क्या ईश्वर पाप क्षमा करते हैं?


 
डॉ विवेक आर्य
आज ईसाई समाज में एक फैशन सा चल पड़ा हैं वो हैं चर्च में जाईये , ईसा मसीह के समक्ष अपने द्वारा किये गए पापों को कबूल (confess) करिए आपके पाप सदा सदा के लिए क्षमा अर्थात माफ़ हो जाते हैं. हैं ना सबसे आसान तरीका, पाप करो और मांफी मांग लो, सजा तो कोई मिलेगी ही नहीं, अगली बार उससे भी बड़ा पाप करों और फिर माफ़ी मांग लो, कोई सजा नहीं, सजा किस बात की, आपने जो पाप किया उसके लिए आप माफ़ किये जा चुके हो इसलिए आपके खाते में तो सिर्फ पुण्य ही पुण्य बचे हैं, पाप तो सारे के सारे माफ़ ही हो चुके हैं. आप तो अब स्वर्ग में ईश्वर के सिंहासन के बगल में बैठने के भागी बन गए हैं क्यूंकि आपके पुण्य आपको उसके लिए उपर्युक्त बना देते हैं.जरा सोचिये बम्बई हमले के दोषी अजमल कसाब ने जज के सामने कोर्ट में बयान दिया की आप मुझे फाँसी की सजा नहीं दे सकते क्यूंकि मैंने चर्च जाकर आपने पापों की क्षमा मांग ली हैं. ईश्वर सभी गुनाहों को मांफ करने वाला हैं. उन्होंने मेरे सारे पाप माफ़ कर दिए हैं.अब जज क्या करेगे कसाब को तो सबसे बड़ी अदालत ने माफ़ कर दिया हैं. उसकी अदालत के आगे आदम की अदालत की क्या बिसात हैं? ऐसी ही दलील कुछ कुछ संसद पर हमला करने वाले आतंकवादी ने अदालत में दी और ओसामा बिन लादेन ने अमरीकी अदालत में भी दी.अब जज क्या करेंगे?
पढने वाले सोचेगे की इसी तरह सभी कैदियों को माफ़ कर दो फिर देखों समाज में कैसी अराजकता फैलती हैं. सभी असामाजिक तत्व लूट-पाट , चोरी ,क़त्ल  आदि करके हर शाम को चर्च जाकर माफ़ी मांग लेंगे. समाज में बहुत कम समय में ही ऐसी अशांति, ऐसी बर्बादी फैलेगी की तथाकथित मानव अधिकार वाले कहेंगे की इससे अच्छा तो यह जेल में ही अच्छे थे. कम से कम हम चैन से जी तो सकते थे.जब व्यावहारिक रूप से आज भी समाज में पाप क्षमा करना मतलब समूची मानव जाति की शांति को भंग कर मानव सभ्यता को खतरे में डालने के समान हैं तो फिर हम कैसे यह सोच सकते हैं ईसाई समाज में प्रचारित करी जा रही उक्ति की “केवल ईसा मसीह ही सच्ची शांति और स्वर्ग के मार्ग हैं क्यूंकि वे ही हैं जोकि पापों को क्षमा करे वाले हैं” में कितना दम हैं.वेद आदि शास्त्रों में ईश्वर को न्यायकारी बताया गया हैं अर्थात जैसे कर्म हैं वैसा फल देना. वेदों में ईश्वर को दयालु भी बताया गया हैं. अब कोई व्यक्ति यह आक्षेप करे की ईश्वर जब पाप कर्मों का दंड देते हैं तो वे दयालु कैसे हो सकते हैं? क्यूंकि दया का अर्थ हैं दंड दिए बिना क्षमा कर देना. इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले हमे कुछ पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए.
पहले तो  ईश्वर जो दंड दे रहे हैं इसका प्रयोजन क्या हैं ? क्या बदला लेना अथवा सुधार करना हैं ?
दुसरे दंड देने से ईश्वर का कोई निजी लाभ नहीं हैं अथवा नहीं?
तीसरे अगर कोई निजी लाभ नहीं हैं तो फिर ईनाम अथवा दंड किस प्रयोजन से दिया जाता हैं?
चौथा क्या दंड देने से ईश्वर अन्यायकारी कहलाते हैं?
परम सत्य हैं की ईश्वर के किसी भी दंड का प्रयोजन किसी से बदला लेना नहीं अपितु उसे सुधारना हैं.जब मनुष्य का मन दुष्कर्मों के करने में इतना प्रवित हो जाये की उसकी खरे- खोटे में विवेक करने की शक्ति शुन्य हो जाये तो ऐसी स्थिति में उसके समाज में रहने से सिवाय हानि के कोई और आशा नहीं करी जा सकती हैं. इसलिए उस मनुष्य को समाज की कुसंगति से पृथक कर सुधरने का मौका दिया जाये जिससे न केवल उसका भला हो अपितु दूसरों को भी उससे शिक्षा मिल सके. जब सुधरने की कोई आशा नहीं बचती तो उसे कठोर से कठोर दंड दिया जाता हैं. अब सभी पाठक इस बात से भी सहमत होंगे की ईश्वर का दंड देने में कोई निजी लाभ नहीं हैं तो ईश्वर के इस निस्स्वार्थ भाव से औरों को सुधारना महान दया नहीं तो और क्या हैं? यदि ईश्वर जीवो को कर्मों का फल देना छोड़ से तब तो यहीं कहाँ जायेगा की ईश्वर ने सुधार का कार्य बंद कर दिया हैं और यह ईश्वर की दयालुता के बिलकुल विपरीत हैं. किसी भी मत पंथ का व्यक्ति यह नहीं कह सकता की ईश्वर का कर्म-फल देने में कोई निजी स्वार्थ हैं तो फिर ईश्वर के इस न्याय को दया भाव कहना ही सही हैं. ईश्वर द्वारा कर्म-फल की व्यवस्था अपनी अनादी प्रजा यानि जीवों का सुधार करने के प्रयोजन से हैं परन्तु यह स्मरण रहे की जो सुख की इच्छा रखता हैं उसे ईश्वर के नियमों का पालन करना ही होगा.यह अत्यंत आवश्यक हैं. कुछ जिज्ञासु यह शंका भी कर सकते हैं की जो ईश्वर की आज्ञा के विरुद्ध आचरण करेगा तो उस जीव को दंड क्यूँ दिया जायेगा? इसका उत्तर स्पष्ट हैं की ईश्वर हमारे कल्याण के लिए ही सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं और अगर कोई भी उस कल्याण मार्ग के विपरीत चलेगा तो उसमे दोष उत्पन्न होंगे और यदि दोष उत्पन्न होगा तो पाप भी उत्पन्न होगे और यदि पाप उत्पन्न होगे तो दुःख और कलेश ही उनका फल होगा. इसलिए ईश्वर को पापी को फल देना आवश्यक हैं. यही कर्म-फल व्यवस्था हैं. ईश्वर पापों की सजा देने से अन्यायकारी नहीं अपितु न्यायकारी कहे जायेगे. किसी को बेवजह ही सुखों का पत्र और किसी को बेवजह ही दुखों का पत्र ईश्वर नहीं बनाते. सब अपने इस जन्म अथवा पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों का फल हैं.

ईसाई समाज द्वारा जो प्रभु के न्याय व दया की सिद्धि के लिए ईसा का सूली पर चढ़ना और उसके बदले में लोगों के पापों को क्षमा किया जाना मानते हैं , यह भारी भूल हैं. क्यूंकि इससे ईश्वर पर बहुत से कलंक लगने के अलावा कोई और लाभ नहीं हैं. पहले तो किसी व्यक्ति को दुसरे के स्थान पर दण्डित करना अन्याय हैं अत्याचार हैं फिर किसी दुसरे के फाँसी पर चढ़ जाने से सबके पाप क्षमा होना असंभव हैं. मान लीजिये समाज में कोई चोरी कर रहा हैं , कोई हत्या कर रहा हैं उन दोषियों को दंड देने के स्थान पर समाज के एक श्रेष्ठ व्यक्ति को उसके बदले में दंड देना कहाँ का न्याय हैं. आज शिक्षित ईसाई समाज को पाप क्षमा होने के मिथक से बचना चाहिए क्यूंकि अगर पाप इसी प्रकार माफ़ होने लगे तो हर कोई अधिक से अधिक पाप करेगा और ईश्वर का कार्य पापों को बढ़ाना नहीं अपितु कम करना हैं.

आज कोई भी ईसाई मत को मानने वाला अगर यह कहे की केवल हमारे प्रभु ईसा मसीह पर विश्वास होने करने भर से पाप क्षमा होते हैं तो आप उनसे यह तर्क पूछ सकते हैं परमेश्वर का कार्य मनुष्य को और अधिक  पापों में सलंग्न होने से बचाना हैं नाकि प्रोत्साहन देना हैं.इसलिए ईश्वर द्वारा वेदों में वर्णित कर्म फल व्यस्था ही एक मात्र सत्य हैं और सुख प्राप्ति का आधार हैं.

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Posted on November 21, 2011, in Christianity. Bookmark the permalink. 14 Comments.

  1. Dear Mr Vivek,

    You have a mistaken identity for Christianity and its teachings. Christ did not say “Sin and you will be forgiven; u can sin again, u will be forgiven again” etc.,If any christian said this to you, even he has a bad understanding of God’s salvation. Christ died for all mankind once for all and hence all sinners will be forgiven of their respective sins, provided they realise their mistakes, confess to God only and repent of their sins, and finally stop doing their wrongdoings. Only then they will be forgiven and only then they will be saved; Only then they will have eternity in Christ. In all other cases, they will have to suffer the wrath of God on the LAST DAY of this universe.

    I request you to make some research on the subject before putting any such articles online henceforth..

    God bless you..May God forgive you for your ignorance !!

    • Karen

      first of all according to christian beleif all are sinners. this is again a wrong concept. if you have not stolen anything then why you will be called as convict.
      second how can be confess one can save from the results of what sin you have done. suppose you kills someone and confess in front of god will god forgive you or you will bear the results of what you have done?
      third its better never to engage in a sin but if you had done a sin you have to face its result then only be the almighty god will be called as kind for all.
      fourth can you elaborate how by killing of jesus all sin of those who confess are neutralized? whats the logic behind this beleief.
      fifth why did not eve confessed in front of god so that she would not be called as sinner forever as well as her generations would not be tagged as sinners?
      sixth if a sin is forgiven then its definately promotes another sin.

      feedback welcomed

      dr vivek arya

  2. How can a person die for the sins of others? will the courts allow the the perpetrators of the crime to go scot-free if the other person would volunteer to undergo punishment for the crimes of others even in Christian countries ? Is it justiciable ?Can this be called logic?

    Aryaveer

  3. i do not agree with the contents of this article,it is wrong to say that only charistion doing this
    we hindu always taking a dip in rivers for the same purpose so please refine your self

    • Bilkul satya hai topic. Ek mahoday ka kahna hai ki ishwar pahli bar kiye gaye pap ko maf ker deta hai agar wo dubara na karne ki kasama khaye to. Ye to to bhugtbhogi ke sath anyay hua. Uska kya. Christian theology is defective.

      Aur ganga me dubki lagane wale b murkh hain. Unko dharm ka gyan nai hai. They dip in ganga out of ignorance. Kisi granth me nai likha. Dharm ke nam pe tamam bhrantia fail gai hain.

    • jagdish ji Yoy are very right that the beleif among the hindus that all sins are washed away by taking bath in ganges is also a superstition. but if we analyse the christians propagates forgiveness of sins for spreading christianity saying christ is the only way. my article is basically focussed on this issue.

  4. Taking dip in the river, fasting, applying Tilak, receiving the Thirth given in temples, doing endless Bhajans, visiting so called Holy places, offering poojas to lifeless Idols do not wash away the sins commited. People are fed with the belief by selfish agents that these things tend to wash away the sins. It is all business. As the adage goes, as you sow so you reap.

  5. गंगा में डुबकी लगाकर स्वयं को पाप से मुक्त समझना मूर्खता है कोई भी पाप छोटा या बड़ा कभी नष्ट नहीं होता और इसका फल भोगना ही पड़ता है और हम भोगते भी हैं इसी जन्म में बस हमे पता नहीं लगता की ये दुःख हमें किस पाप की वजह से मिला है| वेदों में कहीं भी या नहीं लिखा की पूजा करने से या गंगा में डुबकी लगाने से पाप नष्ट होता | पाप को नष्ट नहीं किया जा सकता सिर्फ आगे के लिए उससे बचा जा सकता है और सत्कर्मो के द्वारा सुख की प्राप्ति की जा सकती है| पूजा करना, तिलक लगाना, मंदिर में जाना इन सभी बातों का कारन कुछ और ही है ना की ये पाप से मुक्ति का रास्ता है जो लोग ऐसा समझते हैं वो अँधेरे में हैं| || जय महाकाल ||

  6. Gangaa refers to river of knowledge. Many Yogis have termed it ज्ञानगंगा । That is very sacred and once you take bath in it (i.e., understand true knowledge) you don’t commit any sin further and hence you are saved from being a sinner.

    But what you know is only 10% truth. Remaining is this:

    1>> Many Christians believe that even if you commit many sins from Monday to Saturday, all will be forgiven if you confess before Jesus / GOD on Sunday. (Note: Sunday is very holy for Christianity. Many historians have said that Christianity is a dead religion except Sundays).

    Response : Suppose you die on Saturday midnight. What will happen then?

    2>> Christians further say: commit crime and go to Pope! Pope will free you from sins.

    Response : Jesus is son of GOD. Christians call him GOD. How can Pope tell Jesus as to who is innocent? Is Pope a bigger authority? GOD is supposed to be omniscient and so is Jesus. If GOD / Jesus asks us about our sins, isn’t that stupidity? In corporate world, it is recommended to have less barriers between lower management and higher management. Here, barriers are increased. When Jesus was alive, there was rarely any Pope. Now, path is highly indirect from humans to pope to Jesus to GOD. GOD’s management is so screwed.

    3>> Holy Bible says – diseases are caused by Devil Lucifer and priests in Church will pray and cure you. (Luke 4.33, 4.35, Mark 1.35, James 5.14)

    Response : Good. Christians should replace all hospitals with Churches and vice versa. Further, they must stop going to doctors but go to priest.

    4>> Christians believe: At the day of judgement, GOD will ask us whether we are guilty OR innocent on any of 10 commandments.

    Response : Isn’t GOD omniscient? Commandments are ambiguous. See Exodus 20.5 where GOD calls himself jealous. Christians don’t worship any GOD, they worship a jealous creature. As per Holy Bible Romans 3.7 it is legal to lie for GOD’s sake. I can lie that I am innocent for all commandments. Be pleased O GOD. GOD will happily put me in heaven for that is GOD’s own glory. Even Rupert Hughes writes – Bible wants lies to be told for GOD’s glory. Further Bible Matthew 19.23 restricts a rich man from entering heaven. Even if a rich man satisfies 10 commandments, he won’t be permitted to enter heaven. Why such a drama???

    5>> Christians assume that sins are created out of ignorance. In that case, we should confess before GOD.

    Response : Ignorance? Is Christianity knowledge supporting? Adam and Eve were punished as they took apple from a tree. That tree is tree of knowledge of good and evil. See Genesis 2.17

    6>> Hindus take bath in river Gangaa and their sins are thus washed off.

    Response : We can’t have Ganges as a physical river here. Suppose you take bath in river Ganges. River mixes with ocean and hence our sins are transferred to ocean. By natural process, clouds form due to evaporation of contents of an ocean. So, now our sins are with a cloud. Clouds are linked with raining. They rain our own sins onto us. So, our sins are back to us. Simple…

    गंगा नहाए ते नर जो तर जाए वह मत्स्य क्यो नही तर जाता जिसका गंगा में घर है। … अरे नादानो, तरेगा तो वही जिसने घट में ब्रह्म जाना है।
    – जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

    True Ganges is mentioned on the very top of this comment. Please review.

    However, Agniveer fan Sir, I have some doubts:

    1<< If a 4 year old child (or a mentally ill person) gets some sword from somewhere and kills someone. Will he be punished severely?

    2<< What is GOD's reaction to manage those sins which were committed unknowingly? Example: We kill many insects / micro – organisms doing our daily tasks. If GOD started punishing that too, rarely that cycle will end.

    3<< Consider the case study mentioned here:

    A sage meditating. A deer appeared there and went near sage. Sage on vow to speak truth always. Sage happily gives shelter to the deer. A hunter too approaches there. He asks the sage whether he has seen the deer. Sage in dilemma – what to say?

    …1 Sage tells where deer is.
    Poor deer will be killed.

    …2 Sage says – I haven't seen the deer.
    Sage is a liar.
    His own vow violated.

    Which way will yield no sin? Please explain…
    Thanks

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