दीपावली और देव दयानन्द


जगमगाती किरण थी, या रवि का उजाला

मदमाती पवन थी, या विष्णू की हाला

वह तूफान बन कर, जगत पे था छाया

वह गर्मी अगन की, भर ह्रृदय में लाया

वह शीतल पवन भी, था हिमगिरि स्वयं भी

वह मानव नहीं, देवता बन के आया

दुखियों दरिद्रों के, दुख सारे  हरने

अनाथों और विधवा, को संकट से तरने

वह आखों में अश्रु, की माला भर लाया

वह भारत के कष्टों, से बेजार होकर

ह्रृदय में करुणा की, गंगा ले आया

वह बेदार था, वह खबरदार था

वह वेदों के अमृत, को लौटा के लाया

उसके मन में प्रभु थे, तन में थी शक्ति

बुद्धि में बल था, ह्रृदय में मस्ती

आँखों में करुणा, पाँवों में तप था

ह्रृदय में प्रभु की भक्ति का रस था

मुख से उसके,था वेदों का अमृत टपकता

पी पी कर जिसे मन, कभी न था भरता

करने मानव का उद्धार, दुनिया में आया

वह मानव नहीं , एक महामानव था

जिसने पी कर हलाहल, था अमृत बनाया

प्रभु के चरणों में अपना, मस्तक झुका कर

अमावस्या की रात्री को,  जगमग जगा कर

दीपावली को तज देह अपनी, अनन्त आकाश में जा समाया ||

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Posted on October 25, 2011, in poems. Bookmark the permalink. 2 Comments.

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