतीस और ‘कत्ल’ उनहत्तर बार आया है’ (जिहाद फिक्जे़शन, पृ. ४०)। हालांकि तीन चौथाई कुरान पैगम्बर मुहम्मद पर मक्का में अवतरित हुआ था, मगर यहाँ जिहाद सम्बन्धी पाँच आयतें ही हैं, अधिकांश आयतें मदीना में अवतरित हुईं। मोरे के अनुसार मदीना में अवतरित २४ में से, १९ सूराओं (संखया २, ३, ४, ५, ८, ९, २२, २४, ३३, ४७, ४८, ४९, ५७-६१, ६३ और ६६) में जिहाद का व्यापक र्वान है (इस्लाम दी मेकर ऑफ मेन, पृत्र ३३६)। इसी प्रकार ब्रिगेडियर एस. के. मलिक ने जिहाद की दृष्टि से मदीनाई आयतों को महत्वपूर्ण मानते हुए इनमें से १७ सूराओं की लगभग २५० आयतों का ‘कुरानिक कन्सेप्ट ऑफ वार’ में प्रयोग किया है तथा गैर-मुसलमानों से जिहाद या युद्ध करने सम्बन्धी अनेक नियमों, उपायों एवं तरीकों को बड़ी प्रामाणिकता के साथ बतलाया है जो कि जिहादियों को भड़काने के लिए अक्सर प्रयोग की जाती हैं। डॉ. के. एस. लाल के अनुसार कुरान की कुल ६३२६ आयतों में से लगभग उनतालीस सौा(३९००) आयतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से अल्लाह और उसके रसूल (मुहम्मद) में ‘ईमान’ न रखने वाले ‘काफिरों’, ‘मुश्रिकों और मुनाफ़िकों’ से सम्बन्धित हैं।

(थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया, पृ. ५)

जिहाद का अर्थ-

इस्लाम के समर्थक बार-बार यही तर्क देते हैं कि जिहाद का अर्थ तो ‘कोशिश’ या ‘प्रयास करना’ है। जबकि साउदी अरेबिया की हज्ज मिनिस्ट्री से हिजरी १४१३ में प्रमाणित कुरान के अंग्रेजी भाष्य में ‘अल्लाह के मार्ग में जिहाद’ की ८३ आयतों में ‘स्ट्राइब’ का शाब्दिक अर्थ ‘युद्ध करना’ या ‘कत्ल करना’ किया गया है। पांच आयतों (२ः१९१;३ः१५६;३ः१५७; ३ः१९५) और १९ः५ क्रमशः पृष्ठ संखया ८०, १८८, १८९, २०२ और ४९५-४९७) में तो स्ट्राइव शब्द का अर्थ फाइट (युद्ध करना) और स्ले (कत्ल करना) दोनों अर्थ एक ही आयत में साथ-साथ किए गए हैं। इतना ही नहीं, कुरान में मुसलमानों को गैर-मुसलमानों से अल्लाह के मार्ग में युद्ध करने के लिए अनेकों आदेश दिए गए हैं-(सभी आयतों का प्रमाणिक हिन्दी अनुवाद’कुरान मजीद’ से लिया गया है जिसमें अरबी कुरान के साथ मारमाड्‌यूक पिक्थल का अंग्रेजी और मुहम्मद फ़ारुख खाँ का हिन्दी अनुवाद साथ-साथ दिया गया है।

जिहाद का अर्थ नीचे लिखी आयतों में सुस्पष्ट है :

(i) सबसे पहले अल्लाह ने मानव समाज को दो गुओं में बांटा(कुरान, ५८ः१९-२२)। जो अल्लाह और मुहम्मद पर ईमान लाते हैं वे अल्लाह की पार्टी वाले (मोमिन)हैं और जो ऐसा नहीं करते, वे शैतान की पार्टी वाले काफ़िर हैं, और मोमिनों का कर्त्तव्य है कि वे कफ़िरों के देश (दारूल हरब) को जिहाद द्वारा दारुल इस्लाम बनायें। साथ अल्लाह ने कहा ”निस्ंसदेह काफ़िर तुम्हारे(ईमानवालों के) खुले दुश्मन हैं” (४ः१०१, पृ. २३९)।

(ii) ”तुम पर (गैर-मुसलमानों से) युद्ध फर्ज़ किया गया है और वह तुम्हें अप्रिय है औरहो सकता है एक चीज़ तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें प्रिय हो ओर वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है और तुम नहीं जानते।” (२ : २१६, पृ. १६२)

(iii) ”हे नबी ! ‘काफ़िरों’ और ‘मुनाफ़िकों’ से जिहाद करो और उनके साथ सखती से पेश आओ। उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है ओर वह क्या ही बुरा ठिकाना है” (९ः७३, पृ. ३८०)

(iv) ”किताब वाले’ (ईसाई, यहूदी आदि) जो न अल्लाह पर ‘ईमान’ लाते हैं और न ‘आख़िरत’ पर और न उसे ‘हराम’ करते हैं जिसे अल्भ्लाह और उसके ‘रसूल’ ने ‘हराम’ ठहराया है और वे न सच्चे ‘दीन’ को अपना ‘दीन’ बनाते हैं, उनसे लड़ो यहाँ तक कि अप्रतिष्ठित होकर अपने हाथ से ज़िज़िया देने लगें।” (९ः२९, पृत्र ३७२)।

(v) ”फिर हराम महीने बीत जाऐं तो मुश्रिकों (मूर्ति पूजकों) को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़द्यों और उन्हें घेरो और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। यदि वे तौबा कर लें और ‘नमाज’ क़ायम करें और ‘जकात’ दें तो उनका मार्ग छोड़ दो।” (९ः५, पृ ३६८)।

(vi) ”निःसन्देह अल्लाह ने ‘ईमान वालों से उनके प्राणों और उनके मालों को इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए जन्नत है। वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं तो वे मारते भी हैं और मारे भी हैं और मारे भी जाते हैं। वह अल्लाह के ज़िम्मे (जन्नत का) एक पक्का वादा है कि ‘तौरात’ और ‘इंजील’ और कुरान में; और अल्लाह से बड़कर अपने वादे को पूरा करने वाला कौन हो सकता है ? ।” (९.१११, पृ. ३८८)।

(vii) ”वही है जिसने अपने ‘रसूल’ को मार्गदर्शन और सच्चे’दीन’ (सत्य धर्म) के साथ भेजा ताकि उसे समस्त ‘दीन’ पर प्रभुत्व प्रदान करें, चाहे मुश्रिकों को यह नापसन्द ही क्यों नह हो।” (९ः३३, पृत्र ३७३)।

(viii) इतना ही नहीं, जिहाद न करने वाले के लिए अल्लाह की धमकी भी है-” यदि तुम (जिहाद के लिए) न निकलोगे तो अल्लाह तुम्हें दुख देने वाली यातनाएँ देगा और तुम्हारे सिवा किसी और गिरोह को लाएगा और तुम अल्लाह का कुछ न बिगाड़ पाओगे।” (९ः३९, पृ. ३७४)।

उपरोक्त आयतों से सुस्पष्ट है कि ”जिहाद ”फी सबी लिललाह”, यानी ”अल्लाह के लिए जिहाद’ का अर्थ है-१) गैर-मुसलमानों से युद्ध करना, उन्हें कत्ल करना और उनके धर्म को नष्ट करके सारी दुनिया में अल्लाह के सच्चे ‘दीन’ (धर्म) इस्लाम को स्थापित करना। (२) इसके लिए अल्लाह ने मुसलमानों की सम्पत्ति सहित उनकी जिन्दगी इस शर्त पर खरीद ली है कि यदि वे मारे गए तो उन्हें ”जन्नत’ दी जाएगी। (३) गैर-मुसलमानों से युद्ध करना तुम्हारा फ़र्ज है चाहे तुम्हें बुरा ही क्यों न लगे।

अतः प्रत्येक मुसलमान का तन मन धन से गैर-मुसलमानों को इस्लाम में धर्मान्तरित करने और उनके देश को इस्लामी राज्य बनाने के लिए युद्ध करना ही ‘जिहाद फी सबी, लिल्लाह’ या ‘अल्लाह के लिए जिहाद’ का असली मतलब है।

इस्लाम में पैगम्बर मुहम्मद का स्थान

इस्लाम में पैगम्बर मुहम्मद प्रत्येक मुसलमान के लिए एक आदर्श व्यक्ति है-”निश्चय ही तुम लोगों के लिए रसूल में एक उत्तम आदर्श है।”

(३३ः२१, पृ. ७४८)।

मुहम्मद अल्लाह का सन्देशवाहक या रसूल है। इसलिए उसकी आज्ञा मानना अल्लाह की आज्ञा मानने के समान है और उसकी अवज्ञा करना अल्लाह की अवज्ञा करना है। देखिए प्रमाण:

(i) ”हे ईमान वालो ! अल्लाह का आदेश मानो और रसूल का आदेश मानो।” (४ः५९, पृत्र २३२)।

(ii) ”(हे मुहम्मद) हमने तुम्हें लोगों के लिए ‘रसूल’ बनाकर भेजा है और (इस पर) गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है। जिसने ‘रसूल’ का आदेश माना, वास्तव में उसने अल्लाह का आदेश माना है।” (४ः७९-८०, पृत्र २३५)।

(iii) पैगम्बर मुहम्मद स्वयं कहता है ”जो कोई मेरी आज्ञा पालन करता है वास्तव में वह अललाह की आज्ञा का पालन करता है और जो कोई मेरी अवज्ञा करता है, वास्तव में वह अल्लाह की अवज्ञा करता है।” (बुखारी, खं. ९ : २५१, पृ. १८९; माजाह, खं. ४ः२८५९, पृ. १९१)

अतः इस्लाम में पैगम्बर मुहम्मद का स्थान अल्लाह के बराबर है। मगर अल्लाह निाकार है और मुहम्मद साक्षात लोगों के बीच मौजूद है। इसलिए उसका आदेश अल्लाह के समान अपने आप पालनीय हो जाता है।

हदीसों में जिहाद

पैगम्बर मुहम्मद की कथनी, करनी, आचार-विचार, जीवन पद्धति ओर निर्णयों को, जो उसके साथियों ने देखा और सुना, के संग्रहों का नाम हीदस है। पैगम्बर मुहम्मद के कथनों और इन संग्रहों, दोनों के लिए हदीस शब्द का प्रयोग होता है। इस्लाम में, विशेषकर सुन्नी सम्प्रदाय में, इमाम बुखारी, मुस्लिम, माजाह, दाऊद, नासाई, और तिरमिज़ी की इन छः हरीसों को कुरान के समान प्रामाणिक माना जाता है क्योंकि ये पैगम्बर मुहम्मद के वचन हैं और प्रत्येक हीस में जिहाद सम्बन्धी सैकड़ों सन्देश हैं, जैसे :

(i) ”शाब्दिक रूप से जिहाद का अर्थ युद्ध, कठोर तथा श्रमसाध्य प्रयास करना है। इस्लामी परिप्रेक्ष्य में इसका अर्थ मूर्तीपूजकों के खिलाफ इस्लाम के लिए लड़ना है। व्यापक अर्थ में अल्लाह के मार्ग में किए जाने वाले सभी प्रयास जिहाद के अन्तर्गत आते हैं, जिनका उद्‌देश्य मज़हब का विस्तार करना है। यह युद्ध क्षेत्र? में लड़ाई करना, स्कूलों में शिक्षा देना, सार्वजनिक भाषण देना और इस्लाम पर साहित्य सृजन करना हो सकता है।” (दाऊद, खं. २, नोट. १८०९, पृ. ६८४)

(ii) स्वयं पैगम्बर मुहम्मद ने भी यह कहा-”आप लोगों (ईमान लाने वालों) में से जो भी व्यक्ति कुछ भी बुराई देखें तो वह उसे अपने कर्म से दुरुस्त करें ओर यदि वह इसे दूर नहीं कर पाता है तो उसे चाहिए कि वह इसे अपनी वाणी से दूर करें तथा वह ऐसा भी करने में असमर्थ हो तो वह इसे अपने मन से दूर करें और यही जिहाद है।” (मुस्लिम, खं. १ः७९-८०, पृ. ४०)।

(iii) ”मुहम्मद का कथन है कि अल्लाह के नाम पर और अल्लाह के मार्ग में युद्ध करो। जो इस्लाम में विश्वास न रखते हों उनके विरुद्ध युद्ध करो। पवित्र युद्ध करो।” (मुस्लिम, खं. ३ः४२९३, पृ. ११३७)।

पैगम्बर ने कहा ”शासक चाहे सदाचारी हो या न हो, उसकी आज्ञानुसार जिहाद करना तुम्हारा अनिवाय्र कर्त्तव्य है।”

(दाऊद, खं. २ः२५२७, पृ. ७०३)।

(iv) पैगम्बर मुहम्मद का जिहाद के विषय में गैर-मुसलमानों के विरुद्ध आदेश है-”मुसलमान, गैर-मुसलमानों के सामने तीन शर्तें रखें; पहली-उनको इस्लाम कबूल करने को कहें, यदि वे इसे न मानें तो उनसे इस्लामी राज्य की अधीनता स्वीकारते हुए ज़िजिया टेक्स देने को कहें। यदि वे इन दोनों शर्तों को न माने तो उनसे जिहाद यानी सशस्त्र युऋ करो।” (मुस्लिम खं. ३ः४२४९, पृ. ११३७; माजाह खं. ४ः२८५८, पु. १८९-१९०; दाऊद, खं. २ : २६०६, पृ. ७२२)।

(v) ”जिहाद, अल्लाह के बाद, सबसे उत्तम काम है”। (मुस्लिम, खं. १ः१५२, पृ. ७२२)।

(vi) ”जिहाद, अल्लाह के बाद, सबसे उत्तम काम है”। (मुस्लिम, खं. १ः१५२, पृ. ५९)। इसी प्रकार ”सर्वोत्तम जिहाद वह है जिसमें घोड़ा और सवार दोनों ही घायल हो जायें।” (माजाह, खं. ४ : २७९४, पृ. १५७) तथा ”सर्वोत्तम जिहादी वह है जो अल्लाह के मजहब को बढ़ाने के लिए जिहाद करता है।” (बुखारी, खं. ४ : ३५५, पृ. २२८)।

कुरान की तरह, हदीसों में भी विजित गैर-मुसलमानों के धन, सम्पत्ति व स्त्रियों पर विजेता मुसलमानों का अधिकार होगा, मारे जाने पर वे शहीद कहलायेंगे तथा उन्हें जन्नत मिलेगा जहाँ वे कम से कम बहत्तर युवा कुंवारी सुन्दरियों (हूरों) का पत्नी रूप में अनन्त काल तक भोग विलास का आनन्द लेते रहेंगे। इसके लिए उन्हें एक सौ पुरुषों के बराबर काम शक्ति दी जाएगी।

(बयात मुफ्ती जुबे, मैडिन्स ऑफ़ पैराडाइज़, अनवर शेख-जिहाद के प्रलोभन)।

हदीसों में न केवल युद्ध करने वालों, बल्कि जिहाद के लिए धन, हथियार, अन्य सामान की सहायता करने वाले, यहाँ तक कि सच्चे मन से जिहाद करने का संकल्प लेने वाले को भी जन्नत का आश्वासन दिया गया है। (मुस्लिम, खं. ३ः४६९५ पृत्र १२७२)। यह दूसरी बात है कि हदीवों के अनुसार शहीदों व जिहादियों को जन्नत क़ियामत (प्रलय) बाद ही मिलेगी (मुस्लिम, खं. ४ः६८५८, पृत्र १७९५; मिश्कत, खं. ४ः२३, पृत्र १६७) (पालीवाल, जिहादियों को जन्नत कियामत बाद)।

यहाँ तक कि ”पैगम्बर मुहम्मद पहले व्यक्ति होंगे जो क़ियामत (प्रलय)बाद ही मिलेगी (मुस्मि, खं. १ः३८४, पृ. १६११)। इसके अलावा जिहाद न करने वाले मुसलमानों को अल्लाह सखत सज़ा देगा।” (मुस्लिम, खं. ३ः४६९६, पृ. १२७२; मिश्कत, खं. २ः३२, पृ. ३४८)। अतः हदीसों में भी गैर-मुसलमानों के लिए जिहाद का मतलब, इस्लाम और युद्ध में से एक को चुनना है।

इस्लामी फ़िकह (कानून की किताबों) में जिहाद

इस्लाम में मुखयतया चार प्रकार की काननू व्यवस्था है: इनके अनुसार जिहाद का अर्थ गैर-मुसलमानों को मुसलमान बनाने के लिए युद्ध करना है।

१. हनीफ़ी फिक़ह (६९९-७६७ ए. डी.)-  ”जिहाद का मतलब है अपनी जान, माल और वाणी से अल्लाह के मार्ग में लड़ने के लिए शामिल होना” तथा ”गैर-मुसलमानों को सच्चे मज़हब इस्लाम की ओर आने का निमंत्रण देना और यदि वे इस सच्चे मज़हब को स्वीकारने के लिए तैयार न हों तो उनके विरुद्ध युद्ध करना है।”

२. मलिकी फिक़ह (७१५-७९५ ए. डी.)-जिहाद का अर्थ है ”मुसलमान अल्लाह के मज़हब को बढ़ाने के लिए ‘काफ़िरों’ से युद्ध करें।”

३. शफी फिक़ह (७६७-८२० ए. डी.)-”शरियाह के अनुसार जिहाद का मतलब है ”अल्लाह के मार्ग में लड़ने के लिए जी तोड़ कोशिश करना।”

४. हमबाली फिक़ह (७८०-८५५ ए. डी.)-”जिहाद का मतलब है ”गैर-मुसलमानों से युद्ध करना।” (जिहाद फिक्जे़शन, पृ. २१)

शब्दकोशों में जिहाद

(i) वेब्सटर्स थर्ड न्यू इन्टरनेशनल डिक्शनरी (पृ. 1216) “A holy war waged on behalf of Islam as a religious duty; a bitter strife or crusade undertaken in the spirit of a holy war.”

जिहाद-‘ ‘इस्लाम के नाम पर धार्मिक कर्त्तव्य के रूप में लड़ा जाने वाला एक पवित्र युद्ध है। यह कठोर प्रयास या युद्ध, पवित्र युद्ध की भावना से किया जाता है।”

(ii) वेब्सटर्स न्यू ट्‌वेन्टीथ सेन्चुरी डिक्शनरी (पृ. ९८५)“A Moslem holy war; compaign against unbelievers or enemies of Islam.”

जिहाद-”मुसलमानों का पवित्र युद्ध; इस्लाम के दुश्मनों अथवा गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध अभियान।”

(iii) वेब्सटर्स न्यू इन्टरनेशनल डिक्शनरी (पृ. १३३६)” religious war against infidels or Muhammadan heretics.”

जिहाद– ”मुहम्मडनों के विधर्मी और अविश्वासियों के विरुद्ध, एक धार्मिक युद्ध।”

(iv) दी अमेरिकन कॉलेज डिक्शनरी(पृ. ६५७) ” A war of Muhammadans upon others, with a religious object.”

जिहाद– ”मुसलमानों का धार्मिक उद्‌देश्य से दूसरों (गैर-मुसलमानों)के विरुद्ध एक युद्ध।”

(v) दी अमेरिकन हैरिटेज डिक्शनरी ऑफ दी इंगलिश लैंग्वेज़ (पृ. ७०४) “A Moslem holy war against infidels.”

जिहाद-”गैर-मुसलमानों के विरुद्ध एक पवित्र युद्ध।”

(vi) दी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी(खंड. ५, पृ. ५८३) “Struggle, contest, specially one for the propagation of Islam, a religious war of Muhammadans against unbelievers in Islam inculcated as religious duty by the Quran and the ‘Traditions.”

जिहाद-”संघर्ष, युद्ध, विशेषकर इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए; मुहम्मदियों का इस्लाम में अश्विासियों केविरुद्ध धार्मिक युद्ध जिसे कि कुरान और हदीसों में एक धार्मिक कर्त्तव्य कहा गया है।”

(vii) दीरेंडम हाउस डिक्शनरी ऑफ दी इंगलिश लैंग्वेज (पृ. १०२०) “A holy war undertaken as a sacred duty to Muslims.”

जिहाद-”मुसलमानों के पवित्र कर्त्तव्य के रूप में किए जाने वाला पवित्र युद्ध।”

(x) कॉलिन्स को-बिल्ड इंगलिश लैंग्वेज डिक्शनरी (पृ. ७८१) “A holy war which Islam allows merely to fight against those who reject its teachings.”

जिहाद-”एक पवित्र युद्ध जिसकी मान्यता इस्लाम ने उनके विरुद्ध दी है जो कि इसकी शिक्षाओं को नहीं मानते हैं।”

(xi) लौंगमेन डिक्शनरी आूफ दी इंगलिश लैंग्वेज (पृ. ८४९) “A holy war waged on behalf of Islam as a religious duty.”

जिहाद– ”इस्लाम के लिए, एक धार्मिक कर्त्तव्य के रूप में लड़ा जाने वाला पवित्र युद्ध।”

(xii) दी हार्पर डिक्शनरी ऑफ मॉडर्न थॉट, (पृ. ३२७) (“Holy War”) “A fundamental tenet of traditional Islam obliging the believer to fight the unbeliever until the latter embraces either Islam or the protected status accorded only to those whose religions are based on written scriptures (i.e. Jews, Christians, Sebaeans), the “People of the Book”. A Jihad must be officially proclaimed by a recognized spiritual leader.”

जिहाद- (पवित्र युद्ध)- परम्परागत इस्लाम का एक मौलिक सिद्धान्त जो ईमानलाने वाले को इस बात का आदेश देता है कि वह गैर-ईमानवाले के विरुद्ध तब तक संघर्ष करे जब तक कि वह इस्लाम स्वीकार न कर ले अथवा ऐसी सुरक्षित हैसियत न अपना ले जो केवल उन लोगों को दी जाती है (जैसे यहूदी, ईसाई, साबियन्स) जिनके मज़हब लिखित किताबोंपर आधारित हैं। जिहाद की आधिकारिक घोषणा किसी मान्यता प्राप्त धार्मिक नेता द्वारा की जानी चाहिए।

(xiii) डिक्शनरी ऑफ इस्लाम, ले. टी. पी. हूजेज़ (पृ.२४३) “Jihad, ‘An effort, or a striving:. A religious war with those who are unbelievers in the mission of Muhammad. It is an incumbent religious duty, estalished in the Quran and in the Traditions as a divine institution, and enjoined specially for the purpose of advancing Islam and of repelling evil from Muslims.

When an infidel’s country is conquered by a Muslim ruler, its inhabitants are offered three alternatives :

(1) The reception of Islam, in which case the conquered become enfranchised citizens of the Muslim state.

(2) The payment of a poll-tax (Jizyah), by which unbelievers in Islam obtain protection, and become Zimmis, provided they are not the idolaters of Arabia.

(3) Death by the sword to those who will not pay the poll tax.”

जिहाद– ”एक प्रयास या कोशिश। मुहम्मद के मिशन में आस्था न रखने वाले लोगों के विरुद्ध एक धार्मिक युद्ध। कुरान और हदीसों के अनुसार यह एक आवश्यक धार्मिक कर्त्तव्य है जिसे विशेष रूप से इस्लाम के प्रसार के लिए तथा मुसलमानों में बुराईयों को दूर करने के लिये निभाया जाता है।

जब किसी मुस्लिम शासक द्वारा कोई गैर-इस्लामी देश जीत लिया जाता है तो उसके निवासियों के सामने तीन विकल्प रखे जाते हैं-

1. इस्लाम स्वीकारना– ऐसी हाल में जीते गए देश के लोग मुस्लिम देश के नागरिक बन जाते हैं।

2. पोल टेक्स– जिज़िया देना-इससे इस्लाम में आस्था न रखने वाले को संरक्षण मिल जाता है तथा वे ‘जिम्मी’ हो जाते हैं बशर्तेैं वे अरेबिया के मूर्ति-पूजक न हों।

3. ”ज़जिया’ की अदायगी न करने वालों की तलवार द्वारा हत्या।”

विश्व ज्ञानकोशों में जिहाद

(i) दी कैम्ब्रिज ऐन्साइक्लोपीडिया(पृ. ६३७) “The term Jihad is used in Islam for “Holy war”. According to the Koran, Muslims have a duty to oppose those who reject Islam, by armed struggl, if necesary, and Jihad has been invoked to justify both the expansion and defense of Islam. Islamic states pledged a Jihad against Israel in the Mecca declaration of 1981, though not necessarily by military attachk.”

जिहाद : ”जिहाद शब्द इस्लाम में -पवित्र युद्ध’ के लिए प्रयोग किया गया है। कुरान के अनुसार मुसलमानों का यह कर्त्तव्य है कि वे इस्लाम को न मानने वालों का विरोध करें और यदि आवश्यक हो तो उनके विरुद्ध सशस्त्र युद्ध करें। जिहाद का आदेश इस्लाम के विस्तार तथा उसकी रक्षा के लिए प्रयोग किया गया है। इस्लामी दउेशों ने, सन्‌ १९८१ में, ‘मक्का घोषणा’ में इज्राइल के विरुद्ध जिहाद करने की कसम खाई थी। लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि जिहाद सैन्य हमलों के द्वारा ही किया जाए।”

(ii) दी ऐन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ इस्लाम (सं. एमाइली टाइन)

“Jihad consists of military action with the object of expansion of Islam. This reference work dismisses as “wholly apologetic” the idea that Jihad is undertaken only in self-deefence, for this disregards entirely “the previous doctrine and historical tradition as well as the texts of the quran and the Sunna”.

जिहाद : ”जिहाद इस्लाम के विस्तार के लिए एक सैनिक कार्यवाही है। यह शोध ग्रंथ इस बात को क्षमा याचना के समान मानते हुए नकारता है कि जिहाद केवल आत्मरक्षा के लिए ही की जाती है। ऐसा मानने से पिछले सिद्धान्त और ऐतिहासिक परम्परा एवं कुरान और सुन्ना आदि की भी पूरी तरह से अवहेलना होती है।”

(iii) दी न्यू एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (खं. ६)

“Jihad, also spelled Jehad, Arabic Jiohad (“fight or batle”) a religious duty imposed on Muslims to spread Islam by waging war; Jihad has come to denote any conflict waged for principle or belief and is often translated to mean “holy war”.

“Islam distinguishes four ways by which the duty of Jihad can be fulfilled; by the heart, the tongue, the hand, and the sword. The first consists in a spiritual purification of one’s own heart by doing battle with the devil and overcoming his inducements to evil. The propagation of Islam through the tougue and hand is accomplished in large measure by supporting that which is right and correcting what is wrong. The fourth way to fulfill one’s duty is to wage war physically against unbelievers and enemies of the Islamic faith. Those who professed belief in a divine revelation-Islamic faith. Those who professed belief in a divine revelation-Christians and Jews, in particular-were given special consideration. They could either embrace Islam or at leat submit themseles to Islamic rule and pay a poll and land tax. If both options were rejected, Jihad was declared.”

जिहाद- ”जिहाद को ‘जेहाद’ भी लिखा जाता है और अरबी भाषा के ”जिओहद” शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘लड़ाई या युद्ध’। जिहाद, लड़ाई द्वारा, इस्लाम का विस्तार करने के लिए, मुसलमानों का एक धार्मिक कर्त्तव्य है-जिहाद का अर्थ सिद्धान्त अथवा मत के लिए छेड़े गए किसी संघर्ष से लिया जाने लगा है और प्रायः इसका अर्थ ‘पवित्र युद्ध’ के रूप में किया जाता है।

इस्लाम में जिहाद के कर्त्तव्यों का पालन चार प्रकार से पूरा किया जा सकता है-जैसे-हृदय (या मन से) वाणी, हाथ और तलवार से। पहला तरीका मन के बुरे विचारों से लड़कर और उन पर विजय पाकर तथा आत्मशुद्धि करके है। दूसरा तरीका वाणी के द्वारा इस्लाम का प्रचार करना है। तीसरा तीरका सुकर्म से है जिसके द्वारा अच्छाई का समर्थन करना और बुराई को दूर करना है और चौथा तरीका इस्लाम को इन्कार करने वालों और इस्लाम के शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध छेड़कर अपने कर्त्तव्य का पालन करने से है। जिन्होंने अल्लाह के दैवी प्रगटीकरण के उपदेशों के प्रति विश्वास व्यक्त किया था, विशेषकर ईसाईयों और यहूदियों ने, उनके साथ विशेष रियायत की गई थीं उन्हें इस्लाम को अपनाने अथवा इस्लामी शासन के प्रति आत्मसमर्पणकरने और ज़िज़िया देने के विकल्प दिए गए थे। यदि वे दोनों ही विकल्पों को मानने से इंकार करते थेतो उनके विरुद्ध जिहाद की घोषणा की जाती थी।”

(ii) दी एन्साइक्लोपीडिया एमेरिकन इन्टरनेशनल एडीशन (खं. १६, पृ. ९१-९२) :

“Jihad, and Arabic word meaning, “struggle”. As a religious duty theoritically laid upon all followers of Muhammad, Jihad is based on the concept that the Islamic faith, since it is of universal validity, must be spread to all mankind, by force of arms, if necessary. In classical Islam Jihad was to be directed against “People of the Book” (that is, possessors of authoritative sacred writing, above all Jews and Christians) until they submitted to the political authority of Islam, and against idolaters unitl they become Muslims. Sufi mystics, however, often considered Jihad as a spiritual struggle against the evils within the self.”

जिहाद– ”जिहाद अरबी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ है ‘संघर्ष’। जिहाद मुहम्मद के सभी अनुयायियों के लिए सिद्धान्ततः एक धार्मिक कर्त्तव्य निर्धारित किया गया है। यह इस अवधारणा पर आधारित है क्योंकि इस्लामी मत, विश्वभर के लिए वैध है, इसलिए इसे समस्त मानव समुदाय में फैलाना चाहिए और यदि आवश्यकता हो तो हथियारों की शक्ति द्वारा भी। शास्त्रीय इस्लाम में जिहाद ”किताब के लोग-पवित्र पुस्तकों का अनुसरण करने वाले (जैसे यहूदी, इसाई आदि) के विरुद्ध तब तक किया जाता था जब तक कि वे इस्लाम स्वीकार नहीं कर लेते थे। लेकिन सूफ़ी अक्सर जिहाद को अपने भीतर की बुराईयों को खत्म करने के लिए एक धार्मिक संघर्ष कानते हैं।”

(v) एकेडेमिक अमेरिकन एन्साइक्लोपीडिया(पृ. ४१८)

“In Islam, the duty of each Muslim to spread his religious beliefs, is termed ‘Jihad’. Although the word is widely understood to mean a “holy war’ against non-believers, Jihad may also be fulfilled by a personal battle against evil inclinations, the righting of wrongs, and the supporting of what is good.”

जिहाद– ”इस्लाम में, प्रत्येक मुसलमान का अपने धार्मिक विश्वासों को फैलाना एक कर्त्तव्य है और इसी को ‘जिहाद’ कहा गया है। हालांकि आमतौर पर इस शब्द का अर्थ गैर-मुसलमानों े विरुद्ध ”धार्मिक युद्ध” से लगाया जाता है। लेकिन कुप्रवृत्तियों व बुराइयों को दूर करने के उद्‌देश्य से निजी तौर पर लड़ाई करके और अच्छाई का साथ देकर भी जिहाद का कर्त्तव्य निभाया जा सकता है।

(vi) कोलियर्स एन्साइक्लोपीडिया (खं. १३, पृ. ५८७)

“Jihad, from an Arabic verb meaning to struggle and perserve, denotes, in the history of Islamic civilization, religious war waged against heretics, and the enemies of the state or the community of Muslims. In early Islamic phenomenon, it bears a strict relation to the spread of the faith by Muslims arms. It was a duty to the Kharijits, a band of warlike rebels, and Jihad was considered an obligation or command; and by them it was ranked as a sixth pillar of religion.”

जिहाद‘- ”जिहाद शब्द अरबी भाषा की एक क्रिया से है जिसका अर्थ है संघर्ष एवं लगातार प्रयास करना; तथा इस्लामी सभ्यता के इतिहास में इस्लाम धर्म के विरोधियों व गैर-मुसलमानों, तथा मुस्लिम समाज और राज्य के विरोधियों के विरुद्ध युद्ध करना है। प्रारम्भिक इस्लामी इतिहास में ‘जिहाद’ का अर्थ होता था पवित्र युद्ध, और कठोर इस्लामी तथ्यानुसार इसका सीधा सम्बन्ध मुसलमानों का हथियारों द्वारा इस्लामी पंथ का प्रसार करने से है। यह खारिजितियों (एक कबीला), जो कि युद्ध प्रिय विदोहियों का एक दल था, का कर्त्तव्य था और जिहाद को आदेश या अनिवार्य कर्त्तव्य समझा जाता था और उनकी दृष्टि में यह इस्लाम का छठा स्तम्भ था।”

(vii) दी कन्साइज़ एन्साइक्लोपीडिया ऑफ इस्लाम (पृ. २०९)

“Holy war”, a Divine institution of warfare to extend Islam into the dar al-harb (the non-Islamic terrtories which are described as the “abode of struggle”, or of disbelief) or to defend Islam from danger. Audit males must participate if the need arises, but not all of them, provided that “a sufficient number” (fard al-kifayah) take it up.”

“An important precondition of Jihad is a reasonable prospect of success, failing which a Jihad should not be undertaken. According to the sunnah, a Jihad is not lawful unless it involves the summoning of unbelievers to belief, and the Jihad must end when order is restored that is, when the unbelievers have accepted either Islam or a protected status within Islam, or when Islam is no longer under threat. It is impossible to undertake a Jihad against Muslims.”

जिहाद- ”पवित्र युद्ध”, दार-उल-हर्ब (गैर-इस्लामी देश जिन्हें संघर्ष अथवा इस्लाम में इन्कार करने वालों का स्थन माना जाता है) में इस्लाम के विस्तार के लिए अथवा खत्रतरे से इस्लाम की रक्षा करने के लिए मज़हबी युद्ध। आवयकता पड़ने पर इसमें, सबको नहीं, किन्तु पर्याप्त संखया(फर्द-अल-किफ़ायह) में वयस्क पुरुषों को हिस्सा अवश्य लेना चाहिए।

जिहाद की पहली महत्वपूर्ण शर्त यह है कि जिहाद से उद्‌देश्य की सफलता की सम्भावना दिखाई दे। यदि ऐसा नहीं होता माूलम पड़े तो जिहाद नहीं करनी चाहिए। सुन्ना के अनुसार जिहाद तब तक उचति नहीं है जब तक कि उसके द्वारा ‘इन्कार करने वालों’ को ”ईमान लाने वालो’-‘ के रूप में बदल न दिया जाए और इस उद्‌देश्य की पूर्ति के बाद जिहाद को अवश्य ही समाप्त करन देना चाहिए। उद्‌देश्य की पूर्ति का अर्थ यह है कि ‘इन्कार करने वालों’ ने या तो इस्लाम को स्वीकार कर लिया हो अथवा इस्लाम में संरक्षित हैसियत प्राप्त कर ली है अथवा इस्लाम को कोई खतरा नहीं हो। मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद छेड़ना असम्भव है।”

(viii) एन्कार्टा एन्साइक्लोपीडिया:

“Jihad in Islam, the spiritual struggle against evil. Jihad is the duty of all main stream Muslims, or Sunnites. There are four ways they may fulfil a Jihad : by the heart, the tongue, the hand, and the sword. These refer to the inner, spiritual battle of the heart against vice, passionn, and ignorance; spreading the word of Islam with one’s tongue ‘choosing to do good and avoiding evil with one’s tongue; choosing to do good and avoiding evil with one’s hand; and waging war aginst non-Muslims with the sword.

Islamic law divides the world into dar-al-Islam (abode of Islam) and dar-al-harb (abode of war-that is, of non-Muslims’ rule). Most modern branches of Islam stress the iner, spiritual Jihad. But Islamic law also states the all nations must surrender to Islamic rule, if not its faith. Until that time, all adult, male, and able-bodied Muslims are expected to take part in hostile Jihads against non Muslim neighbors and neighboring lands. The Quran states that those who die in this type of Jihad automatically become martyrs of the faith and are awarded a special place in heaven.

For Muslims, there exist two kinds of non-Muslim enemies: kafir (non-believers in Islam) and ahl-al-Kitab (People of the Book). Kafir, such as Buddhists and Hindus, must either convert to Islam or face execution. Once converted to Islam, it is a capital offence to renounce the faith. People of the Book include Jews, Christians, and followers of Zorostrianism. These people need only submit to Muslim political authority to avoid or end a Jihad. They may keep their original faith, but their status becomes dhimmi (a ‘protected’ non-Muslim) and they must pay a prescribed poll tax. In contrast to main stream Sunnites, Muslim groups such as the Imami and Bohora Ismaili-Shiates are forbidden from participating in the hostile Jihad. These sects believe the only person legitimately capable of conducting such a Jihad, is their Imam, or spiritual leader.”

जिहाद-”इस्लाम के अनुसार जिहाद बुराई के विरुद्ध एक आध्यात्मिक युद्ध है। जिहाद सुन्नियों और मुखय धारा के सभी मुसलमानों के लिए एक कर्त्तव्य है। वे जिहाद के अपने कर्त्तव्य को चार तरीकों से निभाज सकते हैं। जैसे-मन, वाणी, कर्म और तलवार से। मन के बुरे विचार और अज्ञानता के विरुद्ध मन से की जाने वाली आध्यात्मिक लड़ाई, वाणी से इस्लाम का प्रचार; अच्छे कर्म करना और बुरे कर्मों से दूर रहना और गैर-मुसलमानों के विरुद्ध तलवार / हथियार से युद्ध करना।

इस्लामी कानून संसार को दो भागों में विभाजित करता है: (i) दार-उल-इस्लाम (इस्लामी क्षेत्र), और दार-उल-हर्ब (लड़ाई का क्षेत्र जहाँ गैर-मुसलमानों का राज्य हो)। इस्लाम के अधिकतर आधुनिक सम्प्रदाय आन्तरिक या आध्यात्मिक जिहाद पर बल देते हैं। इस्लामी कानून का यह कहना है कि उन सभी देशों को, यदि इस्लाम उनका धर्म नहीं है, तो उन्हें इस्लाम की सत्ता स्वीकार कनी चाहिए। तब तक सभी वयस्कों, पुरुषों तथा स्वस्थ शरीर वाले मुसलमानों से यह उम्मीद की जाती है कि गैर-मुस्लिम पड़ोसी देशों और आस-पास के क्षेत्रों के खिलाफ़ वे सशस्त्र जिहाद में हिस्सा लें। कुरान के अनुसार जिन लोगों की इस प्रकार के जिहाद में जान चली जाती है, वे स्वतः ही ‘दीन’ लिए ‘शहीद’ बन जाते हैं और उन्हें जन्नत में विशेष जगह मिल जाती है।

मुसलमानों के लिए गैर-मुस्लिम दुश्मन दो प्रकार के होते हैं-‘काफ़िर’ (यानी इस्लाम में ईमान न लाने वाले) और दूसरे ‘अहले-किताब वाले’ (पवित्र किताब के लोग जैसे-यहूदी ईसाई आदि)। काफ़िरों, जैसे कि हिन्दुओं और बौद्धों, को या तो इस्लाम कबूर कर लेना चाहिए अथवा प्राण-दण्ड पाने के लिए तैयार रहना चाहिए। एक बार इस्लाम कबूल करने के बाद उसे त्यागने का नतीजा प्राण-दण्ड की सज़ा है। ‘अहले-किताब’ के अन्तर्गत, यहूदी, ईसाई और पारसी धर्म के अनुयायी शामिल हैं। इनके लिए केवल यही जरूरी है कि वे जिहाद से बचने या उसको समाप्त करने के उद्‌देश्य से मुसलमानों की राजनैतिक सत्ता स्वीकार कर लें। वे अपने मूल धर्म के अनुयायी बने रह सकते हैं। लेकिन उनकी हैसियत एक ‘ज़िम्मी’ (एक रक्षित गैर-मुस्लिम) जैसी होगी और उन्हें निर्धारित ज़जिया (टैक्स) अवश्य देना पड़ेगा। मुखयधारा के सुन्नियों े विपरीत, इमामी, तथा बोहरा-इस्माइली, शिया नामक मुस्लिम समुदायों को आक्रामक जिहाद में भाग लेने की मनाही है। इन सम्प्रदायों का मानना है कि उनाक इमाम अथवा धार्मिक नेता ही इस प्रकार के जिहाद की घोषणा कर सकता है।”

जिहाद की उपरोक्त व्याखयाओं से सुस्पष्ट है कि मुसलमान अपने को विश्व भर का डिक्टेटर मानते हैं और गैर-मुसलमानों को आदेश देते हैं कि यदि जिन्दा रहना चाहते हो तो मुसलमान बनकर जियो वर्ना जिहाद द्वारा तलवार के घाट उतार दि जाओगे। क्या सर्वसृष्टा दयालु परमेश्वर, जिसे अल्लाह कहा जाता है, अपनी ही सृष्टि को नष्ट करना चाहेगा ? वह भी सिर्फ अपनी पूजा कराने के लिए। गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जिहादी युद्ध का यह आह्‌वान तो अरबी साम्राज्यवाद की एक स्पष्ट घोषणा है।

इस्लाम के विद्वानों की दृष्टि में जिहाद

(i) Shaikh Abdullah bin Muhammad bin Hamid : the Head cleric of the Sacred Mosque of Mecca, writes : “Praise be to Allah who had ordained “Al-Jihad” (fighting for Allah’s Cause), (i) with the heart (intentions or feelings), (ii) With the hand (weapons) and (iii) With the tongue (speeches, etc., in the cause of Allah) and has rewarded the one who performs it with the high rooms in the Gardens of (Paradise). (the Call To Jihad, Fighting for Allah’s Cause in the Holy Quran, (Sahih Bukhari, vol. 1, pref. xxiv).

शेख अब्दुल्ला बिन मुहम्मद बिन हामिद- मक्का की पवित्र मस्जिद के मुखय इमाम : ”प्रशंसा हो अल्लाह के लिए जिसने १) मन से (इरादों और भावनाओं से, २) हाथ (हथियारों) से, ३) वाणी (अल्लाह के लिए भाषणों) से ‘अल-जिहाद’ (अल्लाह के लिए लड़ने) का हुक्म दिया है तथा जिसने इसे करने वाले को जन्नत में ऊँचे भवनों में स्थान दिया है।” (दी कॉल टू जिहाद-इन दी होली कुरान, बुखारी, खंड १, प्रीफेस पृ. xxiv) ।

(ii) S. Abula’la Maududi : “The Arabic words Jihadi-i-Kabir imply three meanings : (i) To exert one’s utmost for the cause of Islam, (ii) To dedicate all one’s resources to this cause, and (iii) To fight against the enemies of Islam on all possible fronts with all one’s resources in order to raise high the “Word of Allah”. This will include Jihad with one’s tongue, pen, wealth, life and every other available weapon.” (The Meaning of the Quran, vol. VIII, p. 98 on every p. 88).

सैयद अबुलला मौदूदी– ”अरबी भाषा के शब्द ‘जिहाद-इ-कबीर’ के तीन अर्थ हैं : १) इस्लाम के हित के लिए अपना सर्वाधिक प्रयास करना; २) इस काम के लिए अपने संसाधनों को समर्पित कर देना, और ३)  इस्लाम के दुश्मनों के विरुद्ध अपने सभी संसाधनों के साथ हर सम्भव मोर्चों पर लड़ाई करना ताकि ”अल्लाह का कलाम” ऊँचा हो जाए यानी इस्लाम फैले, इसमें वाणी, कलम, धन, जीवन तथा अन्य सभी उपलब्ध हथियारों से जिहाद करना शामिल समझा जाएगा।” (दी मीनिंग ऑफ दी कुरान, खं. ८, P. 98) ।

(iii) Anwar Shaikh :“Jehad is an Arabic word, which literally means ‘endeavour’, but as an Islamic doctrine, it implies ‘fighting in the way of Allah (the Arabic God) to establish His supremacy over unbelievers until they relinquish their faith to become Muslims or acknowledge their subordination by paying a humiliation-tax called ‘JAZIA’.”

“Jehad is a perpetual war against infidels, which include Hindus, Buddhists, Athesists, Deists, Sceptics as well as Jews and Christians.According to this doctrine, a person’s biggest crime is to deny allah and Muhammad’s exclusive right to be believed in and adored. Therefore, this is sufficient cause for  a Muslim state to raid the subjugate non-Muslim territories. (Islam : Sex and Violence, p. 112)

He further says in his book “This is Jehad” : “The concept of Jehad has been presnted by Islam as “a holy war in the way of Allah” as well as, ” a defensive struggle against unbelievers”. There is no truth, whatever, in either of these assertaions. History clearly demonstrates that it is an absolutely aggressive war against non-Muslims, who refuse to accept the Islamic faith and want to worship God the way they like, but this is not acceptable to Allah, who does not acknowledge the ravacity of any other faith and ardently desires to eliminate all other beliefs along with their followrs.” (preface, p. 1).

He also says that, “The following are the cardinal points of Jehad and must be noted carefully to proper understanding of this discussion.

(a) “Jehad is all about massacre, mutilation and misery and not about any moral, social or humanitarian service as the Muslim divines pretend. Again there is a direct connection between Jehad (Murdering non-Muslims) and Paradise i.e. the provision of the choicest sex-after-death in the most hilarious settings ebullient with pleasures, prsents and pleasantries. Having sex after death is a novel concept, which can be realized by terrorizing, tearing and tyrannising the non-Muslims. Commission of atrocities against infidels makes Allah honour-bound to offer Paradise as a gift to a Muslim !

(b) Islam is the only true way of life : the rest is fake, fould and felonious; the People of the Book i.e…., the Jews and Christians are not believers but infidels. They must be murdered or enslaved.” (P. 5).

अनवर शेख– ”जिहाद अरबी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है ”प्रयास”। किन्तु इस्लामी दर्शन में इसका आशय है अल्लाह (अरब का देवता) के लिए युद्धरत होना जिससे काफ़िरों परअल्लाह की प्रभुता स्थापित हो जाए और जब तक कि वे अपना पंथ त्याग कर मुसलमान न हो जाएं या अपमानजनक ज़िज़िया नामक कर देकर उनकी अधीनता स्वीकार न कर लें।

जिहाद गैर-ईमान वालों के विरुद्ध एक अन्तहीन युद्ध है जिसें हिन्दू, बौद्ध, अनीश्वरवादी, देववादी, संशयवादी तथा यहूदी और ईसाई सभी शामिल हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी भी व्यक्ति का सबसे बड़ा अपराध यही है कि वह अल्लाह और मुहम्मद पर ईमान लाने और अल्लाह कोपूजे जाने के एक मात्र अधिकार को नहीं मानता है। इसीलए एक मुस्लिम देश को किन्हीं भी अन्य गैर-मुस्लिम देशों पर आक्रमण करने और उन्हें दास बना लेने के लिये यह पर्याप्त कारण ळै।” (इस्लाम : सेक्स एण्ड वायलेंस, पृ. ११२)।

उन्होंने ”दिस इज़ जिहाद” में लिखा है : ”इस्लाम में जिहाद की अवधारणा को ‘अल्लाह के मार्ग में पवित्र युद्ध” एवं ‘गैर-ईमानवालों (गैर मुस्लिमों) के विरुद्ध एक रक्षात्मक संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन दोनों कथनों में किसी में कुछभी सच्चाई नहीं है। इतिहास साफ तौर पर बतलाता है कि यह पूरी तरह से उन गैर-मुस्लिमों के विरुद्ध एक आक्रामक युद्ध है जो कि इस्लामी पंथ को नहीं स्वीकारते हैं और जो कि अपनी इच्छानुसार ईश्वर की पूजा करना चाहते हैं। लेकिन यह सब अल्लाह को स्वीकार नहीं है जो कि किसी अन्य पंथ के अस्तित्व को नहीं मानता है और बेहद उन्माद के साथ सभी अन्य पंथों को, उनके अनुयायियों सहित, नष्ट करना चाहता है। (पृ. १) पुनः” ”जिहाद का मतलब है-नर संहार, अंग-विकृतीकरण और विपत्ति, न कि यह किसी प्रकार के नैतिक, सामाजिक अथवा मानव कल्याणकारी सेवा के लिए है, जैसा कि मुस्लिम धार्मिक नेता दावा करते हैं।” (वही. पृ. ५)।

(iv) Ibn Warraq : “The totalitarian nature of Islam is nowhere more apparent than in the concept of Jihad, the holy war, whose ultimate aim is to conquer the entire world and submit it to the one true faith, to the law of Allah. to Islam alone has been granted the truth : there is no possibility of salvation outside it. It is the sacred duty an incumbent religious duty, established in the Quran and the traditions-of all Muslims to bring Islam to all humanity. Jihad is the divine institution enjoined specially for the purpose of advancing Islam. Muslims must strike, fight and kill in the name of God.” (Why I am not a Muslim, p. 217)

इन्ब वरौक : ”इस्लाम के सर्व सत्तात्मक स्वरूप का सुस्पष्ट दर्शन जिहाद की अवधारण की अपेक्षा और कहीं अधिक साफ़ दिखाई नहीं देता है।यह एक धर्म युद्ध है जिसका अन्तिम उद्‌देश्य समस्त विश्व को जीतना और फिर उसे एक सच्चे पंथ तथा अल्लाह के कानून के हवाले कर देना है। सत्य केवल इस्लाम को ही दिया गया है; इसके बाहर मोक्ष की कोई सम्भावना नहीं है। प्रत्येक ईमान वाले (मुसलमान) का यह पवित्र कर्त्तव्य और आवश्यक धार्मिक कार्य है कि वे समस्त मानव जाति तक इस्लाम को और आवश्यक धार्मिक कार्य है कि वे समस्त मानव जाति तक इस्लाम को पहुंचायें जैसा कि कुरान और हदीसों में सुनिश्चित किया गया है। जिहाद एक दैवी सिद्धान्त है जिसका उद्‌देश्य, विशेषकर इस्लाम का प्रसार करना है। मुसलमानों को अल्लाह के नाम पर प्रयास, युद्ध और हत्या करनी चाहिए।” (हृाई आई एम नॉट ए मुस्लिम, पृ. २१७)।

(v) Imam Saraksi-“Jihad is obligatory and commanded by Allah. Any person who denies Jihad is a kafir and people who doubt the obligation of Jihad, have gone astray.” (Fathul Qadeer, p. 191, V. 5, Jihad Jixation, p. 21)

इमाम सराक्सी- ”जिहाद एक अनिवार्य कार्य है और इसकी अल्लाह ने आज्ञा दी है। जो कोई व्यक्ति (मुसलमान) जिहाद से इन्कार करता है वह काफिर है और जो लोग जिहाद की अनिवार्यता पर संदेह करते हैं, वे पथ भ्रष्ट हो गए हैं।” (फतूल कादिर, पृ. १९१, खंड ५; जिहाद फिक्जेशन, पृ. २१)

(vi) Sahibul Ikhtiyar-“Jihad is an ordained obligation (fareeda). One who denies it, is a Kafir.” (Jihad Fixation, p. 21).

साहिबुल इखितयार- ”जिहाद (फरीदा) एक विधिसम्मत दायित्व है। जो इससे इंकार करताहै, वह काफ़िर है।” (जिहाद फिक्जे़शन, पृ. २१)।

मजीद खुद्‌दूरी- (जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी) : ”जिहाद इस्लामी पंथ को सार्वभौमिक बनाने और साम्राज्यिक विश्व राज्य स्थापित करने का एक साधन है।” (वॉर एण्ड पीस इन द लॉ ऑफ इस्लाम, पृ. ५१)।

(viii) French Scholar Alfred Morabia-“Offensive, bellicose Jihad, the one codified by the specialists and theologians, has not ceased to awaken echo in the Muslim consiciousness, both individual and collective… To be sure contemporary apologists present a picture of this religious obnligation that conforms well to the contemporary norms of human rights….. but the people are not convinced by this…. The overwhelming majority of Muslims remain under the spiritual sway of law…. whose key requirement is the demand, not to speak of the hope, to make the word of God triumph everywhere inthe world.” (quoted by Daniel Pipes Militant Islam Reaches America p. 265).

फ्रांसीसी विद्वान्‌ अल्फ्रैड मोराबिया : ”आक्रामक व युद्धप्रिय जिहाद, ने जिसे विशेषज्ञों और मज़हब के मर्मज्ञों ने संहिताबद्ध किया है, अकेले तथा सामूहिक दोनों प्रकार से मुस्लिम चेतना को जागृत करना नहीं छोडा है…. .निश्चित तौर पर समकालीन इस्लाम के समर्थक इस मज़हबी फर्ज की एक ऐसी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं जो तत्कालीन मानवीय अधिकारों के मानदण्डों के अनुरूप है….. लेकिन लोग उनके इस कथन से आश्वस्त नहीं होते हैं……………………अधिकांश मुसलमान मज़हबी कानून से प्रभावित रहते हैं…… जिसकी मुखय अपेक्षा, यह मांग है आशा नहीं, कि संसार में हर जगह अल्लाह की वाणी का बोलबाला हो।” (डेनियल पाइप्स द्वारा मिलिटेंट इस्लाम रीचिंज़ अमेरिका पृ. २६५)

(ix) Dr. Muhammad Sayyid Ramadan al Buti-an Azhar scholar in his book, “Jurisprudence in Mohammad’s Biography” mentioned :

“The Holy War (Islamic Jihad), as it is known in Islamic Jurisprudence, is basically an offensive war. This is the duty of Muslims in every age when the needed military power becomes available to them. This is the phase in which the meaning of Holy war has taken its final form. Thus the apostle of God said “I was commanded to fight the people until they believe in Allah and his messenger…… ” (p. 134)

“The apostle of Allah started to send military detachments from among his followers to various Arab tribes which were scattered in the Arab Peninsula to carry out the task of calling (these tribes) to accept Islam. If they did not respond, they (Muslims) would kill them. This was during the 7th Hagira Year. The number of the detachments amouned to ten.” “The concept of Holy War (Jihad) in Islam does not take into consideration whether defensive or an offensive war. Its goal is the exalation of the World of Allah and the construction of Islamic society and the establishment of Allah’s Kingdom on Earth regardless of the means. The means would be offensive warfare. In this case, it is the apex, the noblest Holy War. It is legal to carry on a Holy War.” (p. 263)

डॉ. मुहम्मद सैयद रमादान अल बूती-ने अपनी किताब, ‘ज्यूरिस प्रूडेंस इन मुहम्मद्‌स बायोग्राफी’ में लिखा : ”जैसा कि इस्लामी कानून में ज्ञात है-‘मज़हबी युद्ध’ (इस्लामी जिहाद) बुनियादी तौर पर एक आक्रामक संघर्ष है। हर समय के मुसलमानों का, जब उन्हें आवश्यक सैन्य शक्ति उपलब्ध हो जाती है, यह एक फर्ज़ है। यह वह दौर है जिसके दौरान मज़हबी युद्ध के अर्थ ने अपना अंतिम रूप ग्रहण किया है। इस प्रकार अल्लाह के पैगम्बर ने यह कहा ‘मुझे उन लोगों के साथ तब तक लड़ने का हुक्म हुआ है जब तक कि वे अल्लाह पर ईमान नहीं ले आते।……………” (पृ. १३४)

”अल्लाह के पैगम्बर ने विभिन्न अरबी जनजातियों के पास, जो अरब प्रायद्वीप में फैली हुई थीं, अपने अनुयायी सैनिक भेजे। उन सैनिक अनुयायियों को भेजने का उद्‌देश्य अरब जनजातियों को इस्लाम कबूल करने के लिए समझाना-बुझाना था। यदि वे नहीं मानें तो अनुयायी (मुसलमान) उन्हें मौत के घाट उतार दें। यह जिहरी सन्‌ सात की बात है। भेजी गई टुकड़ियों की संखया १० थी।”….. ”इस्लाम के अनुसार ”मज़हबी युद्ध” (जिहाद) की संकल्पना में इस बात पर ध्यान नहीं किया गया है कि वह रक्षात्मक अथवा आक्रामक है। इसका लक्ष्य तो अल्लाह की वाणी को बुलंद करना है और इस्लामी समाज की स्थापना करना तथा इस धरती पर जैसे भी हो अल्लाह का साम्राज्य स्थापित करना है। इन सभी के लिए आक्रामक युद्ध माध्यम होगा। इस मामले में यह शीर्षस्थ आदर्श पवित्र युद्ध है और इस पवित्र युद्ध को छेड़ना विधि सम्मत है।” (पृ. २६३)।

(x) Baydawi (The Lights of Revelation, p. 252) : “Fight Jews and Christians because they violated the origion of their faith and they do not believe in the religion of the truth (Islam), which abrogated all other religions. Fight them until they pay the poll tax (Ziziya tax) with submission and humiliation.”

बेदावी : (दी लाइट्‌स ऑफ रिवीलेशन, पृ. २५२)-”यहूदियों तािा ईसाइयों के साथ लड़ाई करो क्योंकि उन्होंने अपने मज़हब के उद्‌गम का उल्लंघन किया है और वे सच्चाई के मज़हब (इस्लाम) पर ईमान नहीं लाते हैं जिसने अन्य सभी मज़हबों का खण्डन किया है। उनके साथ अब तक लड़ाई करो जब तक वे समर्पण और विनम्रता से ज़ज़िया अदा नहीं करने लगें।”

(xi) Amit Taher—”Islam makes it incumbent on all adult males, provided they are not disabled or incapacitated, to prepare themselves for the conquest of (other) countries so that the writ of Islam is obeyed in every country in the world……….Those who know nothing of Islam pretend that Islam counsels against war. Those (who say this) are witless. Islam says : “Kill all the unbelieverrs just as they would kill you all ! Does this mean that Muslims should sit back until they are devoured by the unbelievers ? Islam says; Kill them (non-Muslims), put them to the sword and scatter (their armies). Does this mean sitting back until (non-Muslims) overcome us ? Islam says : Kill in the service of Allah those who may want to kill you ! Does this mean that we should surrender to the enemy ? Islam says : Whatever good there exists thanks to the sword and in the shadow of the sword ! People cannot be made obedient except with the sword ! The sword is the key to Paradise, which can be opened only for the Holy Worriors ! There are hundrereds of other (Quranic) psalms and Hadiths (sayings of the Prophet) urging Muslims to value war and to fight. Does all this mean that Islam is a religion that prevents men from waging war ? I spit upon those foolish souls who make such a claim.” (Holy Terror, pp. 226-227).

अमीर ताहिर– ”इस्लाम के अनुसार सभी वयस्क पुरुषों के लिए, बशर्तें वे विकलांग व अशक्त न हों, यह आवश्यक है कि वे अन्य देशों को जीतने के लिए तैयार हो जाएं ताकि संसार के हर एक देश में इस्लाम का अनुसरण हो।….लेकिन जो इस्लामी मज़हबी युद्ध का अध्ययन करेंगे, वे इस बात का समझेंगे कि इस्लाम पूरे विश्व को क्यों जीतना चाहता है…… जो इस्लाम के बारे में कुछ नहीं जानते, वे यह तर्क देते हैं कि इस्लाम युद्ध के खिलाफ़ है। वे जो ऐसा कहते हैं, नासमझ हैं। इस्लाम के अनुसार, ”सभी इंकार करने वाले को जान से मार दो क्योंकि नहीं तो वे आप सबको जान से मार देंगे।” क्या इसका मतलब है कि मुसलमान तब तक बैठे रहें जब तक इंकार करने वाले उन्हें नष्ट नहीं कर देते। इस्लाम का कहना है-”सभी गैर-मुसलमानों को तलवार से मौत के घाट उतार दो।’ क्या इसका मतलब यह है कि तब तक बैठे रहो जब तक गैर-मुसलमान हम पर काबू नहीं पा लेते हैं। इस्लाम का कहना है कि’-अल्लाह की सेवा में उन सभी को जान से मार दो जो आपको जान से मारना चाहते हैं। क्या इसका मतलब यह है कि हमें दुश्मनों के सामने आत्मसमर्पण कर देना चाहिए। इस्लाम का कहना है-जो भी कुछ अच्छाई मोजूद है, उसका श्रेय तलवार और तलवार के भय से है। लोगों को तलवार के भय के बिना आज्ञाकारी नहीं बनायाजा सकता। तलवार जन्नत प्राप्ति की चाबी है और जन्नत के दरवाजे मज़हबी युद्ध करने वालों के लिए ही खुलते हैं। ऐसी कई सौ अन्य हदीसे हैं जिनका उपयोग करके मुसलमानों से कहा जाता है कि वे युद्ध को महत्व दें तथा युद्ध करें। क्या इन सभी का यह मतलब है कि इस्लाम एक ऐसा मज़हब है जो मनुष्य को युद्ध करने से रोकता है ? मैं उन सभी मूख्र लोगों पर थूकता हूँ जो इस प्रकार का दावा करते हैं।” (होली टेरर पृ. २२६-२२७)।

(xii) Ibn-Hisham-Al Sohaily (Al-Rawd al-Anaf pp. 50-51) : “No two religions are to exist in the Arab Peninsula.” Therefore, Saudi Government does not allow any other religion to manifest their religious task. What tolerant and peaceful religion Islam is ! ”

इब्न-हिशाम-अल-सोहेली (अल-रब्द अल-अनाफ,पृत्र ५०-५१)-”अरब प्रायद्वीप में कोई दो मज़हब एक साथ नहीं रह सकते।”। इसीलिए सउदी अरब की सरकार अपने देश में किसी अन्य मज़हब को अपने धार्मिक कृत्य करने की आज्ञा नहीं देती है। वह इस्लाम कितना सहिष्णु और शान्तिपूर्ण मज़हब है।”

(xiii) Ibn Khaldun (1332-1406 A. D., Islam’s great historian, sociologist and philosopher): “In the Muslim community, the holy war is a religious duty, because of the universalism of the (Muslim) mission and (the obligation) to convert everybody to Islam either by persuasion or by force. Therefore, caliphate and royal authority are united in (Islam), so that the person in charge can devote the available strength to both of them at the same time.” (The Muquaddimah, vol. 1 : 473).

इब्न खालदुन-(१३३२-१४०६; इस्लाम का महान्‌ इतिहासकार, समाजशास्त्री तथा दार्शनिक)-”मुस्लिम समुदाय में पवित्र युद्ध एक मज़हबी फ़र्ज है क्योंकि इसका उद्‌ेश्य इसलाम को सार्वभौतिक बनाना है और ह व्यक्ति को समझा-बुझाकर अथवा बल प्रयाग से इस्लाम स्वीकार करवाना है। इसीलिए इस्लाम में शाही-सत्ता और खलीफ़ा (धार्मिक सत्ता) को एक साथ रखा गया है ताकि प्रभावी व्यक्ति दोनों को ही उपलब्ध शक्ति एक ही समय दे सके।” (दी मुकदि्‌दमाह, खं. १, पृ. ४७३)।

(xv) A. A. Engineer (Rational Approach to Islam’ p. 211) : “The concept of Jihad in Islam has been grossly misundertood both by Muslims and Non-Muslims, Actually the word, Islamic Jihad cannot be transalated in any language. However, its spirit can be explained to some extent. So any effort of a Muslim, individually or collectively, which promotes the cause of Islam and proves beneficial individually, and collectively to the Muslim community, in a non-Muslim state, politically, religiouslyand economically, is jihad. Its main trust is always agaisnt the non-Muslims and their country to win over them, in favour of Islam, by any means, whatsoever is possible. However, its mode of operation may vary with specific situation, strength and resources of the activists as well as of the opponents. It is mainly controlled by the local, naional and international political conditions and alignments.”

ए. ए. इंजीनियर (रेशनल अप्रोच टू इस्लाम, पृ. २११) : ”इस्लाम में जिहादकी संकल्पना को मुसलमान तथा गैर-मुसलमान दोनों ही पर्याप्त रूप से नहीं समझ पाए हैं। वास्तव में”इस्लामी जिहाद” शब्दों का अनुवाद किसी भी भाषा में नहीं किया जा सकता है। लेकिन कुछ हद तक इसके भाव की व्याखया की जा सकती है। इसलिए किसी मुसलमान द्वारा व्यक्तिगत तौर पर अथवा सामूहिक तौर पर किया गया यह ‘प्रयास’ जिहाद है जिसमें गैर-मुसलमान देश में इस्लाम की अभिवृद्धि होती है और वह राजनीतिक, धार्मिक तथा आर्थिक तौरपर मुसलमान समुदाय के किसी व्यक्ति के लिए अथवा सामूहिक आधार पर लाभकर सिद्ध होता हो।इसका मुखय निशाना हमेशा गैर-मुसलमान और उनका देश होता है ताकि किसी भी सम्भव तरीके से इस्लाम के पक्ष में उनका हृदय परिवर्तन किया जा सके। लेकिन इसके संचालन का तरीका, स्थिति, ताकत तथा काय्रकर्ताओं के संसाधनों को देखते हुए अलग-अलग हो सकता है। यह मुखयतया स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्थितियों से नियंत्रित होता है।”

(xvi) Sayed Kamran Mirza : “Historically, Jihad means Holy War. For 1400 years, Muslims always understood the meaning of Jihad as Islamic Holy War….. In Islamic history, more than 80 percent of the texts are filled with Holy War (Jihad). Early Islam was apread in the Arabian Peninsula solely by holy wasrs (Jihad). ” ….. ” The majority of the Quran’s texts themselves clearly indentify Jihad as physical warfare in Islam, and Islamically God’s way of establishing the Kingdom of God on earth. Likewise, from the Hadith and the earliest biographies of Muhammad, it is just as evident that the early Muslim community understood these Quranic texts to be taken literally. ” (The Jihad Juggernaut, p. 48).

सैयद कामरान मिर्ज़ा : ”ऐतिहासिक रूप से जिहाद का अर्थ मज़हबी युद्ध है। १४०० वर्षों से मुसलमानों ने सदैव जिहाद का अर्थ इस्लामी मज़हबी युद्ध ही समझा है।…. इस्लाम का इतिहास देखें तो ८० प्रतिशत से अधिक अतिहास मज़हबी युद्धों (जिहाद) से भरा पड़ा है। प्रारम्भिक काल में अरब प्रायद्वीप में इस्लाम का विस्तार केवल मज़हबी युद्ध ही समझा है।…. इस्लाम का इतिहास देखें तो ८० प्रतिशत से अधिक इतिहास मज़हबी युद्धों (जिहाद) से भरा पड़ा है। प्रारम्भिक काल में अरब प्रायद्वीप में इस्लाम का विस्तार केवल मज़हबी युद्ध (जिहाद) से किया गया था।”

”कुरान के अधिकांश आदेशों में स्पष्ट रूप से इस्लाम में जिहाद को भौतिक संघर्ष की संज्ञा दी गई है, तथा इस्लामी तौर से इसे धरती पर अल्लाह की सत्ता स्थापित करने का साधन बताया गया है। इसी प्रकार हदीस और मुहम्मद साहब की जीवनियों से यह स्पष्ट है कि प्रारम्भिक काल में मुसलमान समुदाय ने कुरान के वचनों का शाब्दिक अर्थ ‘धर्म युद्ध’ लिया।” (दी जिहाद जुगरनौट, पृ. ४८)।

(xvii) Abd al-qadir as Sufi ad-Darqawi- Writes in his book, “Jihad a Ground Plan” : “We are at war. And our battle has only just begun. Our first victory will be one tract of land somewhere in the world that is under the complete rule of Islam…. Islam is moving across the earth…. Nothing can stop it, spreading in Europe and America.” (Quoted by John Laffin, Holy War Islam Fights, p. 22).

अब्द-अल-कादिर अस सूफी अद-दर क़ावी ने अपनी किताब ‘जिहाद ए ग्राउंड प्लान’ में लिखा : ”हम संघर्षरत है और हमारा संघर्ष अभी शुरू हुआ हैं। हमारी पहली विजय विश्व की ऐसी भूमि के रूप में होगी जहाँ पूरी तरह इस्लाम का शासन होगा।…… इस्लाम पूरी धरती पर फैल रहा है। इस्लाम के विस्तार को यूरोप और अमेरिका में कोई रोक नहीं सकता।” (जोन लाफ़िन, होली वार इस्लाम फाइट्‌स, पृ. २२)।

(xviii) Ayatullah Khomeini (1903-1989) : ” Jihad is a multifaceted form of of warfare, more genuinely a ‘total war’ than that concieved by the Fascist and Communist Leaders of the mid-20th century. It means armed struggle and battle; it also means war through economic and political pressures, through subversion and propaganda, through conversion of non-Muslims to Islam and through penetration of non-Muslim societies. Translated, Jihad means’ a great striving’ and it calls for relentless and remorseless action world-wide.” (Quoted by John Laffin, ibid p. 15).

Khomeini while in exile in Paris said, “Holy War means the conquest of all non-Muslim territories. Such a war may well be declared after the formation of an Islamic government. …. It will then be the duty of every able-bodied adult male to volunteer for this war of conquest, the final aim of which is to put Koranic law in power from one end of the earth to the other.” He also said, “The person who governs the Muslim community must alwasy have its interest at heart and not his own. This is why Islam has put so many people to death. To safeguard the interests of the Islamic community, Islam has obliterated many tribes because they were sources of corruption and harmful to the welfare of Muslims.” (Quoted by John Laffin, ibid p. 23).

अयातुल्लाह खुमैनी (१९०३-८९) ”जिहाद, संघर्ष का बहुआयामी रूप है। वास्तव में यह पूर्ण संघर्ष है और यह बीसवीं शताब्दी के फ़ासिस्ट और कम्युनिस्ट नेताओं की संकल्पना से कहीं अधिक है। इसका अर्थ सशस्त्र युद्ध और लड़ाई है; इसका अर्थ आर्थिक तथा राजनीतिक दबाव के जरिए संघर्ष करना भी है जिसका संचालन प्रचार के माध्यम से, गैर-मुसलमानों का इस्लाम में मतान्तरण करके और गैर-मुसलमान समाजों में घुस करके किया जाता है। जिहाद का अर्थ घोर प्रयास करना है और यह विश्वभर में अथक कार्रवाई की अपेक्षा करता है।” (जोन लाफ़िन, वही, पृ. १५)।

पेरिस में अपने निर्वासन काल के दौरान खुमैनी ने कहा: ”मजहबी युद्ध का मतलब सभी गैर-मुस्लिम प्रदेशों को जीतना है। इस्लामी सरकार के गठन के बाद ऐसे संघर्ष की अच्छी तरह से घोषणा की जा सकी है………तब हर स्वस्थ वयस्क पुरुष का फर्ज़ होगा कि वह इस विजय-युद्ध में स्वेच्छा से हिस्सा लें। इस विजय युद्ध का अन्तिम उद्‌देश्य धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक कुरान के कानून को लागू करना है।”

उन्होंने यह भी कहा : ”जो व्यक्ति मुसलमान समुदाय पर शासन करता है, उसके मन में हमेशा अपनी भलाई की अपेक्षा मुसलमानी समुदाय की भलाई मौजूद होनी चाहिए। इसीलिए इस्लाम ने अनेक लोगों को मौत के घाट उतारा है। इस्लामी मसुदाय के हितों की रक्षा के लिए इस्लाम ने अनेक जनजातियों का इसलिए विनाश किया कि वे भ्रष्टाचार की स्रोत थीं और मुसलमानों के कल्याण के प्रति हानिकारक थीं।” (जोन लाफ़िन, वही, पृ. २३)।

(xix) Shaikh Zahara (a leading Muslim the ologian in Cairo) : “Jihad is not confined to the summoning of troops and the establishment of huge forces. It takes various forms. From all territories of Islam, there should arise a group of people reinforced with faith, well eqipped with means and methods and let them set ot to atach theusurpers, harassing them incessantly until their abode is one of everlasting torment…. Jihad will never end…… it will last to the Day of Judgement. But war comes to a close as far as paticular group of people is concerned, it is terminated when the war aims are relized, either by the repulse of aggression and the enemy’s surrender by the signing of the covenant or by the permanent peace treaty or truce in favour of Islam.” (Quoted by John Laffin, ibid p. 22-23).

काहिरा के विद्वान शेख ज़ाहरा ने यह घोषणा की : ”जिहाद सैनिकों तथा बड़ी संखया में सैनिक बलों की स्थापना तक सीमित नहीं है। इसके अलग-अलग रूप हैं। इस्लामी देशों से लोगों के एक ऐसा मज़हबी दल उदय होना चाहिए जो पूरी तरह से ईमान से लैस हो और वह इंकार कनेवालों पर हमला करने के लिए कूच करें और उनको तब तक निरंतर उत्पीड़ित करता रहे जब तक उनका आवास स्थान हमेशा के लिए यातनागृह न बन जाए।” जिहाद कभी भी खत्म नहीं होगा।…..यह क़ियामत के दिन तक चलेगा। लेकिन लोगों के एक दल विशेष के सम्बन्ध में संघर्ष उस हालात में समाप्त हो सकता है, जब इसके उद्‌देश्य पूरे हा जाएंगे। समाप्त होने की शर्त दुश्मनों द्वारा लिखित समझौता करके आत्मसमर्पण अथवा इस्लाम के पक्ष में शांति संधि या युद्ध विराम की स्थायी संधि करना है।” (जोन लाफिन, वही, पृ. २२-२३)।

(xx) Prof. Asma Yaqoob (Karachi University) : “Jihad in its given concept denotes the meaning of an organised struggle, reform movement or resistance of Muslims living under particular circumstances, against the undivine and unjust rule of Muslims or non-Muslims.” (The Jihad Fixation, p. 217).

प्रो. आस्मा याकूब,  (कराची विश्वविद्यालय) : ”जिहाद का अर्थ उसकी मौजूदा अवधारणा के अनुसार संगठित संघर्ष, सुधार अभियान अथवा परिस्थितियों विशेष में रह रहे मुसलमानों का मुसलमानों अथवा गैर-मुसलमानों के गैर-मज़हबी और अन्यायपूर्ण शासनों के खिलाफ प्रतिरोध करना है” (दी जिहाद फिक्शेसन, पृ. २१७)।

(xxi) Shaikh Muhammad as-Saleh-al-Uthaimin : “It is our opinion that whoever claims the acceptability of any existing religion today other than Islam-such as Judaism, Christianity and so forth, is a non-believer. He should be asked to repent. If he does not, he must be killed as an apostate because he is rejecting the Quaran.” (The Muslim Belief, p. 22)

शेख मुहम्मद-अस-सलेह-अल-उथेमिन (दी मुस्लिम विलीफ, पृ. २२): ”हमारी यह सम्पत्ति है कि जो कोई इस्लाम के अलावा वतर्तमान में मौजूद किसी अन्य धर्म जैसे यहूदीमत, ईसाईयत और अन्य (हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म आदि) में विश्वास रखता है, वह गैर-ईमान वाला है। उससे पश्चाताप करने के लिए आग्रह करना चाहिए। यदि वह ऐसा नहीं करता है, तो उसकी धर्मत्यागी के समान हत्या कर देनी चाहिए क्यों वह कुरान को नकारा रहा है।”

(xxi) Brigadier S. K. malik (The quranic Concept of War, pp. 142-143) : “The Quranic view on war (Jihad) is, however, altogether different. According to the Book (Quran) the very initration of war is for the Cause of God (Allah). It is, therefore, controlled and conditioned by the ‘Word of God’ from its conception till culmination….. The Quranic philosophy of war is fuly integrated into the total Quranic Ideology… Jehad, the Quranic concept of total strategy, demands the preparation and application of total natonal power, and military instruments is one of its elements.”

ब्रिगेडियर एस. के. मलिक (कुरानिक कंसेप्ट ऑफ वॉर, पृ. १४२-१४३) : ”युद्ध (जिहाद) के सम्बन्ध में कुरान का मत बिल्कुल अलग है। कुरान के अनुसार युद्ध अल्लाह के लिए छेड़ा जाता है। इसलिए यह प्रारम्भ से अंत तक ‘खुदा की वाणी’ के द्वारा ही नियंत्रित होता है। युद्ध के सम्बन्ध में कुरानका दर्शन पूरी तरह से कुरान की विचारधारा से जुड़ा हुआ है…. जिहाद, जो कुरान की सम्पूर्ण रणनीति अवधारणा की मांग है कि राष्ट्र की सम्पूर्ण शक्ति तैयर करके लगा दी जाए, तथा सैन्य शक्ति जिहाद का एक घटक है।”

(xxii) Quazi Hussain Ahmed-President Jamaat-e-islami Pakistan says “Jihad is Worship.” (Jihad Fixation, p. 209)

काजी हुसेन अहमद (अध्यक्ष, जमाते इस्लामी पाकिस्तान) ”जिहाद पूजा है” (जिहाद फिक्सेशन, पृ. २०९)।

(xxiv) Prof. Mohammad Ayoob (Michigan State University, mentions in Jihad Fixation, p. 212) : “In the present context of the large number of multi-religious and multi-ethnic politics, and they form a majority of members of the international system, to talk of Jihad in the traditionally popular term of struggle of Muslims for self-rule against non-Muslims is at best antediluvian and at worst pernicious i character. It harks back to the assumed division between dar-ul-Islam (the land the Islam) and dar-ul-Harb (the land of war) which bears no correspondence to the current politicall reality, if it ever did during any earlier era.”

प्रो. मुहम्मद अयूब, (मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी) ने लिखा (जिहाद फिक्ेसेशन, पृ. २१२) : ”बहु-मज़हबी तथा बहु-नस्लीय राजनीति के, जो अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के बहुसंखयक सदस्य हैं, वर्तमान प्रसंग में उनका, गैर-मुसलमानों के खिलाफ, स्वशासन के लिए मुस्लिमों के परंपरागत रूप से लोग प्रिय संघष्र के संदर्भ में जिहाद की बात करना दकियानूसी तो है ही, साथ ही घातक भी है। यह विश्व को पुनः कल्पित दो भागों में बाँटता है जैसे दारूल इस्लाम (इस्लामी राज्य) तािा दारुल हरब (युद्ध क्षेत्र) जिसका वर्तमान राजनीतिक सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। हो सकता है कि पहले कभी किसी काल में ऐसा किया गया हो।”

(xvv) Jonah Winters (professor Toronoto Universty, Canada) : “The various meanings of Jihad, as found in the Quran, can be broken down into the following broad categories. First, Jihad is the allegiance which one must hold before all others. Second, it is the way to confront the non-Muslim. Forth, it is a requirement for entering paradise. Fifth, it can simply be a synonym for fighting.” (The Jihad Juggernaut, p. 49).

जोनाह विन्टर्स (प्रोफेसर, टोरंटो यूनिवर्सिटी, कनाडा) : ”कुरान में जिहाद के मिलने वाले विभिन्न अर्थों को मोटे तौर पर निम्नलिखित श्रेणियों में रखा जा सकता है। पहला-जिहाद एक निष्ठा है जिसे एक व्यक्ति को अन्य सभी व्यक्तियों के समक्ष दिखानी चाहिए। दूसरा-यह गैर-मुसलमानों का विरोध करने का माध्यम है। तीसरा-यह मुसलमान के रूप में अपना दैनिक जीवन व्यतीत करने का एक निश्चित तरीका है। चौथा-यह जन्नत में प्रवेश की एक पक्की अपेक्षा है। पाँचवा-इसे साधारणतः युद्ध करने का एक पर्याय कहा जा सकता है।” (दी जिहाद जुगरनौट, पृ. ४९)।

(xvi) Ergum Mehmet Caner and Emir Fethi Caner : “Strictly speaking, Jihad means a continuing warfare against them. Despite the explanations of Islamic apologists afte the terrorists attacks, Jihad does not primarily refer to a “struggle of personal piety”. Jihad is a combat on the fronts of politics, warfare, and culture. ” (Unveiling Islam, p. 185)

इरगम मेहमत केनर तथा एमिर फिथिी केनर : ”डंके की चोट पर कहा जाए तो जिहाद का अर्थ उनके (गैर-मुसलमानों के) खिलाफ एक निरन्तर युद्ध है। आतंकवादी हमलों के बाद, इस्लाम-समर्थकों के स्पष्टीकरणों के बावजूद बुनियादी रूप से जिहाद का अर्थ ”व्यक्तिगत मज़हबी निष्ठा” के लिए संघर्ष से नहीं है। जिहाद राजनीति, युद्ध, और सांस्कृतिक मोर्चों पर एक संघर्ष है। (अनवीलिंग इस्लाम, पृ. १८५)

(xxvii) ‘John Laffin writes in ‘Holy War Islam fights’ : “Jihad is a passionately held ideal and Islam’s most dominant obsession. As already explained, the word (Jehad) means literally ‘extraordinary effort’ or ‘great stiving’ for Allah. Because this effort is nowhere more strenuous than in war, Jihad came to mean holy war. Its aim is direct-the subjection of unbelievers to Islam. In modern times, other means and ends have been attached to holy war but the fundamental principle of conquest in the name of Allah, is constant. Together the passion for action and the principle of Islamic domination have made Jihad difficult for western Christians to comprehend.

Yet the rules of concepts of holy war have remained constant for centuries. They are virtually unchangeable because they were laid down in the Koran, reinforced by the Hadiths (the traditional sayings and actions of Muhammad) endorsed by the Shari’a (the law of Islam) and confirmed by Fi-qh (the science of jurisprudence in Islam)

Differences exist in the application of Jihad, according to the four main Schools of Islamic Law, but these differences are in the superstructure of Jihad, not in its solid base. Some of Islam’s commands and promises are still powerful after thirteen centuries, such as the effect of the promise of Paradise for those who fight in the cause of Holy war.” (pp. 39-40).

“A fundamental tenent of Jihad concerns the Islamic belief that soeverignty lies in God rather than in the people; it then becomes logical that rebellion against the state is viewed not merely as an act of civil disobedience but also as an infringement of the will of Allah. Taken a steop further, it is the manifest will of Allah that all men subscribe to Islam; those who do not are obviously enemies of Allah.” (pp. 45-46).

जॉन लाफिन ने ”होली वार इस्लाम फाइट्‌स” में लिखा : ”जिहाद एक आवेशपर्ूा ढ़ंग से माना जाने वाला लक्ष्य है और यह इस्लाम का सबसे प्रबल हावीपन है। जैसा कि पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है, इसका शाब्दिक अर्थ ”अल्लाह के लिए असाधारण अथवा अथक प्रयास करना है।” क्योंकि यह प्रयास किसी भी स्थिति में युद्ध से अधिक कठिन नहीं है। इसलिए जिहाद का अर्थ मज़हबी युद्ध से लगाया जाने लगा है। इसका उद्‌देश्य इंकार करने वालों को इस्लाम स्वीकार करवाना है। आधुनकि युग में इस पवित्र युद्ध से अन्य तौर-तरीके भी जुड़ गए हैं, लेकिन अल्लाह के नाम पर विजय का मौलिक सिद्धान्त यथावत्‌ बना हुआ है। सक्रियता के प्रति आवेग और इस्लामी प्रभुता के सिद्धान्त के कारण ही, पश्चिमी देशों के ईसाइयों े लिए जिहाद को समझ पाना कठिन हो गया है।”

धार्मिक युद्ध की संकल्पनाओं के नियम सदियों से वैसे के वैसे ही बने हुए हैं। वे अपरिवर्तनीय से हैं क्योंकि उन्हें कुरान में निर्धारित किया गया है, हदीसों (मुहम्मद साहब के पारम्परिक कथन और कार्य) तथा शरीयत (इस्लामी कानून) द्वारा उनका समर्थन किया गया है और फिक्ह (इस्लाम की विधि) द्वारा उनकी पुष्टि की गई है।

इस्लामी कानून की मुखय चार धाराओं के अनुसार जिहाद को छेड़ने के सम्बन्ध में मतभेद हैं। लेकिन यह मतभेद जिहाद की ऊपनी रचना के बारे में हैं, न कि उसके बुनियादी सिद्धान्त के बारे में। तेरह सदियां बीत जाने के बाद भी इस्लाम के कुछ आदेश तथा कायदे अभी भी शक्तिशाली हैं जैसे मज़हबी युद्ध में हिस्सा लेने वालों के लिए जन्नत प्राप्ति का वायदा।” (पृ. ३९-४०)।

”इस्लामी पंथ से सम्बन्धित जिहाद का मौलिक सिद्धान्त यह है कि सम्प्रभुता लोगों के हाथों में निहित न होकर, अल्लाह में निहित है और इस प्रकार यह बात तर्क सम्मत नब जाती है कि सरकार के विरुद्ध विद्रोह को न केवल सविनय अवज्ञा के रूप में देखा जाता है बल्कि उसे अल्लाह की इच्छा का उल्लंघन भी माना जाता है। इससे भी बढ़कर यह अल्लाह की सुस्पष्ट इच्छा है कि सभी लोग इस्लाम को मानें और जो ऐसा नहीं करते हैं, प्रत्यक्षतः वे अल्लाह के दुश्मन हैं” (पृ. ४५-४६)

(xxviii) Prof. Daniel Pipes (In the Path of God’, pp. 43-44) : “War on behalf of Islam is known as Jihad and is usually translated into English as “Holy war”. But “holy war” brings to mind warriors going off to battle with God in their hearts intent on spreading the faith-someting like medieval European crusaders or soliders of the Reformation. Jihad is less a holy war than a “righteous war,” fighting carried out in accordance with the Shari’a. Of course, Jihad must be on behalf of Islam, but the emphasis of its definition is on legality, not on holiness. A muslim may go to battle with thoughts of Allah or he may dream of booty; the key is that his behaviour should confirm to the Shari’a and thereby increase the scope of its application. Not every attack on non-Muslims qualifies as Jihad; there are eleborate restrictions which, if transgressed, make the fighting non-Shar’ia and therefore not Jihad. For instance, if an attach breaks an oath, it is nt righteous war. Conversely, Jihad can be directed against Muslims who flout the Shari’a, including apostates and bridgands-hardly what “Holy war” brings to mind.

More importnat yet, Jihad is not holy war because its purpose is not to spread the faith. Non-Muslims commonly assume that Jihad calls for the militant expansion of the Islamic religion; in fact, its purpose is to spread the rule of Islamic law. The logic behind law being the central concern of Jihad has special importance for the topic of Islam and political power : to approach God properly, man must live by the Shari’a, because the Shari’a contains provisions which can only be executed by a government, the state  has to be in the hands of Muslims; Muslims must therefore control territory; to do this, they need to wage wr-and thus, the provision for Jihad. If Muslims do not rule, Kafirs do; by definition, the latter do not see the Shari’a as a sacred law. For expendiency’s sake, to minimize Muslim antagonism toward their rule, non-Muslims may enforce some Islamic precepts, especially private ones, but they would never go to the effeort of implementing Shari’s publci regulations. For these reasons, Islam requires the expulsion of non-Muslims from power and their replacement by believers, by force, if necessary.

Jihad, Offensive in Dar al-Harb, defensive in Dar0-al-Islam, takes many forms-insurrection, invasion, aid to neighbours, self-defense, or guerrilla action. In addition to polities, tribes and individual warriors, can launcha a Jihad on their own. Muslim power should be extended both to areas where Muslims already live and to where they do not, for Shari’a rule (in the Islamic view) brings advantages even to non-Muslims by preventing them from engaging in practices forbidden by God. Jihad, Muslims believe, should continue until they take control of the entire planet and all mankind becomes subject to Islam’s law.

The goal has little common with the widespread image of Jihad as “Islam or the sword.” Jihad impels Muslim conquests, not Islamic conversions, leding to the political subjugation of non-Muslims, not their religious coercion. “The primary aim of the Jihad is not, as it was often supposed in the oldr european literature, the conversion by force of unbeleivers but the expansion-and also the defence-of the Islamic State.”

प्रो. डेनियल पाइप्स (इन दि पाथ ऑफ गॉड, पृ. ४३-४४) : ”इस्लाम की ओर से छेड़े गए युद्ध को जिहाद का नाम दिया गया है, और आमतौर पर अंग्रेजी भाषा में इसका अनुवाद ‘होली वार’ (मज़हबी युद्ध) के रूप में किया जाता है। लेकिन ‘होली वॉर’ से यह आभासा होता है कि सैनिक अपने मन में अल्लाह को संजो कर अपने मज़हब का विस्तार करने हेतु लड़ने जा रहे हैं। यह कुुछ-कुछ मध्यकालीन यूरोपीय धार्मिक योद्धाओं अथवा सुधार सैनिकों जैसा ही है। जिहाद न्यायसंगत युद्ध से कम एक पवित्र युद्ध है जो शरीयत के अनुसार लड़ा जाने वाला मज़हबी युद्ध है। निःसन्देह जिहाद इस्लाम की ओर से है। लेकिन इसकी परिभाषा का बल वैधता पर है, न कि इसकी पवित्रता पर। एक मुसलमान अल्लाह के ध्यान अथवा लूट के खयाल से लड़ाई के लिए जा सकता है; मुखय बात यह है कि उसका व्यवहार शरियत के अनुसार होना चाहिए ताकि उसे लागू करने की सम्भावना बढ़े। यह जरूरी नहीं है कि गैर-मुसलमानों पर हर हमला जिहादी ही हो। ऐसी बहुत सी पाबंदियां हैं जिनका उल्लंघन होने पर लड़ाई शरियत के अनुकूल नहीं रहती। इसलिए वह जिहाद नहीं कहलाती है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी हमले से कोई शपथ टूटती है तो वह मज़हबी युद्ध नहीं कहलाता है। इसके विपरीत जिहाद शरियत को न मानने वाले मुसलमानों के खिलाफ भी छेड़ा जा सकता है, जिनमें मज़हब त्यागने वाले मुस्लिम तथा लुटेरे भी शामिल हैं।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिहाद इसलिए मज़हबी युद्ध नहीं है क्योंि इसका उद्‌देश्य मज़हब को फैलाना नहीं है। आमतौर पर गैर-मुसलमान यह मानते हैं कि जिहाद का उद्‌देश्य आतंक के द्वारा इस्लामी मजहब का विस्तार करना है; वस्तुतः इसका उद्‌देश्य इस्लामी कानून का विस्तार करना है। इस्लामी कानून के सम्बन्ध में तर्कसंगत बात जिहाद है जिसका इस्लाम के विषय और राजनीतिक सत्ता के सम्बन्ध में विशेष महत्व है। अल्लाह को पाने के लिए मनुष्य को अवश्य ही शरीयत के अनुसार जीवन यापन करना चाहिए क्योंकि शरियत में ऐसी व्यवस्थाएँ हैं जिन्हें सरकार द्वारा निष्पादित किया जा सकता है, राज्य का शासन मुसलमानों के हाथों में होना चाहिए; इसलिए मुसलमानों को देश पर नियन्तण के हाथों में होना चाहिए ; इसलिए मुसलमानों को देश पर नियन्तण करना चाहिए; इस उद्‌देश्य से उनके लिए यह आवश्यक है कि वे युद्ध छेड़ें और इस प्रकार जिहाद की व्यवस्था की गई है। यदि शासन मुसलमानों के हाथों में नहीं है तो शासन की बागडोर काफ़िरों के हाथों में होगी; और काफ़िर शरियत को पवित्र कानून नहीं मानते हैं। गैर-मुसलमान सुगमता के लिए अपने शासन के विरुद्ध मुसलमानों के असन्तोष को कम से कम करने के उद्‌देश्य से इस्लाम के कुछ छोटे-छोटे कायदे-कानून लागू कर सकते हैं।

लेकिन वे शरियत के सार्वजनिक नियमों को भी लागू करने का प्रयास नहीं करेंगे। यही कारण है कि इस्लाम, गैर-मुसलमानों को सत्ता से बेदखल करना जरूरी और आवश्यकता पड़े, तो बल प्रयोग करके ‘ईमान लाने वालों’, को सत्ता में लाना, आवश्यक समझता है।

तिहाद, जहाँ ‘जारुल हरब’ में आक्रामक है, वहीं ‘दारुल-इस्लाम’ में रक्षात्मक है। इस प्रकार जिहाद के कई रूप हैं-आक्रमण करना, पड़ोसियों को मदद देना, आत्मरक्षा अथवा गुरिल्ला कार्रवाई करना आदि। शासन के साथ-साथ, कबीले और अलग-अलग लड़ाकू भी अपनी ओर से जिहाद छेड़ सकते हैं। मुस्लिमों की सत्ता का विस्तार, उन क्षेत्रों में जहाँ मुस्लिम रहते हैं तथा उन क्षेत्रों में भी जहाँ वे नहीं रहते दोनों में किया जाना चाहिए क्योंकि शरियत के शासन से गैर-मुसलमानों को भी लाभ मिलता है। गैर-मुसलमानों को लाभ इसलिए मिलता है क्योंकि शरियत का शासन उन्हें ऐसे कार्य करने के लिए रोकता है जिन्हें करने के लिए अल्लाह ने मना किया हैं मुसलमानों का यह विश्वास है कि जिहाद तब तक जारी रहना चाहिए जब तक पूरी पृथ्वी पर मुसलमानों का अधिकार न हो जाए और सम्पूर्ण मानवजाति इस्लामी कानून के अधीन न आ जाए।

यह लक्ष्य ”इस्लाम का अथवा तलवार” के रूप में जिहाद की व्यापक छवि से मेल नहीं खाता है। जिहाद का लक्ष्य इस्लाम में मतान्तरण न होकर मुसलमानों का विजय (राज्य) को आगे बढ़ाना है जिसके परिणामस्वरूप गैर-मुसलमानों को राजनीतिक रूप में दास बनाना है, न कि उनका मजहबी उत्पीड़न है। जिहाद का मुखय लक्ष्य वह नहीं है जिसे कि यूरोप के पुरानत साहितय में प्रायः समझा गया था अर्थात्‌ बल प्रयोग करके इंकार करने वालों का मतान्तरण, अपितु इस्लामी राज्य का वितसार करना और उसकी रक्षा करना है।

(xxix) Bat Ye’-or (Decline of Eastern Christianity under Islam’, pp. 39-40) : “the doctrine of Jihad borrowed the practice of the razzias perpetrated by the nomads but softened them with Quranic injunctions….. The aim of Jihad is to subjugate the peoples of the world to the law of Allah, decreed by His Prophet Muhammad…. As the Jihad is the permanent war, it excludes the idea of peace but authorizes temporary truces related to the political situations.”………………. TheHoly war (Jihad) regarded by Islamic theologians as one of the pillars of the faith, is incumbent on all Muslims : they have to contribute to it according to their capacities, by their persons, their property, or their writings.”

“…………….Jihad is generally transalated as ‘Holy war’ (this term is not satisfactory) : this suggests both that this war is provoked by strong religious feeling, and then that its first subject is not so much to conquer land as to Islamise the population” (p. 18).

बेट ये ओर  (डिक्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी अंडर इस्लाम’) : ”जिहाद के सिद्धान्त खानाबदोशों की छापामार प्रवृत्तियों में लिया गया हैं मगर उन्हें कुरानक े आदेशों से नरम बनाया गया है। ….. जिहाद का लक्ष्य पैगम्बर मुहम्मद के आदेशानुसार संसार के लोगों को अल्लाह के कानून की अधीनता में लाना है…………….. क्योंकि जिहाद एक स्थायी युद्ध है, इसमें शान्ति की अवधारणा का बहिष्कार” किया गया है। लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसारा अस्थायी युद्ध विराम का विधान किया गया हैं मज़हबी युद्ध (जिहाद) को इस्लाम के विद्वानों ने मज़हब के स्तम्भों में से एक माना है और उनके मुताबिक सभी मुसलमानों के लियेयह अनिवार्य है कि वे अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार अपने शरीर, सम्पत्ति अथवा लेखन से इसमें सहयोग करें।” (पृ. ३९-४०)

”…. जिहाद का अनुवाद आमतौर पर ‘पवित्र युद्ध’ के रूप में किया जाता है। (यह शब्द संतोषजनक नहीं है)। इससे दो बातों का संकेत होता है : पहला, यह युद्ध एक उग्र मज़हबी भावना से प्रेरित है और दूसरा, इसका मुखय लक्ष्य भूमि जीतना न होकर लोगों का इस्लामीकरण ळै।” (पृ. १८)।

(xxx) Jecques Ellul : “In Islam, however, Jihad is the religious obligation. It forms part of the duties that the believer must fulfil; it is Islam’s normal path to expansion. And this is found repeatedly dozens of times in the Koran. Therefore, the believer is not denying the religious message. quite the revrse, Jihad is the way he best obeys it. And the facts, which are recorded meticulously and analysed, clearly show that the Jihad is not a “spiritual war” but a real military war of conquest. It expresses the agreement between the ‘fundamental book’ and the believers practical strivings….. Further, “since the Jihad is not solely an external war, it can break out within the Muslim world itself–and wars among Muslims have been numerious but always with the same fatures.

Hence, the second important specific characteristics is that the Jihad is an instituion and not an event,that is to say, it is part of the normal functioning of the Muslim world. This is so on two counts. First, this war creates the institutions which are its consequence. Of course, all wars bring institutional changes merely by the facts that there are victors and vaniquished, but here we, are fac4d with a very different situation. The conqured populations change status (they became dhimmis), and the shari’a tends to be put into effect integrally, overthrowing the former law of the country. The conquered territories do not simply change “owners.” Rather, they are brought into a binding collective (religious) ideology-with the exception of the dhimmi condition-and are controlled by a highly perfected administrative machinery.

Lastly, in this perspectiv the Jihad is an institution in the sense that it participates extensively in the economic life of the Islamic world-like dhimmitude does, which involves a specific conception of his economic life.”…..

But it is most important to grasp that the Jihad is an institution in itself; that is to say, an organic piece of Muslim society. As a religious duty, it fits into the religious organization, like pilgrimages, and so on. However, this is not the essential factor, which derives from the division of the world in the (religious) thought of Islam. The world is divided into two regions, the dar al Islam and the dar-al-harb; in other words, “the domain of Islam” and “the domain of war.” “The world is no longer divided into nations, peoples, and tribes. Raher, they are all located en bloc in the world of war. where war is the only possible relationship with the outside world. The earth belongs to Allah and all its inhabitants must acknowledge this reality; to achieve this goal there is but one method : war. War then is clearly an institution, not just an incidental or fortuitous institution, but a constitutent part of the thought, organization, and structures of this world. Peace with this world of war is impossible. Of course, it is sometimes necessary to call a halft; there are circumstances where it is better not to make war. The Koran makes provision for this. But this changes nothing : war remains an institution, which means that it must resume as soon as circumstances permit.” (Foreword, Decline of Eastern Christinity under Islam, pp. 19-20).


जेक्यूस एलूल : ”इस्लाम में, यद्यपि जिहाद एक मज़हबी फर्ज है, इसकी गणना ‘ईमानलाने वालों’ के कर्त्तव्यों में होती है और उन्हें इसे अवश्य निभाना है; यह इस्लाम के विस्तार का सामान्य रास्ता है और कुरान में जगह-जगह इसका वर्णन आता है। इसीलिए ‘ईमान लाने वाला’ इस मज़हबी संदेश का खण्डन नहीं करता। इसके बिल्कुल विपरीत जिहाद वह रास्ता है जिसे वह सबसे अच्छी तरह अपनाता हैं सावधानी से लिखित तथा स्पष्ट रूप से विश्लेषित तथ्यों से यह साफ़ तौर पर स्पष्ट है कि जिहाद एक आध्यात्मिक युद्ध न होकर जीत के लिए एक वास्तविक सैन्य युद्ध है। यह ‘मौलिक किताब’ तथा ‘ईमानलोन वालों’ के व्यावहारिक प्रयासों कें बीच एक समझौते को व्यक्त करता है।” इसके साथ-साथ ”चूंकि यह केवल बाह्‌य युद्ध नहीं है, इसलिए यह मुस्लिम संसार में भी छिड़ सकता है-और मुसलमासनों के बीच अनेक युद्ध हुए हैं लेकिन उनकी विशेषताएं सदैव एक जैसी रहीं हैं।”

”इसलिए, दूसरा महत्वपूर्ण विशिष्ट लक्षण यह है कि जिहाद संस्थागत क्रिया है, न कि एक घटना अर्थात्‌ यह मुसलमानी संसार के सामान्य कार्यकलाप का एक अंग है। इसके दो कारण हैं : पहला, युद्ध से उसकी संस्थाओं की स्थापना होती है जो कि उसका परिणाम हैं। निः संदेह, सभी युद्धों से मात्र संस्थागत परवित्रन होते हैं, इस तथ्य से कि समजा में अब विजेतागण और दूसरे विजित हैं; लेकिन यहाँ हमारे सामने एक अलग ही स्थिति पैदा हो जाती है। विजित लोगों की हैसियत ही बदल जाती है (वे धिम्मी हो जाते हैं) और देश के पुराने कानून को फेंक कर उन पर शरियत लागू कर दी जाती हे। अतः विजित क्षेत्रों के केवल स्वामी ही नहीं बदलते बल्कि उन्हें बाध्यकारी सामूहिक (मज़हबी) विचारधारा के अन्तरगत लाया जाता है और धिम्मी स्थिति के अपवाद सहित उन पर परिपक्व प्रशासनिक तंत्र का नियंत्रण होता है।

अंततः इस परिप्रेक्ष्य में जिहाद इस अर्थ में संस्थागत है कि यह इस्लामी विश्व के आर्ािक जीवन में व्यपक रूप से उस तरह से सहभागी होता है जैसे धिम्मीपन करता है जिसमें उसके आर्थिक जीन की एक खास संकल्पना छिपी होती है।

इस बात को समझना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि जिहाद अपने आप में एक संस्था है; अर्थात् यह मुस्लिम समाज का एक मूलभूत अंग है। मज़हबी फ़र्ज के रूप में यह मज़हबी यात्राओं आदि की तरह, मज़हबी संगठन के अनुकूल है। तथापि यह वह अनिवार्य तत्व नहीं है जो कि इस्लाम के मज़हबी चिंतन से विश्व के विभाजन से उत्पन्न हो। विश्व का विभाजन दो भागों में किया गया है; दारूल-इस्लाम तथा दारूल हरबा दूसरे शब्दों में ‘इस्लामी क्षेत्र’ तथा ‘युद्ध क्षेत्र’। ‘विश्व अब राष्ट्रों, लोगों, एवं कबीलों में विभाजित नहीं रह गया है, अपितु वे सभी ऐसे युद्ध के विश्व में हैं जहाँ बाहरी विश्व के साथ युद्ध का ही एक मात्र सम्भव सम्बन्ध ळै। समस्त पृथ्वी अल्लाह की है और इसके स्वयं निवासियों को यह सच्चाई अवश्य माननी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए केवल एक ही तरीका है-वह है युद्ध। युद्ध तब स्पष्ट रूप से एक संस्था है जो कि केवल प्रांसगिक अथवा आकस्मिक संस्था नहीं है बलिक् इस संसार की रचना, चिंतन और ंसगठन का एक घटक अंग है। इस युद्ध के विश्व के साथ शांति असम्भव है। निः सन्देह, कभी-कभी युद्ध विराम करना आवश्यक हो जाता है; ऐसी परिस्थितियाँ भी हैं जिनमें युद्ध न छेड़ना बेहतर होता है। कुरान में इसकी व्यवस्था है। लेकिन इससे कुछ भी नहीं बदलता-युद्ध एक संस्था बनी रहती है, जिसका अभिप्राय यह है कि परिस्थितियों के अनुकूल होते ही इसे शुरू हो जाना चाहिए।” (प्राक्थन, डिक्लाइन ऑफ ईस्टर्न क्रिश्चियनिटी अंडर इस्लाम, पृ. १९-२०)।

(xxxi) Rudolf Peters, (professor of Islamic Law at the University of Amsterdam) : ” The crux of the doctrine (of Jihad) is the existence of one single Islamic state, ruling the entire “Ummah’ [Muslim Community). It is the duty of the ‘Ummah’ to expand the territory of this state in order to bring as many people under its rule as possible. The ultimate aim is to expand the territory of this state in order to bring the whole earth under the sway of Islam and to extirpate unbelief (other religions).” (p. 3).

“the most important function of the doctrine of Jihad is that it mobilizes and motivates Muslims to take part in wars against unbelievers, as it is considered to be the fulfillment of a religious duty. this motivation is strongly fed by the idea that those who are killed on the battelfied, called martyrs (shaheed, plur, shuhadda), will go directly to Paradise. At the occasion of wars fought against unbelievers, religious texts would circulate, replete with Koranic verses and hadiths extolling the merits of fighting a Jihad and vividly describing the reward waiting in the hereafter for those slain during the fighting.” (Jihad in Classical and Modern Islam, p. 5).

रूडोल्फ पीटर, (इस्लाम कानून के प्रोफेसर, युनिवर्सिटी ऑफ एम्सटरडम) : ”जिहाद के सिद्धान्त का मर्म यह है कि सम्पूर्ण इस्लामी समुदाय (उम्मा) पर शासन करने वाला मात्र ‘एक इस्लामी राज्य’ है। उम्मा का यह फर्ज़ है कि वह इस राजय का विस्तार करे ताकि उसके शासन के अधीन अधिक से अधिक लोगों को लाया जा सकें इसका अंतिम लक्ष्य इस राज्य की सीमाओं का इतना विसतार करना है ताकि पूरी पृथ्वी पर इस्लाम का राज्य स्थापित हो जाए और अन्य पंथों को मिटा दिया जाए।” (पृ. ३)।

”जिहाद के सिद्धान्त का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि यह मुसलमानों को इस बात के लिए संगठित तथा प्रेरित करता है कि वे ‘इंकार करने वालों’ के विरुद्ध छेड़े गए युद्ध में भाग लें क्योंकि इसे मज़हबी फर्ज़ समझा जाता है। यह प्रेरणा इस ज़बरदस्त सोच पर आधारित है कि युद्ध के मैदान में मारे जाने वाले लोग शहीद, (या शुहदा) कहलाएंगे तथा वे सीधे जन्नत में जाएंगे। ‘इंकार करने वालों’ के विरुद्ध लड़े जाने वाले युद्धों के दौरान धार्मिक शिक्षाएँ प्रसारित-प्रचारित की जाती हैं, जिनमें कुरान की आयतें तथा हदीस होती हैं। कुरान की इन आयतों तथा इन हदीसों में जिहाद को छेड़ने के गुणों, प्रलोभनों व लाभों का वर्णन होता हैं उनमें युद्ध में मारे जाने वाले लोगों को मृत्यु के बाद मिलने वाले इनाम (जन्नत) का भी भरपूर उल्लेख होता है।” (जिहाद इन क्लासिकल एण्ड मॉडर्न इस्लाम, पृ. ५)।

(xxxii) Bernard Lewis“(The Political Language of Islam, p. 72) : “The overwhelming majority of classical theologians, jurists and (Hadith specialist)… understand the obligationof Jihad in a military sense.”

बनार्ड ल्युइस : ”अधिकतर विद्वानों, न्यायविदों तथा हदीस-विशेषज्ञों ने जिहाद के कर्त्तव्य को सैनिक अर्थ में ही लिया है।” (पौलिटिकल लैंग्वेज़ ऑफ़ इस्लाम, पृ. ७२)।

(xxxiii) Dr. K. S. Lal, (an eminent historian of Islam) : “The Quran does not permit the existence or continuance of other faiths and their religious practices. Of the 6326 ayats in the Quran, about 3900 directly or indirectly related to Kafirs, Mushriks, Munkirs, Munafiqs or non-believers in Allah and his Prophet. Broadly speaking, these 3900 ayats fall into two categories-those relating to Muslims who for their faiths will be rewarded in this as well as the rold Hereafter, and those relating to Kafirs or non-believers who are to be punished in this world, and are destined to go to hell after death.”…………………..

The Quran reads like a manual of war on mankind rather than a charater of brotherbhood for all mankind. For people of other faiths, Jihad or permanent war, was the command of the Quran and order of the ay. Islam recommends Jihad or perpetual war on adherents of other religions to lay hold of them, bind the, strike off their heads and burn them, in the fire of hell. This makes Islam a totalitarian and terrorist cult which it has remained ever since its birth.” (Theory and practice of Muslim State in India, pp. 5-6)

डॉ. के. एस. लाल (इस्लाम के विखयात इतिहासकार) : ”कुरान अन्य पंथों के अस्तित्व और उनके मज़हबी रीति-रिवाजों के बने रहने की आज्ञा नहीं देता है। कुरान की ६३२६ आयतों में से ३९०० आयतें प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से ‘काफ़िरों’, ‘मुशरिकों’, ‘मुनकिरों’, ‘मुनाफिकों’ अथवा अल्लाह एवं उसके पैगम्बर पर ‘ईमान न लाने वालों’ से सम्बन्धित हैं। मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि ये ३९०० आयतें दो श्रेणियों के अन्तर्गत आतीं हैं। पहली श्रेणी की आयतें उन मुसलमानों से सम्बन्धित हैं जिन्हें उनके ‘ईमान लाने’ के लिए इस संसार में तथा इस संसार के बाद पुरस्कृत किया जाएगा, और दूसरी र्श्रेणी की आयतें उन ‘काफ़िरों’ तथा ‘इंकार करने वालों’ से सम्बन्धित हैं जिन्हें इस संसार में दण्ड दिया जाना है और जो मृत्यु के बाद निश्चित रूप से जहन्नम में जाएंगे।”

कुरान सम्पूर्ण मानवजाति के लिए भाईचारे का ग्रंथ न होकर मानवजाति के विरुद्ध एक युद्ध की नियम पुस्तिका (मैनुअल)जैसी है। अन्य पंथों के अनुयायियों के विरुद्ध, जिहाद अथवा स्थायी युद्ध, कुरान का आदेश है और यही युग का आदेश है। इस्लाम अन्य पंथों के अनुयायिों के खिलाफ़ जिहाद अथवा लगातार युद्ध की सिफ़ारिश करता है ताकि उन्हें पकड़ लिया जाए, उनके सिर काट दि जाएं और उन्हें जहन्नम की आग में जलाया जा सके। इससे इस्लाम कट्‌टारवादी तथा आतंकवादी मज़हब बन जाता है जैसा कि उसका उत्पत्ति से लेकर अब तक यही रूप रहा है। (थ्यौरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया, पृत्र ५-६)

कुरान, हदीसों, इस्लामी कानूनों एवं इस्लाम के विद्वानों के ऊपर कहे गए कथनों से पाठकों को सुस्पष्ट हो गया होगा कि जिहाद का मुखय अर्थ गैर-मुसलमानों को इस्लाम में धर्मान्तरित करना और उनके सभी देशों को अल्लाह के कानून-शरियत के अधीन लाना है चाहे इसके लिये सशस्त्र युद्ध ही क्यों न करना पड़। फिर भी कुछ मुसलमान इस्लाम को शान्ति का मज़हब कहते हैं। मगर उनके इस कथन में भी कुछ सच्चाई हैं क्योंकि जिहाद के दो चेहरे हैं : एक शान्ति का, दूसरा खुनी युद्ध का।

इस्लाम और जिहाद के दो चेहरे

इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद साहब की तरह, जिहाद के भी दो चेहरे हैं जोकि पूरी तरह कुरान पर आधारित हैं। इसका कारण यह है कि कुरान के ११४ सूराओं में से ९० सूरा मुहम्मद साहब पर मक्का में (६१०-६२२ ए. डी.) अवतरित हुए; और बाकी के २४ मदीना में। इन दोनों जगहों में अवतरित सूराओं के कथनों के स्वभाव, विषय, उद्‌देश्यों और परिस्थितियों में व्यापक अन्तर है। उन्होंने अपने नए मज़हब इस्लाम को स्वीकार ने के लिए मक्का में बार-बार शान्तिपूण्र ढंग से आग्रह किया। उस समय अरब में विभिन्न कबीलों के लोग अपने-अपने इष्ट देवी-देवताओं की अपने ढंग से काबा में पूजा करने की पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दी, सामाजिक समरसता का उपदेश दिया। हालांकि यहाँ जिहाद पर ५ आयतें हैं परनतु इस्लाम स्वीकाने के लिए गैर-मुसलमानों के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध की आज्ञा नहीं दी; बल्कि कुरान कहलता है :

(i) ”दीन’ धर्म के बारे में कोई जबरदस्ती नहीं।” (२ः२५६, पृ. १७२)

(ii) ”कह दो : हे काफ़िरों ! मैं उसकी ‘इबादत’ करता नहीं जिसकी ‘इबादत’ तुम करते हो; और न तुम ही उसकी ‘इबादत’ करते हो जिसकी ‘इबादत’ मैं करता हूँ और न मैं उसकी ‘इबादत’ करने का जिसकी ‘इबादत’ तुम करते आए और न तुम उसकी ‘इबादत’ करने के जिसकी ‘इबादत’ मैं करता हूँ। तुम्हें तुम्हारा ‘दीन’ और मुझे मेरा दीन’ (१०९ : १-६, पृ. १२०७)

ऐसा इसलिए कि यहाँ मुहम्मद कमज़ोर था। परन्तु सितम्बर ६२२ में मदीना में आकर उन्होंने निम्नलिखित पाँच सूत्रीय योजना के द्वारा अपने अनुयायियों का सैनिकीकरण किया : १) अपने अनुयायियों (मुसलमानों) को मदीना में बसना आवश्यक किया; २) प्रत्येक वयस्क मुसलमान के लिए ‘अल्लाह के लिए जिहाद’ करना अनिवार्य किया; ३) व्यापारिक कारवाओं को पवित्र महीनों में भी लूटना वैध कर दिया; ४) लूट और पराजितों के धन, सम्पत्ति, स्त्री आदि में अस्सी प्रतिशत भाग जिहादियों और बीस प्रतिशत अपने लिए सुरक्षित कर दिया और ४) परम्परागत स्वेच्छा से दान (ज़कात) देना सबके लिए अनिवार्य कर दिया। इनके अतिरिक्त अरब के युवकों को आश्वासन दिया गया कि यदि वे गैर-मुसलानों के विरुद्ध लड़ाई में मारे गए तो उन्हें फौरन ज़न्नत मिलेगी जहाँ वे तीस वर्ष के नौजवान हो जाऐंगे और न कभी बूढ़े होंगे। वहाँ उन्हें एक सौ पुरुषों के बराबर वीर्यवत्ता दी जाएगी और कम से कम बहत्तर युवा सुन्दरियों (हूरों) के साथ उनकी शादी रचा दी जाएगी जिनके साथ वे अनन्त काल तक स्वादिष्ट भोजन, मादक शराब, सोने चांदी के महलों में रहते हुए सभी प्रकार के भोग विलास और यौन  सुखों का आनन्द लेते रहेंगे। (बायर, मेडिन्स ऑफ पैराडाइज,; अनवर शेख, इस्लाम सैक्स एण्ड वायलेन्स)।

इसकी पुष्टि में कुरान कहता है :

(i) ”निस्संदेह अल्लाह ने ‘ईमान वालों’ से उनके प्राण ओर उनके माल इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए ज़न्नत है। वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं, तो वे मारते भी हैं और मारे भी जाते हैं। यह उसके जिम्मे तौरात, इन्जील, और कुरान में (किया गया)एक पक्का वादा है और अललाह से बढ़कर अपने वायदे को पूरा करने वाला हो भी कौन सकता ळै” ? (९ : १११, पृ. ३८८)

(ii) ”तुम उनसे लड़ों यहाँ तक कि फितना शेष न रह जाए और ‘दीन (धर्म)’ अल्लाह के लिए हो जाएं। अतः यदि वे बाज़ आजाएँ तो अत्याचारियों के अतिरिक्त, किसी के विरुद्ध कोई कदम उठाना ठीक नहीं।” (२ : १९३, पृ. १५८)

(iii) ”उनसे युद्ध करो जहाँ तक कि कितना शेष्ज्ञ न रहे और दीन-पूरा का पूरा अल्लाह का हो जाए” (८ : ३९, पृ. ३५३)

(iv) ”तुम पर युद्ध फ़र्ज किया गया है’ और वह तुम्हें अप्रिय है-और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें बुरी लगे और वह तुम्हारे लिए अच्छी हो, और हो सकता है कि एक चीज़ तुम्हें प्रिय हो और वह तुम्हारे लिए बुरी हो। अल्लाह जानता है ओर तुम नहीं जानते।” (२ : २१६, पृ. १६२)

(v) मक्का विजय (६३० ए. डी.) के बाद पेगम्बर मुहम्मद ने कहा: ”फिर जब हराम महीने बीत जाऐं तो मुश्रिकों को जहाँ कहीं पाओ कत्ल करो और उन्हें पकड़ों और उन्हें घेरों और हर घात की जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे ‘तौबा’ कल लें और ‘नमाज़’ कायम करें और ज़कात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो।” (९ : ५, पृ. ३६८)।

उपरोक्त आयतों से सुस्पष्ट है कि मक्का की आयतों में सहिष्णुता, सह-अस्तित्व, शान्ति और धार्मिक स्वतंत्रता की बात कही गई है जबकि मदीना की आयतों में इस्लाम न स्वीकार करने वाले दुनियां भर के लोगों के विरुद्ध अनिवार्य सशस्त्र युऋ के आदेश सुस्पष्ट हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मक्का में १३ वर्षों तक शान्तिपूर्ण ढंग से इस्लाम का प्रचार करने के बाद भी उलगभग एक सौ ही लोगों ने इस्लाम स्वीकारा। वहाँ मुहम्मद की सैनिक शकित कमज़ोर थी। परन्तु मदीना में मुसलमानों का सैनिकीकरण, अनिवार्य ज़कात, लूट के माल और जन्नत के भोगविलास पूर्ण जीवन के अनिवार्य ज़कात, लूट के माल और जन्नत के भोगविलास पूर्ण जीवन के प्रलोभनों के फलस्वरूप पैगम्बर मुहम्मद अत्यन्त शक्तिशाली हो गए। यहाँ सात साल के अन्दर ६३० ए.डी. में मक्का पर आक्रमण करते समय पैगम्बर की सेना में दस हजार सैनिक थे और ६३२ में(मृत्यु से पहले) उनके पास बीस हजार सैनिक थे।

अतः गेर-इस्लामी देशों में जहाँ पर मुसलमान संखया बल में कमज़ोर होते हैं, वह देश ‘दारूल हरब’, जैसे भारत, होता है तो वहाँ वे मक्का की शान्ति, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व वाली आयतों (२ः२५६; १०९ : १-६ आदि) पर बल देते हैं तािा इस्लाम को शान्ति का मज़हब होने का दावा करते हैं। वहाँ जिहाद का चेहरा शान्ति का होता है। जहाँ वे राजनैतिक दृष्टि से शकितशाली होते हैं और उनका देश दारूल इस्लाम होता है तो वे मदीना की ९.५ जैसी आयतों की भाषा बोलते हैं। वहाँ उनका चेहरा आक्रामक व डिक्टेटर जैसा हो जाता है। परन्तु यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि गैर-मुसलमानों को मक्का की उदार व शान्तिपूर्ण दिखने वाली आयतों के भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि अल्लाह ने उन्हें निरस्त कर दिया है।


आयतों का निरस्तीकरण : इस्लाम की मान्यता है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह इस्लाम के हित में पिछली आयतों को निरस्त करके नई या उससे बेहतर आयतें भेजता है जैसे :

(i) ”हम जो काई ‘आयत’ मन्सूख (निरस्त) कर देते हैं या भुलवा देते हैं तो उससे अच्दी या उस जैसी दूसरी (आयत) लाते हैं।” (२ : १०६, पृ. १४३)।

(ii) ”अल्लाह जो चाहता है, मिटा देता है और (जो कुछ चाहता है) क़ायम रखता है और उसी के पास मूल किताब है।” (१३ : ३९, पृ. ४६२)।

उपरोक्त आयतों के कारण सभी उलेमा आयतों के निरस्तीकरण के सिद्धान्त को मानते हैं। चौदहवीं सदी के विद्वान जलालुद्‌दीन सुयूती के अनुसार कुरान की पांच सौ आयतें निरस्त या अप्रभावी हैं। (डिक्शनरी ऑफ इस्लाम, टी. पी. ह्नयूज. पृ. ५२०)।

इस्लाम के विद्वान यह भी मानते हैं कि कुरान का ९वां सूरा सबसे बाद में अवतरित हुआ था। इसकी ५वीं आयत, जिसे तलवार की आयत भी कहते हैं, मक्का और मदीना में अवतरित सभी पिछली आयतों को निरस्त करती हैं जो कि तर्क संगत भी है। (सैयद कुत्व, माइल स्टोन, पृ. ६३; मौहूदी-मैसेज ऑफ़ इस्लाम) इसी प्रकार म्यूर (लाईफ ऑफ मुहम्मद, पृ. (xxvii) एवं अब्दुल अज़्ज़ाम (बुर्क अलकायदा पृ. ३२) के अनुसार आयत ९ः५, क्रमशः २२४ और १४० पिछली आयतों को निरस्त करती हैं।

इस सन्दर्भ में आर. बेले ने, २००२ में, लिखा है ”हालांकि सभी मुसलमान विश्वास करते हैं कि अल्लाह ने कुछ नई आयतों को भेजकर पुरानी आयतों को निरस्त किया था। परन्तु इस विषय में उनमें व्यापक मतभेद हैं कि कौन-सी आयत ने किस आयत का स्थान लिया। फिर भी अधिकांश विद्वान मानते हैं कि जिहाद के विषय में आयत ९.५ इससे पहले अवतरित हुई, सभी स्थानीय, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों और पारस्परिक शक्तियों के आधर पर बनाया जाता है। मुसलमानों े सभी आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक एवं राजनैतिक कार्यक्रम जिहाद से ही नियन्त्रित होते हैं।

व्यवहार में जिहाद का अर्थ इस बात पर निर्भर करता है कि वह व्यक्ति कहाँ रहता है। यदि कोई मुसलमान गैर-मुस्लिम राज्य में रहता है तो उसके लिए जिहाद का एक अर्थ सब सम्भव उपायों द्वारा मुस्लिम समुदाय की संखया बढ़ाना तथा सरकार से अधिकाधिक आर्थिक सहायता, धार्मिक स्वतंत्रता, और राजनैतिक अधिकारों को प्राप्त करना है और दूसरी तरफ साम-दाम-दण्ड-भेद आदि उपायों और शान्तिपूर्ण जिहाद द्वारा धीरे-धीरे ऐसे देश में इस्लामी राज्य स्थापित करना है। यदि वह किसी मुस्लिम राज्य में रहता है तो उसके लिए जिहाद का मतलब है कि वह वहाँ अल्लाह का कानून अक्षरशः लागू करवाने का प्रयास करें। परन्तु व्यवहार में ५७ इस्लामी राज्य होते हुए भी इनमें इस्लामी कानून (शरियत) एक समान नहीं है। क्योंकि इस्लाम स्वयं ७३ फिरकों में बंटा हुआ है और प्रत्येक की अलग-अलग शरियत है। अतः जिहाद का स्वरूप भी विभिन्न है। इसीलिए शिया, सुन्नी, सूफ़ी, अहमदिया, बहावी आदि फिरकों के मुसलमान अल्लाह के नाम पर जिहाद के विषय में आपस में संघर्ष करते पाए गए हैं। मुहम्मद अमीर राना के अनुसार ‘कश्मीर में ही जिहाद के नाम पर विभिन्न जिहादी फिरकों की बीच दो हजार संघर्ष हुए हैं।” (गेट वे टू टैरोज्मि, पृ. २९)। इन फिरकों में आपसी मतभेद कितने भी क्यों न हों परन्तु ये सब फिरके गैर-मुस्लिम राज्यों को जल्द से जल्द इस्लामी राज्य बनाने में पूरी तरह से एकमत एवं एक जुट है।

कुरान की चौबीस आयतें और उन पर दिल्ली कोर्ट का फैसला

श्री इन्द्रसेन (तत्कालीन उपप्रधान हिन्दू महासभा दिल्ली) और राजकुमार ने कुरान मजीद (अनु. मौहम्मद फारुख खां, प्रकाशक मक्तबा अल हस्नात, रामपुर उ.प्र. १९६६) की कुछ निम्नलिखित आयतों का एक पोस्टर छापा जिसके कारण इन दोनों पर इण्डियन पीनल कोड की धारा १५३ए और २६५ए के अन्तर्गत (एफ.आई.आर. २३७/८३यू/एस, २३५ए, १ पीसी होजकाजी, पुलिस स्टेशन दिल्ली) में मुकदमा चलाया गया।
1-                ”फिर, जब हराम के महीने बीत जाऐं, तो ‘मुश्रिको’ को जहाँ-कहीं पाओ कत्ल करो, और पकड़ो और उन्हें घेरो और हर घातकी जगह उनकी ताक में बैठो। फिर यदि वे ‘तौबा’ कर लें ‘नमाज’ कायम करें और, जकात दें तो उनका मार्ग छोड़ दो। निःसंदेह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है।” (पा० १०, सूरा. ९, आयत ५,२ख पृ. ३६८)
2-                ”हे  ‘ईमान’ लाने वालो! ‘मुश्रिक’ (मूर्तिपूजक) नापाक हैं।” (१०.९.२८ पृ. ३७१)
3-                ”निःसंदेह ‘काफिर तुम्हारे खुले दुश्मन हैं।” (५.४.१०१. पृ. २३९)
4-                ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) उन ‘काफिरों’ से लड़ो जो तुम्हारे आस पास हैं, और चाहिए कि वे तुममें सखती पायें।” (११.९.१२३ पृ. ३९१)
5-                ”जिन लोगों ने हमारी ”आयतों” का इन्कार किया, उन्हें हम जल्द अग्नि में झोंक देंगे। जब उनकी खालें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल देंगे ताकि वे यातना का रसास्वादन कर लें। निःसन्देह अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी हैं” (५.४.५६ पृ. २३१)
5-                ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! (मुसलमानों) अपने बापों और भाईयों को अपना मित्र मत बनाओ यदि वे ईमान की अपेक्षा ‘कुफ्र’ को पसन्द करें। और तुम में से जो कोई उनसे मित्रता का नाता जोड़ेगा, तो ऐसे ही लोग जालिम होंगे” (१०.९.२३ पृ. ३७०)
7-                ”अल्लाह ‘काफिर’ लोगों को मार्ग नहीं दिखाता” (१०.९.३७ पृ. ३७४)
8-                ”हे ‘ईमान’ लाने वालो! उन्हें (किताब वालों) और काफिरों को अपना मित्र बनाओ। अल्ला से डरते रहो यदि तुम ‘ईमान’ वाले हो।” (६.५.५७ पृ. २६८)
9-            ”फिटकारे हुए, (मुनाफिक) जहां कही पाए जाऐंगे पकड़े जाएंगे और बुरी तरह कत्ल किए जाएंगे।” (२२.३३.६१ पृ. ७५९)
10-              ”(कहा जाऐगा): निश्चय ही तुम और वह जिसे तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे ‘जहन्नम’ का ईधन हो। तुम अवश्य उसके घाट उतरोगे।”
11-             ‘और उस से बढ़कर जालिम कौन होगा जिसे उसके ‘रब’ की आयतों के द्वारा चेताया जाये और फिर वह उनसे मुँह फेर ले। निश्चय ही हमें ऐसे अपराधियों से बदला लेना है।” (२१.३२.२२ पृ. ७३६)
12-             ‘अल्लाह ने तुमसे बहुत सी ‘गनीमतों’ का वादा किया है जो तुम्हारे हाथ आयेंगी,” (२६.४८.२० पृ. ९४३)
13-             ”तो जो कुछ गनीमत (का माल) तुमने हासिल किया है  उसे हलाल व पाक समझ कर खाओ” (१०.८.६९. पृ. ३५९)
14-             ”हे नबी! ‘काफिरों’ और ‘मुनाफिकों’ के साथ जिहाद करो, और उन पर सखती करो और उनका ठिकाना ‘जहन्नम’ है, और बुरी जगह है जहाँ पहुँचे” (२८.६६.९. पृ. १०५५)
15-             ‘तो अवश्य हम ‘कुफ्र’ करने वालों को यातना का मजा चखायेंगे, और अवश्य ही हम उन्हें सबसे बुरा बदला देंगे उस कर्म का जो वे करते थे।” (२४.४१.२७ पृ. ८६५)
16-             ”यह बदला है अल्लाह के शत्रुओं का (‘जहन्नम’ की) आग। इसी में उनका सदा का घर है, इसके बदले में कि हमारी ‘आयतों’ का इन्कार करते थे।” (२४.४१.२८ पृ. ८६५)
17-             ”निःसंदेह अल्लाह ने ‘ईमानवालों’ (मुसलमानों) से उनके प्राणों और उनके मालों को इसके बदले में खरीद लिया है कि उनके लिए ‘जन्नत’ हैः वे अल्लाह के मार्ग में लड़ते हैं तो मारते भी हैं और मारे भी जाते हैं।” (११.९.१११ पृ. ३८८)
18-             ”अल्लाह ने इन ‘मुनाफिक’ (कपटाचारी) पुरुषों और मुनाफिक स्त्रियों और काफिरों से ‘जहन्नम’ की आग का वादा किया है जिसमें वे सदा रहेंगे। यही उन्हें बस है। अल्लाह ने उन्हें लानत की और उनके लिए स्थायी यातना है।” (१०.९.६८ पृ. ३७९)
19-           ”हे नबी! ‘ईमान वालों’ (मुसलमानों) को लड़ाई पर उभारो। यदि तुम में बीस जमे रहने वाले होंगे तो वे दो सौ पर प्रभुत्व प्राप्त करेंगे, और यदि तुम में सौ हो तो एक हजार काफिरों पर भारी रहेंगे, क्योंकि वे ऐसे लोग हैं जो समझबूझ नहीं रखते।” (१०.८.६५ पृ. ३५८)
20-             ”हे ‘ईमान’ लाने वालों! तुम यहूदियों और ईसाईयों को मित्र न बनाओ। ये आपस में एक दूसरे के मित्र हैं। और जो कोई तुम में से उनको मित्र बनायेगा, वह उन्हीं में से होगा। निःसन्देह अल्लाह जुल्म करने वालों को मार्ग नहीं दिखाता।” (६.५.५१ पृ. २६७)
21-            ”किताब वाले” जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं न अन्तिम दिन पर, न उसे ‘हराम’ करते हैं जिसे अल्लाह और उसके रसूल ने हराम ठहराया है, और न सच्चे दीन को अपना ‘दीन’ बनाते हैं उनकसे लड़ो यहाँ तक कि वे अप्रतिष्ठित (अपमानित) होकर अपने हाथों से ‘जिजया’ देने लगे।” (१०.९.२९. पृ. ३७२)
22-            २२ ”…….फिर हमने उनके बीच कियामत के दिन तक के लिये वैमनस्य और द्वेष की आग भड़का दी, और अल्लाह जल्द उन्हें बता देगा जो कुछ वे करते रहे हैं। (६.५.१४ पृ. २६०)
23-            ”वे चाहते हैं कि जिस तरह से वे काफिर हुए हैं उसी तरह से तुम भी ‘काफिर’ हो जाओ, फिर तुम एक जैसे हो जाओः तो उनमें से किसी को अपना साथी न बनाना जब तक वे अल्लाह की राह में हिजरत न करें, और यदि वे इससे फिर जावें तो उन्हें जहाँ कहीं पाओं पकड़ों और उनका वध (कत्ल) करो। और उनमें से किसी को साथी और सहायक मत बनाना।” (५.४.८९ पृ. २३७)
24- ”उन (काफिरों) से लड़ों! अल्लाह तुम्हारे हाथों उन्हें यातना देगा, और उन्हें रुसवा करेगा और उनके मुकाबले में तुम्हारी सहायता करेगा, और ‘ईमान’ वालों लोगों के दिल ठंडे करेगा” (१०.९.१४. पृ. ३६९)
उपरोक्त आयतों से स्पष्ट है कि इनमें ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, कपट, लड़ाई-झगड़ा, लूटमार और हत्या करने के आदेश मिलते हैं। इन्हीं कारणों से देश व विश्व में मुस्लिमों व गैर मुस्लिमों के बीच दंगे हुआ करते हैं।
उपरोक्त आयतों में स्पष्ट है कि इनमें ईर्ष्या, घृणा, कपट, लड़ाई-झगड़ा, लूटमार और हत्या करने के आदेश मिलते हैं। इन्हीं कारणों से देश व विश्व में मुस्लिमों व गैर-मुस्लिमों के बीच दंगे हुआ करते हैं।
मैट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट श्री जेड़ एस. लोहाट ने ३१ जुलाई १९८६ को फैसला सुनाते हुए लिखाः ”मैंने सभी आयतों को कुरान मजीद से मिलान किया और पाया कि सभी अधिकांशतः आयतें वैसे ही उधृत की गई हैं जैसी कि कुरान में हैं। लेखकों का सुझाव मात्र है कि यदि ऐसी आयतें न हटाईं गईं तो साम्प्रदायिक दंगे रोकना मुश्किल हो जाऐगा। मैं ए.पी.पी. की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आयतें २,५,९,११ और २२ कुरान में नहीं है या उन्हें विकृत करके प्रस्तुत किया गया है।”
तथा उक्त दोनों महानुभावों को बरी करते हुए निर्णय दिया कि- ”कुरान मजीद” की पवित्र पुस्तक के प्रति आदर रखते हुए उक्त आयतों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि ये आयतें बहुत हानिकारक हैं और घृणा की शिक्षा देती हैं, जिनसे एक तरफ मुसलमानों और दूसरी ओर देश के शेष समुदायों के बीच मतभेदों की पैदा होने की सम्भावना है।” (ह. जेड. एस. लोहाट, मेट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट दिल्ली ३१.७.१९८६)
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Posted on October 12, 2011, in Islam. Bookmark the permalink. 4 Comments.

  1. Excellent article Alahamdullillah !

  2. पालीवाल जी बहुत बहुत धन्यवाद आपके लेख की लिए| लेख काफी बड़ा है पर बहुत उम्दा है, Muslims Apologists के सभी तर्कों का आपने तगड़ा जवाब दिया है|

  3. True Islam “Hijacked”
    ________________________________________
    Many articles were written, especially in the aftermath of September 11, about how the religion of Islam has been hijacked by a small group of terrorists. This is absolutely correct. The Quran, the holy scripture of Muslims, contains no justification for terrorism and killing innocent people.
    We believe that this hijacking of the religion by terrorists will be a wake up call for the majority of silent Muslims who are decent, God-fearing people. We also believe that the true religion of Islam was actually hijacked many centuries ago, albeit slowly and subtly, by so-called Islamic scholars with only superficial or distorted knowledge of the teachings of the Quran. These scholars gradually abandoned the Quran in favor of unauthorized sources for social and political gain. They have been shaping a religion for the masses based on premises that have nothing to do with the true religion, and are divergent from what is clearly presented in the Quran.
    There is a famous experiment called “Boiling Frog Syndrome.” The idea is that if you throw a frog into a pot of boiling water, it will jump out. But if you place the frog into a pot of lukewarm water and slowly turn up the heat, it will boil to death! In other words, when people become accustomed to practices over a sufficient period of time, they come to accept these practices as normal.
    The Boiling Frog Syndrome explains how the “Muslim” masses have come to accept breaches of the Quranic teachings that would have provoked questioning and confrontation during the time of Prophet Muhammad. They have grown accustomed to distortions in the religion that are not sanctioned by the Quran.
    Why does this great religion that produced unmatched civilizations now produce corrupt nations of the third world? Why are once proud, educated and progressive Muslims now economically and socially dependent? The picture is clear. When the Muslims followed the teachings of the Quran properly, they prospered. But, once they abandoned the words of God in the Quran and followed the corrupt teachings and innovations of their religious leaders, they began a long trail of decline.
    So where does Islam stand today? We believe that True Islam (Submission) is like a precious jewel that is buried under piles of man-made innovations and social traditions that have little to do with the religion. The terrorists and fundamentalists who claim to act on Islamic tenets to justify their ends make things even worse for decent Muslims. Thus the water in the aforementioned pot has reached a critical temperature. The frog that would have jumped out long ago if he were thrown in abruptly is still accommodating these slow increases in temperature. Will our frog eventually awaken in alarm to the truth of his situation, that if he stays in the water he will be cooked alive, or will he remain in a state of warm contentment until it is too late? The Boiling Frog Syndrome is a warning for the true and caring Muslims to jump out of the pot and return to the basis of our great religion, the Quran.
    Muslims will have to re-educate themselves about the Word of God in the Quran, other scriptures, and their history. They cannot blame the terrorists or the Western media anymore. The problem is a consequence of their inaction and ignorance. There is simply no room for complacency. Only Muslims can save themselves from the situation they are in, and only by God’s help. The Quran tells us:
    [13:11] …Thus, GOD does not change the condition of any people unless they themselves make the decision to change. If GOD wills any hardship for any people, no force can stop it. For they have none beside Him as Lord and Master
    Terrorism Has No Religion!
    ________________________________________
    Holy war, suicide bombings, fighting for faith, and killing in the name of God — from Crusaders to terrorists, from sacred shrines to New York City, history is tainted by a grave disease afflicting humankind. While all the known religions of the world call for LOVE, PEACE, TOLERANCE, FREEDOM OF BELIEF AND MUTUAL UNDERSTANDING, many of the terrorists’ acts are committed in this world by people who call themselves religious, and attribute their horrendous and evil acts to the religion. However, God condemns their acts in the scripture. The true religion of Islam forbids the killing of innocent people, irrespective of the cause—religious, political or social beliefs. This is stated in the Quran, the holy book of Muslims.
    [Quran 6:151] “…You shall not kill — GOD has made life sacred — except in the course of justice. These are His commandments to you, that you may understand.”
    The laws of the scriptures that apply to the Christians and Jews are repeated and emphasized for the Muslims also.
    [Quran 5:32] “…we decreed for the Children of Israel that anyone who murders any person who had not committed murder or horrendous crimes, it shall be as if he murdered all the people. And anyone who spares a life, it shall be as if he spared the lives of all the people. …”
    All Religions Condemn Terrorism
    The religion of Islam should not be confused with what these terrorists have done. The terrorist organizations such as Al-Qaida who kill innocent people are actually, by the definition of the Quran, not Muslims, but plain murderers. Who would like to describe Hitler or the likes of Ku Klux Klan as good Christians? We should not let our emotions overcome our logic and understanding. There is no religious scripture that does not condemn terrorism. Every righteous person in any religion would condemn such actions regardless of terrorist’s race, country or religious background.
    True Islam
    What is the ideal of Islam? Islam is not a name that defines you as better than your neighbor or rewards you a special status with God. The name itself is an Arabic word derived from the meaning to surrender or submit. Islam is submission to God’s will. It is a way of life that guides your actions and forms your character. Islam is a state of awareness and appreciation of God’s boundless attributes. As your soul submits, you are able to practice the meaning of peace, compassion, love, forgiveness, and charity that originate from one Source. The shades of superiority, prejudice and judgment fade as the world comes into focus with the eyes of your soul. In Islam, the best among us in the sight of God is not the white or the black, the male or the female, a person who calls himself or herself Christian, Jew, or Muslim, but rather, the one who is the most righteous.
    Islam or Submission to God alone is a way of life encouraged from the time of Abraham by Moses, Jesus, and Muhammad, messengers who have followed Abraham. The one who is able to surrender the soul is called a Muslim in Arabic, or Submitter. There are Submitters to the Creator in every faith. They are those who place no limits on their belief in the Unseen and impose no judgments on the different forms of striving towards attaining God’s mercy. This common striving encourages unity within a diverse group of people who advance their personal strides by learning from one another.
    Righteous People in All Religions
    Thus, the love of God is not reserved for people of religious sects or denominations that cling to an exclusive belief of guaranteed “salvation.” God’s infinite love flows to the charitable, righteous, benevolent, equitable, and the just: Those who recognize their accountability and work towards being good.
    [Quran 2:62] Surely, those who believe, those who are Jewish, the Christians, and the converts; anyone who believes in GOD, and believes in the Last Day, and leads a righteous life, will receive their recompense from their Lord. They have nothing to fear, nor will they grieve.
    TERRORISM CANNOT BE JUSTIFIED
    BY ANY RELIGION OF GOD

    “…we decreed for the Children of Israel that anyone who murders any person who had not committed murder or horrendous crimes, it shall be as if he murdered all the people. And anyone who spares a life, it shall be as if he spared the lives of all the people. …” [Quran 5:32]
    Terrorists, using hijacked planes, have attacked New York City and Washington DC on September 11, 2001 killing thousands of innocent people. This is a deplorable and horrendous act that can never be condoned by any God-fearing people. As in many other attacks in the past, the terrorists are linked to groups that abuse the name of Islam to commit crimes that are abhorred and strongly condemned by God in the Quran, the Muslims’ holy book.
    While all the known religions of the world call for LOVE, PEACE, TOLERANCE, FREEDOM OF BELIEF AND MUTUAL UNDERSTANDING, many of the terrorists’ acts are committed in this world by people who call themselves religious, and attribute their horrendous and Satanic acts to the religion. However, God condemns their acts in the scripture.
    [Quran 7:28] They commit a gross sin, then say, “We found our parents doing this, and GOD has commanded us to do it.” Say, “GOD never advocates sin. Are you saying about GOD what you do not know?”
    Like all the other religions of God, Islam (Submission in English) promotes peace, love and harmony among the people. Actually the word “Islam,” in addition to meaning submission (to God), is also derived from the Arabic word Salaam (peace). Muslims (Submitters) greet other people by saying Salaam (Peace be upon you). This is similar to Shalom in Hebrew.
    [Quran 49:13] O people, we created you from the same male and female, and rendered you distinct peoples and tribes that you may recognize one another. The best among you in the sight of GOD is the most righteous. GOD is Omniscient, Cognizant.
    Therefore, the religion of Islam (Submission), advocates freedom, peace and mutual agreement and admonishes aggression. The following verses make it very clear.
    [Quran 5:87] …and do not aggress; GOD dislikes the aggressors.
    [Quran: 7:199] …You shall resort to pardon, advocate tolerance, and disregard the ignorant.
    The relations of Muslims (Submitters) with others are based primarily on peace, mutual respect and trust. The theme in the Quran is peace, unless there is oppression or injustice that cannot be resolved by all the peaceful means available.
    The true religion of Islam forbids the killing of innocent people, irrespective of the cause *religious, political or social beliefs.
    [Quran 6:151] “…You shall not kill * GOD has made life sacred * except in the course of justice. These are His commandments to you, that you may understand.”
    [Quran17:33] “You shall not kill any person * for GOD has made life sacred — except in the course of justice.”
    The laws of the scriptures that apply to the Christians and Jews are repeated and emphasized for the Muslims (Submitters) in the Quran. Muslims are commanded to follow such laws (See 5:32 above).
    Freedom Of Religion
    The religion of Islam condemns the killing or even the persecution of people merely because they embrace a different religion. The Quran mandates the absolute freedom of religion in a society. It does not allow Muslims to fight except for self-defense and to enforce peace. It does not allow restrictions on those who disagree on religious matters. It urges the Muslims to treat such people kindly and equitably:
    [Quran 2:256] There shall be no compulsion in religion…
    [Quran 60:8] GOD does not enjoin you from befriending those who do not fight you because of religion, and do not evict you from your homes. You may befriend them and be equitable towards them. GOD loves the equitable.
    [Quran 8:61] If they resort to peace, so shall you, and put your trust in GOD. He is the Hearer, the Omniscient.
    [Quran 4:90]”…Therefore, if they leave you alone, refrain from fighting you, and offer you peace, then GOD gives you no excuse to fight them.”
    Terrorism is Evil Regardless of Cause
    Regrettably, many terrorists groups have used the name Islam to promote their cause, and this gave many non-Muslims a chance to assail Islam and label the Muslims as terrorists. Deliberately ignored on the other hand, are terrorists who profess to belong to other religions, or non-religious groups.
    With all the great laws established on earth by God or man, the evil among the human being will find a way to abuse, distort or misinterpret them. This does not make these laws evil but rather proves the evil nature of these criminals.
    Terrorism has been committed by people from all religious and political backgrounds as an act of violence. Terrorists who happened to be Christians (e.g. in Bosnia, England, Ireland, Germany, Spain… etc.) and those who happened to be Jewish (e.g. in Israel, Palestine and Lebanon) used their religious beliefs to claim legitimacy for the violence and terrorism they commit. Thousands of men, women, and children, young and old, have been killed in attempts to achieve or hold on to special interests whether political, social or “religious”.
    Those who do not comprehend the True Islam and those who have an interest in distorting the truth about the religion of Islam have been trying to make the words terrorists and terrorism synonymous with the religion. Unfortunately, this is a common mistake portrayed frequently by the news media in the West.
    Several groups calling themselves Christians, Jews or Muslims, have used terrorism to force their agenda, issues or beliefs. None of these groups represent the true religion of the Christians or Jews any more than these terrorists represent Islam.
    Attacks on the civilians and the innocent people around the world by these groups is something that cannot be justified by any religion or under any cause and is strongly condemned in all religions, including Islam as clarified by the words of God in the Quran, the Final Testament.
    Some of the terrorist groups who massacre innocent people consider themselves martyrs. Those who kill the innocent people in the name of their religion or the name of God, and think of themselves as martyrs should think twice. Their act is actually strongly condemned by God in the verses of the Quran. These people are disobeying God’s commandments and the TRUTH in the Quran. Instead they blindly follow the opinion of their corrupted leaders (and scholars). It is not a surprise that God has not granted them victory. Quite the contrary they have been the most humiliated, defeated and oppressed people on earth. Worst of all, they are oppressed by their own rulers.
    The Quran is very clear that the believers must defend themselves but never aggress. It is true that Islam calls for the followers to be strong. This call however is to use the strength to secure peace, provide freedom for the society and the country but never to aggress unless aggressed upon.
    Our Creator is one and the same. The God of the Muslims is the same God of the Jews and the Christians and all the other religions. God does not permit killing of innocent people.
    Whom to Blame?
    The blame lies with the terrorists and not the religion they claim to adhere to. Not everyone who calls himself a Muslim is a Muslim just as not every one who thinks of himself as a Jew or a Christian is one.
    The religion of Islam should not be confused with what these so-called Muslims have done. They actually, by the definition of the Quran, are not Muslims any more than the Ku Klux Klan are good Christians. We should not let our emotions overcome our logic and understanding. We should spread the true message of Islam (Submission) in all scriptures of God: Peace, freedom and justice for all.
    We stand united against all kinds of terrorism, as only through unity will we be able to eradicate them and bring them to justice. We only serve the terrorists’ cause by name-calling and false accusations of everyone who happens to be a TRUE God-fearing Muslim.
    The Quran on Wars And Aggression

    A number of people today view Submission (Islam in Arabic) as a hostile and aggressive religion. This stereotype has been sadly reinforced by the acts of terrorists and fanatics, who in no way represent what the religion truly stands for. They have hijacked the religion, and consequent media attention, for their own selfish and evil goals. Hence, the world opinion tends towards viewing Islam as a violent religion. People associate Islam with Saddam Hussein, suicide bombers, Osama bin Laden, and September 11th. Very few see it as a religion that forbids any kind of aggression, and permits fighting only in self-defense (Quran 2:190). Yet, this is what the truth is. The religion of Islam, described by God in the Quran stands for peace and tolerance. It does not condone or encourage terrorism.
    In the remainder of the article we address some of the common misconceptions about the Islamic and Quranic perspectives on war and peace. These misconceptions are fueled by some people who quote parts of a few Quranic verses out of context. It is unfortunate that rational open-minded folk accept these misquotations without examining the context of the passage they are written in. As with most other books, the Quran must be read as a whole. Taking a single verse—or a part of a verse—out of context, can naturally lead to incorrect conclusions. No religion of God is evil, rather the people who abuse the religion are.
    Aggression is Forbidden. Fighting is permitted only in self-defence.
    The Quranic verses on this are very clear. God repeats, “do not aggress”, multiple times. Only if attacked, is one permitted to fight back. If the other party refrains from aggression and offers one peace, we are told to stop fighting.
    Rules of War*
    [2:190] You may fight in the cause of GOD against those who attack you, but do not aggress. GOD does not love the aggressors.
    [2:191] You may kill those who wage war against you, and you may evict them whence they evicted you. Oppression is worse than murder. Do not fight them at the Sacred Masjid, unless they attack you therein. If they attack you, you may kill them. This is the just retribution for those disbelievers.
    [2:192] If they refrain, then GOD is Forgiver, Most Merciful.
    [2:193] You may also fight them to eliminate oppression, and to worship GOD freely. If they refrain, you shall not aggress; aggression is permitted only against the aggressors.
    *2:190 All fighting is regulated by the basic rule in 60:8-9. Fighting is allowed strictly in self-defense, while aggression and oppression are strongly condemned throughout the Quran.
    [5:87] O you who believe, do not prohibit good things that are made lawful by GOD, and do not aggress; GOD dislikes the aggressors.
    [8:61] If they resort to peace, so shall you, and put your trust in GOD. He is the Hearer, the Omniscient.
    [4:90] … if they leave you alone, refrain from fighting you, and offer you peace, then GOD gives you no excuse to fight them.
    The Quran also reminds the submitters (muslims in Arabic) that they should not be provoked by past animosity into committing acts of aggression (5:2). Additionally, God insists that submitters (muslims) must be absolutely sure before striking in the cause of God (4:94). Anyone who offers one peace, cannot be attacked.
    [4:94] O you who believe, if you strike in the cause of GOD, you shall be absolutely sure. Do not say to one who offers you peace, “You are not a believer,” seeking the spoils of this world. For GOD possesses infinite spoils. Remember that you used to be like them, and GOD blessed you. Therefore, you shall be absolutely sure (before you strike). GOD is fully Cognizant of everything you do.
    Life is Sacred
    The killing of innocent civilians by suicide bombers and terrorists is strongly condemned in the Quran. Taking any life—except in the course of justice, is forbidden. Even so, capital punishment is discouraged. Thus, those who commit these horrible acts are clearly not muslims, rather very evil people who try to justify their hatred and actions using God’s name (7:28).
    The Major Commandments
    [6:151] Say, “Come let me tell you what your Lord has really prohibited for you: You shall not set up idols besides Him. You shall honor your parents. You shall not kill your children from fear of poverty – we provide for you and for them. You shall not commit gross sins, obvious or hidden. You shall not kill – GOD has made life sacred – except in the course of justice. These are His commandments to you, that you may understand.”
    [17:33] You shall not kill any person – for GOD has made life sacred – except in the course of justice. If one is killed unjustly, then we give his heir authority to enforce justice. Thus, he shall not exceed the limits in avenging the murder; he will be helped.
    [25:68] They never implore beside GOD any other god, nor do they kill anyone – for GOD has made life sacred – except in the course of justice. Nor do they commit adultery. Those who commit these offenses will have to pay.
    [7:28] They commit a gross sin, then say, “We found our parents doing this, and GOD has commanded us to do it.” Say, “GOD never advocates sin. Are you saying about GOD what you do not know?”
    Absolute Freedom to Believe / No compulsion in religion
    Does Islam recommend or justify killing of disbelievers or those who decide to leave the religion? The answer is an emphatic “No”. God makes it very clear in the Quran, that there is no compulsion in religion (2:256). Free will is one of God’s precious gifts to humanity, and human beings cannot take away what God gave man. If someone does not wish to believe, they are to be left alone and not forced in any manner. A submitter’s (muslim) job is simply to invite people to God’s religion with kind enlightenment (16:125).
    No Compulsion in Religion
    [2:256] There shall be no compulsion in religion: the right way is now distinct from the wrong way. Anyone who denounces the devil and believes in GOD has grasped the strongest bond; one that never breaks. GOD is Hearer, Omniscient.
    Absolute Freedom of Religion
    [18:29] Proclaim: “This is the truth from your Lord,” then whoever wills let him believe, and whoever wills let him disbelieve. We have prepared for the transgressors a fire that will completely surround them. When they scream for help, they will be given a liquid like concentrated acid that scalds the faces. What a miserable drink! What a miserable destiny!
    How to Spread God’s Message
    [16:125] You shall invite to the path of your Lord with wisdom and kind enlightenment, and debate with them in the best possible manner. Your Lord knows best who has strayed from His path, and He knows best who are the guided ones.
    Verses Relating To War-Time Situations that are Abused
    There are a number of people who will quote parts of verses out of context, either out of ignorance, or deliberately, to promote a false view of the religion. We present here some of the verses with their context that clearly show that these “violent” verses only relate to war situations. As mentioned before, all wars and fighting are only in self-defence.
    The verses are listed in a table format. In the left column is the verse or part of the verse that is commonly misquoted to try and show “Islam is a religion of violence”. In the right column, the full verse / context is shown, making it clear that the “violence” is only in self-defence / in the time of war.
    Misquoted Verse Same Verse in Context
    [4:101] “… For the Unbelievers are unto you open enemies.” [4:101] When you travel, during war, you commit no error by shortening your Contact Prayers (Salat), if you fear that the disbelievers may attack you. Surely, the disbelievers are your ardent enemies.
    [8:12-13] … I will instill terror into the hearts of the unbelievers. Smite ye above their necks and smite all their finger tips off them. This because they contend against God and his apostle. … [8:12-13] Recall that your Lord inspired the angels: “I am with you; so support those who believed. I will throw terror into the hearts of those who disbelieved. You may strike them above the necks, and you may strike even every finger.” This is what they have justly incurred by fighting GOD and His messenger. For those who fight against GOD and His messenger, GOD’s retribution is severe.
    *8:12-16 All wars are governed by the basic rule in 60:8-9.

    [9:5] “… fight and slay the pagans wherever ye find them, and seize them, beleaguer them, and lie in wait for them in every stratagem (of war) …” [9:4-5] If the idol worshipers sign a peace treaty with you, and do not violate it, nor band together with others against you, you shall fulfill your treaty with them until the expiration date. GOD loves the righteous. Once the Sacred Months are past, (and they refuse to make peace) you may kill the idol worshipers when you encounter them, punish them, and resist every move they make. …
    [9:14] “Fight them, and God will punish them by your hands, cover them with shame …” [9:13-14] Would you not fight people who violated their treaties, tried to banish the messenger, and they are the ones who started the war in the first place? Are you afraid of them? GOD is the One you are supposed to fear, if you are believers. You shall fight them, for GOD will punish them at your hands, humiliate them, grant you victory over them, and cool the chests of the believers.

    To summarize, the religion of Submission to God (Islam) as described in the Quran is a peaceful and tolerant one. The only situations where fighting is allowed is in self-defense. Aggression is always prohibited.
    Protecting our right to religious freedom
    …are we doing better than previous generations?

    Freedom is an absolute concept. One cannot be half or two thirds free. One either is or not. This is key to understand when we look into God’s commandment regarding absolute freedom of religion, for all.
    2:256 There shall be no compulsion in religion ….
    Despite this clear command so many people compromise this God given right of others if in a position to do so, in smaller and greater ways. History of mankind carries a grave testimony to this fact.
    This article hopes to encourage reflections on the subject to avoid repeating mistakes of previous generations, who enforced religion on others in various ways.
    To understand what “no compulsion in religion” really means, we first need to sort out what constitutes ‘religion.’
    What is ‘religion’?
    Is everything in the scripture part of ‘religion’? If yes, then based on the command “no compulsion in religion” we should be free to ignore everything in it, without suffering any consequences at the hands of others. As it contains decrees against murder, we know this could not be the case.
    Therefore it seems there are both religious and non-religious decrees, spiritual and secular, teaching us about our religion as well as about our rights to freedom of religion, all in the same place. If this is indeed the case (and people have failed to make that distinction), that could explain a lot of the confusion in religion. For the sake of this article, we will refer to the two types as personal (religious) and social (non-religious).
    If indeed there are two types of decrees in the scripture, what defines each one?
    Personal versus social decrees
    Let’s assume that personal decrees are designed to help us develop our souls and avoid problems obstructing that goal, and that social decrees are designed to help us coexist peacefully with others, allowing freedom, justice and security for all.

    Personal decrees would thus be private, voluntary, a matter between us and God and not affect other people in ways to warrant regulation. Consequences for disobeying them would solely be issued by God (33:24, 25:70, 9:102, 13:40, 10:41, 3:128). Social decrees on the other hand would thus be a matter between us and other people, and our choices in this regard would affect others significantly enough to warrant consequences for non-compliance. This in turn would give us two types of DO’s and DON’Ts. Examples:

    Personal DO’s: Worship God Alone. Observe the Contact Prayers.
    Personal DON’T’s: Do not set up any idols besides Him. Do not take God’s name in vain.
    Social DO’s: Honor your parents. When greeted with a greeting, respond with an equal or better one.
    Social DON’T’s: Do not commit murder. Do not steal.
    A built in balancing system
    Having two types may help us better understand how to correctly apply each one. Practicing one should never transgress on or compromise the other. Thus it gives us a balancing system. A system through which we can know if we do too much, too little, take things out of context or overlook the essence. Perhaps it is in the balance between the two that we find wisdom?
    One example of different decrees balancing each other
    God tells us to be harsh and stern with disbelievers. He also tells us that we have no excuse to be anything but friendly and just with disbelievers, unless they fight us because of our religion (60:8-9). Only considering the first directive, using it as an excuse to treat people badly if they don’t believe as we do, would put things out of balance and be a severe misrepresentation of the message. When put in context, and balanced against other decrees in the Quran, we understand that it applies to situations when our rights are being compromised because of our faith.
    Another example of different decrees balancing each other
    There are directives in the Quran telling us to worship, praise, glorify and commemorate God publicly, privately, day and night (7:55, 205, 50:40), and put striving in His cause before anything else (9:24). If we only took these decrees into consideration, it may leave us thinking that a pious person has very little to no room for a normal life. As the social decrees throughout the scripture advising us how to deal with everyday life (spouses, children, trade, relatives, etc.) show us, this is far from the case. Instead we are advised to seek the abode of the Hereafter without neglecting our share in this world (28:77).
    When balance is lost
    When people uphold part of the scripture and disregard part, or interpret it in a way to suit their personal agenda, balance is lost. If the agenda is to be ‘right’ as long as it makes someone else ‘wrong’, you will most surely find someone on that side of the argument.
    People who believe themselves to be entitled and superior to others will always look for opportunities to justify that attitude. If they happen to be ‘religious’ they will interpret the decrees in a way that suits their purposes – without balance, without wisdom or faith. They will take that tendency to whatever level their means and capacity allows them, even to the point of physically controlling and punishing others for not adhering to their ways and views.
    Tyranny in the name of ‘righteousness’
    Exercising control over the lives of others, making them miserable in various ways for not complying with our view of the world, even if our own freedom, rights or security is not affected by their choices, is something practiced by disbelievers.
    Forcing others religiously, issuing consequences on them for not complying with our view of private decrees qualify as tyranny. Tyranny is, according to the Quran, a clear sign of disbelief.
    [4:76] Those who believe are fighting for the cause of GOD, while those who disbelieve are fighting for the cause of tyranny.… (see also 2:190-191)
    People who engage in this type of behavior may tell themselves that their intentions are good and that they ‘police’ others for their own good. This is obviously a severely misguided approach which cannot be rooted in good intentions as it directly contradicts God’s decree that people should be free to choose their own religion, including the right to choose no religion.
    People who engage in this kind of behavior are controlled by their egos, convincing them that they are superior and entitled. The ego ranks itself above God and His commands and convinces totally insignificant creates created by and totally dependent on God for their existence, that they too can be gods.
    The size of their invented ‘domain’ (every god needs his or her domain) is only limited by the size of their egos and the capacity and means available to them to try to make their delusion a reality. It could be a domain limited by the walls of a home, borders of a country, or more.
    The first public display of ego
    The first open display of ego (arrogance coupled with ignorance) was when Satan refused to fall prostrate before Adam when God ordered him to do so, with the excuse “I’m better than him! You created me from fire and him from mud.” (38:76)
    If you are a human being on this earth you did not take a firm stand against that behavior and blasphemy, which means you have the same bad seed within you. Thus it makes sense that the first commandment stated in the Quran (in sequential order) is “Kill your ego.” (2:54)
    The billions of ego-displays that followed….
    Consequently the world is full of entirely insignificant human creatures contaminated with the I’m-better-than-you-disease. It will claim superiority over a fellow human being, or a group of people, for whatever ridiculous reason it can find.
    One example of how pathetic an excuse people can find to claim superiority over others.
    A friend shared the story of having witnessed a group of female inmates ranking themselves higher for having an eye-liner look, created with an ink-pen. Inmates without the eye-liner look were expected to be subservient. If people can find it meaningful to use such a flimsy excuse to claim superiority over others, in such a miserable circumstance, all wearing orange prison-suits and serving time together, perhaps it is not surprising that they find a huge playground for this purpose in ‘religion.’
    Social decrees — a must for a society of humans to function
    While animals have unwritten rules and a larger order they submit to without ego, humans don’t. Humans will operate from an egotistical point of view, without considering consequences for others, if they can get away with it. This is a formula for chaos, for everyone, unless controlled. Thus, somewhere between the interest of the individual, the many and the resourceful, a conclusion has been made that it is best for all to have a common set of practical and moral rules and principles to live by.
    To guide us in that process God provided us with social decrees, to create the best circumstances for all people to live well and find and practice their religion freely, or not. As His decrees have simply proven to work the best regardless of location and circumstances, constitutions all over the world, religious and non-religious alike, share a lot of legislation rooted in these scriptural social decrees.
    Examples of God’s universally wise and just guidelines
    To help us determine the appropriate consequence for social transgressions, God taught us to apply the general principle of “equivalence”, meaning (among other things) that a consequence must stand in proportion to and be related to the transgression (the punishment must fit the crime). Not responding with an equal greeting is obviously not anywhere near the category of taking someone’s life, yet both are regulated by the scripture.
    Examples of how the principle of equivalence is applied according to the Quran:
    • The family of a murder victim decides the fate of the perpetrator. Pardon is encouraged. If pardon is issued, a compensation shall be paid (2:178-179)
    • Everything should be equivalently, equitably judged. Pardon is always encouraged (5:45).
    • Even when we judge among people who lead lives we disapprove of, we must judge them equitably (5:42).
    • We have to be honest when dealing with ALL people, of all faiths (3:75).
    • We should be peaceful and equitable with people who do not believe, as long as they do not fight us because of our belief (60:8-9).
    • All people should be treated with respect, and no one discriminated against (49:11).
    Clear as day. Yet, we manage to go wrong. Why?
    To follow these guidelines, and the essence they represent, requires willingness to submit without inserting ones personal opinions or agenda. It requires guidance, wisdom, compassion and a belief in a higher all-pervading justice which excludes none. People who represent the ‘problem with religion’, rarely have any of these qualities.
    These are people who attribute importance to religiously irrelevant details as to how to cut their nails or with which hand to eat. In their inability to distinguish between what is relevant and not, right and wrong, they crave for someone to tell them what to think and do in all aspects of their lives, religion being no exception.
    Group dynamics and social pressure
    Their sense of being ´ok´ and safe is derived from belonging to a group rather than inner convictions (29:25, 9:24) (why are polls so popular…?). This coupled with a huge supply of people who feel entitled to provide answers, make excellent ingredients for producing new religious dogma, which gradually gains acceptance as commonly accepted ‘truths’, which eventually become regarded as part of the rule of law.
    Once such groups (sects in fact) with their own set of dogmas are formed, their resources are used to protect them and their fabricated hierarchies. People who think and act independently thereafter represent a threat and must be neutralized or controlled. To change the collective mindset and consciousness once such a constellation has been formed, requires a major event.
    For the group to maintain the illusion of being protectors of righteousness, they rid themselves of perceived threats to the group by carrying out a wide range of oppressive behaviors, from forbidding literature to issuing physical harm. They also identify an enemy outside themselves, or the group, against which they need to unite. A mere reminder of (and more so presence of) people who act and think freely thereafter, trigger feelings of insult and rage in their fearful and angry egos. They will act on these feelings and physically harm you (3:118) if they can get away with it, all in God’s name.
    How do tyrants perceive God?
    How is it that God describes Himself as the Most Merciful, Most Wise and Most Just, yet people who claim to represent His values behave as if He is cruel, unwise and unjust? How come God encourages us to pardon each other even when it comes to murder, yet people who claim to represent His values kill, maim and oppress others for much less serious and even made up reasons?
    A Quranic society is a free society, one with room for all who respect the same rights of others they themselves wish to enjoy. Such a simple, logical and just principle. Yet so very hard to accept for those who seek to control others beyond their rights.
    Will history stop repeating itself?
    The descriptions of the human being in the Quran, leave bleak to no expectations on the majority of people regarding their ability to learn from their past to do better for their future, collectively or individually. We learn that most people, no matter what, will never believe, and the majority of those who do will pollute their belief with idol worship (12:106-108), i.e. they will never be content with only God’s laws. This leaves a minority, which in themselves are not exempt from making mistakes.
    So we already know that most people in our generation will re-plant new seeds of oppression, and already do. We see it in warped and senseless interpretations of Quranic commands such as ‘prohibit evil’ being interpreted as calls to prohibit ‘evil’ in the lives of others. We hear it in suggestions to limit the human rights of others when choosing a life style we don’t want ourselves (homosexuality for example).
    What is the difference between such people with such attitudes and those who inflict bodily harm on others because they don’t like their private choices, except the time, space and support in numbers they’ve been given to enforce their ideas?
    When God says “forbid evil” religiously it must mean ‘prohibit evil in your own lives’, and when He says, “fight in His cause” it must include the fight to allow others their God given rights and freedom. When God says “promote righteousness” and “establish the Contact Prayers and Zakat,” it can never mean more than informing, inviting and setting a good example. When God says the retribution may not be limited to the evildoers among us, this has to be put in relation with His promise that:
    [5:105] O you who believe, you should worry only about your own necks. If the others go astray, they cannot hurt you, as long as you are guided. To GOD is your ultimate destiny, all of you, then He will inform you of everything you had done.
    As mentioned earlier, having the two types of decrees helps us determine the correct application of each type, in general or for individual decrees. It provides us with a scale on which to balance each type, as one cannot transgress on the other.
    There must be ways to show non-tolerance against evil behavior without limiting the lives of others. We must be able to apply one category of decrees correctly without hindering the correct application of the other.
    But for that to happen we must be willing to open our hearts to alternative ways of moving forward together, alongside all kinds of people. We must be willing to fight our ego, who seeks to control that which it has no right to, which it is unwilling to give up to God.
    How to ‘correct’ unwanted behavior in a Quranic society?
    As members of any society, a Quranic society being no exception, we have rights as well as obligations. The system is that we maintain our rights by honoring our obligations. Our obligations are not to hurt or be a burden to others, by choice. None of our obligations are rooted in religious performance.
    People who do not honor their obligations but stay in destructive behaviors by choice, causing all kinds of problems in their own lives and in the lives of others, must at some point lose their rights to societal resources to alleviate negative consequences in their lives as a result of their choices.
    The traditional punitive system is based on the principle “We will do this to you if you”. A more productive Quranic system is, “You must do this for us if you” (public services, or performing a service to ones victims). A complement to these two methods, in keeping with absolute freedom for all people may be the principle, “We will not do this for you if you.”
    Through a “We will not do this for you if you,” system we can, as a society, make our stand known and practice low to no tolerance for certain behaviors, by withholding support for alleviating negative consequences incurred from repeated destructive behaviors, by choice.
    If people get ill, cannot work to support themselves due to substance abuse for example, society could step in to try to help that individual out of that state. If the person returns to that behavior after receiving help, any further consequences for this should not be picked up by society.
    Effective prohibition system without punitive actions
    The “We will not do this for you if you,” system may be an effective way of forbidding something without on infringing on someone’s right to still do that something.
    Everyone must be free to do what they want, as well as be free to not do what they don’t want, as long as they don’t hurt or limit the rights of other people. We are not responsible for each other. If someone chooses to do something with known negative consequences, it should be their own responsibility to carry that burden, and not something they can obligate others to carry.
    A society with such a system installed would support absolute freedom, while firmly prohibiting evil and promoting righteousness. Instead of spending resources on those who keep hurting themselves, such a society could spend resources on research and keeping the public informed, showing the benefits of making the right choices, and the risks of making the wrong ones.
    Keeping people informed to help them make better choices for themselves would create a healthier society overall. This would be promoting righteousness. Any other funds could be spent on helping people OUT of a destructive behavior, but never help them stay in it. God gives people second chances, shouldn’t we?
    [6:54] …. Your Lord has decreed that mercy is His attribute. Thus, anyone among you who commits a transgression out of ignorance, and repents thereafter and reforms, then He is Forgiving, Most Merciful.” (see also 3:89, 4:17-18, 7:153, 5:39, 2:160, 4:16, 2:286, 3:90, 4:48, 5:34, 9:104, 16:119, 17:25, 24:5, 42:25)
    Would ‘evil’ exist in a society ruled by Submitters?
    If there would ever be a society on this Earth ruled by Submitters, chances for all in that society to practice religion the same way is nil, as only a minority of the minority will ever believe the right way (12:103-106).
    Isolating ourselves from other people just because they have a different belief, or no belief, would be un-Quranic. Thus there would surely be people around who had made choices regarded as religiously ‘evil’.
    Does this mean that people would people be free to drink and fornicate if they want? As we have seen above, many verses in the Quran confirms that the answer is yes.
    (18:29) “Whoever wills, let him believe, and whoever wills, let him disbelieve”
    Obviously we do not have the power to ´allow´ people to believe or not in their hearts. Thus, this verse must refer to people’s right to make individual choices in their own lives, based on their belief or not.
    Why it must be that way.
    When we consider the purpose of our being here, which is to be tested if we choose God nor not, the right thing or not, we realize that this is simply the way it must be.
    Our religious choice(s) can only benefit us if they are ours, and they can only be ours if we are free to make them. To be free to make them we need access to information to base our decisions on, without having a threat of something bad happening to us at the hands of others if we don’t make a choice they approve of. The test in this life is to see whether we believe in God and in the Hereafter, not whether we believe in people’s ability to make our lives miserable.
    ONLY when we do something based on our own convictions do we reap the benefits.
    [4:124] As for those who lead a righteous life, male or female, while believing, they enter Paradise; without the slightest injustice. (see also 16:97, 20:112, 21:94)
    Thus, we must be free to make the right AND the wrong choices. Forcing people to do things whether they want to or not, EVEN IF IT IS THE RIGHT THING TO DO, is an effort to cheat them out of the reward for making the right choice(s), as well as cheating them out of the learning process through experience.
    What kind of people punish others for not complying with their view of the world?
    It is always disbelievers who punish and evict believers for not complying with their view of the world, not the other way around.
    Lot who was considered righteous by God, lived alongside and interacted with homosexuals. Because they knew him and his family as people who wished to be pure, they evicted them from their town.
    [27:56] The only response from his people was their saying, “Banish Lot’s family from your town; they are people who wish to be pure.” (see also 7:82)
    [8:30] The disbelievers plot and scheme to neutralize you, or kill you, or banish you. However, they plot and scheme, but so does GOD. GOD is the best schemer (see also 14:13, 17:76).
    The believers are never the oppressors, it is always the disbelievers. As the disbelievers often enjoy the upper hand in this worldly life, they use that position to oppress and hurt believers. They experience great worldly success, with lots of money and children, exclusive mansions and other temporary enjoyments in this life. This is God’s just system, as this is all they get, while getting no share in the eternal Hereafter.
    Conclusions
    In religion, as far as people to people are concerned, there are no MUST DO’s, only CHOOSE TO’s. It is clear that God advises us to separate our state from our church.
    People have the strongest tendencies to impose themselves and their values on others, against God’s commands. It is our obligation as people who know better, to set the best examples and carefully scrutinize our own behavior in this regard, and remind each other when we see history repeating itself, hearing or seeing seeds of oppression being planted amongst us yet again.

  4. Jihad ka mtlb kisi ko marna nhi h…. Islam dhram ya QURAN … ye ijzat nhi deta k ap kisi ka katal kro…. jihad to usko bolte h jab koi acche kam k liye kisi buri chiz ka virodh kiya jaye…. jaise k jab Angrezon ne hmare desh India pr zulm kiye the …. tb Bhagat singh jaise bhadur ne unka virodh kiya tha …. aisi ldai ko jihad khete h…… Islam kisi ko marne ki izajat nhi deta…… tbhi to Karbala k mdan mien Imam Hussain (A.S) ne Jung ni ki thi….. Agr vo Chate to sare dushmno ko mar girate ..mgr unhone aisa kiya nhi ku k Allah kisi ko marne ki izajat nhi dete…… or rhi baat antkvad ki vo muslman h hi nhi …… vo to shetan h jisne muslman hone ka natak kiya huya h…. agr vo Muslim hota to kbi Aisa gnda kaam na krta……

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