‘थ्री हंडरेड रामायण’ (300 Ramayan) बनाम ‘रंगीला रसूल’


 

Dr Vivek Arya

मीडिया में विशेषकर अंग्रेजी मीडिया में रामानुजम द्वारा लिखित ‘थ्री हंडरेड रामायण’ नामक एक लेख की विशेष चर्चा जोरों पर हैं. कारण है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर एवं अन्य अनेक बुद्धिजीवी केवल रामायण के भिन्न कथन (Many Ramayan) पढ़ाने की जिद कर रहे हैं? रामानुजम नामक एक प्रोफेसर जो न संस्कृत के विद्वान थे और न ही इतिहासकार थे ने रामायण के बारे में सुनी-सुनाई बातों पर ‘थ्री हंडरेड रामायण’ नामक एक लेख लिखा था जिसे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस ने प्रकाशित किया था और जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यकर्म में शामिल किया गया था. सदियों से रामायण महाग्रंथ के माध्यम से हिन्दू समाज के पुरोधा मर्यादापुरुषोत्तम रामचंद्र जी महाराज का जीवन संपूर्ण विश्व को बुराई पर अच्छाई की जीत, पिता के आदेश का सम्मान,भाइयों में आपसी प्रेम और त्याग का उदहारण प्रकट कर समाज को उचित मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता आ रहा हैं. यही कारण हैं की रामायण की प्रसिद्धि भारतभर में ही नहीं अपितु विश्व के प्रत्येक देश में हैं. भारत के बाहर जावा सुमात्रा, मलेशिया, थाईलैंड , श्री लंका आदि देशों में तो भारत के समान रामलीला का आयोजन हर वर्ष विशेष रूप से स्थानीय निवासियों द्वारा ही किया जाता हैं.

रामायण इतनी ज्यादा प्राचीन हैं की समय समय पर उसमें कई परिवर्तन होते रहे.वाल्मीकि रामायण का आज जो स्वरुप विद्यमान हैं वह पहले ऐसा नहीं था. जैसे उत्तर रामायण में तो सीता की अग्नि परीक्षा आदि को स्वयं अनेकों विद्वानों ने प्रक्षिप्त माना हैं.

रामायण में परिवर्तन के पीछे एक कुत्सित उद्देश्य था वह था श्री राम चन्द्र जी महाराज के पावन चरित्र को मलिन करना जिससे की वे हिंदुयों के आदर्श न रहे और विधर्मियों को हिंदुयों को अपने मत में शामिल करने का सुयोग्य अवसर मिल जाये.

ऐसा प्रयास कुछ अज्ञानी पंडितों से लेकर चार्वाक, वाम मार्गियों, बुद्ध और जैन मत को मानने वालों द्वारा विशेष रूप से किये गए थे. जैसे वाममार्ग को मानने वालों ने रामायण में अनेक प्रसंगों को मिला दिया जिसमे श्री रामचंद्र जी महाराज को मांसाहारी दिखाया गया था जबकि वाल्मीकि रामायण में ही अनेक प्रसंग मांस भक्षण और जीव हत्या के विरुद्ध मिलते हैं.

ऐसा ही एक प्रयास शम्बूक को लेकर किया गया जिसमे यह दिखाया गया की एक तपस्वी शुद्र की हत्या श्री रामचंद्र जी महाराज द्वारा हुई जोकि अत्याचार था. इस असत्य और घटना को आज अपने आपको दलित विशेष कहने वाले वर्ग द्वारा बार बार उछाल कर श्री राम चन्द्र जी महाराज को बदनाम किया जाता हैं.

चारों वेदों के ज्ञाता श्री राम वेदानुयाई थे , वेद में स्पष्ट रूप से शुद्र जन्म से नहीं अपितु गुणों से रहित व्यक्ति को कहा गया हैं और शुद्र को वेद पड़ने का पूरा अधिकार भी दिया गया हैं .इसलिए शम्बूक का वध एक काल्पनिक घटना के अलावा ओर कुछ भी नहीं हैं.कालांतर में रामायण में अनेक परिवर्तन हुए जैसे तमिलनाडु में करीब ७०० वर्ष पूर्व रचित कम्ब रामायण में श्री राम को मांसाहारी बताया गया हैं.

मांसाहार का पूरजोर समर्थन करने वाले विशेष रूप से इस्लाम को मानने वाले कम्ब रामायण के आधार पर मांसाहार का समर्थन करते हैं.

आगे श्री लंका और आंध्र प्रदेश में पाने वाले परिवर्तित संस्करणों में दर्शाया गया की सीता रावण की बेटी थी. ऐसा लिखने का एक ही मंतव्य हमारे समझ में आता हैं श्री राम ने अपने ही ससुर पर बेवजह आक्रमण कर शांति प्रिय असुर जाति की राजधानी श्री लंका को तबाह कर दिया. यह एक दलित राजा पर आर्य आक्रमण का प्रमाण हैं. आर्य द्रविड़ युद्ध का आज तक कोई प्रमाण नहीं मिला हैं. इस तथाकथित परिवर्तन के कितने दुष्परिणाम हो सकते हैं पाठक स्वयं समझ गए होगे.

एक ओर परिवर्तन जो अत्यंत चिंताजनक हैं हमारे प्रकाश में आया हैं वह हैं की श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण की सीता पर कुदृष्टि थी. सबसे पहले तो यह हमारे आदर्श चरित्रों को बदनाम करने का एक कुत्सित प्रयास हैं दुसरे स्वछंद सम्बन्ध को आधुनिकता के नाम पर समर्थन करने वालों को एक ओर बहाना ओर मिल जायेगा की जब रामायण समर्थन करती हैं तो फिर आप कौन हैं बीच में आक्षेप करने वाले जैसे वाममार्ग द्वारा रचित कामसूत्र और खजुराओ के मंदिरों को हिन्दू धर्म के प्रतीक कह कर विदेशी मीडिया खासा बदनाम करता रहा हैं जबकि उससे पूर्व रचित वेद के संयम और ब्रहमचर्य के सन्देश की अवहेलना करना उसके लिए आम बात हैं.सत्य यह हैं की जब वन में भटकते हुए श्री राम को हनुमान और सुग्रीव द्वारा सीता माता की चूरामणि दी गयी तो श्री राम ने उन्हें पहचान लिया जबकि लक्ष्मण उसे न पहचान पाए क्यूंकि वे बोले में तो केवल सीता माता के पैरों में पहनने वाले आभूषणों को पहचानता हूँ जिन्हें मैं हर रोज प्रात: काल उनके चरण स्पर्श करते हुए देखता था मैंने कभी उनके मुख की तरफ नहीं देखा. ऐसा महान आदर्श हमारे पूर्वजों ने स्थापित किया थे जो की विश्व की किसी भी मत- मतान्तर में पढने को नहीं मिलते. फिर लक्ष्मण की सीता माता पर कुदृष्टि थी ऐसा लिखने वाले कितने बड़े पापी और अज्ञानी हैं.

रामानुजन नामक तथाकथित वामपंथी प्रोफेसर ने इस प्रकार के जितने भी असत्य परिवर्तन थे उनको एकत्र कर एक लेख के रूप में लिखा था जिसे हम ‘थ्री हंडरेड रामायण’ के नाम से जानते हैं.रामानुजम के शब्दों में केवल विचित्र, अपमानजनक शब्दों में ‘धक्का पहुंचाने वाली’ टिप्पणिया इस लेख में एकत्र की गई हैं।

इस लेख में रामायण के सम्बन्ध में ऐसे निरर्थक और भ्रामक विचार लिखे गए थे की इसलिए विश्व विद्यालय ने अपील करने पर धार्मिक भावनायों का सम्मान करते हुए उसे अपने पाठ्यक्रम से हाथ दिया . विश्व विद्यालय के इस उचित कदम के विरुद्ध तथाकथित वामपंथी और मुस्लिम- ईसाई इतिहासकारों ने शोर मचा कर उसे विचारों की अभिव्यक्ति पर लगाम, साहित्य सृजन की स्वतंत्रता में रुकावट आदि आदि बहाने बनाकर उसे दोबारा से पाठ्य क्रम में लगाने के लिए शोर मचा रहे हैं जो की एक प्रकार से दुराग्रह के अलावा कुछ भी नहीं हैं.

हमारा तथाकथित हिन्दू विरोधी लाबी से कुछ प्रश्न हैं. अगर साहित्य की रक्षा इतनी हे आवश्यक हैं जिसमे साहित्य किस कोटि का हैं इस तथ्य को भी नाकारा जा सकता हैं अथवा उसका उद्देश्य क्या हैं उसकी भी नाकारा जा सकता हैं तब तो इस्लाम और ईसाइयत के विषय में भी विभिन्न साहित्य की रचना हुई हैं जो इस्लाम और ईसाइयत के विभिन्न दृष्टीकौनों को समझने का प्रयास मात्र हैं उन्हें भी प्रचारित किया जाना चाहिए .

जैसे शुरुआत आज़ादी से पहले खासी चर्चा में रही और धर्म वीर महाशय राजपाल के शहीद होने का कारण बनी पुस्तक रंगीला रसूल (Rangila Rasool)को भी इस्लाम को समझने की दृष्टी में दिल्ली विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रम में लगाया जाये तो साहित्य के प्रचार प्रसार में उसे क्रान्तिकारी कदम माना जायेगा .

मुस्लिम जगत के नेता और अलीगढ मुस्लिम विश्व विद्यालय की स्थापना करने वाले सर सय्यद अहमद खान द्वारा कुरान का नवीन भाष्य किया गया था जिसके विरुद्ध अरब तक से उनके विरुद्ध फतवे दिए गए थे उसे भी पाठ्क्रम में लगाया जाये तो उचित कदम कहा जायेगा.

इस्लाम के मूर्धन्य विद्वान पंडित चमूपति द्वारा रचित चौदहवी का चाँद, वैदिक स्वर्ग और पंडित गंगा प्रसाद द्वारा रचित इस्लाम के दीपक भी पाठ्क्रम में लगाया जाये तो उचित कदम कहा जायेगा.

पाकिस्तान में ही जन्मे और इस्लाम के विद्वान डॉ गुलाम जिलानी द्वारा रचित दो इस्लाम अर्थात (Dual Islam) को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता हैं जिसके अनुसार कुरान में वर्णित इस्लाम हदीसों से अलग हैं.

विश्व प्रसिद्द लेखक सलमान रश्दी द्वारा रचित सतानिक वेर्सेस (satanic verses) और बंगलादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन इन दोनों के विरुद्ध भी अनेक फतवे इस्लाम को मानने वालों ने दिए हैं को भी इस्लाम को समझने की दृष्टी में दिल्ली विश्व विद्यालय के पाठ्यक्रम में लगाया जाये तो साहित्य के प्रचार प्रसार में उसे क्रान्तिकारी कदम माना जायेगा.

ईसाई समाज द्वारा नकार दी गयी डान ब्राउन (Dan brown) द्वारा रचित ‘द डी विन्सी कोड’ (The Di Vinci Code) पर भी हमारा यही विचार हैं.

इन सभी पुस्तकों और इन जैसी कई पुस्तकों के नाम देने का उद्देश्य उस दोहरे मापदंड को दर्शाना हैं जो हिन्दू समाज के विरुद्ध वामपंथी बुद्धिजीवी? वर्ग अपनाये हुए हैं की हिन्दुओं के विरुद्ध तो किसी भी प्रकार का कुत्स साहित्य विचारों की अभिव्यक्ति की श्रेणी में आता हैं जबकि ईसाई और इस्लाम मत के सम्बन्ध में लिखा गया कोई भी साहित्य अल्पसंख्यकों के अधिकारों का दमन करने वाले और उनके विरोद्धी दक्षिणपंथी विचारधाराओं का उन्हें दबाने का प्रयास हैं.पहले भी ऐसे प्रयास सीता सिंग्स तरहे ब्लुएस (Sita Sings The Blues) के माध्यम से हो चुके हैं.

अथवा आर्य द्रविड़ की घटिया राजनीती करने वाले तमिल नाडू के पूर्व मुख्यमंत्री करूणानिधि द्वारा भी श्री राम को रामसेतु मुद्दे पर काल्पनिक बताना अत्यंत खेदजनक था.

मकबूल फ़िदा हुसैन द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स भी इसी श्रेणी में आती हैं क्यूंकि केवल हिन्दू देवी देवताओं के अश्लील चित्र बना कर उसे विचारों की अभिव्यक्ति कहना दोगली नीति हैं. हुसैन की इतनी हिम्मत कभी नहीं हुई की इस्लाम अथवा ईसाइयत से सम्बंधित किसी की भी ऐसी पेंटिंग्स बना सके पर सबसे बड़ी विडम्बना यही रही की उनके मरने के बाद वामपंथी जब घरियाली आंसू बहाने लगे तो मीडिया ने हुसैन के भगोड़े होने की काले पानी की सजा से तुलना करी थी.

आज के युवा आसानी से धर्म के नाम पर परोसी जा रही इस दोगली निति को समझ गए हैं और सभी मिलकर हमारी श्रेष्ठ विचारधारा को हानी पहुँचाने वाले ऐसे कुत्सित प्रयासों का मुहतोड़ जवाब दे तभी हम आर्य जाति के सच्चे सिपाही कहलाने जायेगे.

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Posted on December 12, 2011, in daily gossips. Bookmark the permalink. 20 Comments.

  1. आपने जो उद्दरण दिये हैं उन्हे पढ़कर एक आम जागरूक हिन्दू का मन उद्वेलित हो जाना चाहिए। लेकिन सेकुलरिज़्म की अफ़ील खाकर सोये हिन्दू न जाने क्यू खामोश हैं। थ्री हंड्रेड रामायण एक तरह की बौद्धिक बर्बरता है। आपके गहन लेकिन समझने योग्य सहज विश्लेषण के लिए हार्दिक साधुवाद.

  2. aap ne jo likha vo satya hai

  3. I also add that Bertrand Russell wrote a book “why I am not a Christian”. This book also deserves to be the book of study for students of Delhi university. But this is inconceivable in the present surcharged atmosphere of Secularism. Bertrand Russell is no mean author and he won Nobel prize for his literary works.

    But beyond this, what should be noted is there is no authentic Version of Ramayan which could be referred to as benchmark. True, the Valmiki Ramayan is the authentic but then this version itself is full of interpolations. A common man is at loss to know which is the trustworthy version and where this could be procured. The Ramayan book sold by Geetha press, Gorakpur is a bundle of interpolations.
    I feel sometimes that Arya scholars have failed to come with the authentic version of Ramayan and even if they had one such version, the apex body of Aryasamaj have failed to bring out the correct version of valmiki Ramayan. As long as we do not have an all India, authentic version of Ramayan, printed and sold in crores we would be coming across the writings of the type of Ramanujam.
    Incidentally, Ramanujam, is a Kannada man now dead.

    • aryaveer ji

      swami jagdishwaranand ji had edited ramayan and removed all sorts of interpolations. its published from govindram hasanand delhi.

      but we need another suddh version of ramayan like dr surende rkumar had published on manu smriti

  4. नमस्ते जी, बहुत अच्छा लेखे है । ऐसे भ्रष्ट पाठों को विश्वविद्‍यालय के पाठ्यक्रम से बाहर ही करना चाहिये ।

    किसी आर्य विद्‍वान् के आर्यभाषा में लिए हुए रामायण के अनुवाद को पाठ्यक्रम में रखना चाहिये ।

    धन्यवाद.

  5. आर्यवीरजी की बात से बिल्कुल सहमत हूँ। हिन्दू/सनातन समाज मे एक अधिकृत केंद्रीय प्रकाशन संस्था की अति आवश्यकता है। जो समस्त धार्मिक ग्रंथो का विधिवत सम्पादन /त्रुटीमुक्त करके आम लोगो को बिना लाभ /हानि के सस्ते दाम पर ग्रंथ सुलभ कराये। प्रकाशन मण्डल मे वेदो के निष्णात लोगो की एक कुशल संपादकीय टीम रहे। इस विषय मे आर्यसमाज और विहिप /संघ मिलकर कुछ ठोस काम कर सकते हैं। आजकल टीवी चैनलो पर कई तरह के पोंगा पंडित आकर ग्रहण व आँय धार्मिक विषयो पर अपना ज्ञान झाड़ते हैं। जो कई बार तो परस्पर विरोधाभासी भी होता है। भले ही ऐसे कार्यक्रमो से उनको व्यक्तिगत फायदा मिलता हो लेकिन सनातन धर्म को तो नुकसान ही होता है। इसलिए एक ऐसी केंद्रीय पीठ होनी चाहिए जो त्योहारो/ग्रहण/ज्योतिष आदि विषयो पर समय-समय पर त्रुटीहीन सूचनाए जारी करे। और शांकाओ का समाधान करे।

  6. What sri Jeet Bhargavaji said here was what I intended. A few years ago in the context of Ramsetu controversy I sent an e-mail to Dr Togadia Gen Secy of VHP on the necessity of forming a council of Scholars with the agenda of bringing out a pure form of Ramayan and Mahabharath. Dr Togadia agreed but no action. The differences between Aryasamaj and VHP scholars in these matters is not very much and hence it is still necessary that an authentic versions of these timeless epics are brought out to silence the critics for good. Further, as Bhargavji has suggested that these vetted copies of epics should be made available to one and all at a very economic price and further, any show, book, etc which derogates the character of Ram and Krishna should be got condemned in no time and recourse to legal action is taken to rectify the wrongs. But this is a onerous task and at least Aryasamaj should take the lead in forming the council of scholars and mobilising resources.

  7. http://agniveerfans.wordpress.com/2011/08/16/krishna/

    please readthis article of mine on yogiraj shri krishna ji maharaj.

    in rss orkut group discussion thread went to 1000 + posts but majority of hindu brothers not ready to accept the truth and reject untruth.

    dr vivek arya

  8. Hindus have been brainwashed by the scandalous teachings of Puranas for over 1000-1500years. Earlier they were brainwashed by the stupid, motivated writings about Vedas, with the result that the Hindus have lost sense of balanced. logical thinking and they are house divided. When therefore swami Dayanand wanted to take Hindus back to the pure nectar of Vedas and asked them think logically, he was mistaken and branded with so many uncharitable remarks. Hindus as I feel are destined to disappear and as the saying goes that a drowning man also drags the rescuer resulting getting both of them drowned, the people who point out mistakes and asks them to correct are not received well. What Dr vivek Arya said about Orkut is 100@ correct and the discussion was abandoned as the stupid people refused to see the reason. This is very sad. But at least the Arya Pratindihi sabha should seriously think over the issue and bring out pure version of Ramayan and Mahabharath in paper back editions so that discerning people would see reason and accept truth. I request Dr vivek Arya to make some attempts in this regard as he is stationed in Delhi and in the know of people and things.

    • aryaveer ji

      i even talked to scholars. they said it need continious harwork for years to prove 25 thousand shaloks of ramayan as original or interpolated one.

      suc tasks could be done only after big assurance.

  9. नन्दकिशोर आर्य

    अतिउत्तम प्रस्तुति

  10. Delhi University should incorporate the following magnum opus in their syllabus on History.

    1. Understanding Muhammad and Muslims – by Dr. Ali Sina
    2. The X-Rated Bible – by Ben Edward Akerley
    3. Holy Bible – by Robert G Ingersoll
    4. The Dark Bible – Jim Walker
    5. The Christ – by John E Remsberg
    6. Muhammad and Islam-Stories not told before – by Muhammad Asghar
    7. Prophet of Doom – by Craig Winn
    8. Muslim State in India Today – K S Lal
    9. Islam, Sex & Violence_Anwar Shaikh
    10. Is the Qur’an the Word of God – Jay Smith

    I am sure the Uni will never do this as all the above books show us Islam and Christianity as they actually are.

    Whether the Unis teach or not, those who are interested should learn the truth on their own as the truth (esp about history) is something which is almost impossible to find in Indian Unis.

    I am ready to give all these and hundreds of other books to Agniveerfans if they are willing.

    — Rajeshkumar Arya

  11. One more. They should also prescribe readings on Christianity done by Nobel laureate Late Bertrand Russel, and eminent men like Jefferson, Thomas Paine etc. But as Rajesh observed that this will be never done in the name of Secularism which is solely confined to ridicule Hinduism..

  12. Rajeshkumar Arya

    Let’s see how Mark Twain used to see the Bible.
    Once a young woman superintendent in the Children’s Department of the Brooklyn Public Library charged that Tom Sawyer and Huckleberry Finn were corrupting the morals of children.
    Twain’s answer, as recorded in volume two of his autobiography, page 335, was:
    “I am greatly troubled by what you say. I wrote Tom Sawyer and Huck Finn for adults exclusively,and it always distresses me when I find that boys and girls have been allowed access to them. The mind that becomes soiled in youth can never again be washed clean; I
    know this by my own experience, and to this day I cherish an unappeasable bitterness against the unfaithful guardians of my young life, who not only permitted but compelled me to read an unexpurgated Bible before I was fifteen years old… Most honestly do I wish I could say a softening word or two in defense of Huck’s character, since you wish it, but really in my
    opinion, it is no better than those of Solomon, David, Satan, and the rest of the sacred brotherhood. If there is an unexpurgated [Bible] in the Children’s Department, won’t you please help that young woman remove Huck and Tom from that questionable companionship?” [taken from “The X-rated Bible” written by Ben Edward Akerley]

  13. Rajeshkumar Arya

    “Somebody ought to tell the truth about the Bible. The preachers dare not, because they would be driven from their pulpits. Professors in [Delhi Uni] colleges dare not, because they would lose their salaries [secular image]. Politicians dare not, because they would be defeated. Editors [of print and electronic media] dare not. They would lose subscribers. Merchants dare not, because they might lose customers. Men of fashion [films and serials] dare not, fearing that they would lose caste [fans]. Even clerks dare not, because they might be discharged. And so I thought I would do it myself”.
    “There are many millions of people who believe the Bible to be the inspired word of God — millions who think that this book is staff and guide, counselor and consoler; that it fills the present with peace and the future with hope — millions who believe that it is the fountain of law, justice and mercy, and that to its wise and benign teachings the world is indebted for its liberty, wealth and civilization — millions who imagine that this book is a revelation from the wisdom and love of God to the brain and heart of man — millions who regard this book as a torch that conquers the darkness of death, and pours its radiance on another world — a world without a tear”.
    “They forget its ignorance and savagery, its hatred of liberty, its religious persecution; they remember heaven, but they forget the dungeon of eternal pain. They forget that it imprisons the brain and corrupts the heart. They forget that it is the enemy of intellectual freedom. Liberty is my religion. Liberty of hand and brain — of thought and labor, liberty is a word hated by kings — loathed by popes. It is a word that shatters thrones and altars — that leaves the crowned without subjects, and the outstretched hand of superstition without alms. Liberty is the blossom and fruit of justice — the perfume of mercy. Liberty is the seed and soil, the air and light, the dew and rain of progress, love and joy”.
    [These passages have been taken from “The Holy Bible” written by Robert G Ingersoll in 1894]

    Note: Words in [ ] are mine.

  14. Rajeshkumar Arya

    Professor Henry Sturt, of Oxford University, in The Idea of a Free Church says , “Of all the terrible intellectual disasters of Europe the Bible has been by far the greatest.
    ——————————–
    “…The truth is that the Bible is a dangerous moral guide, which if followed, would land men in the alms house or the penitentiary. All the language of exaggeration has been exhausted in praising that book, and yet that book has been the greatest enemy of the human race. It has been the enemy of liberty, the enemy of knowledge, the enemy of morality. That book helped largely to destroy the civilization of Greece and Rome. It gave Europe the long night of the dark ages. It made ignorance and cruelty universal. It enslaved millions. It drenched Christian lands with the blood of persecution. It caused countless religious wars. It filled millions of lives with sorrow, and covered countless faces with tears”.
    “For the civilization we enjoy, we are indebted to the brave thinkers who fought against the ignorance and the abuses that are championed by the Bible. The world has advanced in spite of the repressive influence of its “inspired” book. Every educated minister knows this. The best minds in the church today take consolation from the fact that the Bible is not true. The light is spreading everywhere. The clergy are apologizing. Superstition is surely fading from the mind. Freethought holds the allegiance of the world’s best brains. The day is coming when mankind will own that while there are many good things in the Bible, its influence in the world proves it to have been an extremely dangerous moral guide”.

    [from “Bible – A Dangerous Moral Guide” a lecture delivered by Marshall J Gauvin]

  15. “People just don’t decide to become terrorists. Terrorists are motivated by a doctrine that instills in them the hate and the will to kill. But you cannot hate so intensely unless you feel victimized. Yes the terrorists feel victimized. They are filled with venom. That is why they are willing to die. Part of that victimization is justified, but the great part of that is induced in them by the teachings of the Quran”.
    —- Dr. Ali Sina

    • Ali Fina at http://www.faithfreedom.org is doing a very courageous work by exposing islam

      • विजय विक्रम सिंह

        राम और रामायण दोनो की विचारधारा दलित विरोधी है ।
        डोर शूद्र पशु और नारी
        ये सब है ताड़िन के अधिकारी

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