भारतीय महापुरुषों की दृष्टि में इस्लाम


 

डॉ कृष्ण वल्लभ
भूमिका

भारत में हिन्दू पिछले १३०० वर्ष से अकारण विदेशी मुसलमानों के क्रूर आक्रमणों व अत्याचारों को झेलते चले आ रहे है। हिन्दू, १९४७ में ब्रिटिश-मुस्लिम कूटनीति और धर्म-आधारित भारत विभाजन एवं कांग्रेस द्वारा हिन्दू-मुस्लिम जनसंखया की अदला-बदली न करने के दुष्परिणामों को भुगत रहे हैं। सत्तालोलुप राजनैतिक नेता इस्लामी जिहाद और आतंकवाद के सामने आत्मसमर्पण कर रहे हैं जिसके परिणामस्वरूप निकट भविष्य में शेष भारत के इस्लामीकरण के लक्षण साफ दिखाई दे रहे हैं।
इस काल खण्ड (७१२-२००६) में भारतीय मनीषियों, महापुरुषों धर्मचार्यों, सन्तों, इतिहासकारों और राजनेताओं ने इस्लाम और मुस्लिम मानसिकता पर समय-समय पर अपने अनुभवों को व्यक्त किया है। यहाँ हमने ऐसे ही कुछ महापुरुषों के इस्लाम सम्बन्धी विचारों को इस लघु पुस्तिका में संकलित किया है जो कि इस्लाम की धार्मिक, सामाजिक एवं राजनैतिक मान्यताओं, मुस्लिम मानसिकताओं और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को साफ़-साफ़ प्रगट करते हैं।
मुझे आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है कि इन महापुरुषों के अनुभव आज के सेक्यूलर भारत में मुस्लिम मानसिकता को समझने एवं मुसलमानों के प्रति नीति निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाऐंगे। यदि वर्तमान राजनीतिज्ञ, धर्माचार्य, सामाजिक कार्यकर्त्ता एवं सामान्य हिन्दू भी इन अनुभवों से शिक्षा ग्रहण कर सकें तो इससे मुझे अति सन्तोष का अनुभव होगा।
संकलन कर्ता
भारतीय मुसलमानों का राजनैतिक लक्ष्य

इस्लामी सिद्धान्त, आदर्श और विधि विधान का एकमात्र अन्तिम लक्ष्य सभी अन्य धर्मों को नष्ट कर विश्व भरा में इस्लामी-साम्राज्य एवं अरबी संस्कृति स्थापित करना है। क्योंकि ‘‘इस्लाम एक धर्म नियंत्रित राजनैतिक आन्दोलन है” जी. एच. जानसेन के अनुसार ‘इस्लाम में धर्म और राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं” (मिलिटेंट इस्लाम)।
यह बात प्रत्येक गैर-मुस्लिम भारतीय को भली भांति समझ लेना चाहिए कि पाकिस्तान व बंगला देश बनने के बाद भी मुसलमानों का एक मात्र अन्तिम लक्ष्य शेष भारत को भी इस्लामी राज्य बनाना और समस्त गैर-इस्लामी धर्मों जैसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई आदि को समाप्त करना है जैसी कि उनको कुरान (अनु. मुहम्मद फारूख खां, १९८०) का आदेश है-
(१) ‘दीन’ तो अल्लाह का इस्लाम है’ (३ः १९ : पृ. १८८);
(२) ”उनसे युद्ध करो जहां तक कि फ़ितना शेष न रहे और ‘दीन’ अल्लाह का हो जाए” (२ : १९३, पृ. १५८;
(३) ‘वही है जिसने अपने ‘रसूल’ को मार्ग दर्शन और सच्चे ‘दीन’ सत्य धम्र के साथ भेजा ताकि उसे समस्त ‘दीन’ पर प्रभुत्व प्रदान करे, चाहे मुशिरकों को नापसन्द क्यों न हो।” (९ :’ ३३, पृ. ३७३)
इसीलिए मुस्लिम नेताओं ने अपनी राजनैतिक आकाक्षाएं सुस्पष्ट कर दी हैं —
(१) हकीम अजमल खां ने कहा-”एक और भारत और दूसरी ओर एशिया माइनर भावी इस्लामी संघ रूपी जंजीर की दो छोर की कड़ियाँ हैं जो धीरे-धीरे किन्तु निश्चय ही बीच के सभी देशों को एक विशाल संघ में जोड़ने जा रही है” (भाषण का अंश खिलाफ़त कान्फ्रेस, अहमदाबाद १९२१, आई. ए. आर. १९९२, पृ.४४७)
(२) एफ. ए. दुर्रानी ने कहा-”भारत-सम्पूर्ण भारत हमारी पैतृक सम्पत्ति है और उसका फिर से इस्लाम के लिए विजय करना नितांत आवश्यक है’ तथा पाकिस्तान का निर्माण इसलिए महत्वपूर्ण था कि उसका शिविर यानी पड़ाव बनाकर शेष भारत का इस्लामीकरण किया जा सके।” (पुरुषोत्तम, मुस्लिम राजनीतिक चिन्तन और आकंक्षाएँ पृ. ५१, ५३)
(३) कांग्रेस नेता एवं भूतपूर्व शिक्षा मंत्री अबुल कलाम आज़ाद ने पूरे भारत के इस्लामीकरण की वकालत करते हुए कहा : भारत जैसे देश को जो एक बार मुसलमानों के शासन में रह चुका है, कभी भी त्यागा नहीं जा सकता और प्रत्येक मुसलमान का कर्त्तव्य है कि उस खोई हुई मुस्लिम सत्ता को फिर प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करें (बी. आर. नन्दा, गांधी पैन इस्लामिज्म, इम्पीरियालज्म एण्ड नेशनलिज्म, पृ. ११७)।
(४) मौलाना कौदूदी का कथन है कि ‘मुस्लिम भी भारत की स्वतन्त्रता के उतने ही इच्छुक थे जितने की दूसरे लोग। किन्तु वह इसको एक साधन, एक पड़ाव मानते थे ध्येय (मंजिल) नहीं। उनका ध्येय एक ऐसे राज्य की स्थापना था जिसमें मुसलमानों को विदेशी अथवा अपने ही देश के गैर-मुस्लिमों की प्रजा बनकर रहना न पड़े। शासन दारूल-इस्लाम (शरीय :शासन) की कल्पना के, जितना सम्भव हो, निकट हो। मुस्लिम, भारत सरकार में, भारतीय होने के नाते नहीं, मुस्लिम हैसियत से भागीदार हों।” (डॉ. तारा चन्द, हिस्ट्री ऑफ दी फ्रीडम मूवमेंट, खंड ३, पृ. २८७)
(५) हामिद दलवई का मत है कि ‘आज भी भारत के मुसलमानों और पाकिस्तान में भी प्रभावशाली गुट हैं, जिनकी अन्तिम मांग पूरे भारत का इस्लाम में धर्मान्तरण है।’ (मुस्लिम डिलेमा इन इंडिया पृ., ३५)
(६) बंगलादेश के जहांगीर खां ने ”बंगला देश, पाकिस्तान, कश्मीर तथा पश्चिमी बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब व हरियाणा के मुस्लिम बहुल कुछ भागों को मिलाकर मुगलियास्थान नामक इस्लामी राष्ट्र बनाने का सपना संजोया है” (मुसलमान रिसच इंस्टीट्‌यूट जहांगीर नगर, बंगलादेश, २०००)
उपरोक्त उद्‌देश्यों को भारत सरकार और सभी राजनैतिक दलों को मुसलमानों की इन अकांक्षाओं को गम्भीरता से सोचना-समझना चाहिए। मगर हमारा विश्वास है कि कांग्रेस, सी. पी. एम. सपा, राजद आदि के स्वार्थी नेता उनके वोटों के सहारे केबल पर कुछ दिनों राज करने के लिए मुस्लिम तुष्टीकरण और शान्तिपूर्ण जिहाद में सहयोग देकर शेष भारत के इस्लामीकरण मेंसहयोग दे रहे हैं। ऐसे नेता तो चले जाएंगे लेकिन इनके कारण मानवता, अध्यात्म और उद्‌दात्त संस्कृति का हिन्दू भारत सदैव के लिए इस्लामी जिहाद की भट्‌टी में जलकर समाप्त हो जाएगा। इसलिए भारत के इस्लामीकरण को रोकना प्रत्येक देश भक्त का सबसे पहला परम कर्त्तव्य है।
०१. गुरु नानक देव (१४६९-१५३९)

हिन्दुओं को यातनाएं दी गई -”सैय्यद, शेख, मुगल, पठान आदि सभी बहुत निर्देयी हो गए थे और वे हिन्दुओं को भीषण यातनाएं दे रहे थे। उन्होंने हिन्दुओं को गिद्ध आदि मांसभक्षी पक्षिणें के आगे डाल दिया। अनेकों (हिन्दुओं) को उनके शरीरों में कीलें ठोंकर मार डाला गया। अन्य अनेकों को कुत्तों से नुचवाकर मरवा दिया गया। जिन्होंने इस्लाम में धर्मान्तरित होना स्वीकार नहीं किया, उन्हें अन्य अनेकों प्रकार से यातनाएं दी गईं। यज्ञ और हवन करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया और जिन्होंने इस आज्ञा का उललंघन किया उन्हें क्षमा मांगनी पड़ी। हिन्दुओं की सुन्दर स्त्रियों का अपहरण किया गया और उन्हें जबरदस्ती मुसलमानों के घरों में रखा गया। न्यायाधीशों ने रिश्वत लेकर अपने निर्णयों द्वारा सच को झूठ में बदल दिया।”

(नानक प्रकाश तथा प्रेमनाथ जोशी की पुस्तक ‘पैन इस्लामिज्म रौलिंग बैक’ के पृ. ८० से)
०२. गुरू समर्थ रामदास (१६०८-१६८०)

शिवजी महाराज के गुरू प्रसिद्ध संत समर्थ रामदास ने हिन्दुओं की स्थिति जो उन्होंने १६३२-४४ में देखी उसे उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘दास बोध’ में इस प्रकार व्यक्त किया :

(१) ”ऊँची और नीची सभी जातियों की अगणित हिन्दू स्त्रियों को यातनाएं दी गईं और उनका बलात्कार किया गया। अनेकों बंदी बनाई गईं और उन्हें दूर देशों में बेचा गया। अनेक सुन्दर स्त्रियों ने यातनाओं से दुखी होकर आत्महत्या कर ली है।
(२) ‘लोगों की धन-सम्पत्ति जब्त कर ली गई है। भय के कारण से अनंकों ने अपने घर बार छोड़ दिए और इस प्रक्रिया में अनेकों मर गए। लोगों को कपड़ा और भाजन प्राप्त नहीं है।”
(३) ”अनेक लोग दुष्कर्मों में ढ़केल दिए गए हैं जबकि अनेक बलात्‌ स्लाम में धर्मान्तरित कर दिए गए हैं। अगणित बच्चे चीख-चीखकर रो रहे हैं क्योंकि उनके माँ-बापों की हत्या कर दी गई या उन्हें बंदी बना कर दूर ले जाया गया है।”
(४) ”अनेकों ने विष खाकर अपना जीवन समाप्त कर लिया। अनेकों ने पानी में डूबकर जान दे दी तथा अनेक जला दिए गए या जिन्दा गाढ़दिए गए।”
(५) ”लोग गहनतम हताशा में डूबे हुए हैं। सभी लोग दयनीय हो गए हैं। उन्हें किसी भी क्षण शान्ति नहीं है।”
(६) ”लोग गहनतम हताशा में डूबे हुए हैं। सभी लोग दयनीय हो गए हैं। उन्हें किसी भी क्षण शान्ति नहीं है।”
(७) ”जब वे भोजन करने की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं, यकायक रोने व चीखने की आवाज़ें सुनाई देने लगती हैं और इन हमले में किसी की पत्नी की बलात्‌ अपहरण हो जाता है, किसी का सामान छीना, झपटा या लूट लिया जाता है।”
(८) ”आक्रमणकारी मुसलमान पशुवत्‌ निर्दयी होते हैं। वे सर्वत्र बहुतायत में हैं। वे पिछले सैकड़ों वर्षों से अपने घृणित कार्य करते चले आ रहे हैं। इसलिए हे राजन्‌ ! (शिवाजी महाराज) सावधान रहना।”
(डॉ. एस. डी. कुलकर्णी कृत ‘एंकाटर विद इस्लाम, पृत्र २६७-२६८ से)
०३. राजा राम मोहन रॉय (१७७२-१८३३)

मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार -”मुसलमानों ने हिन्दुओं पर अत्यधिक अत्याचार किए हैं विशेषकर ब्राह्‌मणों पर क्योंकि वे लगातार हिन्दू धर्म में अडिग बने रहे और उन्होंने मुसलमानों द्वारा अकथनीय अत्याचारों और मृत्यु दण्ड की धमकियों के बावजूद भी अपने धर्म को नहीं त्यागा।मुसलमानों ने यह मान रखा है कि उनके लिए कुरान की आयतें अल्लाह का हुक्म है और उन्होंने निश्चित कर रखा है कि उनके लिए यह अल्लाह का आदेश है कि वे मूर्तिपूजकों (हिन्दुओं) को यातनाएं दें और उनकी हत्या करें। मुसलमानों के अनुसार ‘सब मूर्तिपूजकों (हिन्दुओं) में से ब्राह्‌मण सबसे नीच हैं। यही कारण है कि मुसलमान धर्मान्ध हो गए और उन्होंने गैर-मुस्लिमों (हिन्दू, बौद्ध, ईसाई आदि) को धार्मिक उन्माद में मारने में कोई कमी नहीं रखी।”

(राजा राममोहन रॉय के सम्पूर्ण वाड्‌ऋमय से, पृ. ७२६-७२७, हराफ पब्लिकेशंस, कोलकता, १९७३)
०४. महर्षि दयानन्द सरस्वती (१२.२.१८२५-२०.१०.१८८२)

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चौदहवें समुल्लास (अध्याय) में इस्लाम के धर्म ग्रंथ कुरान की १६१ आयतों या आयत समूहों की समीक्षा की है। यहाँ इन्हीं में से कुछ आयतों की समीक्षा सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, रामलीला मैदान, नई दिल्ली, द्वारा १९७५ में प्रकाशित, सत्यार्थ प्रकाश के पृष्ठ ५४३ से ६१२ तक से ली गई है जबकि कुरान की वे ही पूरी की पूरी आयतें ‘पवित्र कुरआन’ (अनुवादक मौलाना मुहम्मद फारूक रवां और डॉ.मुहम्मद अहमद, प्रकाशक मधुर संदेश संगम, जामियानगर, नई दिल्ली, २००५) में देखी जा सकती हैं। सन्दर्भ में पहले सूरा और बाद में आयत का संखया क्रम दिया गया है।

स्वामी जी ने कुरान की समीक्षा करने से पहले अपना मन्तव्य इस समुल्लास के प्रारम्भ में दी गई अनुभूमिका (४) में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया है-
”यह लेख केवल मनुष्यों की उन्नति और सत्यासत्य के निर्णय के लिए सब मतों के विषय का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होवे इससे मनुष्यों को परस्पर विचार करने का समय मिले और एक-दूसरे के दोषों का खण्डन कर, गुणों का ग्रहण करें, न किसी अन्य मत पर, न इस मत पर झूठ-मूठ बुराई व भलाई लगाने का प्रयोजन है किन्तु जो-जो भलाई है वही भलाई और जो बुराई है वही बुराई सबको विदित होवे”
”यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिए किया गया है, न कि इनको बढ़ाने के अर्थ। क्योंकि एक दूसरे की हानि करने से पृथक्‌ रह, परस्पर को लाभ पहुंचाना हमारा मुखय कर्म है। अब यह चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों का मत विषय सब सज्जनों के सामने निवेदन करता हूँ, विचार कर इष्ट का ग्रहण, अनिष्ट का परित्याग कीजिए।” (पृ५४३)

१. कुरान

१. ”आरम्भ साथ नाम अल्लाह के क्षमा करने वाला दयालु ।” (१ : १)
समीक्षक-”मुसलमान लोग ऐसा कहते हैं कि यह कुरान खुदा का कहा है। परन्तु इस वचन से विदित होता है कि इसका बनाने वाला कोई दूसरा है क्योंकि जो परमेश्वर का बनाया होता तो ”आरम्भ साथ नाम अल्लाह के” ऐसा न कहता किन्तु ”आरम्भ वास्ते उपदेश मनुष्यों के” ऐसा कहता।” (पृ ५४४)
२. ”सब स्तुति परमेश्वर के वास्ते है जो परबरदिगार अर्थात्‌ पालन करने हारा है तब संसार का। क्षमा करने वाला दयालु है।” (१ : २)
समीक्षक-”जो कुरान का खुदा संसार का पालन करने हारा होता और सब पर क्षमा और दया करता है तो अन्य मत वाले और पशु आदि को भी मुसलमानों के हाथ से मरवाने का हुकम न देता। जो क्षमा करने हारा है तो क्या पापियों पर भी क्षमा करेगा ? और जो वैसा है तो अगे लिखेंगे कि ”काफ़िरों को कतल करो” अर्थात्‌ जो कुरान और पैगम्बर को न मानें वे काफ़िर हैं, ऐसा क्यों कहता है? इसलिए कुरान ईश्वरकृत नहीं दीखता।” (पृ. ५४४-५४५)
३. ”दिखा उन लोगों का रास्ता कि जिन पर तूनपे निआमत की॥ और उनका मार्ग मत दिखा कि जिनके ऊपर तू ने गज़ब अर्थात्‌ अत्यन्तक्रोध की दृष्टि की और न गुमराहों का मार्ग हमको दिखा।” (१ : ६)
समीक्षक-”जब मुसलमान लोग पूर्वजन्म और पूर्वकृत पाप-पुण्य नहीं मानते तो किन्हीं पर निआमत अर्थात्‌ फ़जल या दया करने और किन्हीं पर न करने से खुदा पक्षपाती हो जायेगा, क्योंकि बिना पाप-पुण्य, सुख-दुःख देना केवल अन्याय की बात है और बिना कारण किसी पर दया और किसी पर क्रोध दृष्टि करना भी स्वभाव से बहिः है। वह दया अथवा क्रोध नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व संचित पुण्य पाप ही नहीं तो किसी पर दया और किसी पर क्रोध करना नहीं हो सकता। और इस सूरः की टिप्पणी पर ”यह सूरः अल्लाह साहेब ने मनुष्यों के मुखय से कहलाई कि सदा इस प्रकार से कहा करें” जो यह बात है तो ‘अलिफ्‌ बे” आदि अक्षर भी खुदा ही ने पढ़ाये होंगे। जो कहो कि बिना अक्षरज्ञान के इस सूरः को कैसे पढ़ सके ? क्या कण्ठ ही से बुलाए और बोलते गये ? जो ऐसा है तो सब कुरान ही कण्ठ से पढ़ाया होगा। इससे ऐसा समझना चाहिए कि जिस पुस्तक में पक्षपात की बातें पाई जायें वह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता, जैसा कि अरबी भाषा में उतारने से अरबवालों को इसका पढ़ना सुगम, अन्य भाषा बोलने वालों को कठिनहोता है इसी से खुदा में पक्षपात आता है और जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्याय दृष्टि से सब देश भाषाओं से लिक्षण संस्कृत भाषा कि, जो सब देशवालों के लिए एक से परिश्रम से विदित होती है, उसी में वेदों का प्रकाश किया है, करता तो यह दोष नहीं होता।” (पृ. ५४५-५४६)
४. ”हे नबी ! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमान वाले अनुयायी ही काफ़ी है। ‘हे रबी ! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे पास पचास बीस आदमी जमें होंगे तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुममें से ऐसे सौ होंगे तो वे इंकार करने वालों में से एक हजार पर प्रभावी होंगे क्योंकि वे नासमझ लोग हैं।” (८ः६४-६५, पृ. १५५)
”अतः जो कुछ गनीमत (लूट) का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो।” (८ : ६९, पृ. १५६)
समीक्षक-”भला ! यह कौन-सी न्याय, विद्धत्ता और धर्म की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहे अन्याय भी करे उसी का पक्ष और लाभ पहुंचावे ? और जो प्रजा में शान्ति भंग करके लड़ाई करे, करावे और लूट मार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी कानाम क्षमावान्‌ दयालुलिखे यह बात खुदा की तो क्या किन्तु किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी-ऐसी बातों से कुरान ईश्वर वाक्य कभी नहीं हो सकता।” (पृ. ५७४)
५. ”और इसी प्रकार हमने इस (कुरआन) को एक अरबी फरमान के रूप में उतारा है। अब यदि तुम उस ज्ञान के पश्चात्‌ भी जो, तुम्हारे पास आ चुका है, उसकी इच्छाओं के पीछे चले तो अल्लाह के मुकाबले में न तो तुम्हारा कोई सहायक मित्र होगा औन न कोई बचाने वाला।” (१३ : ३७)
हम जो वादा उनसे कर रहे हैं चाहे उसमें से कुछ हम तुम्हें दिख दें या तुम्हें उठा लें। तुम्हारा दायित्व तो बस सन्देश का पहुंचा देना ही है, हिसाब लेना तो हमारे जिम्मे है।” (१३ः४०, पृ. २१२-२१३)
समीक्षक-”कुरान किधर की ओर से उतारा ? क्या खुदा ऊपर रहता है ? जो यह बात सच्च है तो वह एकदेशी होने से ईखश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैगा़ाम पहुंचाना हल्कारे का काम है और हल्कारे की आवश्यकता उसी को होती है जो मनुष्यवत्‌ एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है, ईश्वर का नहीं, क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया कुरान है।” (पृ. ५७९)
६. ”और जो तौबा कर ले और ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, फिर सीधे मार्ग पर चलता रहे उसके लिए निश्चय ही मैं अत्यन्त क्षमाशील हूँ।” (२०ः ८२, पृ. २७२)
समीक्षक-”जो तोबाः से पाप क्षमा करने की बात कुरान में है, यह सबको पापी कराने वाली है। क्योंकि पापियों को इससे पाप करने का साहस बहुत बढ़ जाता है। इससे यह पुस्तक और इसका बनाने वाला पापियों को पाप करने में हौसला बढ़ाने वाला है। इससे यह पुस्तक परमेश्वर कृत और इसमें कहा हुआ परमेश्वर भी नहीं हो सकता।” (पृ. ५८४)
७. ”(जो आयतें उतर ही हैं) वे तत्वज्ञान से परिपूर्ण किताब की आयतें हैं।” (३१.२)। ”उसने आकाशों को पैदा किया (जो थमे हुए हैं) बिना ऐसे स्तम्भों के जो तुम्हें दिखाई दें और उसने धरती में पहाड़ डाल दिए कि ऐसा न हो कि तुम्हें लेकर डावांडोल हो जाए।” …. (३१.१०) ”क्या तुमन देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है”………….(३१ : २९) ”क्या तुमने देखा नहीं कि नौका समुद्र में अल्लाह के अनुग्रह से चलती हैं ताकि वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाए।” (३१ : ३१, पृत्र ३६०-३६२)
समीक्षक-वाह जी वाह ! हिक्मतवालीकिताब ! कि जिसमें सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उसमें खम्भे लगाने की शंका और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए पहाड़ रखना! थोड़ी-सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता और हिकमत देखो कि जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं ओर जहाँ रात है वहाँ दिन नहीं, उसको एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है यह बड़े अविद्यानों की बात है, इसलिए यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्या विरुद्ध बात नहीं है कि नौका, मनुष्य और क्रिया कौशलादि से चलती है वा खुदा की कृपा से ? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बनाकर समुद्र में चलावें तो खुदा की निशानी डूब जाय वा नहीं ? इसलिए यह पुस्तक न विद्यान्‌ ओर न ईश्वर का बनाया हुआ हो सकता है।” (पृ. ५९०-५९१)
२. अल्लाह

८. ”अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए खास कर ले ; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करने वाला है।” (२ः१०५, पृ. १९)
समीक्षक- ”क्या जो मुखय और दया करने के योग्य न हो उसको भी प्रधान बनाता और उस पर दया करता है ? जो ऐसा है तो खुदा बड़ा गड़बड़िया है क्योंकि फिर अच्छा काम कौन करेगा ? और बुरे कर्म को कौन छोड़ेगा ? क्योंकि खुदा की प्रसन्नता पर निर्भर करतेहैं, कर्मफल पर नहीं, इससे सबको अनास्था होकर कर्मोच्छेदप्रसंग होगा।” (पृ. ५५४)
९. ”… और यह कि अल्लाह अत्यन्त कठोर यातना देने वाला है।” (२ : १६५) ”शैतान के पद चिन्हों पर मत चलो । निसन्देह वह तुम्हारा खुला शत्रु है ” (२ : १६८)।” वह तो बस तुम्हें बुराई और अश्लीलता पर उकसाता हे और इस पर कि तुम अल्लाह पर थोपकर वे बातें कहो जो तुम नहीं जानते।” (२ :  १६९, पृ. २६)
समीक्षक- ”क्या कठोर दुःख देने वाला दयालु खुदा पापियों पुण्यात्माओं पर है अथवा मुसलमानों पर दयालु और अन्य पर दयाहीन है ? जो ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। और पक्षपाती नहीं है तो जो मनुष्य कहीं धम्र करेगा उस पर ईश्वर दयालु और जो अधर्म करेगा उस पर दण्ड दाता होगा, तो फिर बीच में मुहम्मद साहेब और कुरान को मानना आवश्यक न रहा। और जो सबको बुराई कराने वाला मनुष्य मात्र का शुत्र शैतान है, उसको खुदा ने उत्पन्न ही क्यों किया? क्या वह भविष्यत्‌ की बात नहीं जानता था ? जो कहो कि जानता था परन्तु परीक्षा के लिये बनाया, तो भी नहीं बन सकता, क्योंकि परीक्षा करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ तो सब जीवों के अच्छे बुरे कर्मों को सदा से ठीक-ठीक जानता है और शैतान सबको बहकाता है, तो शैतन को किसने बहकाया ? जो कहो कि शैतान आप बहमता है तो अन्य भी आप से आप बहक सकते हैं, बीच में शैतान का क्या काम ? और जो खुदा ही ने शैतान को बहकाया तो खुदा शैतान का भी शैतान ठहरेगा, ऐसी बात ईश्वर को नहीं हो सकती और जो कोई बहकाता है वह कुसुग तथा अविद्या से भ्रान्त होता है ” (पृ. ५५७)
१०. ”जब तुम ईमान वालों से कह रहे थे; ”क्या यह तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है कि तुम्हारा रब तीन हजार फरिश्ते उतारकर तुम्हारी सहायता करे।” (३ : १२४, पृ. ५८)
समीक्षक- ‘जो मुसलमानों को तीन हजार फरिश्तों के साथ सहाय देता था तो अब मुसलमानों की बादशाही बहुत-सी नष्ट हो गई और होती जाती है क्यों सहाय नहीं देता ? इसलिए यह बात केवल लोभ के दो मूखा्रें को फंसाने के लिये महा अन्याय की है।” (पृ. ५६४)
११. ‘‘अल्लाह बिगाड़ को पसन्द नहीं करता” (२ : २०५)/हे ईमानवालों ! तुम सब इस्लाम में दाखिल हो जाओ और शैतान के पद चिन्हों पर न चलो। वह तो तुम्हारा खुला शत्रु है।” (२ : २०८, पु. ३१)
समीक्षक-”जो झगड़े को खुदा मित्र नहीं समता तो क्यों आप ही मुसलमानों को झगड़ा करने में प्रेरणा करता ? और झगड़ालू मुसलमानों से मित्रता क्यों करता है ? मुसलमानों के मत में मिलने ही से खुदा राजी है तो वह मुसलमानों ही का पक्षपाती है, सब संसार का ईश्वर नहीं। इससे यहाँ यह विदित होता है कि न कुरान ईश्वरकृत और न इसमें कहा हुआ ईश्वर हो सकता है।” (पृ. ५५९)
१२. ”वह जिसको चाहे-नीति (तत्त्वदर्शिता) देता है।” (२ : १६९, पृ. ४२)
समीक्षक-”जब जिसको चाहता है उसको नीति देता है तो जिसको नहीं चाहता है उसको अनीति देता होगा, यह बात ईश्वरता की नहीं किन्तु जो पक्षपात छोड़ सबको नीति का उपदेश करता है वही ईश्वर और आप्त हो सता है, अन्य नहीं।” (पृ. ५६१)
१३. ”फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ प्राप्त है।” (२ः२८४, पृ. ४४)
समीक्षक-”क्या क्षमा के योग्य पर क्षमा न करना, अयोग्य पर क्षमा करना गवरगंड राजा के तुल्य यह कर्म नहीं है ? यदि ईश्वर जिसको चाहता पापी वा पुण्यात्मा बनाता तो जीव को पाप पुण्य न लगना चाहिये। जब ईश्वर ने उसको वैसा ही किया तो जीव को दुःख सुख भी होना न चाहिए। जैसे सेनापति की आज्ञा से किसी भृत्य ने किसी को मारा वा रक्षा की उसका फलभागी वह नहीं होता, वैसे वे भी नहीं।” (पृ. ५६१-५६२)
१४. ‘‘निःसन्देह अल्लाह रत्ती भी जुल्म नहीं रकता और यदि कोई एक नेकी हो तो वह उसे कई गुना बढ़ा देगा और अपनी ओर से बड़ा बदला देगा।” (४ : ४०, पृ. ७२)
समीक्षक-”जो एक त्रसरेणु (तनिक) भी खुदा अन्याय नहीं करता तो पुण्य को द्विगुणा क्यों देता ? और मुसलमानों का पक्षपात क्यों करता है ? वास्तव में द्विगुण वा न्यून फल कर्मों का देवे तो खुदा अन्यायी हो जावे।” (पृ. ५६५)
१५. ”निश्चय ही अल्लाह कपटाचारियों और इनकार करने वालों-सबको जहन्नम में एकत्र करने वाला है।” (४ : १४०)…..”कपटाचारी अल्लाह के साथ धोखेबाज़ी कर रहे हैं हालांकि उसी ने उन्हें धोखे में डाल रखा है…”। (४ : १४२)। हे ईमानवालो ! ईमानवालों ! (मुसलमानों) को छोड़कर इन्कार करने वालों (काफ़िरों) को अपना मित्र न बनाओ।” (४ : १४४, पृ. ८५)
समीक्षक-”मुसलमानों के बहिश्त और अन्य लोगों के दोज़ख़ में जाने का क्या प्रमाण ? वाह जी वाह ! जो बुरे लोगों के धोखे में आता और अन्य को धोखा देता है ऐसा खुदा हम से अलग रहे, किन्तु जो धोखेबाज़ हैं उनसे जाकर मेल करे और वे उनसे मेल करें। क्योंकि-याद्‌टशी शीतलादेवी तादृश : खरवाहन :।
जैसे को तैसा मिले तभी निर्वाह होता है। जिसका खुदा धोखेबाज़ है उसके उपासक लोग धोखेबाज क्यों न हों ? क्या दुष्ट मुसलमान हो उससे मित्रता और अन्य श्रेष्ठ मुसलमान-भिन्न से शत्रुता करना किसी को उचित हो सकता है ?” (पृ. ५६७-५६८)
१६. ‘‘… जो पहले हो चुका उसे अल्लाह ने क्षमा कर दिया, परन्तु जिस किसी ने फिर ऐसा किया तो अल्लाह उससे बदला लेगा।” ०१८८५ : ९५, पृ. १०३)
समीक्षक-”किये हुए पापों का क्षमा करना जानो पापों को करने की आज्ञा दे के बढ़ाना है। पाप क्षमा करने की बात जिस पुस्तक में हो वह न ईश्वर और न किसी विद्वान्‌ का बनाया है किन्तु पापबर्द्धक है। हाँ, अगामी पाप छुड़वाने के लिये किसी से प्रार्थना और स्वयं छोड़ने के लिये पुरुषार्थ पश्चात्ताप करना उचित है, परन्तु केवल पश्चात्ताप करता रहे, छोड़े नहीं, तो भी कुछ नहीं हो सकता।” (पृ. ५६९)
१७. …………….”हालांकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करने वालों (काफ़िरों) की जड़ काट दें।” (८ : ७) (उसने कहा 🙂 ”…..मैं इनकार करने वालों के दिलों में रौब (भय)डाल देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ।” (८ : १२, पृ. १५०)
समीक्षक-”वाहजी वाह ! कैसा खुदा और कैसे पैंगम्बर दयाहीन, जो मुसलमानी मत से भिन्न काफ़िरों की जड़ कटवावे। और खुदा आज्ञा देवे उनको गर्दन मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्पत्ति देवे ऐसा खुदा लंकेश से क्या कुछ कम है ? यह सब प्रपंच कुरान के कर्त्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हमसे दूर और हम उससे दूर रहें।” (पृ. ५७२)
१८. ”उन्हें उनका रब़ अपनी दयालुता औ प्रसन्नता और ऐसे लोगों की शुभ सूचना देता है जिनमें उनके लिए स्थायी सुख-सामग्री है। उनमें वे सदैव रहेंगे। निःस्संदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला है।”
(९ : २१-२२) ”हे ईमानवालो ! अपने बाप और अपने भाईयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुकाबले में कुफ्र उन्हें पिय्र हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे।” (९ः२३) ”अन्नतः अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और ऐसी सेनाएँ उतारीं जिनको तुमने नहीं देखा और इनकार करने वालों को यातनादी और यही इनकार करने वालों का बदला है।” (९ : २६) ”और इसके बाद अल्लाह जिसको चाहता है उसे तौबा : नसीब करता है।” (९ : २७) ”वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न अंतिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते हैं और न सत्य धर्म का अनुपालन करते हैं, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज्जया देने लगें।” (९ : २९, पृ. १५९-१६०)
समीक्षक-”भला ! जो बहिश्तवालों के समीप अल्लाह रहता है तो सर्वव्यापक क्यों कर हो सकता है ? जो सर्वव्यापक नहीं तो सृष्टिकर्त्ता और न्यायाधीश नहीं हो सकता। ओर अपने माँ, बाप, भाई और मित्र को छुड़वाना केवल अन्याय की बात है। हाँ जो वे बुरा उपदेश करें, न मानना परन्तु उनकी सेवा सदा करनी चाहिए। जो पहले खुदा मुसलमानों पर बड़ा सन्तोषी था और और उनके सहाय के लिये लश्कर उतारता था, सच हो तो अब ऐसा क्यों नहीं करता ? और जो प्रथम काफ़िरों को दण्ड देता और पुनः उसके ऊपर आता था तो अब कहाँ गया ? क्या बिना लड़ाई के ईमान खुदा नहीं बना सकता ? ऐसे खुदा को हमारी ओर से सदा तिलांजलि है, खुदा क्याहै, एक खिलाड़ी है।” (पृ. ५७४)
१९. ”निःसन्देह अल्लाह सारे ही गुनाहों को क्षमा कर देता है।” (३९ : ५३) ”हालांकि कियामत के दिन सारी की सारी धरती उसकी मुट्‌टी में होगी और आकाश उसके दाएँ हाथ में लिपटे हुए होंगे।” (३९ : ६७) ”और धरती अपने रब के प्रकाश से जगमगा उठेगी और किताब रखी जाएगी और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा और लोगों के हक़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा। उन पर कोई जुल्म न होगा।” (३९ : ६९, पृ. ४१२-४१३)
समीक्षक-”यदि समग्र पापों को खुदा क्षमा करता है तो जानो सब संसार को पापी बनाता है और दयाहीन है, क्योंकि एक दुष्ट पर दया और क्षमा करने से वह अधिक दृष्टता करेगा और अन्य बहुत धर्मातओं को दुःख पहुंचावेगा। यदि किचिंत भी अपराध क्षमा कियाजावे तो अपराध ही अपराध जगत्‌ में छा जावे। क्या परमेश्वर अग्निवत्‌ प्रकाश वाला है ? और कर्मपत्र कहाँ जमा रहते हैं ? और कौन लिखता है ? यदि पैगम्बरों और गवाहों के भरोसे खुदा न्याय करता है तो वह असर्वज्ञ और और असमर्थ है। यदि वह अन्याय नहीं करता, न्या ही करता है तो कर्मों के अनुसार करता होगा। वे कर्म पूर्वापर वर्तमान जन्मों के हो सकताहैं। तो फिर क्षमा करना, दिलों पर ताला लगाना और शिक्षा न करना, शैतान से बहकवाना, दौरा सुपुर्द रखना, केवल अन्याय है।” (पृ. ५९७-५९८)
३. पैगम्बर मुहम्मद का अल्लाह का सहयोगी बनना

२०. ” अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष की सूचना दे दे। …. किन्तु अल्लाह इस काम के लिये जिसको चाहता है, चुन लेता है और वे उसके रसूल होते हैं। अतः अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ।” (४ : १७९, पृ. ६४)
समीक्षक-”जब मुसलमान लोग सिवाय खुदा के किसी के साथ ईमान नहीं लाते और न किसी को खुदा का साझी मानते हैं तो पैगम्बर साहेब को क्यों ईमान में खुदा के साथ शरीक किया ? अल्लाह ने पैगम्बर के साथ इमानलाना लिखा इसी से पैगम्बर भी शरीक हो गया, पुन’ लाशरीक कहना ठीक न हुआ। यदि इसका अर्थ यह समझा जाए कि मुहम्मद साहेब के पैगम्बर होने पर विश्वास लाना चाहिए तो यह प्रश्न होता है कि मुहम्मद साहेब के पैमब्र होने की क्या आवश्यक है ? यदि खुदा उनको पैमब्र किये बिना अपना अभीष्ट कार्य नहीं कर सकता तो अवश्य असमर्थ हुआ।” (पृ. ५६४-५६५)
२१. ”ये अल्लाह की निश्चित की गई सीमाएं हैं जो कोई अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों का पालन करेगा उसेअल्लाह ऐसे बागों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वह सदैव रहेगा।” परन्तु जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करेगा उसे अल्लाह आग में डालेगा जिसमें वह सदैव रहेगा और उकसे लिए अपमानजनक यातना है।” (४ : १३ – १४, पृ. ६९)
समीक्षक-”खुदा ही ने मुहम्मद साहेब पैगम्बर को अपना शरीक कर लिया है और खुद कुरान ही में लिखा है। और देखो ! खुदा पैगम्बर के साथ कैसा फंसा है कि जिसने बहिश्त में रसूल का साझा कर दिया हैं किसी एक बात में भी मुसलमानों का खुदा स्वतन्त्र नहीं तो लाश्रीक कहना व्यर्थ है। ऐसी-ऐसी बातें ईश्वरोक्त पुस्तक में नहीं हो सकती।” (पृ. ५६५)
२२. ”अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल की आज्ञा का पालन करो……….।” (५ : ९२, पृ. १०२)
”देखिये ! यह बात खुदा के शरीक होने की है, फिर खुदा को ”लाशरीक” मानना व्यर्थ है।” (पृ. ५६९)
४. इस्लाम

२३. ”और हमने मूसा को किताब दी थी और उसके पश्चात्‌ आगे-पीछे निरन्तर रसूल भेजते रहे और मरियम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियां प्रदान की और पवित्र-आत्मा के द्वारा उसे शक्ति प्रदान की तो यही तो हुआ किजब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम्हारे जी को पसन्द न थ, तो मि अकड़ बैठे, तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को कत्ल करते रहे ? (२ : ८७, पृ. १७)
समीक्षक-”जब कुरान में साक्षी है कि मूसा को किताब दी तो उसका मानना मुसलमानों को आवश्यक हुआ और जो-जो उस पुस्तक में दोष हैं वे भी मुसलमानों के मत में आ गिरे ओर ‘मौजिज़े’ अर्थात्‌ दैवी शक्ति की बातें सब अन्यथा हैं, भोले-भाले मनुष्यों को बहकाने के लिए झूठमूठ चला ली हैं क्योंकि सुष्टिक्रम और विद्या से विरुद्ध सब बातें झूठी ही होती हैं। जो उस समय ‘मौजिज़े’ थे तो इस समय क्यों नहीं ? जो इस समय भी नहीं, तो उस समय भी न थे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं।” (पृ. ५५३)
२४. ”दीन (धर्म) तो अल्लाह की दृष्टि से इस्लाम ही है।” (३ : १९, पृ. ४६)
समीक्षक-“क्या अल्लाह मुसलमानों ही का है औरों का नहीं ? क्या तेरह सौ वर्षों के पूर्व ईश्वरीय मत था ही नहीं ? इसी से यह कुरान ईश्वर का बनाया तो नहीं, किन्तु किसी पक्षपाती का बनाया है।” (पृ. ५६२)
२५. ”प्रत्येक व्यक्ति को जो उसने कमाया होगा, पूरा-पूरा मिल जाएगा और उनके साथ कोई अन्याय नहोगा।” (३ : २५) कहो : ”ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी  ! जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले और जिसे चाहे इज्जत (पभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाइ है निसंदेह तुझे हर चीज़ की समर्थ्य प्राप्त है।” (३ : २६) ”तू रात को दिन में पिरोता है और दिन को रात में पिरोता है। तु निर्जीव से सजीव को निकालता है और सजीव से निर्जीव को निकालता है जिसे चाहता है बेहिसाब देता है।” (३ : २७) ”ईमानवालों (मुसलमानों) को चाहिए कि वे गैर-ईमानवालों (गैर-मुसलमानों) से हटकर इंकार करने वालों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाएँ और कोई ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं।” (३ : २८) ”कह दो : यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह भी तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा।” ( ३ : ३१, पृ. ४७-४८)
समीक्षक-”जब प्रत्येक जीव को कर्मों का पूरा-पूरा फल दिया जावेगा तो क्षमा नहीं किया जाएगा और जो क्षमा किया जाएगा। तो पूरा फल नहीं दिया जाएगा और अन्याय होगा। जब बिना उत्तम कर्मों के राज्य देगा तो भी अन्याय हो जाएगा और बिना पाप के राज्य औरप्रतिष्ठा छीन लेगा तो भी अन्यायकारी हो जाएगा, भला जीवित से मृतक और मृतक से जीवित कभी हो सकता है ? क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था अछे?-अभे? है, कभी अदल बदल हनीं हो सकती। अब देखिये पक्षपात की बातें कि जो मुसलमान के मजहब में नहीं हैं उनको काफ़िर ठहराना, उनमें श्रेष्ठों से भी मित्रता न रखने और मुसलमाना में दुष्टों से भी मित्रता रखने के लिए उपदेश करना ईश्वर को ईश्वरता से बिह : कर देता है। इससे यह कुरान, कुरान का खुदा ओर मुसलमान लोग केवल पक्षपात अविद्या के भरे हुए हैं इसीलिए मुसलमान लोग अन्धेरे में हैं और देखिए मुहम्मद साहेब की लीला कि जो तुम मेरा पक्ष करोगे तो खुदा तुम्हारा पक्ष करेगा और जो तुम पक्षपातरूप पाप करोगे उसको क्षमा भी करेगा। इससे सिद्ध होता हैं कि मुहम्मद साहेब ने कुरान बनाया या बनवाया, ऐसा विदित होता है।” (पृ. ३६३)
२६. ”तो यदि वे तुमसे अलग-अलग न रहें और तुम्हारी ओर सुलह का हाथ न बढ़ाएं और अपने हाथ न रोकें तो तुम उन्हें पकड़ों और कत्ल करो, जहाँ कहीं भी तुम उन्हें पाओ। उनके विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकर दे रखा है।” (४ : ९१) ”किसी ईमानवाले का यह काम नहीं कि वह किसीईमानवाले (मुसलमान) की हत्या करे। भूल-चूक की बात और है और कोई व्यक्ति यदि गलती से किसी ईमानवाले की हत्या कर दे तो एक मोमिन गुलाम को आजाद करना होगा।” (४ : ९२) ”और जो व्यक्ति जान-बूझकर किसी मोमिन की हत्या करे, तो उसका बदला जहन्नम है जिसमें वह सदा रहेगा, उस पर अल्लाह का प्रकोप और उसकी फिटकार है और उसके लिए अल्लाह ने बड़ी यातना तैयार कर रखी है।” (४ : ९३, पृ. ७९)
समीक्षक-”अब देखिए महापक्षपात की बात ! कि जो मुसलमान न हो उसको जहाँ पाओ मार डालों और मुसलमानों को न मारना । भूल से मुसलमान को मारने में प्रायश्चित और अन्य को मारने से बहिश्त मिलेगा। ऐसे उपदेश को कूप में डलना चाहिए। ऐसे-ऐसे पुस्तक, ऐसे-ऐसे पैग़म्बर, ऐसे-ऐसे खुदा और ऐसे-ऐसे मत से सिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं ऐसों का न होना अच्छा और ऐसे प्रामादिक मतों से बुद्धिमानों को अलग रहकर वेदोक्त सब बातों को मानना चाहिए, क्योंकि उसमें असत्य किचिंमात्र भी नहीं हे, और मुसलमान को मारे उसको दोज़ख मिले और दूसरे मतवाले कहते हैं कि मुसलमान को मारे तो स्वर्ग मिले। अब कहो इन दोनों मतों में से किसको मानें, किसकोछोड़े ? किन्तु ऐसे मूढ़ प्रकल्पित मतों को छोड़कर वेदोक्त मत स्वीकार करने योग्य सब मनुष्यों के लिए है कि जिसमें आर्य मार्ग अर्थात्‌ श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग मं चलना और दस्यु अर्थात्‌ दुष्टों के मार्ग से अलग रहना लिखा है, सर्वोत्तम है।” (पृ. ५६६-५६७)
२७. ”उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाकी न रहे और दीन (धर्म) पूरा-का-पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए।” (८ : ३९) ”और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ गनीमत (लूट) के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पांचवा भाग अल्लाह का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफिरों का है।” ०१८८ः४१, पृ. १५२-१५३)
समीक्षक-”ऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शान्ति-भंगकर्त्ता दूसरा कौन होगा ? अब देखिये यह मज़हब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत्‌ को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है ? और लूट के माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्‌टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैगम्बर संसार में ऐसी उपाधि और शान्ति भंग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिए कहां से आया ? जो ऐसे-ऐसे मत जगत्‌ में प्रचलित न होते तो सब जगत्‌ आनन्द में बना रहता।” (पृ. ५७३)
५. इस्लाम में गैर-मुसलमानों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार

२८. ”जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते हैं उनके लिए यह मत कहो कि ये मृतक हैं किन्तु वे जीवित हैं। परन्तु तुम्हें एहसास नहीं होता।” (२ : १५४, पृ. २५)
समीक्षक-”भला ईश्वर के मार्ग में मरने मारने की क्या आवश्यक है ? यह क्यों नहीं कहते हो कि यह बात अपने मतलब सिद्ध करने से न डरेंगे, लूटमार कराने से ऐश्वसर्य प्राप्त होगा, पश्चात्‌ विषयानन्द करेंगे इत्यादि। स्वप्रयोजन के लिए यह विपरीत व्यवहार किया है।” (पृ. ५५६-५५७)
२९. ”और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ों जो तुमसे लड़ें किन्तु ज्यादती न करो।” (२ : १९०) ”तुम उनसे लड़ों यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए।” (२ : १९३) …. ”अतः जो तुम पर ज्यादती करे तो जैसी ज्यादती वह तुम पर करे, तुम भी उसी प्रकार उससे ज्यादती का बदला लो।” (२ : १९४, पृ. २९-३०)
समीक्षक-”जो कुरान में ऐसी बातें न होतीं तो मुसलमान लोग इतना बड़ा अपराध जो कि अन्यमतवालों पर किया है, न करते, और बिना अपराधियों को मारना उन पर बड़ा पाप है। जो मुसलमान के मत का ग्रहण न करना है उसको कुफ़ कहते हैं अर्थात्‌ कुफ्ऱ से क़तल को मुसलमान लोग अच्छा मानते हैं। अर्थात्‌ जो हमारे दीन को न मानेगा उसको हम क़तल करेंगे, सो करते ही आये, मज़हब पर लड़ते-लड़ते आप ही राज्य आदि से नष्ट हो गये और उनका मत अन्य मत वालों पर अति कठोर रहता है। क्या चोरी का बदला चोरी है ? कि जितना अपराध हमारा चोर आदि करें क्या हम भी चोरी करें ? यह सर्वथा अन्याय की बात है। क्या कोई अज्ञानी हम को गालियां दे, क्या हम भी उसको गाली देवें ? यह बात न ईश्वर की और न ईश्वर के भक्त विद्वान्‌ की ओर न ईश्वररोक्त पुस्तक की हो सकती है। यह तो केवल स्वार्थी ज्ञानरहित मनुष्य की है।” (पृ. ५५८)
३०. ”अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्ति बद्ध होकर लड़ते हैं मानों वे सीसा पिलाई दीवार हैं।”
(६१ : ४, पृ. ५०७)
समीक्षक-वाह ठीक है ! ऐसी-ऐसी बातों का उपदेश करके बेचारे अरबवासियों को सबसे लड़ा के शत्रु बनाकर परस्पर दुख दिलाया और मजहब का झंडा खड़ा करके लड़ाई फैलावे, ऐसे कोई बुद्धिमान ईश्वरकभी नहीं मान कसते। जो मनुष्य जाति में विरोध बढ़ावे वही सबको दुखदाता होता है।” (पृ. ६०३)
३१. ”हे नबी ! इनकार करने वालों और कपटाचारियों से जिहाद करो और उनके साथ सखती से पेश आओ । उनका ठिकाना, जहन्नम है और वह अन्ततः पहुँचने की बुरी जगह है।” (६६ : ९, पृ. ५१८)
समीक्षक-”देखिए मुसलमानों के खुदा की लीला ! अन्य मत वालों से लड़ने के लिए पैगम्बर और मुसलमानों को उचकाता है। इसीलिए मुसलमान लोग उपद्रव करने में प्रवृत रहते हैं। परमात्मा मुसलमानों पर कृपा दृष्टि करे जिससे ये लोग उपद्रव करना छोड़ के सबसे मित्रता से बर्तें।” (पृ. ६०४)
३२. ”और जो व्यक्ति इसके पश्चात्‌ भी कि मार्गदर्शन खुलकर उसके सामने आ गया है, रसूल का विरोध करेगा और ईमानवालों के मार्ग के अतिरिक्त किसी और मार्ग पर चलेगा तो उसे हम उसी पर चलने देंगे जिसको उसने अपनाया होगा और उसे जहन्नम मं झोक देंगे और वह बहुत बुरा ठिकाना है।” (४ : ११५, पृ. ८२)
समीक्षक-”अब देखिए खुदा और रसूल की पक्षपात की बातें ! मुहम्मद साहेब आदि समझते थे कि जो खुदा के नाम से ऐसी हम न लिखेंगे तो अपना मज़हब न बढ़ेगा और पदार्थ न मिलेंगे,आनन्दभोग न होगा, इसी से विदित होता है कि वे अपने मतलब करने में पूरे थे और अन्य के प्रयोजन बिगाड़ने में। इससे ये अनाप्त थे। इनकी बात का प्रमाण आप्त विद्वानों के सामने कभी नहीं हो सकता”। (पृ. ५६७)
३३. ऐ ईमानवालों ! उन इंकार करने वालों से लड़ों जो तुम्होर निकट हैं और चाहिए कि वे तुम में सखती पाएं और जान रखो कि अल्लाह डर रखने वालों के साथ है” (९ : १२३), ”क्या वे देखते नहीं कि प्रत्येक वर्ष के एक या दो बार आज़माइश में डाले जाते हैं ? फिर भी न तो वे तौबा करते हैं, और न चेतते हैं।” (९ : १२६, पृ. १७१)
समीक्षक-”देखिए ! ये भी एक विश्वासघात की बातें, खुदा मुसलमानों को सिखलाता है कि चाहे पड़ोसी हों या किसी के नौकर हों जब अवसर पावें तभी लड़ाई वा घात करें। ऐसी बातें मुसलमानों में बहुत बन गई हैं इसी कुरान के लेख से। अब तो मुसलमान समझ के इन कुरानोक्त बुराइयों को छोड़ दें, तो बहुत अच्छा है।”  (प्.ृ ५७६)
६. भोग विलास के लिए जन्नत के प्रलोभन

३४. ”कहो : क्या मैं तुम्हें इनसे उत्तम चीज़ का पता दूँ ? जो लोग अल्लाह का डर रखेंगे उनके लिए उनके रब के पास बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। वहाँ पाक-साफ़ (जोड़े, बीबियां) होंगे ओर अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त होगी।” (३ : १५, पृ. ४६)
समीक्षक-भला यह स्वर्ग है किंवा वेश्यावन ? इसको ईश्वर कहना वा स्त्रैण ? कोई भी बुद्धिमान ऐसी बातें जिसमें हों उसको परमेश्वर का किया पुस्तक मान सकता है ? यह पक्षपात क्यों करता है ? जो बीबियां बहिश्त में सदा रहती हैं वे यहाँ जन्म पाके वहाँ गई हैं वा वहीं उत्पन्न हुई हैं ? यदि यहाँ जन्म पाकर वहाँ गई हैं और जो क़यामत की रात से पहले ही वहाँ बीबियों को बुला लिया तो उनके खाविन्दों को क्यों न बुला लिया ? यदि वहीं जन्मी हैं तो क़यामत तक वे क्यों कर निर्वाह करती हैं ? जो उनके लिए पुरुष भी हैं तो यहाँ बहिश्त में जाने वाले मुसलमानों को खुदा बीबियां कहाँ से देगा ? और जैसे बीबियां बहिश्त में सदा रहने वाली बनाईं वैसे पुरुषों को वहाँ सदा रहने वाले क्योंकि नहीं बनाया ? इसलिए मुसलमानों का खुदा अन्यायकारी, बेसमझ है।” ( पृ. ५६२)
३५. ”उनके बीच विशुद्ध पेय का पात्र फिराया जाएगा, बिल्कुल साफ़ उज्ज्वल, पीने वालों के लिए सर्वथा सुस्वादु । न उसमें कोई खुमार होगा और न वे उससे निढ़ालऔर ममदहोश होंगे। और उनके पास निगाहें बचाए रखने वाली, सुन्दनर आँखों वाली स्त्रियां होगी मानों वे सुरक्षित अंडे हैं”, (३७ : ४५-४९) ”है ना अब ऐसा कि हम मरने के नहीं। हमें जो मृत्यु आनी थी वह बस पहले आ चुकी। और न हमें कोई यातना ही दी जाएगी।” (३७ : ५८, पृ. ३९४-३९५) ”और निश्चय ही लूत भी रसूलों में से था। याद करो, जब हमने उसे और उसके सभी लोगों को बचा लिया सिवाय एक बुढिऋया के जो पीछे रह जाने वालों में से थी। फिर दूसरों को हमने तहस-नहस करके रख दिया।” (३७ : १३३-१३६, पृ. ३९८-३९९)
समीक्षक-”क्योंजी, यहाँ तो मुसलमान लोग शराब को बुरा बतलाते हैं परन्तु इनके स्वर्ग में तो नदियाँ की नदियाँ बहती हैं। इतना अच्छा है कि यहाँ तो किसी प्रकार मद्य पीना छुड़ाया परन्तु यहाँ के बदले वहाँ उनके स्वर्ग में बड़ी खराबी है ! मारे स्त्रियों के वहाँ किसी का चित्त स्थिर नहीं रहता होगा ! और बड़े-बड़े रोग भी होंगे ! यदि शरीर वाले होते होंगे तो अवश्य मरेंगे और जो शरीर वाले न होंगे तो भोग विलास ही न कर सकेंगे फिर उनका स्वर्ग में जाना व्यर्थ है। यदि लूत को पैगम्बर मानते हो तो जो बाइबिल में लिखा हैकि उससे उसकी लड़कियों ने समागम करके दो लड़े पैदा किए इस बात को भी मानते हो वा नहीं ? जो मानते हो तो ऐसे को पैगम्बर मानना व्यर्थ है और जो ऐसे और ऐसे के संगियों को खुदा मुक्ति देता है तो वह खुदा भी वैसा ही है, क्योंकि बुढ़िया की कहानी कहने वाला और पक्षपात से दूसरों को मारने वाला खुदा कभी नहीं हो सकता। ऐसा खुदा मुसलमानों के ही घर में रह सकता है, अन्यत्र नहीं ।” (पृ. ५९५-५९६)
३६. ”सदैव रहने के बाग़ हैं जिनके द्वार उनके लिए खुले होंगे। उनमें वे तकिया लगाए होंगे। वहाँ वे बहुत-से मेवे और पेय मंगवाते होंगे और उनके पास निगाहें बचाए रखने वाली स्त्रियां होगी, जो समान अवस्था की होगी।” (३८ : ५०-५२) ”तो सभी फरिश्तों ने सजदा किया, सिवाय इबलीस के। उसने घमण्ड किया ओर इंकार करने वालों में से हो गया। कहा : ”ए इबलीस ! तुझे किस चीज़ ने उसके सजदा करने से रोका जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया ? क्या तूने घमण्ड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है ? ” उसने कहा : ”मैं उससे उत्तम हूँ। तू ने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्‌टी से पैदा किया। कहा : ”अच्छा, निकल जा यहां से, क्योंकि तूधुत्कारा हुआ है। और निश्चय ही बदला दिए जाने के दिन तक तुझ पर मेरी लानत है।” उसने कहा : ”ऐ मेरे रब ! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए मुहलत दे, जबकि लोग (जीवित करके) उठाए जाएंगें।” कहा : ”अच्छा, तुझे ज्ञात एवं निश्चित समय तक मुहलत है।” (३८ : ७३-८२, पृ. ४०४-४०६)
समीक्षक-”यदि वहाँ, जैसे कि कुरान में बाग, बगीचे, नेहरें, मकानादि लिखे हैं, वैसे हैं तो वे न सदा से थे, न सदा रह सकते हैं, क्योंकि जो संयोग से पदार्थ होता है वह संयोग के पूर्व न था, अवश्यभावी वियोग के अन्त में न रहेगा। जब यह  हिश्त ही न रहेगा तो उसमें रहने वाले सदा क्योंकर रह सकते हैं ? क्योंकि लिख है कि गद्‌दी, तकिये, मेवे और पीने के पदार्थ वहाँ मिलेंगे, इससे यह सिद्ध होता है कि जिस समय मुसलमानों का मज़हब चला उस समय अरब देश विशेष धनाढ्‌य न था, इसलिए मुहम्मद साहिब ने तकिए आदि की कथा सुनाकर गरीबों को अपने मत में फंसा लिया और जहाँ स्त्रियाँ हैं, वहाँ निरन्तर सुख कहाँ ? ये स्त्रियाँ वहाँ-कहा से आई हैं ? अथवा बहिश्त की रहने वाली हैं ? यदि आईं हैं तो जायेंगी और जो वहीं की रहने वाली हैं तो क़यामत के पूर्व क्या करती थी ? क्या निकम्मी अपनीउम्र को बहा रही थीं?
अब देखिए खुदा का तेज कि जिसका हुक्म अन्य सब फरिश्तों ने माना और आदम साहेब को नमस्कार किया, और शैतान ने न माना। खुदा ने शैतान से पूछा, कहा कि मैंने उसको अपने दोनों हाथों से बनाया, तू अभिमान मत कर। इससे सिद्ध होता है कि कुरान का खुदा दो हाथों वाला मनुष्य था, इसलिए वह व्यापक वा सर्वशक्तिमान्‌ कभी नहीं हो सकता। और शैतान ने सत्य कहा कि मैं आदम से उत्तम हूँ। इस पर खुदा ने गुस्सा क्यों किया ? क्या आसमान ही में खुदा का घर है, पृथ्वी में नहीं ? तो काबे को खुदा का घर प्रथम क्यों लिखा है ? भला परमेश्वर अपने में वा सृष्टि में से लग कैसे निकाल सकता है ? और वह सृष्टि सब परमेश्वर की है। इससे स्पष्ट विदित हुआ कि कुरान का खुदा बहिश्त का जिम्मेदार था। खुदा ने उसको लानत धिक्कार दिया और कैद कर दिया। और शैतान ने कहा कि हे मालिक ! मुझको क़यामत तक छोड़ दे। खुदा ने खुशामद से क़यामत के दिन तक छोड़ दिया। जब शैतान छूटा तो खुदा ने कहा कि जितनों को तू बहकावेगा मैं उनको दोज़ख में डाल दूँगा और तुझको भी।
अब सज्जन लोगों ! विचारिये कि शैतान को बहकाने वाला खुदा है वाआपसे वह बहका ? यदि खुदा न ेबहकाया तो वह शैतान का शैतान ठहरा। यदि शैतान स्वयं बहका तो अन्य जीव भी स्वयं बहकेगे, शैतान की जरूरत नहीं। और जिससे इस शैतान बागी को खुदा ने खुला छोड़ दिया, इससे विदित हुआ कि वह भी शैतान का शरीक, अधर्म कराने में हुआ। यदि स्वयं चोरी कराके दण्ड देवे तो उसके अन्याय का कुछ भी पारावार नहीं।” (पृ. ५९६-५९७)
”जड़ित तखतों पर तकिया लगाए आमने-सामने होंगे। उनके पास किशोर होंगे जो सदैव किशोरावस्था ही में रहेंगे, प्याले और आफ़ताबे (जग) और विशुद्ध पेय से भरा हुआ पात्र लिए फिर रहे होंगे-जिस (के पीने) से न तो उन्हं सिर दर्द होगा ओर न उनकी बुद्धि में विकार आएगा। और (स्वादिष्ट) फल जो वे पसन्द करें और पक्षी का मांस जो वे चाहें और बड़ी आँखों वाली हूरें, मानों छिपाए हुए मोती हों।” (५६ : १५-२३, पृ. ४८९)
समीक्षक-”यदि वहाँ लड़के सदा रहते हैं तो उनके माँ बाप भी रहते होंगे और सास-श्वसुर भी रहते होंगे, तब तो बड़ा भारी शहर बसता होगा। फिर मलमूत्रादि के बढ़ने से रोग भी बहुत से होते होंगे। क्योंकि जब मेवे खावेंगे, गिलासों में पानी पीवेंगे ओर प्यालों सेमद्य पीवेंगे, न उनका शिर दूखेगा और न कोई विरुद्ध बोलेगा। यथेष्ट मेवा खावेंगे और जानवरों तथा पक्षियों के मांस भी खावेंगे तो अनेक प्रकार के दुःख, पक्षी, जानवर वहाँ होंगे, हत्या होगी और हाड़ जहाँ तहाँ बिारे रहेंगे और कसाईयों की दुकानें भी होंगी। वाह! क्या कहना इनके बहिश्त की प्रशंसा कि वह अरब देश से भी बढ़कर दीखती है !!! और जो मद्य मांस खा पी के उन्मत्त होते हैं इसलिए अच्छी-अच्छी स्त्रियां और लौंडे भी वहाँ अवश्य रहने चाहिए, नहीं तो ऐसे नशेबाजों के शिर में गर्मी चढ़ के प्रमत्त हो जावें। अवश्य बहुत स्त्री पुरुषों के बैठने सोने के लिए बिछौने बड़े-बड़े चाहिए। जब खुदा कुमासरियों को बहिश्त में उत्पन्न करता है तभी तो कुमारे लड़कों को भी उत्पन्न करतमा है। भला कुमारियों का तो विवाह जो यहाँ से उम्मेदवार होकर गये हैं उनके साथ खुदा ने लिखा। पर उन सदा रहने वाले लड़कों का भी किन्हीं कुमारियों के साथ विवाह न लिखा। तो क्या वे भी उन्हीं उम्मेदवारों के साथ कुमारीवत दे दिये जायेंगे ? इसकी व्यवस्था कुछ भी नहीं लिखी, यह खुदा से बड़ी भूल क्यों हुई ? यदि बराबर अवस्था वाली सुहागिन स्त्रियां पतियोंको पाके बहिश्त में रहती हैं, तो ठीक नहीं हुआ ; क्योंकि स्त्रियों से पुरुष का आयु दूना ढाईगुना चाहिए। यह तो मुसलमानों के बहिश्त की कथा है।”  (पृ. ६०२)
७. मुख्य निष्कर्ष

”अब इस कुरान के विषय को लिख के बुद्धिमानों के सम्मुख स्थापित करता हूँ कि पुस्तक कैसा है ? मुझसे पूछो तो यह किताब न ईश्वर, न विद्वान्‌ की बनाई और न विद्या की हो सती है। यह तो बहुत थोड़ा-सा दोष प्रकट किया, इसलिए कि लोग धोखे में पड़कर अपना जन्म व्यर्थ न गमावें। जो कुछ इसमें थोड़ा-सा सत्य है वह वेदादि विद्या पुस्तकों के अनुकूल होने से जैसे मुझको ग्राह्‌य है वैसे अन्य भी मज़हब के हठ और पक्षपातरहित विद्वानों और बुद्धिमानों को ग्राह्‌य है। इसके बिना जो कुछ इसमें है वह सब अविद्या, भ्रमजाल और मनुष्य के आत्मा को पशुवत्‌ बनाकर शान्तिभंग कराके उपद्रव मचा, मनुष्यों में विद्रोह फैला, परस्पर दुःखोन्नति करने वाला विषय है। और पुनरुक्त दोष का तो कुरान जानों भण्डार ही है।
परमात्मा सब मनुष्यों पर कृपा करे कि सबसे सब प्रीति, परस्पर मेल और एक-दूसरे के सुख की उन्नति करने में प्रवृत्त हों। जैसे मैं अपना वा दूसरे मतमान्तरों का दोष पक्षपात रहित होकरप्रकाशित करता हूँ इसी प्रकार यदि सब विद्वान्‌ लोग करें तो क्या कठिनता है कि परस्पर का विरोध छूट मेल होकर आनन्द में एकमत हो के सत्य की प्राप्ति सिद्ध हो। यह थोड़ा-सा कुरान के विषय में लिखा, इसको बुद्धिमान्‌ धार्मिक लोग ग्रन्थकार के अभिप्राय को समझ लाभ लेवें। यदि कहीं भ्रम से अन्यथा लखा गया हो तो उसको शुद्ध कर लेवें।” (पृ. ६१०)
०५. श्रीमती ऐनी बेसेन्ट (१.१०.१८४७-२.९.१९३३)

भगवत्‌ गीता की भाष्यकार एवं भूतपूर्व कांग्रेस अध्यक्ष (कलकत्ता सैसन १९१७) श्रीमती ऐनी बेसेंट कहती हैं :

स्वतंत्र भारत में भी मुस्लिम कट्‌टरवाद की आशंका-”भारत के मुसलमानों के सम्बन्ध में एक दूसरा गम्भीर प्रश्न और उठता है। यदि मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच वैसे ही सम्बन्ध रहते हैं, जैसे लखनऊ में हुआ करते थे, तो यह प्रश्न इतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। यद्यपि  यह प्रश्न स्वतंत्र भारत में देर-सवेर अवश्य ही उठता। परन्तु खिलाफत आन्दोलन के बाद से परिस्थितियां बदल गई हैं और खिलाफत जिहाद को बढ़ावा देने से भारत को पहुंची गई क्षतियों में एक यह भी है कि मुसलमानों के दिल में ‘नास्तिकों’ के विरुद्ध नंगी और बेशर्मी की हद तक नफ़रत पैदा हुई जो कभी पहले होती थी।
हम देखते हें कि राजनीति में तलवार का वही पुराना मुस्लिम धर्म लोगों की भावनाओं को उकसा रहा है, हम देख रहे हैं शताब्दियों पुरानी वही मुस्लिम धर्म की श्रेष्ठता का दंभ। हमने देखा कि शताब्दियों को विस्मृति के बावजूद अलगाव की वह प्राचीन भावना पुनर्जीवित हो गई है, जिसमें जजीरूत अरब अर्थात्‌ अरब द्वीप के सम्बन्ध में वह दावा है कि यह मुसलमानों का पवित्र भू-खंड है और इसे गैर-मुस्लिम के अपवित्र पांव गंदा न करें।
हमने मुसलमान नेताओं को यह कहते सुना है कि यदि अफ़गान भारत पर आक्रमण करें तो वे अपने धर्म को मानने वाले अफ़गानों की सहायता करेंगे ओर उन हिन्दुओं की हत्या करेंगे जो दुश्मनों से अपनी मातृभूमि की रक्षा करेंगे। हमें यह सोचने पर विवश कर दिया गया है कि मुसलमानों की पहली वफादारी मुस्लिम देशों के प्रति है, हमारी मातृभूमि के प्रति नहीं। हमें यह भी मालूम हुआ है कि उनकी उत्कट इच्छा है ‘अल्लाह का साम्राज्य’ स्थापित करना, न कि संसार के परमात्मा का, जिसे अपने सभी प्राणियों से समान प्रेम है। अल्लाह के आदेश को वे अपने किसी पैगम्बर के आदेश में देखते हैं, और उसी के अनुसार यह तय करते हैंकि खुदा पर अविश्वास करने वालों के साथ कैसा सुलूक किया जाए। प्राचीन हिब्रूज के मोजेज़जेहोवा की तरह आज वे पैगम्बर द्वारा प्रतिपादित धर्म का पालन करने की स्वतन्त्रता के लिए पुराने मुसलमानों की भांति लड़ रहे हैं।
यद्यपि आज की दुनिया उन धर्म व्यवस्थाओं से कहीं आगे जा चुकी है, जिनमें एक इंसान द्वारा ईश्वर के आदेश दिए जाते थे। मुस्लिम नेताओं का यह दावा कि मुसलमानों को अपने विशेष पैगम्बर के कानून का पालन करना चाहिए और अपने राज्य के कानूनों, जिसमें वे रहते हैं, को दरकिनार कर देना चाहिए, राष्ट्र और नागरिक व्यवस्था के लिए घातक हैं। यह उन्हें बुरा नागरिक साबित करता है, क्योंकि उनकी निष्ठा का केन्द्र राष्ट्र से बाहर है और जब तक वे मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली जैसे मुस्लिम समुदाय के मान्य नेताओं के विचारों से मतैक्य रखेंगे, उन पर उनके सह-नागरिक विश्वास नहीं करेंगे। यदि भारत स्वतंत्र हुआ तो मुस्लिम जनसंखया वाला वह क्षेत्र जिसमें रह रहे अज्ञानी लोग उन लोगों का अनुसरण करेंगे, जो पैगम्बर के नाम पर आह्‌वान करते हैं, तो भारत की स्वतन्त्रता के लिए तत्काल खतरा पैदा हो जाएगा। वे लोग अफ़गानिस्तान, बलूचिस्तान, फ़ारस, इराक,अरब, तुर्की और मिस्र एवं मध्य एशिया के उन कबीलों से मैत्री करके जो मुस्लिम हैं, भारत को मुस्लिम शासन के अधीन करने के लिए एकजुट हो जाएंगे और मुस्लिम शासन की स्थापना कर देंगे।
हमने सोचा था कि भारतीय मुसलमान अपनी मातृभूमि के प्रति वफादार होंगे, और वास्तव में हम अब भी सोचते हैं कि उनमें से शिक्षित वर्ग यह कोशिश करें कि मुसलमानों में ऐसी भावना फैले। परन्तु ऐसे मुसलमान बहुत कम हैं और अक्षम भी हैं, इसलिए उन्हें धर्म-विरोधी की संज्ञा देकर उनकी हत्या कर दी जाएगी। मालाबार से हमें सीख मिल चुकी है कि इस्लामी शासन के अर्थ क्या हैं, और अब हम भारत में खिलाफत राज्य का दूसरा नमूना नहीं देखना चाहते हैं मालाबार से बाहर रहने वाला मुसलमानों ने मोपलों के प्रति किनी सहानुभूति बरती है, यह प्रमाणित हो चुका है। उनके बचाने के प्रयत्न में उनके सहधर्मियों ने और स्वयं श्री गांधी ने कहा कि उन मुसलमानों ने वही किय, जिसकी उनके धर्म ने उनको शिक्षा दी। मुझे इसकी सच्चाई में शंकर है, परन्तु सभ्य समाज में ऐसे लोगों के लिए कोई स्थान नहीं है जो यह मानते हैं कि उनका धर्म उन्हें हत्या करने, डाका डलने, आगजनी करने और उन लोगों को देश से निकालने की शिक्षा देता है, जो अपने धर्म को त्यागने से इंकार करते हैं।
ठगों का विश्वास था कि उनका देवता उन्हें लोगों का, विशेषकर पैसेवाले यात्रियों का, गला घोंटने की इज़ाजत देता है। ऐसे दैवी कानूनों को सभ्य समाज के कानूनों को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती और जो लोग बीसवीं सदी में रह रहे हैं, वे या तो मध्ययुगीन विचार के लोगों को शिक्षित करें या उन्हें निर्वासित कर दें। ऐसे लोगों का स्थान उन्हीं देखों में है जो उनके विचारों से सहमत हैं, और जहाँ अब भी ऐसे तक्र वे उन्हें दे सकते हैं जो उनसे सहमत नहीं होते, जैसे बहुत पहले फ़ारस और पारसी लोग, और हमारे समय में ‘बहाई’। वास्तव में विभिन्न-मुस्लिम मतावलंबी कट्‌टरपंथी मुस्लिम शासन में सुरक्षित नहीं हैं। भारत में ब्रिटिश शासन ने सभी मतावलम्बियों की स्वतंत्रता की सुरक्षा की हैं शिया, सुन्नी, सूफी, बहाई सब मुस्लिम जातियां भारत में सुरक्षापूव्रक रहती हैं, यद्यपि ब्रिटिश शासन उन्हें सामाजिक बहिष्कार से वहां नहीं रोक सकता, जहाँ वे अल्पसंखयक हैं मुस्लिम शासित देशों की तुलना में मुसलमान ब्रिटिश शासन में ज्यादा स्वतंत्र हैं स्वाधीन भारत के बारे में सोचते समय हमें मुस्लिम शासन के आतंक के बारे में भी विचार करना होगा।
(बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय खंड १५, पृ. २७२-२७५)
०६. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (७.५.१८६१-७.८.१९४१)

१. इस्लाम और ईसाइत अन्य सीभी धर्मों को समाप्त करने को कटिबद्ध-”विश्वभर में दो ऐसे रिलीजन हैं जो कि अन्य सभी रिलीजनों के विरुद्ध विशेष शत्रुता रखते हैं। ये दो हैं-ईसाइयत और इस्लाम। वे केवल अपने मतानुसार अपना जीवन व्यतीत करने में ही सन्तुष्ट नहीं होते हैं बल्कि अन्य सभी रिलीजनों को नष्ट करने को कटिबद्ध रहते हैं इसीलिए उनके साथ शान्ति से रहने का एकमात्र सही उपाय यही है कि उनके रिलीजन में धर्मान्तरित हो जाओ।”

(७ असाढ़ १३२९ बंगाब्द को कालीदास नाग के लिखे पत्र से, रवीन्द्रनाथ वांड्‌मय, २४वां खंड, पृ. २७५, विश्वभारती, १९८२)
२. मुसलमान अपनी राष्ट्रभक्ति किसी एक देश तक सीमित नहीं रख सकते-” खिलाफत आन्दोलन के बाद हिन्दू-मुस्लिम दंगों पर प्रतिक्रिया-”एक महत्वपूर्ण कारण जिसके फलस्वरूप हिन्दू-मुस्लिम एकता लगभग असम्भव है और जो कि पूर्णतया सच है कि मुसलमान कभी भी अपनी राष्ट्र भक्ति किसी एक देश तक ही सीमित नहीं रख सकते हैं। मैंने मुसलमानों से स्पष्ट पूछा है कि यदि कोई बाहरी मुहम्मदीय शक्ति भारत पर हमला करती है तो ऐसी स्थिति में क्या वह (मुसलमान) अपने सम्मिलित भारत देश की रक्षा के लिए अपने हिन्दू पड़ोसियों का कन्धे-से-कंधा मिलाकर उनका साथ देंगें मैं उनसे पाए गए उत्तर से संतुष्ट नहीं था…. यहाँ तक कि मि. मौहम्मद अली (अली भाइयों में से एक, अनु.) जैसे व्यक्ति ने घोषणा की कि किसी भी परिस्थिति में, किसी भी मुसलमान को, चाहे वह किसी भी देश का हो, यह आज्ञा नहीं है कि वह किसी मुसलमान के विरुद्ध संघर्ष करे।”
(१८.४.१९२४ को, टाईम्स ऑफ इंडिया में रवीन्द्रनाथ टैगोर के छपे साक्षात्कार से)
३. हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल दिखावटी मित्रता-”जब कभी भी कोई मुस्लिम समुदाय किसी मुसलमान को आह्‌वान करता है तो कोई रुकावट नहीं होती है क्योंकि वह एक ईश्वर के नाम पर पुकारा जाता है, जैसे ‘अल्लाह-हो-अकबर’ यानी ”अल्लाह महान है।” इसके विपरीत जब हम हिन्दू के नाम पर पुकारते हैं कि ओ हिन्दुओं ! आओ ! तो कौन इस आह्‌वान का पालन करेगा ? क्योंकि हम हिन्दू अनेक छोटे-छोटे समुदायों में बंटे हुए हैं। हमारे सामने प्रान्तवाद आदि की बाधाएं हैं। भला कौन इन बाधाओं और संकीर्णताओं को लांघकर आएगा।”
”हमने अनेक संकटरों को झेला है लेकिन फिर भी हम कभी संगठित न हो सके। जब बाहर से मुहम्मद गौरी ने पहला हमला किया तो बिल्कुल सामने आए संकट की घड़ी में भी हिन्दू संगठित न हो सके, जब मुसलमान एक के बाद एक हमारे मंदिरों को विध्वंस करने लगे और हमारे देवी देवताओं की मूर्तियों को तोड़ने लगे तो हिन्दू छोटी-छोटी टुकड़ियों में बहादुरी से तो लड़े और मारे भी गए लेकिन फिर भी संगठित न हो सके। यह सिद्ध हो चुका है कि हम विभिन्न कला खंडों में अपने आपसी संगठन की कमी के कारण मारे गए।
दुर्बलता पाप को उकसाती है। अतः मुसलमान हमें प्रताड़ित करते हैं और हम हिन्दू बिना किसी विरोध के सहन करते हैं। तब हम समझ सकेंगे कि ऐसा सब हमारी कमजोरियों के कारण ही सम्भव हो सका। हमें अपने लिए ओर अपने पड़ोसी मुसलमानों के लिए भी अपनी कमजोरियों को उखाड़ फेंक देना होगा। हम अपने पड़ोसी मुसलमानों से निवेदन करसकते हैं कि ‘कृपया हम पर अत्याचार न करो।’ क्योंकि कोई भी मज़हब जनसंहार पर नहीं टिक सकता है।” लेकिन इस प्रकार कीविनती व्यर्थ होगी क्योंकि यह तो कमजोरों का रोना-धोना मात्र है। जब कभी हवा में कम दवाब पैदा होता है तो फौरन एक तूफान उठता है। इसे कोई भी मज़हब के नाम पर रोक नहीं सकता है। इसी प्रकारयदि कमज़ोरी को पोषित कियाजाए ओर उसे बना रहने  दिया जाए तो यातना स्वत्‌ ही प्रारम्भ हो जाती है और कोई भी इसे रोक नहीं सकता है। सम्भवतः हिन्दू और मुसलमान कुछ समय के लिए एक-दूसरे के प्रति एक बनावटी मित्रता स्थापित कर सकते हैं लेकिन ऐसी मित्रता कभी स्थायी नहीं हो सकती है।
जब तक तुम उस मिट्‌टी को नहीं धारते हो जो कि केवल कांटेदार झाड़ियों को ही उगाती व पोषित करती है तो तुम उससे कभी किसी फल की आशा नहीं कर सकता है। सम्भवतः हिन्दू और मुसलमान कुछ समय के लिए एक-दूसरे के प्रति एक बनावटी मित्रता स्थापित कर सकते हैं लेकिन ऐसी मित्रता कभी स्थायी नहीं हो सकती है।
जब तक तुम उस मिट्‌टी को नहीं सुधारते हो जो कि केवल कांटेदार झाड़ियों को ही उगाती व पोषित करती है तो तुम उससे कभी किसी फल की आशा नहीं कर सकते हो।”
(माघ १३३३ बंगाब्ध में ‘स्वामी श्रद्धानन्द’ पर लिखे एवं ‘कलान्तर’ ग्रन्थ में संकलित से)।
४. मालाबार के हिन्दू राजा की भूल का दुष्परिणाम-”डॉ. मुंजे ने अपनी रिपोट के एक अन्य भाग में कहा था कि आठ सौ वर्ष पहले मालाबार (आज का केरल) को हिन्दू राजा ने अपने ब्राह्‌मण मंत्रियों के परामर्श पर अरबों को अपने राज्य में बसने के लिए अनेक बड़ी-बड़ी रियायतें दी। यहाँ तक कि उसने अरबों को खुश करने के लिए हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मान्तरण कराया और कानून बनाया कि प्रत्येक मछुआ परविार में से एक व्यक्ति का इस्लाम में धर्मान्तरित होना अनिवाय्र है। ऐसे जिन लोगों का रिलीजन सामान्य बुद्धि की जगह अज्ञानता वू मूढ़ता का पालन करता हो वे कभी भी स्वतंत्रता का आनन्द नहीं ले सकते हैं भले ही वे सर्वोच्च शासक ही क्यों न हों। वे विवेकपूर्ण कार्य करने की घड़ियों को आमोद-प्रमोद में बिता देते हैं। यही कारण है कि वे दिन के मध्य काल में भी छाया के शिकार हो जाते हैं।”
”मालाबार के राजा ने एक बार अपना राजय जड़बुद्धिता को सौंप दिया और वही बौद्धिक जड़ता एक हिन्दू सिंहासन से आज भी मालाबार पर शासन कर रही है। यही कारण है कि वहाँ हिन्दू आज भी प्रताड़ित किये जा रहे हैं और कहते हैं कि ईश्वर आकाश की ओर मुँह किए हुए विद्यमान है। सारेभारत में हमने इसी जड़बुद्धिता को शासन करने दिया और स्वयं अपने को भी उस मूढत्रता के आगे समर्पित कर दिया। परिणामस्वरूप सामान्य बुद्धि से रहित एवं जड़वाद से ग्रसित इस भारत राजय पर कभी पठानों ने, तो कभी मुगलों और कभी ब्रिटिशों ने लगातार हमले किए। हम उनके द्वारा (मुसलमानों) दी गई यातनाओं को बाहर से देख सकते हैं मगर वे तो केवल उन यातनाओं े साधन हैं, वे वास्तव में यातनाआं े कारण नहीं है। इन सभी यातनाओं का मुखय कारण हमारी जड़बुद्धिता और सामान्य विवेक का अभाव है जो कि हम पर की गई सब यातनाओं का मूल कारा हैं अतः हमें इस जड़बुद्धिता के विरुद्ध संघर्ष करना होगा। हमें अपने सामान्य विवेक के अभाव और अपनी अव्यावहारिक नीतियों के विरुद्ध लड़ना होगा। इन्हीं मूढत्रताओं व विवेकहीन नीतियों ने हिन्दुओं को बांट दिया और हम पर परतंत्रता लाद दी……। अगर हम केवल यातनाओं के बारे में सोचते रहेंगे तो हमें कोई भी हल नहीं मिलेगा। यदि हम अपनी जड़मति और विवेकहीनता से छुटकारा पा जाएं तो अत्याचारी स्वयं हमारे आगे समर्पण कर देगा।”
(अग्रहयान १३३० बंगाब्ध में लिखे लेख ‘समस्या’ तथा ‘कालान्तर’ से)
५. केवल स्वधर्म सच्चा अन्य सब झूठे-” जब दो या तीन विभिन्न रिलीजन यह दावा करें कि केवल उनका ही रिलीजन सच्चा है और बाकी सब झूठे हैं, उनके ही रिलीजनों से ‘स्वर्ग’ मिल सकता है, तो संघर्षों को रोका नहीं जा सकता हैं इस प्रकार का कट्‌टरवाद अन्य सभी रिलीजनों को समाप्त करना चाहता है। यह तो धर्म में बोल्शविज्म़ कहलाता है। इस कट्‌टरपंथी संकीर्णता से केवल हिन्दू धर्म ही छुटकारा दिलवा सकता है।
(‘परिचय’ पुस्तक में, ‘आत्मपरिचय’ लेख से)
६. हिन्दू माताएं अपने बच्चों को क्षात्रधर्मी बनाएँ-”हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध-”इस देश की भयानक स्थिति ने मेरे मस्तिष्क को बेचैन कर रखा हैं अब मैं और चुप नहीं रह सकता हूँ। अर्थहीन बोझिल कर्म काण्डों ने हिन्दू समाज को अनेक सम्प्रदायों में बांट रखा है। परिणामस्वरूप हम लगातार पराजय से पीड़ित होते आ रहे हैं हम अपने आन्तरिक और बाह्‌य शत्रुओं की यातनाओं के फलस्वरूप थक और जर्जरित हो चुके हैं। मुसलमान अपने ार्म और कर्मकाण्डों के विषय में संगठित हैं बंगाली मुसलमान, दक्षिण भारतीय मुसलमान और यहाँ तक कि भारत के बाहर के मुसलमान भी सब संगठित हैं वे संकट के समय में सदैव एक जुट हो जाते हैं, तथा विभाजितऔर बिखरे हुए हिन्दू उनसे संघर्ष नहीं कर पायेंगे। वह समय आ रहा है जब हिन्दू फिर मुसलमानों के हाथों अवमानित किए जाएंगे।
”तुम अनेक बच्चों की एक मां हो। एक दिन तुम मर जाओगी और हिन्दू समाज का भविष्य अपने बच्चों के कमजोर कंधों पर छोड़ जाओगी।”
(१६ अक्टूबर १९३३ को हेमन्त बाला सरकार को लिखे पत्र से, जो कि २९.६.१९९९ के ‘स्वास्तिक’ पत्रिका में छपा)
०७. स्वामी विवेकानन्द (९.१.१८६२-४.७.१९०२)
(समस्त उद्धरण अंग्रेजी के सम्पूर्ण विवेकानन्द वाडऋमय के हिन्दी अनुवाद से हैं, खंड एवं पृष्ठानुसार)
१. मुहम्मद की शिक्षाओं के कारण लाखों मारे गए-”यदि तुम कुरान को पढ़ो तो तुम्हें वहाँ सबसे आश्चर्यपूर्ण सत्य और अंधविश्वास मिलेजुले मिलेंगे। तुम इनकी व्याखया कैसे करोगे ? निःसन्देह वह पुरुष (पैगम्बर मुहम्मद) अन्तःप्रेरित था। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वह अन्तःप्ररेणा मानों उस पर थोपी गई हो। वह कोई एक प्रशिक्षित योगी नहीं था और वह जो कुछ कर रहा था वह उस सबका कारण भी नहीं जानता था। सोचो उस भलाई को जो मुहम्मद ने विश्व के लिए की और उस महान बुराई को भी सोचो जो कि उसकी हठधर्मिता के कारण की गईंज़रा सोचो कि उसकी शिक्षाओं के कारण लाखों मनुष्यों की सामूहिक हत्यायें हुई, मांओं को अपने बच्चों को मौत के कारण खोना पड़ा, बच्चे अनाथ बनाए गए, अनेक देश सम्पूर्ण नष्ट कर दिए गए, लाखों ही लाखों लोगों की हत्या की गई” (१ : १८४)
२. मुसलमानों के कर्मकाण्ड-”प्रत्येक मुसलमान जो यह सोचता है कि एक गैर-मुसलमान का प्रत्येक कर्मकाण्ड, प्रत्येक आराध्य स्वरूप, प्रत्येक मूर्ति एवं प्रतयेक धार्मिक अनुष्ठान पापपूर्ण है, मगर वह ऐसा नहीं सोचता जब वह अपने ही धर्मस्थल काबा पर आता हैं इस सन्दर्भ में हर एक धार्मिक मुसलमान को, वह जहाँ कहीं भी उपासना करें उसे यह सोचना आवश्यक है कि वह काबा के सामने खड़ा है (इसीलिए विश्व के सारे मुसलमान मक्का की ओर मुंह करके नमाज पढ़ते हैं, अनु.)। जब वह वहाँ की यात्रा करें तो उसे धर्मस्थल की दीवार में लगे ‘संगे-अस्वद (काले पत्थर) को चूमना चाहिए। मुसलमानों का विश्वास है कि वे सभी चुम्बनों के निशान जो कि लाखों-ही-लाखों मुसलमानों ने उस पवित्र पत्थर पर किए वे ‘आखिरात’ यानी ‘न्याय के दिन’ पर उस धार्मिक व्यक्ति के कल्याण के लिए उठ खड़े होंगे। इसके अलावा वहाँ एक ज़िमज़िम का कुआं है।मुसलमानों का विश्वास है कि जो कोई थोड़ा भी पानी उस कुएं से निकालेगा उसके सभी पाप क्षमा कर दिए जाएंगे और ‘कियामत’ के दिन के बाद उसे एक नया शरीर मिलेगा तथा वह सदैव रहेगा।” (२ : ३९)
३. गैर-मुसलमानों को जान से मारो-”मुहम्मदीय मत यानी इस्लाम अपने अनुयायी मुसलमानों को उन सभी लोगों को जान से मारने की अनुमति देता है जो कि उनके मत के नहीं है यानी गैर-मुसलमान हैं। कुरान में यह साफ लिखा हैं कि ‘गैर-मुसलमानों की हत्या करो यदि वे मुसलमान नहीं बन जाते हैं।” उनको आगे में जला देना और तलवार के घाट उतार देना चाहिए।” (२ : ३३५)
४. गैर-मुसलमानो की हत्या करना जन्नत जाने का सबसे पक्का तरीका-”कोई आदमी जितना अधिक स्वार्थी होता है वह उतना ही अधिक अनैतिक होता हैं इसी प्रकार जो जाति केवल अपने ही स्वार्थ में लिप्त रहती है, वह सारे विश्व में सबसे अधिक निर्दयी और सबसे अधिक अत्याचारी पाई गई है। ऐसा कोई रिलीजन नहीं हुआ है जो इस उपरोक्त द्वेषवाद से अधिक चिपका हुआ हो जितना कि अरेबिया के पैगम्बर (मुहम्मद) द्वारा स्थापित रिलीजन ‘इस्लाम’ और अन्य कोई रिलीजन ऐसा नहीं हुआ है जिसने इतना खून बहाया ो औरजो अन्य लोगों के प्रति इतना अत्याचारी रहा हो। कुरान में एक उपदेश है जो कि मनुष्य इन शिक्षओं को नहीं मानता है, उसे मार देना चाहिएं उसे मारना एक दयालुता हैं इस्लाम में स्वर्ग (जन्नत), जहाँ कि अत्यन्त सुन्दर ‘हूरें’ और अन्य सभी प्रकार के इन्द्रिय सुखों एवं आमोद-प्रमोद के साधन हैं, को पाने का सबसे पक्का तरीका गैर-मुसलमानों को मार देने के द्वारा है। ज़रा इस रक्तपात के बारे में सोचो जो कि इस प्रकार के विश्वासों के परिणामस्वरूप हुए हैं।”
(१८ नवम्बर १८९६ को लंदन में दिए गए भाषण से; २ः३५२-५३)
५. एक हाथ में कुरान दूसरे में तलवार-”जरा उन छोटे-छोटे सम्प्रदायों के बारे में सोचो जो पिछले कुछ सैकड़ों वर्षों में चलायमान मानव मस्तिष्क से उपजे हैं और वे ईश्वर के समीप अगणित सत्यों के ज्ञान का हेकड़बाजी से दावा करते हैं। इस मिथ्याभिमान पर जरा ध्यान दीजिए। इससे यदि कुछ सिद्ध होता है तो यही कि ये लोग कितने अहंकारी हैं। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि ऐसे दावे हमेशा झूठे साबित हुए हैं और ईश्वर की कृपा से ऐसे दावों का सदैव असत्य होना निश्चित है। इस विषय (इस्लाम) में मुसलमान सबसे अलग थे। उन्होंने आगे बढ़नेका प्रत्येक कदम तलवार की धार से आगे बढ़ाया यानी कि एक हाथ में कुरान और दूसरे में तलवार, ”कुरान स्वीकार करो या मौत’ इसके अलावा अन्य कोई विकलप नहीं है।” तुम इतिहास से जानते हो कि इससे उनकी कितनी आश्चर्यजनक सफलता रही। छः सौ वर्षों तक उन्हें कोई नहीं रोक सका और इसके बाद एक समय ऐसा आया कि जब उन्हें चिल्ला कर कहना पड़ा कि रुको। अन्य रिलीजनों के साथ भी ऐसा ही होगा, यदि वे ऐसे ही तरीके अपनाएंगे
(२८ जनवरी १९००, में पाडसेना कैलीफोर्निया में दिए गए भाषण से, ‘१ : ६९-७०)
६. सार्वभौमिक भाईचारा केवल मुसलमानों के लिए-”मुसलमान विश्व व्यापी भाईचारे की बात करते हैं परन्तु वास्तव में इसका मतलब क्या है ? आखिर जो कि मुसलमान नहीं है वह इस सार्वभौमिक भाईचारे में सम्मिलित क्यों नहीं किया जाएगा उसके तो गले काटे जाने की सम्भावना अधिक है।” (२ : ३८०)
७. मुसलमान मूर्त्तियों की जगह कब्रों को पूजते हैं-”मुसलमान प्रायः मूर्तियों की जगह अपने पीरों और शहीदों की कब्रों का उपयोग करते हैं (यानी पूजते हैं)।” (३ : ६१)
८. बालक रूप में ईश्वर-”मुसलमानों द्वारा ईश्वर को एक बच्चे के रूप में होने के विचार कोस्वीकार करना असम्भव है। वे इसे मानने से एक भयसहित संकोच करेंगे। लेकिन ईसाई और हिन्दू इसे आसानी से अनुभव कर सकते हैं। क्योंकि उनके मत में बाल स्वरूप ज़ीज़स और बालरूप गोपाल श्री कृष्ण की अवधारण है।” (३ : ९६)
९. किसी मुस्लिम देश में मंदिर बनाना वर्जित-”ऐसा भारत में ही है कि यहाँ भारतीय (हिन्दू) मुसलमानों और ईसाईयों के लिए पूजा स्थल (मस्जिद, गिरजाघर) बनवाते हैं, अन्यत्र कहीं नहं। अगर आप अन्य देशों में जाओ और मुसलमानों या अन्य मतों के लोगों से कहो कि उन्हें अपने लिए मंदिर बनाने दो तो देखो वे तुम्हारी किस प्रकार मदद करते हैं, अनुमति देने की जगह वे तुम्हें और तुम्हारे मंदिर को ही तोड़ डालने की कोशिश करेंगे, यदि वे ऐसा कर सके।” ( ३ : ११४)
१०. भारत में रहने वाले भी हिन्दू-”इसलिए यह शब्द (हिन्दू) न केवल वास्तविक हिन्दुओं बल्कि मुसलमानों, ईसाईयों, जैनियों और अन्य लोगों के लिए भी है, जो कि भारत में रहते हैं।” (३ : ११८)
११. सैकड़ों वर्षों तक ‘अल्लाह-हो-अकबर’ गूंजता रहा-”बर्बर विदेशी आक्रान्ताओं की एक लहर के बाद दूसरी लहर इस हमारे पवित्र देश पर टकराती रही। वर्षों तक आकश’अल्लाह-हो-अकबर’ के नारों से गुंजायमान होता रहा और कोई हिन्दू नहीं जानता था इसका अन्तिम क्षण कौन-सा होगा। विश्वभर के ऐतिहासिक देशों में से भारत ने ही सबसे अधिक यातनाएँ और अपमान सहें हैं फिर भी हम लगभग उसी एक राष्ट्र के रूप में विद्यमान हैं और यदि आवश्यक हुआ तो सभी प्रकार की आपदाओं को बार-बार सामना करने के लिए तैयार हैं। इतना ही नहीं, अभी हाल में ऐसे भी संकेत हैं कि हम न केवल बलवान ही हैं बल्कि बाहर निकलने को तैयार हैं क्योंकि जीवन का अर्थ प्रसार है।” ( ३ : ३६९ – ७०)
१२. मुसलमानों की तरह न मानने पर हत्या-”अज्ञानी लोग…. अन्य किसी दूसरे मनुष्य को विश्व की समस्याओं का अपने स्वतंत्र चिन्तन के अनुसार व्याखया न करने देने को न केवल मना करते हैं, बल्कि यहाँ तक कहने का साहस करते हैं कि अन्य सभी बिल्कुल गलत हैं और केवल वे ही सही हैं। यदि ऐसे लोगों का विरोध किया जाता है तो वे लड़ने लगते हैं और यहाँ तक कहते हैं कि वे उस आदमी को मार देंगे यदि वह वैसा विश्वास नहीं करता है जैसा कि वे स्वयं करते हैं और अन्य मुसलमान भी करते हैं।” (४ : ५२)
१३. पैगम्बर व फरिश्तों को पूजने में आपत्तिनहीं-”मुसलमान प्रारम्भ से ही मूर्ति पूजा के विरोधी रहे हैं लेकिन उन्हें पैगम्बरों या उनके संदेशवाहकों को पूजने या उनके प्रति आदर प्रगट करने में कोई आपत्ति नहीं होती हैं, बल्कि वास्तविक व्यवहार में एक पैगम्बर की जगह हज़ारों ही हज़ार पीरों की पूजा की जा रही हे।” (४ : १२१)
१४. मुसलमान सर्वाधिक सम्प्रदायवादी-”इस (इस्लाम) के विषय में आज मुसलमान सबसे अधिक निर्दयी और सम्प्रदायवादी हैं उनका मुखय सिद्धान्त वाकय है ”ईश्वर (अल्लाह) एक है औ मुहम्मद उसका पैगम्बर है।” इसके अलावा सभी बातें न केवल बुरी हैं, बल्कि उन्हें फौरन नष्ट कर देना चाहिए। प्रत्येक स्त्री औरपुरुष, जो इस सिद्धान्त को पूरी तरह नहीं मानता है, उसे क्षणभर की चेतावनी के बाद मार देना चाहिए, प्रत्येक वस्तु जो इस प्रकार की पूजाविधि के अनुकूल नहीं है, उसे फौरन नष्ट कर देना चाहिए और प्रत्येक पुस्तक जो इसके अलावा कुछ और बातों की शिक्षा देती है, उसे जला देना चाहिए। पछिले पांच सौ वर्षों में प्रशान्त महासागर से लेकर अंध महासागर तक सारे विश्व में लगातार रतपात होता रहा। यह है मुहम्मदवाद ! फिर भी इन मुसलमानों में से ही, जहाँ कहीं कोई दार्शनिक व्यक्ति हुआ, उसनेनिश्चय ही इन अत्याचारों की निंदा की है।” (३ फरवरी १९००, कोपासाडेना में रिए गए भाषण से, ४ : १२६)
१५. अल्लाह के लिए लड़ो-”भारत में विदेशी आक्रान्ताओं की, सैकड़ों वर्षों तक लगातार, एक के बाद एक लहर आती रही और भारत को तोड़ती और नष्ट-भ्रष्ट करती रही। यहाँ तलवारें चमकीं और ‘अल्लाह के लिए लड़ो और जीतो’ के नारों से भारत का आकाश गूंजता रहा। लेकिन ये बाढ़ें भारत के आदर्शों को बिना परिवर्तित किए, स्वतः ही धीरे-धीरे समाप्त होती गई।” (४ : १५९)
१६. मूर्ति पूजक हिन्दू घृणास्पद-”मुसलमानों के लिए यहूदी और ईसाई अत्यन्त घृणा के पात्र नहीं है। उनकी नज़रों में वे कम-से-कम ईमान के आदमी तो हैं। लेकिन ऐसा हिन्दू के साथ नहीं है। उनके अनुसार हिन्दू मूर्तिपूजक है व घृणास्पद ‘काफ़िर’ है। इसलिए वह इस जीवन में नृशंस हत्या के योग्य हैं और मरने के बाद उसके लिए शाश्वत नकर तैयार है। मुसलमान सुलतानों ने काफिरों के आध्यात्मिक गुरुओ व पुजारियों के साथ यदि कोई सबसे अधिक ृपा की तो यह कि उन्हें किसी प्रकार अन्तिम सांस लेने तक चुपचाप जी लेने की अनुमति दे दी। यह भी कभी-कभी बड़ी दयालुता मानी गईं यदिकिसी मुस्लिम सुलतान का धार्मिक जोश असामान्य या कुछ अधिक होता तो ‘काफिरों’ के कत्लेआम रूपी बड़े यज्ञ का फौन ही प्रबन्ध किया जात।” (४ : ४४६)
१७. यहाँ कत्ले आम मुसलमान लाए-”तुम जानते हो कि हिन्दू धर्म किसी को यातना नहीं देता। यह एक ऐसा देश है जहाँ कि सभी प्रकार के सम्प्रदाय शान्ति और सौहार्द के साथ रह सकते हैं। मुसलमान अपने साथ अत्याचार और कत्ले आम लाए, लेकिन उनके आने से पहले तक यहाँ शान्ति बनी रही थी।” (५ : १९०)
१८. मुसलमानों ने तलवार का सहारा लिया-”भारत में मुसलमान ही पहले ऐसे लोग थे, जिन्होंने तलवार का सहारा लिया।” (५ : १९७)
१९. एक हिन्दू कम होने का मतलब एक शत्रु का बढ़ना-”सबसे पुराने इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार हमें बताया गया है कि जब सबसे पहले मुसलमान भारत में आये तो यहाँ साठ करोड़ हिन्दू थे और अब केवल बीस करोड़ हैं (यानी चालीस करोड़ हिन्दू मारे और धर्मान्तरित किए गए-अनु.)। और हिन्दू धर्म से एक भी हिन्दू का बाहर जाने का मतलब है एक हिन्दू का कम होना ही नहीं है बल्कि एक दुश्मन का बढ़ जाना है। इसके अलावा इस्लाम और ईसाइयत में धर्मान्तरित अधिकांश हिन्दू तो तलवार के बल पर धर्मान्तरित हुए हैं या उनकी सन्तानें हैं।” (५ : २३३)
२०. मुहम्मददीय विजय को भारत में पीछे हटना पड़ा-”मुसलमानों के विजय की लहर जिसने सारी पृथ्वी को निगल लिया था, उसे भारत के सामने पीछे हटना पड़ा।” (५ : ५२८)
२१. हशासिन शब्द ‘असेसिन’ बन गया-”मुसलमानों का ‘हशासिन’ शब्द ‘असेसिन’ बन गया क्योंकि मुहम्मदीय मत का एक पुराना सम्प्रदाय गैर-मुसलमानों को मारने को अपने धर्म का एक अंग मानता था।” (५ : ४०)
२२. इस्लाम में हिंसा का प्रयोग-”मुसलमानों ने हिंसा का सबसे अधिक प्रयोग किया।” (७ : २१७)
२३. गैर-मुसलमानों को मार दो-”एक ऐसा रिलीजन भी हो सकता है जो अत्यन्त भयंकर शिक्षाएं देता हो। उदाहरण के लिए मुहम्मदीय मत (इस्लाम) मुसलमानों को उन सबकी हत्या करने की अनुमति देता है जो कि उसके मतानुयायी नहीं हैं। ऐसा कुरान में स्पष्ट लिखा है कि ”अविश्वासियों (गैर-मुसलमानों) को मार दें। यदि वे मुहम्मदीय यानी मुसलमान नहीं हो जाते हैं।” उन्हें अग्नि में झोंक देना और तलवार से काट देना चाहिए। अब यदि हम किसी मुसलमान से कहें कि ऐसा गलत है तो
वह स्वाभाविक तौर पर फौरन पूछेगा कि ”तुम ऐसा कैसे जानते हो ? तुम कैसेजानते हो कि ऐसा ठीक नहीं है ? मेरी धर्म पुस्तक (कुरान) कहती है कि ऐसा ठीक है।”
(१७ नवम्बर १८९९ को लंदन में दिए भाषण में, प्रेक्टीकल वेदान्त, भाग ३ से)
०८. लाला लाजपतराय (२८.१.१८६५)-१७.११.१९२८)

क्या कोई मुस्लिम नेता कुरान और हिदीस के विपरीत जा सकता है ?
”एक बात और है, जो मुझे बहुत दिनों से कष्ट दे रही है, जिसे मैं चाहता हूँ कि आप बहुत ध्यान से सोचें और वह है हिन्दू-मुस्लिम एकता। पिछले ६ महीनों में मैंने अपना अधिकांश समय मुस्लिम इतिहास और मुस्लिम कानून को पढ़ने में लगाया है और मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यह न तो सम्भव है और न ही व्यावहारिक है। असहयोग आन्दोलन में मुस्लिम नेताओं की ईमानदारी व निष्ठा को मानते हुए और उसे स्वीकारते हुए, मैं समझता हूं कि उनका धर्म उनके मार्ग में एक किस्म से रुकावट डालता है।
आपको याद होगा हकीम अजमल खां और डॉ. किचलू से उस विषय मेंजो मेरी बातचीत हुई थी, उसकी रिपोर्ट मैंने आपको कलकत्ता में दी थी। हकीम साहेब से बेहतर कोई मुसलमान हिन्दुस्तान में नहीं हे। परन्तु क्या कोई अन्य मुस्लिम नेता कुरान के विपरीत जा सकता है ? मैं तो केवल यही सोचता हूँ कि इस्लामिक कानून के बारे में मेरा ज्ञान सही नहीं है और ऐसा ही सोचकर मुझे राहत मिलती है। परन्तु यदि यह सही हे, तो यह बात साफ़ है कि हम अंग्रेजों के विरुद्ध एक हो सकते हैं, परन्तु ब्रिटिश रूपरेखा के अनुसार हिन्दुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते। जम जनतांत्रिक आधार पर हिन्दुस्तान पर शासन चलाने के लिए एक नहीं हो सकते।
फिर उपाय क्या है ?उ मुझे हिन्दुस्तन के सात करोड़ हिन्दुओं का डर नहीं है, परन्तु मैं सोचता हूँ कि हिन्दुस्तान के सात करोड़ मुसलमान और अफ़गानिस्तान,, मध्य एशिया, अरब, मिसोपोटामिया और तुर्की के हथियारबंद गिरोह मिलकर अप्रत्याशित स्थिति पैदा कर देंगे। मैं ईमानदारी से हिन्दू-मुस्लिम एकता की आवश्यकता और वांछनीयता में विश्वास करता हूँ। में मुस्लिम नेताओं पर भी पूरी तरह से विश्वास करने को तैयार हूँ, परन्तु कुरान और हदीस की निषेधाज्ञा के बारे में क्या कहें ? ये नेता उनका उल्लंघन नहीं कर सकते। तो क्या हम बर्बाद हो जाएंगे ? मैं ऐसी बात नहीं सोचता। मैं आशा करता हूँ कि सुशिक्षित और बुद्धिमान इस कठिनाई से बच निकलने का कुछ उपाय ढूंढेंगे।”
(सी. आर. दास को लिखे पत्र से, जा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूण्र वाड्‌मय, खंड १५, के पृ. २७५ पर उद्धृत है)
०९. मोहनदास करमचन्द गांधी (२.१०.१८६९-३०.१.१९४८)

१. मुसलमान चाकू और पिस्तौल चलाने में अत्यधिक स्वच्छन्द-”मुसलमानों को एक अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कियाजा सता है कि वे चाकू और पिस्तौल चलाने में अत्यधिक स्वछन्द होते हैं।”

(यंग इंडिया, २० दिसम्बर १९४२)
२. सामान्यतः मुसलमान क्रूर और हिन्दू कायर होते हैं-”मेरा अपना अनुभव है जो इस विचार को पक्का करता है कि सामान्यतया मुसलमान क्रूर होते हैं जबकि हिन्दू सामान्यतया कायर होते हैं।”
(गांधी की जीवनी, धनंजय कीर पौपूलर प्रकाशन, मुम्बई १९७३, पृ. ४०२)
१०. योगीराज श्री अरविन्द (१५.८.१८७२-५.१२.१०५०)

१. हिन्दू-मुस्लिम एकता असम्भव-”तुम एक ऐसे धर्म के साथ तो सौहार्दपूर्णता के साथ रह सकते हो जिसका सिद्धान्त सहिष्णुता हो। लेकिन ऐसे धर्म के साथ शान्ति से रहना कैसे सम्बन्ध हो सकता है जिसकी सिद्धान्त ही यह हो कि ‘मैं तुम्हें सहन नहीं करूँगा’। तुम ऐसे लोगों (मुसलमानों) के साथ कैसे एकता स्थापित कर सकते हो ?

निश्चय ही हिन्दू-मुस्लिम एकता इस आधार पर स्थापित नहीं हो सकती है कि मुसलमान तो हिन्दुओं का लगातार धर्मान्तरण करते रहें जबकि हिन्दू किसी मुसलमान को धर्मान्तरित न करें।”
”…. तुम इस प्रकार के आधार पर हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित नहीं कर सकते हो। शायद मुसलमानों को अहानिकारक बनाने का एक मात्र तरीका यही है कि वे अपने मज़हब के प्रति धर्मान्धता छोड़ दें।”
(२३.७.१९२३ को वार्तालाप से जिसे ए. बी. पुरानी ने ‘ईवनिंग टॉक्स विद श्री अरबिन्दों’ में संकलित किया, प्रकाशक श्री अरबिन्दों आश्रम  ‍टरस्त, १९९५, पृ. २९१)
२. शायद हिन्दुओं को मुसलमानों से लड़ना पड़े-”मुझे खेद है कि वे (प. मदनमोहन मालवीय और चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य) इस हिन्दू-मुस्लिम एकता को अंध श्रद्धा के आधार पर बना रहे हैं। इस सच्चाई की उपेक्षा करने से कोई लाभ नहीं है कि किसी दिन हिन्दुओं को मुसलमानों से शायद लड़ना पड़े और उन्हें इसके लिए तैयार हो जाना चाहिए। हिन्दु-मुस्लिम एकता का अर्थ हिन्दुओं की पराधीनता नहीं होनी चाहिए। हर बार हिन्दुओं को अपनी सहनशीलता के कारण पराजित होना पड़ा हैं सबसे उत्तम हल तो यही होगा कि हिन्दू स्वयं को संगठित करें और फिर हिन्दू’मुस्लिम एकता इसकी स्वयं व्यवस्था कर लेगी और इससे उनकीसमस्याओं का हल भी स्वयं निकल आएगा वर्ना हम आत्म संतुष्टि के भ्रमित जाल में फंसे रहेंगे कि हमने एक कठिन समस्या का हल निकाल लिया हे जबकि वास्तव में हमने इस समस्या से पलायन कर लिया है।”
(१८.४.१९२३) के वार्तालाप से, वही ए. बी. पुरानी, पृ. २८९)
३. मुहम्मदीय चिन्तन में परिवर्तन आवश्यक-”२९.६.१९२६ को एक शिष्य ने श्री अरबिन्द से पूछा कि ‘यदि भारत की यही नियति है कि वह सभी प्रकार के परस्पर विरोधी तत्वों का आत्मसात करे तो क्या मुहम्मदीय तत्व (इस्लाम) का भी आत्मसात सम्भव है ? श्री अरबिन्द ने उततर दिया क्यों नहीं ! भारत ने ग्रीकों, पार्सियों और अन्य राष्ट्रों के तत्वों का आत्मसात किया हैं लेकिन वह तभी आत्मसात करता है जब उसके मौलिक सत्य को दूसरे पक्ष द्वारा स्वीकारा जाता है और यहाँ तक कि आत्मसात करते हुए वह उसे इस प्रकार से करता है कि जिन तत्वों का आत्मसात किया जाए वे विदेशी प्रतीत न हों और उसके एक अंग बन जाएं…।” मुहम्मदीय संस्कृति का आत्मसातकरण भी, मस्तिष्कों में, अधिकांश अंशों में कर लिया गया था और वह शायद और भी आगे तक चला जाता। लेकिन इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के लिए यह आवश्यक है कि मुहम्मदीय चिन्तन में एकपरिवर्तन आए। यह विरोधाभास बाहरी जीवन में है और जब तक कि मुसलमान सहनशलता नहीं सीखते, मैं नहीं सोचता कि आत्मसातकरण कभी सम्भव है।”
”हिन्दू तो सहन करने को तैयार है। उसका मन नए विचारों के लिए खुला है और उसकी संस्कृति में आत्मसात करने की एक अद्‌भुत क्षमता भी है परन्तु उसने इसी बात पर बल दिया है कि उसके ‘मौलिक सत्य’ को स्वीकारा जाए।”
(ए. बी. पुरानी, वही, पृ. २८२)
४. गृह युद्ध की सम्भावना-३०.१२.१९३९ को श्री अरबिन्द ने हिन्दु मुस्लिम सम्बन्धों के बारे में कहा कि ”मैंने सी. आर. दास को १९२३ में कहा था कि हिन्दु मुस्लिम समस्या का हल ब्रिटिशों के जाने से पहले खोज लेना चाहिए बर्ना गृहयुद्ध के खतरे की सम्भावना है। वे इस बात से सहमत थे और इस समस्या को हल करना चाहते थे।”
(ए. बी. पुरानी, वही, पृ. ६९६)
११. विनायक दामोदर सावरकर (२८.५.१८८३-२६.२.१९६६)

१. मजहवी धारणा-”सामान्यतः मुसलमान अभी अत्यधिक धार्मिकता और राज्य की मजहबी धारणा के ऐतिहासिक चरण से नहीं उबर पाये हैं। उनकी मजहबी राजनीति मानव-जाति को दो भागों में विभाजित करती है-‘मुस्लिम भूमि’ और ‘शत्रु भूमि’ ! वे सभी देश, जिनमें या तोपूर्ण रूप से मुसलमान ही निवास करते हैं अथवा जहाँ मुसलमानों का शासन है, ‘मुस्लिम देश’ हैं और अन्य देश ‘शत्रु देश’।” (सावरकर एण्ड हिज टाइम, पृ. २३०)

२. मुस्लिम धर्मान्धता-”पारसी-ईसाई आदि भारत के लिए कोई समस्या नहीं है। जब हम स्वतन्त्र हो जायें तब इन्हें बड़ी सरलता से हिन्दी नागरिक की श्रेणी में लाया जा सकेगा। किन्तु ुसलमानों के बारे में बात दूसरी है। जब कभी इंग्लैण्ड भारत से अपनी सत्ता हटा लेगा तब भारतीय राज्य के प्रति देश के मुसलमान भयप्रद सिद्ध हो सकते हैं। हिन्दुस्थान में मुस्लिम राज्य की स्थापना करने की अपनी धर्मान्ध योजना को अपने मन-मस्तिष्क में संजोय रखने की मुस्लिम जगत की नीति आज भी बनी हुई है।’ (३० दिसम्बर १९३९ को हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)
३. ”मुसलमानों में जात-पांत या क्षेत्रीयता का भाव नहीं है, यह कहना सर्वथा भ्रामक है। दुर्रानी मुसलमान व मुगल मुसलमान, दक्खिनी मुसलमान व उत्तरी मुसलमान, शेख मुसलमान व सैयद मुसलमानों के झगड़े का लाभ उठाकर ही मराठों ने मुगलों का तखता पलटा। शिया और सुन्नी दंगे वैष्णव व शैवों के दंगों से हजार गुणा ज्यादा भयंकर है- और बार-बार होते रहते हैं।
काबुलमें सुन्नी मुसलमानों ने अहमदिया मुसलमानों को पत्थरों से मार डाला। बहाई मुसलमान तो अन्य सभी मुसलमानों को इस दुनियां में फांसी और नर्क के योग्य समझते हैं। अस्पृश्यता भी उनमें कम नहीं हैं। भंगी मुसलमान को पानी भी न छूने देने वाली व मस्जिद में नमाज़ के लिए न जाने देने की घटनायें होती ही रहती हैं।” (मौलाना शौकतअली को लिखे पत्र तीसरा खंड, सावरकर समग्र वांड्‌., पृ. ७५८)
४. मुस्लिम मनोवृत्ति- पिछले पचास वर्षों में, मुसलमानों को प्रसन्न कर व उन्हें एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र में सम्मिलित करके कम से कम इस हेतु प्रेरित करने के लिए कि सर्वप्रथम वे भारतीय हैं व फिर मुसलमान हैं, कांग्रेस के प्रयासों का बुरी तरह असफल होने का क्या कारण था ? ऐसा नहीं है कि मुसलमान एक संयुक्त भारतीय राष्ट्र नहीं बनाना चाहते किन्तु एकता, राष्ट्रीय एकता की कल्पना उसके प्रादेशिक एकता पर आधारित नही है। इस विषय पर किसी मुसलमान ने यदि स्पष्ट एवं बोधगम्य रूप से अपना मानस व्यक्त किया है तो वह मोपला आन्दोलन के नेता अली मुसलियार ने हजारों हिन्दू महिलाओं, पुरुषों, बच्चों को धर्मान्तरित करने अथवा तलवार के बल पर समाप्त करने के अति दुष्ट अभियानके समर्थन में उसने घोषित किया कि भारत को एक संयुक्त राष्ट्र होना ही चाहिए और हिन्दू मुसलमान की शाश्वत एकता स्थापित करने का केवल एक ही मार्ग हैं और वह है सारे हिन्दुओं का मुसलमान बन जाना।” (नागपुर में हिन्दू महासभा में अध्यक्षीय भाषण)
५. मुसलमान-मुसलमान, भारतीय कभी नहीं-मुसलमान, मुसलमान प्रथम और अंतिम रूप से मुसलमान रहे, भारतीय कभी नहीं। वे तब तक तटस्थ रहे जब तक कि दिगम्रमित हिन्दुओं ने अंग्रेजी राज से सभी भारतीय के लिए राजनैतिक अधिकार प्राप्त करने का संघर्ष जारी रखा और लाखों की संखया में जेल गये, हजासरों की संखया में अण्डमान गये, सैकड़ों की संखया में फाँसी पर झूल गये और जैसे ही एक ओर कांग्रेसी हिन्दुओं द्वारा चलाये जा रहे निःशस्त्र आन्दोलन एवं दूसरी ओर कांग्रेस से बाहर सशस्त्र हिन्दू क्रान्तिकारियों द्वारा अधिक भयावह एवं प्रवासी जीवन-मृत्यु का संघर्ष चलाये जाने से अंग्रेजी शासन पर पर्याप्त रूप से प्रभाव पड़ा और उन्हें भारतीय को महत्वपूर्ण राजनैतिक शक्ति देने को विवश होना पड़ा, तुरन्त ही मुसलमान चाहरदीवारी से कहने लगे कि वे भी भारतीय हैं, उन्हें भी अपना अधिकार मिलना चाहिए। अंततोगत्वा बातयहाँ तक पहुँची कि भारतवर्ष को ‘मुस्लिम भारत’ व ‘हिन्दू भारत’ में विभाजित करने का प्रस्ताव ज़ोरशोर से रखा गया और इस हेतु मुस्लिम लीग जैसी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था ने मुस्लिम राष्ट्रों के साथ हिन्दुओं के विरुद्ध मित्रता करने की तत्परता बताई।” (नागपुर में हिन्दु महासभा में अध्यक्षीय भाषण)
६. वन्द्रमातरम्‌ का विरोध-”मुस्लिम लीग ‘वन्देमातरम्‌’ को इस्लाम विरोधी घोषित कर चुकी है। राष्ट्रवादी कहे जाने वाले कांग्रेसी मुस्लिम नेता भी ‘वन्देमातरम्‌’ गाने से इनकार कर अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति का परिचय दे चुके हैं। हमारे एकतावादी कांग्रेसी नेता उनकी हर अनुचित व दुराग्रहपूर्ण मांग के सामने झुकते जा रहे हैं। आज वे वन्देमातरम्‌ का विरोध कर रहे हैं। कल ‘हिन्दुस्थान’ या ‘भारत’ नामों पर एतराज़ करेंगे-इन्हें इस्लाम विरोधी करार देंगे। हिन्दी की जगह उर्दू को राष्ट्रभाषा व देवनागरी की जगह अरबी लिपि का आग्रह करेंगे। उनका एकमात्र उद्‌देश्य ही भारत को ‘दारूल इस्लाम’ बनाना है। तुष्टीकरण की नीति उनकी भूख और बढ़ाती जायेगी जिसका घातक परिणाम सभी को भोगना होगा।” (अहमदाबाद का हिन्दू महासभा का अध्यक्षीय भाषण)
७.हिन्दू का सैनिकीकरण-”जब तक देश की राजनीति का हिन्दूकरण और हिन्दू का सैनिकीकरण नहीं किया जायेगा, तब तक भारत की स्वाधीनता, उसकी सीमायें, उसकी सभ्यता व संस्कृति कदापि सुरक्षित नहीं रह सकेगी। मेरी तो हिन्दू युवकों से यही अपेक्षा है, यही आदेश है कि वे अधिकाधिक संखया में सेना में भर्ती होकर सैन्य-विद्या का ज्ञान प्राप्त करें, जिससे समय पड़ने पर वे अपने देश का स्वाधीनता की रक्षा में योग दे सकें।” (१९५५ में जोधपुर में सम्पन्न हिन्दू महासभा अधिवेशन में भाषण)
८. हिन्दुस्थान नाम का विरोध-”हर एक देश का नाम उसके राष्ट्रीय बहुमत वाले नाम से ही पुकारा जाना चाहिए। क्या कभी बलूचिस्तान, वजीरिस्तान, अफगानिस्तान, तुर्किस्थान आदि नामों पर भी आपत्ति की गयी, जबकि इन देशों में गैर-मुस्लिम अल्पमत बस रहा है ? फिर हिन्दुस्थान या हिन्दू राज्य का नाम लेते ही इनकी साँस क्यों उखड़ने लगती है-जैसे कि उन्हें साँप ने ही काट खाया हो ?” (विनायक दामोदर सावरकर, पृ. २२२)
१२. सरदार वल्लभ भाई पटेल (३०.१.१८७५-१५.१२.१९५०)

१. मुसलमान अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन लाऐं ”भारत का नया नाष्ट्र किसी भी प्रकार की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सहन नहीं करेगा। यदि फिर वही मार्ग अपनाया जाना है जिसके कारण देश का विभाजन हुआ, तो जो लोग पुनः विभाजन करना चाहते हैं और फूट के बीज बोना चाहते हैं उनके लिए यहाँ कोई स्थान नहीं होगा, कोई कोना नहीं होगा।……….. किन्तु मैं अब देखता हूँ कि उन्हीं युक्तियों को फिर अपनाया जा रहा है जो उस समय अपनायी गयीं थीं जब देश में पृथक्‌ निर्वाचन-मण्डलों की पद्धति लागू की गयी थी। मुस्लिम लीग के वक्ताओं की वाणी में प्रचुर मिठास होने पर भी अपनाये गये उपाय में विषय की भरपूर मात्रा है। सबसे बाद के वक्ता (श्री नजीरुद्‌दीन अहमद) ने कहा है-”यदि हम छोटे भाई का संशोधन स्वीकार नहीं करेंगे तो हम उसके प्यार को गँवा देंगे।” मैं उसका प्यार गँवाने के लिए तैयार हूँ, अन्यथा बड़े भाई की मृत्यु हो सकती है। आपको अपनी प्रवृत्ति में परिवर्तन करना चाहिए, स्वयं को बदली हुई परिस्थितियों के अनुकूल ढालना चाहिए। यह बहाना बनाने से काम नहीं चलेगा कि ”हमारा तो आपसे घना प्यार है।” हमने आपका प्यार देख लिया है। अब इसकी चर्चा छोड़िए।”
२. हम देश का पुनः विभाजन नहीं चाहते-”आइए, हम वास्तविकताओं का सामना करें। प्रश्न यह है कि आप वास्तव में हमसे सहयोग करना चाहते हैं या तोड़-फोड़ की चालें चलना चाहते हैं। मैं आपसे हृदय-परिवर्तन का अनुरोध करता हूँ। कोरी बातों से काम नहीं चलेगा; उससे कोई लाभ नहीं होगा। आप अपनी प्रवृत्ति पर फिर से विचार करें। यदि आप सोचते हैं कि उससे आपको लाभ होगा तो आप भूल कर रहे हैं……. मेरा आपसे अनुराो है कि बीती को बिसार दें, आगे की सुध लें। आपको मनचाही वस्तु मिल गयी है। और स्मरण रखिए, कि आप ही लोग पाकिस्तान के लिए उत्तरदायी हैं, पाकिस्तान के वासी नहीं। आप लोग आन्दोलन के अगुआ थे। अब आप क्या चाहते हैं ? हम नहीं चाहते कि देश का पुनः विभाजन हो।” (संविधान-सभा में भाषण, दि. २८.८.१९४७)
१३. बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर (१४.४.१८९१-६.१२.१९५६)

१. हिन्दू काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं-”मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इसलिए जिस देश में क़ाफिरों का शासनहो, वह मुसलमानों के लिए दार-उल-हर्ब है ऐसी सति में यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।” (पृ. ३०४)
२. मुस्लिम भ्रातृभाव केवल मुसलमानों के लिए-”इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परन्तु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा ओर शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा है। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उल्टे सोचना अत्यन्त दुष्कर है। जहाँ कहीं इस्लाम का शासन हैं, वहीं उसका अपना विश्वासहै। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट सम्बन्धी मानने की इज़ाजत नहीं देता। सम्भवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय, परन्तु सच्चे मुसलमान ने, अपने, शरीर को हिन्दुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।”
३. एक साम्प्रदायिक और राष्ट्रीय मुसलमान में अन्तर देख पाना मुश्किल-”लीग को बनाने वाले साम्प्रदायिक मुसलमानों और राष्ट्रवादी मुसलमानों के अन्तर को समझना कठिन है। यह अत्यन्त संदिग्ध है कि राष्ट्रवादी मुसलमान किसी वास्तविक जातीय भावना, लक्ष्य तथा नीति से कांग्रेस के साथ रहते हैं, जिसके फलस्वरूप वे मुस्लिम लीग् से पृथक पहचाने जाते हैं। यह कहा जाता है कि वास्तव में अधिकांश कांग्रेसजनों की धारण है कि इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है, और कांग्रेस के अन्दर राष्ट्रवादी मुसलमानों की स्थिति साम्प्रदायिक मुसलमानों की सेना की एक चौकी की तरह है। यह धारणा असत्य प्रतीत नहीं होती। जब कोई व्यक्ति इस बात को याद करता है कि राष्ट्रवादी मुसलमानों के नेता स्वर्गीय डॉ. अंसारी ने साम्प्रदायिक निर्णय का विरोध करने से इंकार किया था, यद्यपिकांग्रेस और राष्ट्रवादी मुसलमानों द्वारा पारित प्रस्ताव का घोर विरोध होने पर भी मुसलमानों को पृथक निर्वाचन उपलब्ध हुआ।” (पृ. ४१४-४१५)
४. भारत में इस्लाम के बीज मुस्लिम आक्रांताओं ने बोए-”मुस्लिम आक्रांता निस्संदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का वह गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगा कर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो यह वरदान माना जाता। वे ऐसे नकारात्मक परिणाम मात्र से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने इस्लाम का पौधा लगाते हुए एक सकारात्मक कार्य भी किया। इस पौधे का विकास भी उल्लेखनीय है। यह ग्रीष्म में रोपा गया कोई पौधा नहीं है। यह तो ओक (बांज) वृक्ष की तरह विशाल और सुदृढ़ है। उत्तरी भारत में इसका सर्वाधिक सघन विकास हुआ है। एक के बाद हुए दूसरे हमले ने इसे अन्यत्र कहीं को भी अपेक्षा अपनी ‘गाद’ से अधिक भरा है और उन्होंने निष्ठावान मालियों के तुल्य इसमें पानी देने का कार्य किया है। उत्तरी भारत में इसका विकास इतना सघन है कि हिन्दू और बौद्ध अवशेष झाड़ियों के समान होकर रह गए हैं; यहाँ तक कि सिखों की कुल्हाड़ी भी इस ओक (बांज) वृक्ष को काट कर नहीं गिरा सकी।” (पृ. ४९)
५. मुसलमानों की राजनीतिक दाँव-पेंच में गुंडागर्दी-”तीसरी बात, मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया जाना है। दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागिर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है।” (पृ. २६७)
६. हत्यारे धार्मिक शहीद-”महत्व की बात यह है कि धर्मांध मुसलमानों द्वारा कितने प्रमुख हिन्दुओं की हत्या की गई। मूल प्रश्न है उन लोगों के दृष्टिकोण का, जिन्होंने यह कत्ल किये। जहाँ कानून लागू किया जा सका, वहाँ हत्यारों को कानून के अनुसार सज़ा मिली; तथापि प्रमुख मुसलमानों ने इन अपराधियों की कभी निंदा नहीं की। इसके वपिरीत उन्हें ‘गाजी’ बताकर उनका स्वागत किया गया और उनके क्षमादान के लिए आन्दोलन शुरू कर दिए गए। इस दृष्टिकोण का एक उदाहरण है लाहौर के बैरिस्टर मि. बरकत अली का, जिसने अब्दुल कयूम की ओर से अपील दायर की। वह तो यहाँ तक कह गया कि कयूम नाथूराम की हत्या का दोषी नहीं है, क्योंकि कुरान के कानून के अनुसार यह न्यायोचित है। मुसलमानों का यह दृष्टिकोण तो समझ में आता है, परन्तु जो बात समझ में नहीं आती, वह है श्री गांधी का दृष्टिकोण।”(पृ. १४७-१४८)
७. हिन्दू और मुसलमान दो विभिन्न प्रजातियां-”आध्याम्कि दृष्टि से हिन्दू और मुसलमान केवल ऐसे दो वर्ग या सम्प्रदाय नहीं हैं जैसे प्रोटेस्टेंट्‌स और कैथोलिक या शैव और वैष्णव, बल्कि वे तो दो अलग-अलग प्रजातियां हैं।” (पृ. १८५)
८. इस्लाम और जातिप्रथा-”जाति प्रथा को लीजिए। इस्लाम भ्रातृ-भाव की बात कहता है। हर व्यक्ति यही अनुमान लगाता है कि इस्लाम दास प्रथा और जाति प्रथा से मुक्त होगा। गुलामी के बारे में तो कहने की आवश्यकता ही नहीं। अब कानून यह समाप्त हो चुकी है। परन्तु जब यह विद्यमान थी, तो ज्यादातर समर्थन इसे इस्लाम और इस्लामी देशों से ही मिलता था। कुरान में पैंगबर ने गुलामों के साथ उचित इस्लाम में ऐसा कुछ भी नहीं है जो इस अभिषाप के उन्मूलन के समर्थन में हो। जैसाकि सर डब्ल्यू. म्यूर ने स्पष्ट कहा है-
”….गुलाम या दासप्रथा समाप्त हो जाने में मुसलमानों का कोई हाथ नहीं है, क्योंकि जब इस प्रथा के बंधन ढीले करने का अवसर था, तब मुसलमानों ने उसको मजबूती से पकड़ लिया….. किसी मुसलमान पर यह दायित्व नहीं है कि वह अपने गुलामों को मुक्त कर दें…..”
”परन्तु गुलामी भले विदा हो गईहो, जाति तो मुसलमानों में क़ायम है। उदाहरण के लिए बंगाल के मुसलमानों की स्थिति को लिया जा सकता है। १९०१ के लिए बंगाल प्रांत के जनगणना अधीक्षक ने बंगाल के मुसलमानों के बारे में यह रोचक तथ्य दर्ज किए हैं :
”मुसलमानों का चार वर्गों-शेख, सैयद, मुग़ल और पठान-में परम्परागत विभाजन इस पांत (बंगाल) में प्रायः लागू नहीं है। मुसलमान दो मुखय सामाजिक विभाग मानते हैं-१. अशरफ अथवा शरु और २. अज़लफ। अशरफ से तात्पर्य है ‘कुलीन’, और इसमें विदेशियों के वंशज तथा ऊँची जाति के अधर्मांतरित हिन्दू शामिल हैं। शेष अन्य मुसलमान जिनमें व्यावसायिक वर्ग और निचली जातियों के धर्मांतरित शामिल हैं, उन्हें अज़लफ अर्थात्‌ नीचा अथवा निकृष्ट व्यक्ति माना जाता है। उन्हें कमीना अथवा इतर कमीन या रासिल, जो रिजाल का भ्रष्ट रूप है, ‘बेकार’ कहा जाता है। कुछ स्थानों पर एक तीसरा वर्ग ‘अरज़ल’ भी है, जिसमें आने वाले व्यक्ति सबसे नीच समझे जाते हैं। उनके साथ कोई भी अन्य मुसलमान मिलेगा-जुलेगा नहीं और न उन्हें मस्जिद और सार्वजनिक कब्रिस्तानों में प्रवेश करने दिया जाता है।
इन वर्गों में भी हिन्दुओं में प्रचलित जैसी सामाजिक वरीयताऔर जातियां हैं।
१. ‘अशरफ’ अथवा उच्च वर्ग के मुसलमान (प) सैयद, (पप) शेख, (पपप) पठान, (पअ) मुगल, (अ) मलिक और (अप) मिर्ज़ा।
२. ‘अज़लफ’ अथवा निम्न वर्ग के मुसलमान
(i) खेती करने वाले शेख और अन्य वे लोग जो मूलतः हिन्दू थे, किन्तु किसी बुद्धिजीवी वर्ग से सम्बन्धित नहीं हैं और जिन्हें अशरफ समुदाय, अर्थात्‌ पिराली और ठकराई आदि में प्रवेश नहीं मिला है।
( ii) दर्जी, जुलाहा, फकीर और रंगरेज।
(iii) बाढ़ी, भटियारा, चिक, चूड़ीहार, दाई, धावा, धुनिया, गड्‌डी, कलाल, कसाई, कुला, कुंजरा, लहेरी, माहीफरोश, मल्लाह, नालिया, निकारी।
(iv) अब्दाल, बाको, बेडिया, भाट, चंबा, डफाली, धोबी, हज्जाम, मुचो, नगारची, नट, पनवाड़िया, मदारिया, तुन्तिया।
३. ‘अरजल’ अथवा निकृष्ट वर्ग
भानार, हलालखोदर, हिजड़ा, कसंबी, लालबेगी, मोगता, मेहतर।
जनगणना अधीक्षक ने मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था के एक और पक्ष का भी उल्लेख किया है। वह है ‘पंचायत प्रणाली’ का प्रचलन। वह बताते हैं :
”पंचायत का प्राधिकार सामाजिक तथा व्यापार सम्बन्धी मामलों तक व्याप्त है और……..अन्य समुदायों के लोगों से विवाह एक ऐसा अपराध है, जिस पर शासी निकायकार्यवाही करता है। परिणामत: ये वर्ग भी हिन्दू जातियों के समान ही प्रायः कठोर संगोती हैं, अंतर-विवाह पर रोक ऊंची जातियों से लेकर नीची जातियों तक लागू है। उदाहरणतः कोई घूमा अपनी ही जाति अर्थात्‌ घूमा में ही विवाह कर सकता है। यदि इस नियम की अवहेलना की जाती है तो ऐसा करने वाले को तत्काल पंचायत के समक्ष पेश किया जाता है। एक जाति का कोई भी व्यक्ति आसानी से किसी दूसरी जाति में प्रवेश नहीं ले पाता और उसे अपनी उसी जाति का नाम कायम रखना पड़ता है, जिसमें उसने जन्म लिया है। यदि वह अपना लेता है, तब भी उसे उसी समुदाय का माना जाता है, जिसमें कि उसने जन्म लिया था….. हजारों जुलाहे कसाई का धंधा अपना चुके हैं, किन्तु वे अब भी जुलाहे ही कहे जाते हैं।”
इसी तरह के तथ्य अन्य भारतीय प्रान्तों के बारे में भी वहाँ की जनगणना रिपोर्टों से वे लोग एकत्रित कर सकते हैं, जो उनका उल्लेख करना चाहते हों। परन्तु बंगाल के तयि ही यह दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं कि मुसलमानों में जाति प्राणी ही नहीं, छुआछूत भी प्रचलित है।” (पृ. २२१-२२३)
९. इस्लामी कानून समाज-सुधार के विरोधी-”मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुखदहैं। किन्तु उससे भी अधिक दुखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आन्दोलन नहीं उभरा जो इन बुराईयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिन्दुओं में भी अनेक सामाजिक बुराईयां हैं। परन्तु सन्तोषजनक बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराईयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर, मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराईयां हैं। परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, वे अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने केन्द्रीय असेंबली में १९३० में पेश  किए गए बाल विवाह विरोधी विधेयक का भी विरोध किया था, जिसमें लड़की की विवाह-योग्य आयु १४ वर्ष् और लड़के की १८ वर्ष करने का प्रावधान था। मुसलमानों ने इस विधेयक का विरोध इस आधार पर किया कि ऐसा किया जाना मुस्लिम धर्मग्रन्थ द्वारा निर्धारित कानून के विरुद्ध होगा। उन्होंने इस विधेयक का हर चरण पर विरोध ही नहीं किया, बल्कि जब यह कानून बन गया तो उसके खिलाफ सविनय अवज्ञाअभियान भी छेड़ा। सौभाग्य से उक्त अधिनियम के विरुद्ध मुसलमानों द्वारा छोड़ा गया वह अभ्यिान फेल नहीं हो पाया, और उन्हीं दिनों कांग्रेस द्वारा चलाए गए सविनय अवज्ञा आन्दोलन में समा गया। परन्तु उस अभियान से यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि मुसलमान समाज सुधार के कितने प्रबल विरोधी हैं।” (पृ. २२६)
१०. मुस्लिम राजनीतिज्ञों द्वारा धर्मनिरपेक्षता का विरोध-”मुस्लिम राजनीतिज्ञ जीवन के धर्मनिरपेक्ष पहलुओं को अपनी राजनीति का आधार नहीं मानते, क्योंकि उने लिए इसका अर्थ हिन्दुओं के विरुद्ध अपने संघर्ष में अपने समुदाय को कमजोर करना ही है। गरीब मुसलमान धनियों से इंसाु पाने के लिए गरीब हिन्दुओं के साथ नहीं मिलेंगे। मुस्लिम जोतदार जमींदारों के अन्याय को रोकने के लिए अपनी ही श्रेणी के हिन्दुओं के साथ एकजुट नहीं होंगे। पूंजीवाद के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में मुस्लिम श्रमिक हिन्दू श्रमिकों के साथ शामिल नहीं होंगे। क्यों ? उत्तर बड़ा सरल है। गरीब मुसलमान यह सोचता है कि यदि वह धनी के खिलाफ गरीबों के संघर्ष में शामिल होता है तो उसे एक धनी मुसलमान से भी टकराना पड़ेगा। मुस्लिम जोतदार यह महसूस करते हैं कि यदि वे जमींदारों के खिलाफ अभियान में योगदान करते हैं तो उन्हें एक मुस्लिम जमींदार के खिलाफ भी संघर्ष करना पड़ सकता है। मुसलमान मजदूर यह सोचता है कि यदि वह पूंजीपति के खिलाफ श्रमिक के संघर्ष में सहभागी बना तो वह मुस्लिम मिल-मालिक की भावाओं को आघात पहुंचाएगा। वह इस बारे में सजग हैं कि किसी धनी मुस्लिम, मुस्लिम ज़मींदार अथवा मुस्लिम मिल-मालिक को आघात पहुंचाना मुस्लिम समुदाय को हानि पहुंचाना है और ऐसा करने का तात्पर्य हिन्दू समुदाय के विरुद्ध मुसलमानों के संघर्ष को कमजोर करना ही होगा।” (पृ. २२९-२३०)
११. मुस्लिम कानूनों के अनुसार भरत हिन्दुओं और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो सकती-”मुस्लिम धर्म के सिद्धान्तों के अनुसार, विश्व दो हिस्सो में विभाजित है-दार-उल-इस्लाम तथा दार-उल-हर्ब। मुस्लिम शासित देश दार-उल-इस्लाम हैं। वह देश जिसमें मुसलमान सिर्फ रहते हैं, न कि उस पर शासन करते हैं, दार-उल-हर्ब है। मुस्लिम धार्मिक कानून का ऐसा होने के कारण भारत हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों की मातृभूमि नहीं हो सकती है। यह मुसलमानों की धरती हो सकती है-किन्तु यह हिन्दुओं और मुसलमानों की धरती, जिसमें दोनोंसमानता से रहें, नहीं हो सकती। फिर, जब इस पर मुसलमानों का शासन होगा तो यह मुसलमानों की धरती हो सकती है। इस समय यह देश गैर-मुस्लिम सत्ता के प्राधिकार के अन्तर्गत हैं, इसलिए मुसलमानों की धरती नहीं हो सकती। यह देश दार-उल-इस्लाम होने की बजाय दार-उल-हर्ब बन जाताप है। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि यह दृष्टिकोण केवल शास्त्रीय है। यह सिद्धान्त मुसलमानों को प्रभावित करने में बहुत कारगर कारण हो सकता है।” (पृ. २९६-२९७)
१२. दार-उल-हर्व भारत को दार-उल-इस्लाम बनाने के लिए जिहाद-”यह उल्लेखनीय है कि जो मुसलमान अपने आपको दार-उल-हर्ब में पाते हैं, उनके बचाव के लिए हिजरत ही उपाय नहीं हैं मुस्लिम धार्मिक कानून की दूसरी आज्ञा जिहाद (धर्म युद्ध) है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। संसार के दो खेमों में बंटने की वजह से सारे देश या दो दार-उल-इस्लाम (इस्लाम का घर) या दार-उल-हर्ब (युद्ध का घर) की श्रेणी में आते हैं। तकनीकी तौर पर हर मुस्लिम शासक का, जो इसके लिए सक्षम है, कर्त्तव्य है कि वह दार-उल-हब्र कोदार-उल-इस्लाम में बदल दे; और भारत में जिस तरह मुसलमानों के हिज़रत का मार्ग अपनाने के उदाहरण हैं, वहाँ ऐसेस भी उदाहरण हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया।”
”तथ्य यह है कि भारत, चाहे एक मात्र मुस्लिम शासन के अधीन न हो, दार-उल-हर्ब है, और इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।” (पृ. २९७-२९८)
१३. हिन्दू-मुस्लिम एकता असफल क्यों रही ?-”हिन्दू-मुस्लिम एकता की विफलता का मुखय कारण इस अहसास का न होना है कि हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं हैं इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता हैं दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती हैं दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया हैं, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिन्दू और मुसलमानों के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।” (पृ. ३३६)
१४. हिन्दू-मुस्लिम एकता असम्भव कार्य-”हिन्दू-मुस्लिम एकता की निरर्थकता को प्रगट करने के लिए मैं इन शब्दों से और कोई शबदावली नहीं रख सकता। अब तक हिन्दू-मुस्लिम एकता कम-से-कम दिखती तो थी, भले ही वह मृग मरीचिका ही क्यों न हो। आज तो न वह दिखती हे, और न ही मन में है। यहाँ तक कि अब तो गाांी ने भी इसकी आशा छोड़ दी है और शायद अब वह समझने लगे हैं कि यह एक असम्भव कार्य है।” (पृ. १७८)
१५. साम्प्रदायिक शान्ति के लिए अलपसंखयकों की अदला-बदली ही एक मात्र हल-”यह बात निश्चित है कि साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंखयकों की अदला-बदली ही हैं।यदि यही बात है तो फिर वह व्यर्थ होगा कि हिन्दू और मुसलमान संरक्षण के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं। यदि यूनान, तुकी और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके तो यह मानने का कोई कारण नहीं है कि हिन्दुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते। फिर यहाँ तो बहुत कम जनता को अदला-बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी ओर चूंकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है। इसलिए साम्प्रदायिक शांति स्थापित करने के लिए एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यन्त उपहासास्पद होगा।” (पृ. १०१)
१६. विभाजन के बाद भी अल्पसंखयक-बहुसंखयक की समस्या बनी ही रहेगी-”यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि पाकिस्तान बनने से हिन्दुस्तान साम्प्रदायिक समस्यासे मुक्त नहीं हो जाएगा। सीमाओं का पुनर्निर्धारण करके पाकिस्तान को तो एक सजातीय देश बनाया जा सकता हे, परन्तु हिन्दुस्तान तो एक मिश्रित देश बना ही रहेगा। मुसलमान समूचे हिन्दुस्तान में छितरे हुए हैं-यद्यपि वे मुखयतः शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं। चाहे किसी भी ढंग से सीमांकन की कोशिश की जाए, उसे सजातीय देश नहीं बनायाजा सकता। हिन्दुस्तान को सजातीय देश बनाने काएकमात्र तरीका है, जनसंखया की अदला-बदली की व्यवस्था करना। यह अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि जब तक ऐसा नहीं कियाजाएगा, हिन्दुस्तान में बहुसंखयक बनाम अल्पसंखयक की समस्या और हिन्दुस्तान की राजनीति में असंगति पहले की तरह बनी ही रहेगी।” (पृ. १०३)
१७. अल्पसंखयकों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक उपाय-”अब मैं अल्पसंखयकों की उस समस्या की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जो सीमाओं के पुनः निर्धारण के उपरान्त भी पाकिस्तान में बनी रहेंगी। उनके हितों की रक्षा करने के दो तरीके हैं। सबसे पहले, अल्पसंखयकों के राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में सुरक्षा उपाय प्रदान करने हैं। भारतीय के लिए यह एक सुपरिचित मामला है और इस बात पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है।” (पृ. ३८५)
१८. अल्पसंखयकों की अदला-बदली-एक संभावित हल-”दूसरा तरीका है पाकिस्तान से हिन्दुस्तान में उनका स्थानान्तरणकरने की स्थिति पैदा करना। अधिकांश जनता इस समाधान को अधिक पसंद करती हे और वह पाकिस्तान की स्वीकृति के लिए तैयार और इच्छुक हो जाएगी, यदि यह प्रदर्शित किया जा से कि जनसंखया का आदान-प्रदान सम्भव है। परन्तु इसे वे होश उड़ा देने वालीऔर दुरूह समस्या समझते हैं। निस्संदेह यह एक आतंकित दिमाग की निशनी है। यदि मामले पर ठंडे और शांतिपूर्ण एंग से विचार किया जाए तो पता लग जाएगा कि यह समस्या न तो होश उड़ाने वाली है, और न दुरूह।” (पृ. ३८५)
(सभी उद्धरण बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाड्‌मय, खंड १५-‘पाकिस्तान और भारत के विभाजन, २००० से लिए गए हैं)
१४. माधवराव सदाशिव राव गोलवलकर ‘गुरू जी’ (१९.२.१९०६-५.६.१९७३)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सर संघचालक (१९४०-७३) श्री गुरू जी ने अपनी पुस्तक ”बंच ऑफ थॉट्‌स”, (अध्याय XVI, आन्तरिक खतरा-१. मुसलमान, पृ. १७७-१८७, १९६६) में कहा :

१. मुस्लिम मानसिकता-”क्या (पाकिस्तान बनने के बाद) जो मुसलमान भारत में रह गए हैं, उनकी मानसिकता तनिक भी बदल गई है ? क्या उनकी पुरानी शत्रुता और हत्या करने की मनस्थिति जिसके फलस्वरूप १९४६-५७ में व्यापक मात्रा में दंगे, लूट, आगजनी, बलात्कार और विभिन्न प्रकार की लम्पटताएं अभूतपूव्र स्तर पर हुईं, अब समाप्त हो गई ? ऐसा भ्रम से भी विश्वास कर लेना कि पाकिस्तान बनने के बाद वे रातोंरात राष्ट्र भक्त हो गए हैं, आत्मघाती होगी। इसके विपरीत पाकिस्तान बन जाने के कारण मुस्लिम खतरा सैंकड़ों गुना और बढ़ गया है क्योंकि पाकिस्तान हमारे देश पर समस्त भावी आक्रामक कार्यवाहियों के लिए कए स्थायी आधार बन गया है।” (पृ. १७८)
२. भारीय मुसलमानों की दोहरी आक्रामक नीतियाँ-”उनकी आक्रामक रणनीति सदैव दोहरी रही है : पहली ‘सीधा आक्रमण’। स्वतंत्रता पूर्व जिन्ना नपे इसे ‘डाईरेक्ट एक्शन’ या ‘सीधी कार्यवाही’ कहा जिसके पहले झटके के फलस्वरूप उन्हें पाकिस्तन मिला।” (पृ. १७८)….. ”उनके आक्रमण का दूसरा मोहरा हमारे देश के संवदेशनील क्षेत्रों में तेजी से अपनी जनसंखया बढ़ाना है। कश्मीर के बाद इनका दूसा निशाना आसाम है। वे पिछले अनेक वर्षों से नियोजित ढंग से आसाम, त्रिपुरा ओर शेष बंगाल में तेजी से घुस पैंठ कर रहे हैं। ऐसा, हमारी तरह, कोई भी विश्वास नहीं करेगा कि क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में अकाल का प्रकोप है, इसलिए लोग वहाँ से आसाम और पश्चिमी बंगाल में आ रहे हैं। पाकिस्तानी मुसलमान तो पिछले पन्द्रह वर्षों (१९५१) से आसाम में घुस पैठ कर रहे हैं। क्या इसका यह अर्थ है कि पिछले पन्देह वर्षों से अकाल उन्हें धकेतला रहा है ? ” (पृ. १७९)
३. फिर १९४६-५७ जैसी स्थिति-”इस बात के स्पष्ट लक्षण हैं कि भारत में १९४६-४७ जैसी विस्फोटक स्थिति फिर तेजी से पनप रही हे और पता नहीं विस्फोट कब हो जाए। दिल्ली से लेकर रामपुर औरल खनऊ तक मुसिलम खतरनाक षड्‌यंत्रों जैसे हथियारों की जमाखोरी और अपने लोगों को लामबंद करने में व्यस्त हैं और सम्भवतः वे अन्दर से आक्रमण करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जब पाकिस्तान हमारे देश पर सशस्त्र हमला करने का फैसला करें।” (पृ. १८१)
४. अनेक भारतीय मुसलमान पाकिस्तान के सम्पर्क में-”सार की बात यह है कि व्यवहार में प्रत्येक जगह एसे मुसलमान हैं जो कि पाकिस्तान के साथ ट्रान्समिटर के द्वारा लगातार सम्पर्क में रहते हैं। ऐसा करते हुए वे न केवल एक सामान्य नागरिक के अधिकारों का प्रयोग कर रहे हैं बल्कि कुछ विशेष रिययतें और कुछ विशेष अधिकार भी क्योंकि वे ‘अल्पसंखयक’ हैं। हमारा गुप्तचर विभाग ऐसे लोगों, जो हमारे देश के अस्तित्व को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, की अपेक्षा राष्ट्र भक्त लागों के बारे में ज्यादा सतर्क प्रतीत होते हैं।” (पृ. १८५)

५. वास्तविकता का सामना करो-”मुसलमान, आज भी चाहे किसी ऊँचे सरकारी पद पर हों या बाहर हों, राष्ट्रविरोधी गोष्ठियों में खुल्लम खुल्ला भाग लेते हैं उनके भाषणों में विरोध और अवज्ञा सुस्पष्ट दिखाई देती है। एक केन्द्रीय मंत्री ने एक ऐसी ही गोष्ठी के मंच से बोलते हुएधमकी दी जब तक कि मुसलमानों के हितों को सुरक्षित नहीं रखा गया यहाँ भी स्पेन जैसी स्थिति दुहराई जाएगी जिसका अर्थ है कि वे सशस्त्र क्रांति के लिए उठ खड़े होंगे।”
……”अब हम और रोना-धोना बंद करें जब तक कि बहुत देर न हो जाए; और देश की सुरक्षा और अखंडता को सर्वोत्तम प्राथमिकता देते हुए इस लम्बी आत्मघाती चली आई मानसिकता का सामना करने के लिए तैयार हो जाओ।” (पृ. १८६-१८७)
१५. नीरद चन्द्र चौधरी

आधुनिक युग के प्रमुख चिन्तक और सुप्रसिद्ध बुद्धिजीवी ने लिखा-

१. इस्लामी सिद्धान्त गैर-मुस्लिमों के साथ भेद-भव पूर्ण हैं-”इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार एक मुसलमान यह मानने के लिए प्रतिबद्ध है कि सब मुसलमान उसके भाई हैं और सभी गैर-मुसलमान उसके दुश्मन हैं। मुस्लिम समाज की आन्तरिक समानता ओर भ्रतृत्वपन के कारण मुसलमान गैर-मुसलमानों के प्रति अपनी विभिन्नताओं के प्रति अधिक जागरूक हैं।”
२. इस्लाम द्वारा विश्व का इस्लामी और गैर-इस्लामी राज्यों में विभाजन-”इस्लामी धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार एक मुसलमान के लिए विव दो सुस्पष्ट भागों में विभाजित किया गया है : एक दार-उल-इस्लाम-यानी ऐसा देश जो इस्लामी कानूनोंके अनुसार शासित किया जाता है और दूसरा दार-उल-हर्ब या जिहाद का देश यानी ऐसा देश जिसे मुसलमानों को युद्ध द्वारा जीत कर वहाँ इस्लामी राज्य व्यवस्था स्थापित करना है।”
३. दार-उल-हर्ब में मुसलमानों को लगातार युद्ध करते रहना चाहि-”इस्लामी सिद्धान्त के अनुसार मुसलमान एक गैर-मुसलमानी जगत से लगातार संघर्ष करते रहना चाहिए। इसीलिए एक गैर-मुस्लिम देश दार-उल-हर्ब यानी ‘युद्ध का देश’ कहलाता है। ”इस इस्लामी आदेश के कारण एक मुस्लिम राज्य और एक गैर-मुस्लिम (सेक्यूलर) राज्य के बीच कभी भी किसी प्रकार की मित्रता नहीं हो सकती है जब तक कि गैर-मुस्लिम राज्य मुस्लिम राज्य नहीं बन जाता है और जब तक ऐसा नहीं हो जाता है, प्रत्येक मुसलमान को गैर-मुसलमानों के विरुद्ध जिहाद या संघर्ष अवश्य करते रहना चाहिए।”
४. जिहाद में गैर-मुसलमानों को तीन विकल्प-”जिहाद के सिद्धान्त के अनुसार, गैर-मुसलमान के सामने केवल तीन विकल्प हैं : (१) या तो वह इस्लाम स्वीकार करें (२) या वह आत्मसमर्पण करके मुसलमानों की गुलामी स्वीकार करके नियमित ज़िजिया टैक्स दे, या फिर (३) लड़ने को तैयार रहे। इस्लाम के अनुसार एक मुसलमान का एक गैर-मुसलमान के सामने प्रस्तुत करने को कोई चौथा विकल्प नहीं है।” (नीरद चन्द्र चौधुरी-शत वार्षिकी के संकलन में से, प्रकाशक मित्रा एण्ड घोष, कोलकता २०००, पृ. ४७०-४७१)
५. मुसलमानों ने हजारों हिन्दू मंदिरों को नष्ट-भ्रष्ट किया-”मैं कहता हूँ कि मुसलमानों को एक मस्जिद के नष्ट करने की शिकायत करने का तनिक भी अधिकार नहीं है। १००० एडी से लगातार काठियावाड़ से बिहार तक और हिमालय से विन्ध्याचल तक प्रत्येक हिन्दू मंदिर अपवित्र और नष्ट किया गया। उत्तरी भारत में तो एक भी मंदिर को अखंडित नहीं रहने दिया गया…….. केवल वे ही मंदिर नष्ट होने से बचे जहाँ पर मुस्लिम शक्ति की उन तक पहुंच नहीं थी जैसे कि अत्यन्त घने जंगलों का होना। इसके अलावा संर्वत्र लगातार विध्वंस का दौर रहा।”
६. हिन्दू अपमान क्यों भूल जाएँ ? ”थोड़ा-सा भी स्वाभिामान रखने वाला देश इस क कृत्य को क्षमा नहीं करेगा। इन्होंने हमारी स्त्रियों का बलात्‌ अपहरण किया और इन्होंने ज़जिया-टैक्स लगाया। हम यह सब क्यों भूल जाएँ और इसके लिए इन्हें क्यों क्षमा कर दिया जाए ? जो कुछ अयोध्या में हुआ, वैसा कुछ नहीं होता यदि मुसलमान इस ऐतिहासिक तर्क की सच्चाई को एक बार भी स्वीकार कर लेते। तब हम यह कह सकतेथे : ठीक है। अतीत को अतीत ही रहने दो और फिर हम इस समस्या का सर्वोत्तम समाधान ढूँढ़ने का प्रयास करें”
७. मुसलमानों ने स्थायी संघर्ष को प्रारम्भ किया-”समस्त तर्क का सार यह है कि जीवन के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण और मुस्लिम दृष्टिकोण पूर्णतया संघर्षोंन्मुख हो मानव समाज में स्थायी संघर्ष को जन्म देने वाले पहले व्यक्ति मुसलमान ही थे। फिर साम्यवादियों ने इसे अपनाया। मुसलमान, गैर-मुसलमानों की राजनैतिक अधीनता में नहीं रह सकते हैं। दूसरे, मुसलमान, मानव जगत को दो क्षेत्रों-‘शांति के क्षेत्र’ और ‘संघर्ष के क्षेत्र में’ विभाजित करते है। यह प्रत्येक मुसलमान का कर्त्तव्य है कि वह गैर-मुस्लिम क्षेत्र को इस्लाम के अधीन लाने का प्रयास करें।” (सन्डे टाईम्स ऑफ इंडिया, अगस्त ८, १९९३), दिल्ली सम्पादक पंडगांवकर के साथ साक्षात्कार में)
१६. डॉ. यदुनाथ सरकार

विश्व विखयात इतिहासकार ने इस्लाम के बारे में इस प्रकार लिखा :

१. इस्लाम में बहुदेवतावाद पाप-”इसलिए परम्परागत इस्लाम में किसी अन्य सम्प्रदाय (देवता) को सहन करना पाप कमाने से अधिक उत्तम नहीं है और सबसे निकृष्ट प्रकार का पाप बहुदेवतावाद है यानी एक ऐसा विश्वास जिसके अनुसार अन्यदेवता भी एक सच्चे देवता के सहभागी होते हैं। ऐसा विश्वास उसके प्रति घोर कृतघ्नता है जो हमें जीवन और दैनिक आजीविका देता है।”
२. जिहाद का अर्थ है ‘अल्लाह के मार्ग में प्रयास करना’-”इसलिए इस्लामी सिद्धान्त के अनुसार एक सच्चे विश्वासी (मुसलमान) का सबसे श्रेष्ठ कर्त्तव्य यह है कि वह अल्लाह के मार्ग में अधकितम प्रयास करके गैर-मुसलमानों के देश (दारूल हर्ब) के विरुद्ध संघर्ष करे जब तक कि वे गैर-मुसलमान इस्लाम के अंग न बन जाएं। विजय े बाद, समस्त गैर-मुसलमान लोगों की हैसियत सिद्धान्ततः विजेता सेना (मुसलमानों) के अधीन गुलामों जैसी हो जाती हैं। ऐसे सशस्त्र बंदियों को कत्ल कर दिया जाए या गुलामी के लिए बेच दिया जाए और उनी पत्नियों और बच्चों को दास कार्यों  में लगा दिया जाए। लेकिन युद्ध न करने वाले बंदियों की तत्काल हत्या न की जाए जैसाकि इस्लामी कानून का विशेषज्ञ शफी कुरान के अनुसार बतलाता है कि उन्हें तब तक का अवसर दिया जाए जब तक कि समझा-बुझाकर सच्चे धम्र इस्लाम को स्वीकारने के लिए उन्हें तेयार न कर लिया जाए।” (दी हिस्ट्री ऑफ़ आरंगज़ेब, खंड ३, पृत्र १६३-१६४, १९७२)
३. गैर-मुसलमानों की हत्या करना एक पुण्यफल-”इस्लाम में अविश्वासियां।(गैर-मुसलमानों) की हत्या करना (भले ही वे निरपराधी हों) एक पुण्य फल समझा जाता है। यह आवश्यक नहीं है कि उस (मुसलमान) में उमंग या आत्मसंयम हो, यह भी आवश्यक नहीं कि वह अपने अंदर अत्यधिक आध्यात्मिकता का विकास करें। उसे केवल एक विशेष वर्ग (गैर-मुसलमान)ह के व्यक्तियों की हत्या करनी है या उनकी ज़मीनों और सम्पत्तियों पर कब्जा करना है और इतने कार्य मात्र से ही उस (मुसलमान) की आत्मा का जन्नत मिल जाएगी। एक ऐसा धर्म जिसमें अपने अनुयायिों को अपने ही साथियों की लूट-पाट और हत्या करने को धार्मिक कर्त्तव्य होने की शिक्षा दी जाती है, उससे मानव जाति की प्रगति अथ्वा विश्व शांति का हेना असंगत है।” (वही, पृ. १६१-१६९)
४. मुस्लिम देश के शासक और उसके पड़ोसी गैर-मुस्लिम राज्यों के बीच शांति असम्भव-”कुरानी कानून के अनुसार मुहम्मदीय बादशाह और उसके पड़ोसी गेर-इस्लामी राज्यों के बीच कभी शांति नहीं रह सकती है। क्योंकि बाद के राज्य ‘दार-उल-हर्ब’ यानी कानूनन ‘संघर्ष के राज्य’ हैं और एक मुस्लिम बादशाह का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह उनको (गैर-मुस्लिम लोगों) को लूटे और उनका कत्ल करे जब तक कि वे सच्चे धर्म (इस्लाम) को स्वीकार नकर लें और वह देश ‘दार-उल इस्लाम’ न हो जाए और उसके बाद वे (बादशाह द्वारा) अपनी सुरक्षा के अधिकारी हो जाएंगें।”
(शिवाजी एण्ड हिज़ टाईम्स, ले. यदुनाथ सरकार, पृ. ४७९-४८०, प्रकाशक ओरियंट लौंगमेन)
१७. डॉ. के. एस. लाल (१९२०-२००२)

सुप्रसिद्ध इतिहासका डॉ. के. एस. लाल अपनी पुस्तक ”थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ़ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया”, (१९९९) में लिखते हैं :
१. कुरान अन्य धर्मों के अस्तित्व एवं निरन्तरता की आज्ञा नहीं देता-”ये दोनों (हिन्दू राजा और मुस्लिम सुलतान) दो विभिन्न धार्मिक धाराओं का अनुसरण करते हें। मुस्लिम सुलतानों ने अपने इस्लामी कानून (शरियत) के अनुसार और हिन्दू राजाओं ने अपने धर्म शास्त्रानुसार भारत में राज्य किया। मगर इन दोनों की शासन प्रणाली और युद्ध के नियम, एक-दूसरे से पूर्णतया भिन्न थे। कुरान, अन्य धर्मों के अस्तित्व, उनके धार्मिक रीति-रिवाजों और उनकी निरन्तरता को बने रहने देने की अनुमति नही देता है।” (पृ. ४)
२. अधिकांश कुरान काफ़िरों, मुशरिकों और मुनाफ़िकों के बारे में है-”कुरान की ६३२६ आयातों में से उन्तालीस सौा (३९००) आयतें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से अल्लाह औरउसके ‘रसूल’ (मुहम्मद) में ‘ईमान’ न रखने वालों या काफिऱों, मुशरिकों (बहुदेववादी) मुनकिरा व मुनाफ़िकों (कपटाचारियों) से सम्बन्धित हैं। मुखय रूप से ये उन्तालीस सौ आयतें दो श्रेणियों की है। एक श्रेणी की आयतें उन मुसलानों से सम्बन्धित हैं जो अल्लाह में ईमान लाने के कारण इसी जीवन में ओर मरने के बाद भी पुरस्कृत किए जाएंगे और दूसरी प्रकार की वे आयतें हैं जो गैर-ईमानवालों व काफ़िरों से सम्बन्धित हैं जो कि न केवल इस जीवन में सताए जाएंगे बल्कि मरने के बाद जहन्नम (नरक) की आग में डाले जाएंगे।” (पृ. ५)
३. कुरान एक युद्ध-नियम पुस्तिका (मैनुअल) जैसी प्रतीत होती है-”कुरान मानव जाति के लिए भाई चारे के विधान की अपेक्षा एक युद्ध म्बन्धी विधिविधान का ग्रंथ (मैनुअल) प्रतीत होता है। कुरान का अन्य धर्म वालों के विरुद्ध जिहाद या स्थायी युद्ध का आदेश, पहले भी था, आज भी है। इस्लाम अन्य धर्म वालों के विरुद्ध जिहाद या लगातार युद्ध करने तथा उन्हें कैद करने, बाँधने, कत्ल करने और इन्हें ‘जहन्नम’ की आग में जलाने की सिफारिश करता है। इससे इस्लाम एक सर्वसत्तात्मक ओर आतंकवादी धार्मिक पंथ हो जाता है जैसाकि वह अपने जन्म से ही रहाआया है।” (पृ. ५)
४. विदेशी मुस्लिम आक्रान्ताओं का उद्‌देश्य भारत का इस्लामीकरण था-”मुस्लिम आक्रान्ता ओर शासक केवल भारत को जीतने के लिए ही नहीं बल्कि वे समस्त भारत पर इस्लामी राज्य स्थापित करना चाहते थे। और इस क्रिया से उतपन्न खाई पट नहीं सकी। क्योंकि इस्लाम भारत पर एक बलात्‌ अध्यारोपण है। इससे भी निकृष्टता तो यह है कि यह युद्ध की विजयों के द्वारा थोपा गया। राल्फ बोरसोडी-एक अमरीका शिक्षा विशेषज्ञ और सामाजिक चिन्तक अपनी पुस्तक ‘चैलेंज ऑफ़ एशिया’ में लिखता है : ” एशिया माइनर के अलावा दुनिया में सभी जगह, ये तीन बड़े समीटिक धर्म-यहूदी, ईसाइयत व इस्लाम घुस पैठिया हैं : एवं मूल रूप से एशिया, ब्राहृणवादी (हिन्दू), कन्फ्यूसियनी, बौद्ध और टाओवादी है तथा यूरोप पैगन है। यूरोप में ईसाइयत और एश्यिा में इस्लाम बलात्‌ अध्यारोपित हैं।” (पृ. ६-७)
५. जिहाद का मतलब : गेर मुसलमानों का धर्मान्तण या कत्ल-”जिहाद एक मुसलमान का सबसे बड़ा धार्मिक कर्त्तव्य है। जिहाद का मतलब है गैर-मुसलमानों का धर्मान्तरण, हमला व हत्या करना या उन्हें कैद करना है, भले ही उन्होंने मुसलमानों को कोई हानि न पहुंचाई हो और यहाँ तक किवे निहत्थे हों। जिहाद अल्लाह के लिए की जाती है; उसकी सेवा में पूजा और युद्ध दोनों एक हैं। जिहाद से पलायन या जी चुराना सबसे बड़ा पाप है, तथा जिहाद के द्वारा यश पाना सर्वोच्च सम्मान हैं। इस्लाम विजयवाद के दम्भ से पीड़ित है। यह कहता है कि उसकी दूसरों पर निश्चित विजय होनी चाहिए क्योंकि केवल इस्लाम ही सच्चा और अन्य सब धर्म झूठे हैं। माना सभी बहिष्कारवादी कट्‌टरपंथी नहीं है परन्तु सभी मानते हैं कि केवल एकमात्र इनका ही धर्म सच्चा है। यह इस्लामी कट्‌टरपंथवाद है। कट्‌टरपंथवाद है। कट्‌टरपंथवाद का अर्थ है, अपने धर्म ग्रन्थों को ईश्वरीय प्रगटीकरण मानना। कट्‌टरपंथवाद संयोगवश नहीं बल्कि एक आवश्यक अवधारण है।” (पृ. ९-१०)
६. इस्लाम में सत्य का निर्णय तलवार से ही होता है-”इस्लाम में जिसे ज्ञान या इल्म कहा जाता है, उसका सदैव मतलब धार्मिक ज्ञान या खुदाई इलहाम से होता है और तर्क यह है कि इस्लाम में जो कछ भी है, वह सब सच है। यह इसकी परिवर्तनशीलता को इसकी शक्ति मानता है। यही कारण है कि मुस्लिम चिन्तकों और धार्मिक नेताओं के लए सुधार शब्द अत्यन्त घृणास्पद होता है। इस्लामी धर्मशास्त्रों में आज्ञाएं, आदेश और निर्देश हैं। कहींपर भी विचार-विनिमयों और आम सम्मति बनाने का उल्लेख नहीं है। मुहम्मद द्वारा अरेबिया विजय के बाद ऐसी ही रीति थी और ऐसी ही परम्परा वहाँ थी, जहाँ भी मुस्लिम सेनाएँ पहुंची। इस्लाम में सत्य का निर्णय तलवार से होता है, न कि पारस्परिक संवाद और तर्क से।” (पृ. १०)
७. इस्लाम में मूर्ति भंजन एक महत्वपूर्ण कार्य-”देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ना पैगम्बरीय मतों की एक देन है। इस्लाम में मूर्ति भंजन एक महत्वपूर्ण क्रिया है। लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण गैर-मुस्लिमों के पूजा स्थलों को अपवित्र करना और नष्ट करना है, न कि आपसी सहमति और धन आपूर्ति के द्वारा उनको बचे रहने देना। अत्तार के अनुसार सोमनाथ मंदिर ध्वस्त करते समय जो मुहम्मद गज़नबी ने कहा वह इस्लाम की सच्ची भावना का सार है।” (पृ. १०)
८. इस्लाम राजय और धर्म के बीच विभाजन की अनुमति नही देता-”इस्लाम के कानून और धार्मिक सिद्धान्त कुरान और हदीसों पर आधारित हैं। इस्लाम का सर्वसत्तात्मक स्वरूप राज्य और धर्म के बीच विभाजन की अनुमति नहीं देता है। जैसा कि आधुनिक कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि इस्लाम में कानून का सम्बन्ध कानून व्यवस्था की अपेक्षा धर्म से ज्यादा घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है (पृ. १०)
९. इस्लाम हिंसा और आक्रामकता का पंथ-”इस्लाम हिंसा और आक्रामकता का एक पंथ है। जिहाद की वैचारिकता ने इन्हें (मुसलमानों को) बिजली के करन्ट जैसी फुर्ती और ऊर्जा दी है और विश्व भर के लोगों ने इस्लाम को सदैव एक आक्रामक धर्म यानी हिंसा और आक्रामकता के पंथ के रूप में पहुँचना है।” (पृ. १२)
१०. इस्लाम आर्थिक लाभों के फलस्वरूप फैला-”इस्लाम अरबों के देश में जन्मा। अरबों की एक राजनैतिक शक्ति के रूप में विकसित होने के बार में इस्लाम के अनेक लेखकों ने लिखा है। टी. डब्लू अरनोल्ड ने माना है कि-अरबों का विस्तार-धार्मिक भावना के कारण से नहीं जितना कि अपने पड़ोसियों जो कि अधिक धनी और भाग्यशाली थे, की सांसारिक पदार्थों की लूट और भूमि प्राप्त करने की लालसा के कारण ज्यादा हुई है।”
”पैगम्बर मुहम्म कालीन अधिकांश अरबी लोग निर्धन थे। उन्हें एक ऐसे सुधारक की आवश्यकता थी जो उनकी आर्थिक स्थिति को सुधार सके। आर्थिक स्थिति सुधारने और निर्धनता दूर करने के दो ही तरीके हैं : एक साधन तो है कठोर परिश्रम और लगन द्वारा अपने संसाधनों की उन्नति करना, और दूसरा तरीका है दूसरोंपर हमला करके उनकी धन सम्पत्ति को लूटना और स्वयं धनी हो जाना। तात्कालीन प्रारम्भिक गरीब अरबों को या तो उन्हें अपनी जीविका के लिऐ कड़े परिश्रम के लिए प्रेरित किया जाता अथवा उन्हें अन्यों पर हमला करके उन्हें लूटा जाता। इस्लाम ने दूसरे विकल्प को चुना जैसाकि अल्लाह ने आदेश दिया था। गरीब और गुलाम वर्ग के लोगों की भर्ती के फलस्वरूप ईमान लाने वाले मुसलमानों की संखया तेजी से बढ़ने लगी। एडवर्ड गिबन की लच्छेदार भाषा में कहें तो ”चरवाहे लुटेरे बन गए और लुटेरों को इकट्‌इा करके विजय के लिए सेना तैयार कर ली गई। ”अल्लाह की दृष्टि में सैनिक बनना न केवल एक श्रेष्ठ और आकर्षक व्यवसाय था, बल्कि वह सबसे लाभदायक भी था।” (पृ. १२-१३)
११. गैर-मुस्लिम के प्रति मक्काई आयतों में शान्ति-”मदानाई आयातों में असहिष्णुता मक्काई आयतों में गैर-मुस्लिमों के प्रति सहिष्णुता है। मगर मदीनाइ्र आयतों में उनके विरुद्ध संघर्ष का आदेश”। कुरान में एक या दो ऐसी आयतें है जिनमें कहा गया है कि ”मेरे लिए मेरा धर्म और तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म” २ : २५६ सहिष्णुता का उपदेश देने वाली सभी आयतें मक्काई हैं यानी प्रारम्भिक सूराओं मेंहै, और गैर-मुस्लिमों की हत्या, उनके गले काटना और अंग-भंग करने के आदेश् मदीनाई आयतों में पाए जाते हैं यानी बाद में सहिष्णुता को असहिष्णुता में बदल दिया गया। उदाहरण के लिए सूरा नौ की पांचवीं सुप्रसिद्ध आयत ”मूर्ति पूजकों का कत्ल करो, जहाँ कहीं भी उन्हें पाओ” द्वारा पिछली १२४ आयतों को निरस्त कर दिया गया जिनमें धैर्य और सहिष्णुता की बात कही गई है।” (पृ. १५)
१२. मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के लिए नैतिकता के दो विभिन्न मापदण्ड-”इस्लाम में नैतिकता, न्याय और सदाचार के दोहरे मापदण्ड हैं : एक मुसलकामनों के लिए और दूसरा गैर-मुसलमानों के लिए। निष्ठा,उ सद्‌भावना और भ्रातृतव केवल अल्लाह विश्वासी-मुसलमानों के लिए हैं जबकि गैर-मुसलमानों के लिए सिद्धान्त एवं आचरण के मापदण्ड उनसे भिन्न हैं।” (पृ. १५)
१३. अरबों का सिंध पर हमला-”भारत में, पहले अरबी और फिर तुर्की मुसलमान, आक्रमणों की तीन मुखय धाराओं के माध्यम से फैले। लेकिन ऐसा करने में उन्हें पाँच सौ वर्ष लगे। ६४३ ई. में ईरान विजय के बाद अरबी खलीफ़त की सीमाएँ भारत के फ्रन्टीयर क्षेत्र से लग गई थीं। भारत, जो प्रारम्भिक अरबों को हिन्द यासिन्ध के नाम से ज्ञात था, भी मुसलमानों की विस्तारवादी योजनाओं से अछूता नहीं रह सका था और उन्होंने अपनी सेनाएं भारत में समुद्री और मैदानी मार्गों से भेजीं। उन्होंने इन तात्कालीन ज्ञात व्यापार-मार्गों को चुना (१) कूफ़ा और बगदाद, वाया बसरा और हौरमुज़ से चौल जो भारत के पश्चिमी तट से जुड़ा था; (२) पश्चिमी पर्सियन नगरों से, वाया हौरमुज से सिंध में  देवल तक और (३) मैदानी मार्ग उत्तरी खुरासान से काबुल वाया बानियान। लेकिन भारत में मुस्लिम सेना और इस्लाम की प्रगति धीमी, और बहुत धीमी रही, क्योंकि मुस्लिम आक्रान्ताओं की घोषणाओं के उद्‌देश्यों ने कठोर भारतीय प्रतिरोध और उसकी आन्तरिक अवरोध शक्तियों का अनुमान नहीं लगाया था। खलीफा उमर (६३४-६४४ एडी) ने ६३६-६३७ एडी में थाना को लूटने के लिए एक अभियान दल भेजा। इसके बाद खलीफा उस्मान, और ली ने भी इसी प्रकार के अभियान दल भेजे लेकिन ये सभी बेकार सिद्ध हुए। इस्लाम के पहले चारों ‘पवित्र खलीफा’ सिंध या हिन्द पर विजय की सूचना सुने बिना ही चल बसे।” (पृ. १७)
१३. इस्लाम शस्त्र बल से फैला-”इस्लाम अद्वितीय सशस्त्र शक्तिपूर्ण अभियानों के द्वारा फोला। कुछमुस्लिम व्यापारियों ने अपने पंथ को शान्तिपूर्ण तरीकों तथा अपने अधीन कर्मचारियों और अन्य लाभान्वितों को इस्लाम में धर्मान्तरित करके भी फैलाया। इस्लाम के शांतिपूर्ण ढंग से प्रचार की सम्भावना बहुत कम थी क्योंकि प्रारम्भिक अरबी मुसलमान अधिकांशतः इने शिक्षित नहीं थे जो कि वे वाद-विवाद, बहस, तर्क आदि के द्वारा विश्वास दिला सकें।
इसलिये वे इस नए पंथ को फैलाने के किए किसी मिशनरी भावना से काम करने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे। वे केवल तलवार ही भलीभांति चला सकते थे। इसलिए मुस्लिम ऐतिहासिक साहित्य बार-बार दुहराता है कि इस्लाम का प्रसार सैनिक विजयों के द्वारा हुआ जबकि पराजितों के सामने दो ही विकल्प-इस्लाम या मौत, रखे जाते थे। उन्होंने इस्लाम को स्वीकारा-क्योंकि उनके सामने शायद ही अन्य कोई विकल्प था। मृत्यु कोई विकल्प नहीं होता है क्योंकि कोई भी मौत को चुनना नहीं चाहेगा। इसीलिए इन्होंने इस्लाम को चुना।” (पृ. १४-१५)
१४. सैन्य बल द्वारा इस्लाम का फैलाव-”जैसा कि संयुक्त राष्ट्र संघ के रिलीफ और वर्क्स एजेन्सी के शिक्षा विभाग में कुछ काल तक परामर्शदाता रहे डॉ. अली इसा औथमन ने कहा ”इस्लाम का फैलाव सैन्य बलसे हुआ। इसे लिए माफी मांगने की प्रवृत्ति दिखाई देती है, और हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। क्योंकि ‘कुरान के आदेशों में से एक ऐसा है कि तुम्हें इस्लाम के प्रसार के लिए संघर्ष करना चाहए।”
”इस्लाम के इस प्रसार के लिए किए गए संघर्षों में सफलतानाएँ मध्यकालीन मुस्लिम इतिहास का मुखय अंग हैं। इस्लाम में शक्ति के महत्व को स्वीकारना चाहिए, न कि उसका अवमूल्यांकन करना। डॉ. अजीज़ अहमद और मुहममद मुजीब जैसे कुछ आधुनिक इतिहासकारों द्वारा शक्ति को इस्लाम के प्रसार का आधार नकारने में इस्लाम के इतिहास ओर दर्शन के मौलिक तथ्य की सत्यता बदली नहीं जा सकती है और न काफिर जिहाद, ज़िज़िया आदि शब्दों में निहित भावना को बदला जा सकता है। (पृ. २३)”
१५. इस्लाम अहिंसक नहीं हो सकता-”मुसलमानों के लिए जिहाद एक प्रेरणा और आवश्यक कर्त्तव्य होने के कारण, इस्लाम अहिंसक नहीं हो सकता है……….. एक मुसलमान के लिए किसी गैर-मुसलमान के विरुद्ध जिहाद से मुकर जाना एक महान पाप है। जो ऐसा करेंगे वे जहन्नम की आग में पकेंगे। कुरान की अनेकों आयतों से यह सुस्पष्ट है कि वह किसी आध्यात्मिक युद्ध अथवा अपनी नकारात्मक प्रवृत्तियों पर संयम करने की बातनहीं कर रही हे। यह तो साक्षात्‌ युद्ध के मैदान की बात कर रही हे और काफ़िरों के विरुद्ध खून के प्यासे आदेशों से उत्साहित कर रही हे। पढ़ने से कुरान एक धार्मिक किताब नहीं लगती बल्कि युद्ध की एक नियम पुस्तिका के समान प्रतीत होती है। यह अहिंसा का उपदेश नहीं देती है।” (थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस ऑफ मुस्लिम स्टेट इन इंडिया, पृ. २८६-२८७)
१६. कुछ सूफ़ी सम्प्रदाय मतान्ध हैं-”सूफियों में अनेक सम्प्रदाय हैं। इनमें से ये चार-चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी और नक्शाबन्दी, भारत में सुविखयात हो गए। पहले दो लोकप्रिय हो गए क्योंकि पिछले दो अत्यन्त कट्‌टरपंथी और धर्मान्ध थे। सूफियों में से बहुत कम ऐसे थे जो सांसारिक सम्पत्ति के प्रति उदासीन थे। अधिकांशों ने शासकों और नवाबों से भूमि-सम्पत्ति प्राप्त की और कुछ शानदार ढंग से रहते थे। उन्होंने अपने को अध्यात्मिक जीवन तक सीमित रखने के लिए संसार से विरक्ति नहीं ली थी बल्कि अपने संरक्षकों को गैर-मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध करने को अक्सर उकसाया और स्वयं भी ऐसे युद्धों में भाग लिया। यहाँ तक कि शेख मुइनुद्‌दीन चिश्ती को एक चित्र में सहनशीलता की मूरत की जगह उसे ‘इस्लाम का योद्धा’ दर्शाया गयाहै। मुइनुद्‌दीन चिश्ती (१२३ एडी) के दिनों से लेकर शाह वली उल्लाह (१७०३-१७६३) तक सूफी योद्धाओं की लम्बी श्रृंखला है। उन्होंने धम्र, राजनीति और युद्ध (जिहाद) में सक्रिय भाग लिया।” (वही, प. २८७)
१७. सूफियों द्वारा हिन्दुओं का इस्लामीकरण-”सूफ़ियों और मौलवियों ने मुस्लिम शसकों के धर्मान्तरण प्रयासों में खुलकर सहयोग दिया। मुहम्मद बिन तुग़लक (१३२६-१३५१) के समय से लेकर अकबर (१५५६-१६०५) तक बंगाल ने विद्रोहियों, शरणार्थियों, सूफी मशेख, असंतुष्ट नवाबों और उत्तर भारत के साहसी युवकों को आकर्षित किया। आक्रामक प्रकार के सूफी मशेखों ने बंगाल की भूमि को हिन्दुओं के धर्मान्तरण के लिए उपजाऊ माना और मुसलमानों की संखया बढ़ाने के लिए उन्होंने कठोर परिश्रम किया।” (इंडियन मुस्लिम हू आर दे ?, पृ. ५८)
१८. सूफ़ियों ने इस्लाम-प्रसार के लिए शान्तिपूर्ण एवं आक्रामक तरीके अपनए-”सूफ़ियों ने अधिकांशतः शान्तिपूर्ण मिशनरियों की भांति कार्य किया लेकिन यदि उन्होंने कहीं पाया कि कुछ उचति उद्‌देश्य (इस्लाम प्रसार) के लिए सैनिक कार्यवाही की जरूरत है, तो उन्होंने (गैर-मुस्लिमों से) युद्ध करने हिचक नहीं की। संक्षेप में, सूफीमुशेखों ने आक्रामक और शान्तिपूर्ण दोनों तरीकों से हिन्दुओं का धर्मान्तरण किया, उनके पूजास्थलों पर कब्जा किया और उन्हें खानकहों और मस्जिदों में बदल दिया, ताकि पूर्वी बंगाल को विशेषकर एक मुस्लिम भूमि बनाई जा सके। मध्यकालीन इतिहासकारों ने बंगाल में बलात्‌ धर्मान्तरण की कहानियों को बड़े जोश के साथ वर्णन किया है।” (इंडियन मुस्लिम हू आर दे ?, पृ. ५९)
१९. शाह वलीउल्लाह द्वारा भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण-”सूफ़ी विद्वान शाह वली उल्लाह ने अफ़गानिस्तान के बादशाह अहमदशाह अब्दाली को मुसलमानों की सहायता के लिए भारत पर हमला करने के लिए आमंत्रित किया। पत्र बताता है : ”संक्षेप में (भारत में) मुस्लिम समुदाय दयनीय स्थिति में है। सरकारी मशीनरी का सभी नियंत्रण हिन्दुओं के हाथों ें है क्योंकि केवल वे ही लोग हैं जो कि योग्य और परिश्रमी हैं। सम्पत्ति और समृद्धि उनके ही हाथों में केन्द्रिति है जबकि इसमें मुसलमानों का हिसा। गरीबी और दरिद्रता के अलावा कुछ नहीं है…….इस समय तुम ही एक ऐसे बादशाह हो जो कि शक्तिशाली, दूरदर्शी और शत्रु की ताकतों को हराने के योग्य हो। निश्चय हो यह तुम्हारा अनिवर्यकर्त्तव्य है कि तुम भारत पर चढ़ाई करो, मराठाओं के शासन को समाप्त करो और कमजोर और बूढ़े मुसलमानों को गैर-मुसलमानों का शासन बना रहेगा और मुसलमाना इस्लाम को भूल जायेंगे। थोड़े से ही समय में यह देश ऐसा हो जायेगा जिसमें मुसलमानों को गैर-मुसलमानों में से पहचानने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा।” (दी लीगेसी ऑफ़ मुस्लिम रूल इन इंडिया, पृ. ३२५)
नोटः अहमदशाह अब्दाली ने १७५७, १७५९ और १७६१ में भारत पर तीन हमले किए।
 
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Posted on October 14, 2011, in Islam. Bookmark the permalink. 11 Comments.

  1. Namaste dr. vivek ji,
    ek sujhav hai ki yadi aap itne lambe lambe article ko 2-3 bhag karke likhen to jyada achcha hoga.

  2. It would be far better if the article were to be brought in English.

  3. @Namaste dr. vivek ji

    I also support suggestion of Basant jhariya Ji. Really very knowledgeable Article. I have given your articles to many scholars & friends to awaken them & society. & Few days before I requested to you & once again I request you to translate Agniveer Article on Vedic series & on Ved Mantra.
    http://agniveer.com/series/vedic-lessons/
    And
    Lets truly enjoy! – Ishopanishad Mantra 1
    Lets have some action! – Ishopanishad Mantra 2
    Avoid troubles Remove guilt- Ishopanishad Mantra 3
    Quick transformation with Gayatri Mantra

    Motive of translation of these articles is to create interest in common masses to learn /know Veda e.i. knowledge directly emanates from God in every cycle of creation.

  4. नमस्कार विवेक आर्य जी !
    यह लेख सर्वथा सत्य है। इस्लाम को सुधारना असम्भव से भी भयंकर है। अग्निवीर कहता है कि इस्लाम को किसी ने अपहृत किया है। यह तो मुसलमान कहते है – अग्निवीर क्यो ऐसा कहते है मुझे पता नही। जो अल्लाह ने मजहब बनाया वह कैसे अपहृत हो सकता है? जब अल्लाह स्वयं कहता है कि क़ुरान को भ्रष्ट होने से बचाएगा तो इस्लाम का अपहरण असम्भव है। और अपहरण करने वाला कौन? मुल्लाह — वह कहते है कि इस्लाम कहता है कि गैर मुसलमानो को मार दो। इशरार अहमद तो आतंकवादियो से भी बुरे विचार रखते है।

    बहाउल्ला ने ईरान में इस्लाम को सुधारना चाहा और उसे बहाई का नाम दिया जो शांति का सन्देश कहते है। दूसरे शांति के प्रचारक भी आए और मिर्ज़ा ग़ुलाम अहमद क़ादियान के नाम से जाने जाते है। दोनो 19 शताब्दी में ही आए। ईरान संस्कृत शब्द आर्य से ही निकल आया है। अत: यह स्पष्ट है कि समाज सुधारक सदैव आर्य सभ्यता से ही आए है। स्वामी दयानन्द भी आर्य धर्म के ही प्रवर्तक है। बहाउल्ला और मिर्ज़ा साहब ने क्रमश: बहई और अहमदी के नाम पर वास्तव में वैदिक मंत्र – “सर्वे भवंतु सुखिन:” ही समझाया और वैदिक मंत्र – “ॐ सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनासि जानतां” का पालन करने को बताया। अधिकांश बहई और अहमदी “वसुधैव कुटुम्बकं” में विश्वास रखते है। इसका एक छोटा सा प्रमाण देखे – अल्लामा शेख़ मुहमद इक़्बाल अहमदी मुसलमान बने और इसके बाद उनमें देशप्रेम जग गया और वह रामभक्त हो गए।

    प्रमाण – http://satyagni.com/5316/iqbal-on-rama/

    वहाबी उपरोक्त सुधारको से घृणा करते है और लगभग सारे आतंकवादी वहाबी ही है। जो 2 % अच्छे मुसलमान है वह इनके कारण अपमानित होते है। आपके द्वारा लिखित लेख में जिनका उल्लेख है वह सभी वहाब / वहाबी के बारे में बात कर रहे होंगे। अच्छे मुसलमानो के बस का नही कि अपहरणकर्ताओ से स्वयं को बचा पाए।

    खैर – वह सब छोड़िए – यह बताए कि सनातन धर्म को मानने वालो के लिए क्या आदेश है?

    गुजरात दंगो वाला इतिहास दोहराना है अथवा समझौता लौहपथगामिणी के कथा को दोहराना है? जो असीमानन्द में हैदराबाद में किया वह आवश्यक था।

    मेरे मतानुसार पहले स्थानो को पुन: संस्कृत में डालना होगा। अलाहाबाद, मुजफ्फरनगर, ग़ाज़ियाबाद इत्यादि मुसलमान नाम निकाल बाहर करने होंगे और जो सिन्ध पाकिस्तान में गया उसे वापस लेना पड़ेगा। ( भारतीय सभ्यता सिन्धु घाटी के नाम से ही जानी जाती है। )

    आपके क्या विचार है? कृपया मार्ग प्रशस्त करे।
    धन्यवाद ॥

  5. Must visit

    http://www.islaminindia.org/category/13-evidence-that-islam-is-false/logical-proofs

    Please promote this and post on as many websites as you can.

  6. A Time for Peace, A Time for War

    The word “Islam” is closely related to the word “salam or silm” which means peace. Muhammad, sallallahu alayhe wa sallam, himself had a very peaceful nature, was extremely tolerant, and highly protective of the non-Muslim minorities living in the Muslim state.

    However, there are times when states find war inevitable, but Islam only permits war in specific and dire circumstances. It keeps warfare at a level of mercy and respect for the enemy that no other army has been able to reach. The Prophet sometimes had to fight for the mere survival of his people and message, but once their security was ensured, he immediately reverted to peace and diplomacy.

    There is a rigid code Muslims must abide by in deciding when they can fight and how the fighting should be conducted. War itself is despised, and is only a last-resort option when all other attempts at peace have been made.

    A Muslim is never allowed to initiate hostilities. “And fight in the way of Allah against those who fight against you, but transgress not the limits. Surely, Allah likes not the transgressors.” [2: 190].

    The only times in which believers are allowed to take up arms are when they are defending their own lives and the lives of their people, when they see the weak being oppressed in acts of tyranny, and when they are prohibited from practicing their religion:

    “And slay them wherever ye find them, and drive them out of the places whence they drove you out, for persecution is worse than slaughter. And fight not with them at the Inviolable Place of Worship until they first attack you there, but if they attack you (there) then slay them. Such is the reward of disbelievers.” [2: 191].

    “They question thee (O Muhammad) with regard to warfare in the sacred month. Say: Warfare therein is a great (transgression), but to turn (men) from the way of Allah, and to disbelieve in Him and in the Inviolable Place of Worship, and to expel His people thence, is a greater with Allah; for persecution is worse than killing. And they will not cease from fighting against you till they have made you renegades from your religion, if they can. And whoso be cometh a renegade and dieth in his disbelief: such are they whose works have fallen both in the world and the Hereafter, Such are rightful owners of the Fire: they will abide therein,” [2:217].

    Aside from these circumstances, there is no legitimate fighting in Islam.

    The conditions placed upon the soldier in battle are of utmost respect for the enemy and for human life. Islam makes a clear distinction between combatants and noncombatants, forbidding soldiers to harm defenseless civilian in any way. The Prophet said: “Do not kill the women, children, aged or the ill.” He also prohibited Muslims from harming monks in their monasteries or hermits in their caves. Cutting down trees, destroying livestock, wells, homes or land of the enemy is likewise forbidden. Upon seeing the corpse of a woman in a battlefield, Prophet Muhammad asked his companions why she had been killed, and condemned it.

    There is no excuse for any expedition or attack resulting in the killing of civilians, no one has the right to take innocent lives.

    For those enemies active in combat and those taken prisoner of war, the list of rights is lengthy. There is no torture, no killing of the wounded or defenseless, and the return of corpses to the enemy is honored. There is no mutilation of the enemy bodies. Even after Hind bint Utbah, a powerful lady of Makkah, chewed the liver of the Prophet’s uncle, Hamzah, after he was killed in a battle between Muhammad and her non-Muslim people, Muhammad still forbade his men from disrespecting a creation of God in such a way

    The Prophet commanded the believers to treat the prisoners of war with kindness. One prisoner by the name of Abu Aziz told how surprised he was to see the Muslims giving the better part of their meal-the bread-to the prisoners while they themselves just had dates. “Not a crumb of bread would fall into their hands without them giving it to me,” he narrated, “and I would be so embarrassed that I would reject it. But then they would return it back to me.”

    The Qur’an lays down strict guidelines for the declaration of war by a Muslim army, and Muslims are prohibited from breaching any treaty to which they have agreed.
    “If you fear treachery from any people throw back (their covenant) to them (so as to be) on equal terms (that there will be no more covenant between you and them), Certainly Allah likes not the treacherous. [8:58].

    The extent of the Prophet’s mercy can be seen in the Muslim conquest of Makkah, which happened towards the end of his life. The Makkan tribe of Quraish had blatantly violated the significant “Treaty of Hudaybiyya” by supplying men and arms in an effort to attack a Muslim-allied tribe. They had slaughtered ruthlessly, even killing inside the Holy Sanctuary, and knew they could expect retaliation for such a weighty crime.

    Muhammad, upon learning of the raid, set out for Makkah at the head of a colossal army of 10,000 men. Everyone
    wondered how he would conduct this expedition; if he wanted revenge for all the mockery, persecution, and murders of his companions, now was certainly the time. His forces humiliatingly outnumbered his enemies.

    When the army reached the outskirts of Makkah, they came upon the chief of Quraish, the archenemy of Islam, Abu Sufvan. Several Muslims were furious and wished to see him dead, but the noble Prophet received him. Muhammad
    asked his uncle, Abbas, to take Abu Sufyan ahead to a high gorge-giving him a full view of the Muslim army approaching Makkah.

    The leader must have felt his heart leap to his throat as he watched group after group, tribe after tribe pass in front of him. Finally, he turned to ‘Abbas and asked incredulously, “Oh Abbas! Who are all these people?” Abbas’s reply was
    plain and powerful: “This is the Apostle of Allah and his Companions.”

    When Abu Sufyan approached the Prophet Muhammad begging for pardon and forgiveness, it was not revenge he heard coming from Muhammad’s blessed lips. Instead, the Prophet simply said: “He who takes refuge in Abu Sufyan’s house is safe; whosoever confines himself to his house, the people therein will be in safety; and he who enters the Sacred Mosque is safe.”

    With these words Muhammad gave a full pardon and amnesty to the city of Makkah, and it was conquered in peace. To Wahshi, the murderer of Muhammad’s uncle Hamzah; a pardon. To Hind, who mutilated his body and chewed his liver, absolute clemency. To Habar, who had attacked the Prophet’s daughter so brutally that she eventually died, forgiveness.

    After seeing this, the people started to accept Islam in crowds, as long before, God had promised Muhammad they would. ” When comes the Help of Allah (to you against your enemies) and conquest (of Makkah), And you see that the people enter Allah’s Religion (Islam) in crowds, So glorify the Praises of your Lord, and ask for His forgiveness. Verily, He is the One Who accepts the repentance and forgives”
    [110:1-3].

    As families were reunited and the Muslims celebrated being back in the sacred city, Muhammad had other things in mind. After offering prayers to God for the victory, he proceeded directly to the House of God, the Ka’bah, that had been polluted by the 360 man-made idols. The Prophet of God proceeded to knock them to the ground with his bow. As he did, he recited the Qur’anic verse: “And Say: Truth (Islamic Monotheism) has come and falsehood (Polythesm) has vanished. Surely! Falsehood is ever-bound to vanish.” [17:81].

    “Al-Amin” returned to Madinah, where he spent the last years of his extraordinary life in worship and devotion to his Lord. He continued to stand in prayer for hours throughout the night until his ankles were swollen and his wife asked him to stop., but he did not.

    Although he was a ruler of a vast empire in his last years, he continued to sleep on a modest straw mat, with no desire for carpets, or luxuries of any kind. He became ill and passed away in the arms of his wife, Aisha, at the age of 63. He left behind a stunning legacy, a blameless example and a religion that changed the world forever.

  7. ये लेख गलत है जिसको तरक करना है कर ले

    • shravan pandey

      भगवान विष्णु ने जब-जब अवतार लिया तब-तब समाज में बुराइया ही थी।उस बुराई को ख़त्म करने के लिए उनको जन्म लेना पड़ा।इसी तरह जब कलियुग में भगवान् कलिक का अवतार होगा तो इस अवतार का ज़िमेदार सिर्फ और सिर्फ मुस्लमान ही ज़िमेदार होगा,क्योकि मुसलमान इतना अत्याचार इतना पाप करेगा की भगवान् को मज़बूरी में अवतार लेकर मुसलमानी नस्ल को ख़त्म करके एक नए युग की स्थापना करेगे। यही अटल सत्य है।

    • तुम तर्क करने के काबिल ही नहीं हो।इतना बड़ा लेख लिखा है जो बिलकुल सही है ।क्योकि कुरान में तो यही लिखा है।फिर भी तुम नहीं मान सकते क्योकि कुरान को अगर तुमने पड़ा भी होगा तब भी कोई धर्म के खिलाफ नहीं जा सकता।यही इंसानी मानसिकता है। लेकिन जो सही है ओ तो मान ही सकते हो।एक महान आदमी ने कहा था जो भी कुरान पड़ता है उसका दिमाग आतंकवादी जैसा हो जाता है।दूसरे धर्म ग्रन्थो में हमेशा अच्छी बाते बताई गई है।

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