इस्लामी जिहाद क्या और क्यों?


इस्लामी जिहाद क्या और क्यों?

जिहाद मुसलमानों के लिए एक सर्वोच्च व सर्वाधिक महत्वपूर्ण कर्तव्य है। जिहाद का अर्थ है गैर-मुसलमानों पर आक्रमण करना, उनका वध करना, दास बना लेना, धर्मान्तरण कर देना, भले को उन्होंने मुसलमानों की कोई कैसी भी हानि नहीं की है और भले ही वे निहत्थे हैं। जिहाद अल्लाह के लिए किया जाता है। अल्लाह की सेवा के लिए पूजा और युद्ध एक समान हैं। जिहाद से बचना सबसे बड़ा पाप व अपराध है; जिहाद के माध्यम से महिमा, बड़प्पन प्राप्त कर लेना सबसे बड़ा लाभ वा उपलब्धि है। इस्लाम में विश्व विजय कर लेने सम्बन्धी अहंकार का एक भीषण रोग है। इस्लाम कहता है कि उसे दूसरे पन्थों पर विजय प्राप्त कर लेनी है क्योंकि वह ही अकेला अन्तिम सच है शेष सारे पन्थ पूरी तरह झूठ हैं। यही रूढ़िवादिता है। रूढ़िवादिता एक दृढ़ विश्वास है कि उसके पन्थ के धर्म ग्रन्थों का सन्देश ही एक मात्र अन्तिम सत्य है और उसमें कोई कैसी त्रुटि वा अभाव नहीं है। इस्लाम में रूढ़िवादिता आकस्मिक न होकर एक अनिवार्यता है। इस्लाम में ज्ञान का आय पान्थिक ज्ञान है जो पैगम्बर मुहम्मद को अल्लाह द्वारा प्रगटीकरण से उपलब्ध कराया गया था और तर्क यही है कि इस्लाम में जो कुछ है वह ही एक मात्र सच है। वह परिवर्तनशीलता के अभाव को ही शक्ति मानता है। यही कारण है कि इस्लामी धार्मिक नेताओं व विचारकों को सुधार शब्द  से असीमित घृणा है। इस्लामी धर्म ग्रन्थों में आदेश, निर्देश व आज्ञायें ही भरी पड़ी हैं और विचार विनिमय, एवं व्यापक सहमति के लिए कोई कैसा भी अवसर व स्थान नहीं है।
इस्लामी धर्म ग्रन्थों के अनुसार गैर-मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध जिहाद है। जिहाद अल्लाह की सेवा के लिए ही किया जाता है।
पाकिस्तानी सेना के ब्रिगेडियर एस.के. मलिक जो ”कुरानिक कन्सैप्ट ऑफ वार” के लेखक और एक इस्लामी विद्वान भी हैं, के अनुसार, ”युद्ध के संदर्भ में कुरान सम्बन्धी प्रमुख मार्गदर्शक तत्व यह है कि युद्ध अल्लाह के उद्देश्य  की पूर्ति के लिए ही लड़ा जाता है।” जो लोग इस सर्वाधिक उपयोगी दैवीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए युद्ध करते हैं, उनके लिए कुरान अति आकर्षक, उत्तम, स्वर्गीय उपहारों की प्रतिज्ञा व व्यवस्था करता है। अल्लाह के उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी व्यक्ति का अल्लाह की इच्छा के आगे पूर्ण समर्पण ही माप है। जो लोग अल्लाह के उद्देश्य की पूर्ति के लिए पूरी तरह समर्पित हो जाने के लिए प्रस्तुत नहीं होते अल्लाह उनसे नाराज़ हो जाता हैं युद्ध में जीवन व, धन सम्पत्ति के विनाश् की जोखिम तो होती ही है जिसे स्वेच्छा, उत्सुकता, व सहर्ष स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। कुरान में कहा है, ”कि सभी (मुसलमान) जो घर में बैठे रहते हैं और आघात नहीं सहते, वे, उन लोगों जो अपने शरीर व धन सम्पत्ति के साथ अल्लाह के लिए युद्ध करते हैं, के समान नहीं होते। जो अपने शरीर व धन सम्पत्ति के साथ युद्ध करते हैं उन लोगों के लिए, अल्लाह ने घर में बैठे रहने वाले मुसलमानों की अपेक्षा, एक अधिक उच्च स्तर दे रखा है।” कुरान ने जैसा प्रतिपादित कर रखा है कि सारे युद्धों का केन्द्र बिन्दु अल्लाह के उद्देश्य की पूर्ति है- इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर्वप्रथम अल्लाह ने मुसलमानों को युद्ध के लिए अनुमति देना ही तय किया था किन्तु बाद में अल्लाह के उद्देश्य की पूर्ति के लिए इसे एक धार्मिक कर्तव्य व दायित्व के रूप में आदेश निश्चित कर दिया।
धर्म युद्ध ‘जिहाद’ की नीतियों में शत्रुओं के हदयों में भय स्थापित कर देने का काम एक महत्वपूर्ण व्यवस्था थी। बदर के युद्ध
के सम्बन्ध में सर्वशक्ति मान अल्लाह ने पैगम्बर मुहम्मद से इस प्रकार कहा था, ”मैं तुम्हारे साथ हूँ। विश्वासियो को दृढ़ता दो, मैं गैर-मुसलमानों के हदयों में भय भर दूँगा।’‘ उहुद के युद्ध में अल्लाह ने युद्ध में हुई इस्लामी हार की समीक्षा की थी; दैवीय मार्ग दर्शन किय  था, और एक वचन दिया था, ”शीघ्र ही हम गैर-मुसलमानों के हदयों में भय भर देंगे।’‘ बानू कुरेजिया द्वारा दिये गये धोखे के सम्बन्ध में वर्णन करते हुए कुरान ने बताया, ”अल्लाह ने (अविश्वासियों को) उन्हें उनके शक्तिशाली क्षेत्रों से बाहर निकाला, और नीचे गिरा दिया, उनके हदयों में भय भरा परिणामस्वरूप तुमने उनमें से कुछ का वध कर दिया, कुछ को बन्दी बना लिया। और उसने तुम्हें उनकी भूमि, भवन, सम्पत्ति व वस्तुओं का उत्तराधिकारी बना दिया।” शत्रुओ  के हदयों में बैठाया हुआ भय मात्र साधन ही नहीं है वरन्‌ साध्य भी है।” ”शत्रुओ के हदयों में भय तब ही भर पाता है जब उनका मत (विश्वास) समाप्त कर दिया जाता है। मनोवैज्ञानिक विकृति तो अस्थिर वा अल्पकालीन होती है किन्तु मत (विश्वास्) की विकृति स्थाई परिणामकारी होती है।” ……. अन्तिम विश्लेषण के रूप में शत्रु पक्ष के हदयों में भय व्याप्त कर देने के लए उसके मत(विश्वास) की विकृति अनिवार्य है। यह वही है जो मुस्लिम शासकों ने अपने काल में भारत में किया। मुसलमानों को युद्ध के लिए आदेश करते समय कुरान ने मूर्ति पूजकों के विरुद्ध युद्ध को दैवी युद्ध के रूप में परिभाषित किया है।
कुरान ने आदेश दिया, ”युद्ध करो जब तक अशांति और अत्याचार पूरी तरह समाप्त न हो जाएँ और जब तक न्याय और अल्लाह में पूर्ण विश्वास स्थापित न हो जाए।” एक वर्ष पश्चात्‌ बदर के युद्ध के उपरान्त पुनः आदेश हुआ, आज्ञा दुहराई गई थी। उस समय पवित्र कुरान ने कहा था कि, ”उनसे युद्ध करो जब तक अशांति व अत्याचार पूरी तरह समाप्त न हो जाएँ, जब तक सर्वत्र पूर्ण न्याय और अल्लाह में सम्पूर्ण विश्वास स्थापित न हो जाए।”
उपर्लिखित विश्लेषण में से तीन निष्कर्ष निकलते हैं, १. प्रथम सारे युद्धों में से मुसलमानों द्वारा प्रारम्भ किये गये युद्ध ही अल्लाह की सेवा के लिए होते हैं। परिणामस्वरूप इस्लाम का धर्मयुद्धोन्माद, व आतंकवाद ईश्वरीय आदेशानुसार कृति वा कार्य हो जाता है। २. मूर्ति पूजा अशांति और अत्याचार की श्रेणी में, और इस्लाम न्याय और अल्लाह के विश्वास में रूपान्तरित हो जाता है और यही मुसलमानों को सिखाया जाता है। ३. इस ईश्वरीय युद्ध में भाग लेना मुसलमानों के लिए अनिवार्य है और युद्ध में जो लोग भाग लेते हैं उन्हें पुरस्कार, और
जो लोग भाग नहीं लेते हैं उन्हें, दण्ड, दिया जाता है।
जिहाद एक सम्पूर्ण युद्ध ही है। अरब साम्राज्य व शक्ति के विस्तार तथा इस्लाम को पहले सारे अरब में और फिर सारे विश्व भर में विस्तार की अभिलाषा  को पूर्ण करने के लिए ही जिहाद का प्रारम्भ हुआ था। मुहम्मद जानता था कि उसके व्यक्ति सम्पूर्ण विश्वभर पर तब तक शासन नहीं कर सकेंगे जब तक उन्हें एक प्रभावशाली शक्ति के रूप में ढ़ाला नहीं जाता। ताकि इससे वे मूर्ति पूजकों के देशों, उनकी व्यक्तिगत सम्पत्तियों, व महिलाओं पर अधिकार जमा सकें और उन्हें अरब के प्रभाव में ला सकें और उन्हें दास बना सकें। चूंकि जिहाद अविश्वासियों के प्रति किया जाता है, अतः मुहम्मद ने अन्य पन्थों को झूठा व अल्लाह का विरोधी घोषित कर धर्म युद्धों के लिए असीमित अवसर उत्पन्न कर दिये। इस प्रकार जिहाद मुसलमानों के लिए अल्लाह का आदेश् है कि वे गैर-मुसलमानों का विनाश् कर दें। धर्म युद्ध या जिहाद प्रारम्भ करने के लिए यह बिल्कुल भी आवश्यक नहीं कि मुसलमानेतर लोगों ने मुसलमानों के प्रति कोई कैसा भी अपराध किया है; उनका इस्लाम में विश्वास न करना ही पर्याप्त व सच्चा अपराध है। तलवार केबल पर इनके द्वारा इस्लाम स्वीकार करना लेना जिहाद का उद्‌देश्य है।

     इस्लामी शब्द कोष के आधार पर जिहाद शब्द का अर्थ है, ‘‘उन लोगों के साथ धर्म युद्ध करना जो मुहम्मद के उद्‌देश्य में विश्वास नहीं रखते। कुरान और हदीसों द्वारा स्थापित, दैवीय नियमों के रूप में प्रस्थापित, और विशेषकर इस्लाम के विस्तार के लिए आदेशित जिहाद एक अनिवार्य धार्मिक कृत्य है।”

     सूरा२ आयत १९३ में कुरान कहता है, ‘मुशरिकों के विरुद्ध युद्ध करो जब तक मूर्ति पूजा समाप्त न हो जाए और अल्लाह में पन्थ इस्लाम का एक छत्र राज्य न हो जाए”। यही आदेश् सूरा ८ आयत ३३ मे दुहराया गया हैं सूरा ६९ आयत ३०-३७ में आदेश है, ”उन पर काबू करो, बाँध लो, उन्हें नर्क की आग में जला दो।” और पुनः सूरा ४७ आयत १४-१५ में कहा है, ”जब गैर-मुसलमानों मिलें उनके शिरों को काट दो और जब तुमने हराकर उन्हें बन्दी बना लिया है, गिरा दिया है, तो बन्दियों को दृढ़ता से बाँध लो।’
     सूरा ८ आयत १२ में कहा है, ”अविश्वासियों के हदयों में भय भर दो, उनके शिर काट दो, उनके सभी अंगों को एक-एक कर काट दो”। सूरा ११ आयत ८ में कहा है, ”मूर्ति पूजकों से युद्ध करो,उन्हें जहाँ कहीं पाओ तुम उनका वध कर दो, युद्ध नीति के अंतर्गत उन्हें पकड़ लो, घेर लो, और उनकी प्रतीक्षा में छिप जाओ, (और युद्ध करते रहो) जब तक कि वे सम्मान न करें, तौबा न करें, आदर से निरन्तर नमाज़ न पढ़ें, और दान न दें।”

     कुरान व हदीसों-इस्लामी धर्मग्रन्थों-में इस प्रकार के आदेश, उद्‌बोधन, व आज्ञायें बार-बार दी गई हैं। पवित्र जिहाद ही था जिसके माध्यम से इन आदेशों का पालन किया जा सकता था। जिहाद या धर्म युद्ध बहु आयामीय अवधारणा है। जिहाद की आधारभूत अवधारणा के विषय में कोई भी दो मुसलमान, भिन्न मत वाले नहीं हो सकते। इसका स्पष्ट अर्थ है अल्लाह के लिए युद्ध करना; इस्लाम के उद्‌देश्यों की पूर्ति व संवर्धन के लिए युद्ध करना; सच्चे पन्थ (इस्लाम) के लिए लोगों की बलात धर्मान्तरित करना; यदि वे प्रतिरोध करें तो उनका वध कर देना; उनकी सम्पत्तियों, महिलाओं व बच्चों को अधिकार में ले लेना ओर उनके पूजा घरों व मन्दिरों को विनष्ट कर देना, मूर्तिभंजन और दूसरों के मन्दिरों को ढहा देना इस्लाम का मुखय उद्‌देश्य है; पैगम्बर मुहम्मद के व्यवहार को उदाहरण मान वे इसे न्यायोचित मानते हैं। स्वयं मुहम्मद ने अरब में मूर्ति पूजकों के मन्दिर ढहाये थे और वह ही उनके अनुयायियों के लिए आदर्श  बन गया है। जिहाद के अभाव में इस्लाम का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। अतः जिहाद प्रत्येक मुसलमान का एक अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य व दायित्व है।
    जिहाद के लिए प्रोत्साहक पुरस्कार

मुजाहिद (धर्म योद्धा) के लिए आगामी दुनिया में जन्नत मिलेगी। गैर-मुसलमानों के विरुद्ध युद्ध करते हुए मुजाहिद चाहे बच
जाए, घायल हो जाए, अथवा मर जाए उसके लिए मरणोपरान्त जन्नत हर दशा में मिलेगी ही, यह निश्चत है। जिहाद में भाग लेने का धार्मिक महत्व अन्य धार्मिक कर्तव्यों व क्रियाओं जैसे रोज़ा रखना, निरन्तर नमाज के लिए खड़े होना, और कुरान में लिखे अल्लाह के आदेशों का पालन करना, आदि सभी के बराबर ही है। जन्नत प्राप्ति के लिए इस्लाम के विस्तार के लिए जिहाद में भाग लेना सर्वाधिक गुण युक्त व महत्व का है। पैगम्बर ने अपने अनुयायियों को बताया था कि ‘जन्नत तलवारों के साये में है।’ कुरान के अनुसार ‘‘जन्नत में विश्राम, और परिश्रम रहित इन्द्रिय सुख मिलता है। कलकल कर शोर करते हुए नालों में सीचें हुए हरे भरे बगीचे, जिनमें विश्वास ……. जैसा कि अरब के निवासी सामने रखे हुए बिना हत्थे वाले पात्रों में डालकर अथवा सुन्दर कुँवारी लड़कियों द्वारा चाँदी के शीशे जैसे चमकीले चारों ओर प्रस्तुत पात्रों में डालकर, नशीली शराबें बड़े-बड़े घूंटों में पीना पसन्द करते हैं… (जन्नत) निश्चय ही पवित्र लोगों के लिए सौभाग्यपूर्ण आवास है, जहाँ बगीचे हैं, अंगूरों के बाग हैं, उठे हुए उरोजों वाली, समान उम्रवाली, और एक पूरा भरा प्याला…जन्नत की इन परियों की पहचान है। उनकी बड़ी-बड़ी आकर्षक आँखें मानो सीपी में से मोती चमक रहे हों। ये परियाँ एक ऐसा अनुपम उपहार हैं जिसके लिए ही विश्वासी  (मुसलमान) बने हैं। निश्चय ही इन हूरियों को एक अनुपम अलभ्य (न प्राप्त हो सकने योग्य) कृति के रूप में हमने बनाया है; हमने इन्हें समान उम्रवाली, ब्रहाचारिणी और अति आकर्षक व सुन्दर बनाया है।” जन्नत में मुजाहिद स्वेच्छा से, आज़ाद पक्षी, जिसका घोंसला चमकीले प्रकाश युक्त झाड़ फानूस में बना है, की भाँति घूम सकेंगे। हूरियों के साथ उनकी शादियाँ होंगी और बहुमूल्य हीरे जवाहिरात से जड़े हुए सोने के खम्भों वाले बगीचों में ये रहेंगे। जन्नत में सत्तर हजार दरवाज़े होंगे, प्रत्येक दरवाजे पर एक-एक अति सुन्दरी हूरी इनके आगमन की प्रतीक्षा में खड़ी होगी ओर इनक सारे पाप क्षमा कर दिये जाएँगे।
हदीसों में एक लेख है कि एक व्यक्ति अल्लाह के पैगम्बर के पास गया और बोला मुझे एक ऐसा कार्य बताइए जिसका पुरस्कार जिहाद के पुरस्कार के बराबर हो। पैगम्बर ने उत्तर दिया कि ऐसा कोई कार्य मेरे ध्यान में नही आता। जिहाद के ऐसे पुरस्कारों के कारण ही मुजाहिदों में एक बड़ी तीव्र इच्छा जगी, अल्लाह के मार्ग में अथवा अल्लाह के लिए युद्ध किया जाए और मरा जाए, बार-बार युद्ध किया जाए और बार-बार मरा जाए। यह अति महत्वपूर्ण है कि सुनान इब्न माजब के अन्त में जिहाद द्वारा प्राप्त जन्नत का विस्तृत वर्णन को, दुहराया गया है, दुबारा वर्णन किया गया है।
प्रारम्भिक उम्र से ही मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को कुरान व हदीसों की शिक्षाओं को पढ़ाया जाता है। निष्ठावान मुसलमानों
द्वारा हदीसों की शिक्षाओं को बार-बार पढ़ाया व दुहराया जाता है। पुस्तक के अन्तिम पृष्ठ पाठकों के मस्तिश्कों में स्थाई प्रभाव उत्पन्न कर देते हैं। हदीसों के संग्रहों के अन्त में जिहाद और जन्नत का वर्णन है। वह पाठकों के मनों व मस्तिष्कों को प्रभावित करता है। और जिहाद और लालच भरे जन्नत में, जाने केलिए कभी न हो सकने वाली प्रेरणा व उत्साह, से मुसलमानों के मन व मस्तिष्क पूरी तरह भर जाते हैं।
कुरान व हदीसों के आदेशों के पूर्णतः स्पष्ट व असंदिग्ध होने पर भी टी.पी. हयूज कहते हैं कि धार्मिक विचारकों के अनुसार
जिहाद दो प्रकार का होता है : प्रथम ‘जिहादुल अकबर‘ अर्थात्‌ बड़ा धर्म युद्ध जो अपनी वासनाओं व कामेच्छा के विरुद्ध लड़ा जाता है और दूसरा जिहादुल असगर यानी छोटा धर्म युद्ध जो गैर-मुसलमानों के विरुद्ध लड़ा जाता है। हदीसों व कुरान में पहले वाले धर्म युद्ध ‘जिहादुल अकबर’ का कहीं भी कोई भी, कैसा भी उल्लेख नहीं है। इन इस्लामी धर्म ग्रन्थों में प्रति रक्षात्मक धर्म युद्ध जैसी भी कोई बात नहीं है। एम. मुजीब के द्गाब्दों में ”भले ही गैर-मुसलमानों ने कोई कैसा भी आक्रमण न किया हो, गैर-मुसलमानों के विरुद्ध, धर्म युद्ध, जिहाद, की वैधानिकता के विद्गाय में बुरहानुद्‌दीन अली का भाष्य ‘हिदाया’ पूर्णतः स्पष्ट व असंदिग्ध है।” बुरहानुद्‌दीन अली के भाष्य ‘हिदाया’ के आधार पर, जैसा स्वयं  टी.पी. हयूज कहता है, कि बाद वाला धर्म युद्ध, ‘जिहादुल असगर’, कयामत के दिन तक चलने वाला स्थाई युद्ध है।
Advertisements

About Fan of Agniveer

I am a fan of Agniveer

Posted on November 2, 2011, in Islam. Bookmark the permalink. 1 Comment.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: