मेरे शरीर व मन पुष्ट हों, मुझे प्रकाश दो


डा. अशोक आर्य

 

ईश्वर सुखों का भंडार है | मानव को मिलने वाले सब सुख उस प्रभु की कृपा का ही परिणाम है | ईश्वर राजा को रंक बना सकता है तथा रंक को राजा | ईश्वर का आदेश है कि हे मनुष्य ! तु कर्म कर , उसका फल तुझे मैं दूंगा | इस से स्पष्ट है कि ईश्वर यूँ ही राजा को रंक नहीं बनाता और न यूँ ही किसी को रंक से राजा बनाता है जो मानव कर्म करता है , पुरुषार्थ करता है , मेहनत करता है, उसे ईश्वर निश्चित ही उपर उठता है | हम भी प्रति क्षण ईश्वर से हमारे सुखद भविष्य कि प्रार्थना करते हैं | हम सदा चाहते हैं कि हे ईश्वर ! मुझे सदा स्वस्थ रखें, पुष्ट रखें , सुखी रखें , प्रकाशित रखें | इस के लिए हमें तदनुरूप पुरुषार्थ करना होगा ईश्वर पुरुषार्थी का ही रक्षक होता है |

यजुर्वेद के अध्याय १४ मन्त्र १७ में इसे ही दर्शाया गया |

मन्त्र इस प्रकार है : –

 

आयुर्मे पाहि , प्राण में पाह्यपान्म में पाहि |

व्यान्म में पाही ,च्क्शुर्मे पाहि , श्रोत्रं में पाहि , वाचन में पिन्व ,मनो मे जिन्वात्मान्म में पाःही , ज्योतिर्मे यच्छ ||

यजुर्वेद १४-17 ||

 

शब्दार्थ : – (में) मेरी (आयु:) आयु की (पाहि) रक्षा करो (में प्राणं पाहि) मेरे प्राणवायु की रक्षा करो (में अपानं पाहि) मेरी अपां वायु की रक्षा करो(में व्यानाम पाहि( में व्यान वायु की रक्षा करो (में चक्षु: पाहि) मेरी आँखों की रक्षा करो(में श्रोत्रं पाहि) मेरे कानो की रक्षा करो (में वाचं पिन्व)मेरी वाणी को पुष्ट करो (में मन: जिन्व ) मेरे मन को प्रसन्न व तृप्त करो(में आत्मानं पाहि) मेरी आत्मा की रक्षा करो (में ज्योति: यच्छ ) मुझे प्रकाश दो |

 

भावार्थ : – हे परमपिता परमात्मन , मेरी आयु की रक्षा करो | हे

प्रभु , मेरे प्राण, अपान, व्यान आदि सब वायुओं की रक्षा करो | हे पिता, मेरी आँखों व कानों की रक्षा करो | हे परमेश्वर, मेरी वाणी को पुष्ट करो व मन को तृप्त करो | हे सर्व रक्षक , मेरी आत्मा की रक्षा करो तथा मुझे प्रकाश दो | ऊपर हमने यजुर्वेद का मूल मन्त्र देकर उसका शब्दार्थ व भावार्थ भी दे दिया है ताकि हम इस मन्त्र की विषद व्याख्या करने तथा समझने मैं समर्थ हो सकें | अत: आओ हम मन्त्र की विवेचनात्मक व्याख्या द्वारा मन्त्र के भाव को समझने का प्रयास करें तथा दूसरों को भी समझाने के लायक बनें | मन्त्र में कुछ व्यक्तिगत प्रार्थनाओं के द्वारा हम ने प्रभु से हमारे विभिन्न अवयवो की रक्षा, पुष्टि व प्रकाश देने की प्रार्थना की है | परमपिता परमात्मा हमारा पिता होने के कारण हम उस प्रभु से जो कुछ भी माँगते हैं वह हमें देता ही चला जाता है | प्रभु देता तो है किन्तु देता उसे ही है जो लेने के लिए सुपात्र हो | कुपात्रों को वह प्रभु कुछ भी नहीं देता | कहा भी है की जैसा बोवोगे , वैसा ही काटोगे | यदि हम गेहूं का बीज अपने खेत में डालेंगे तो प्रभु उसका फल गेहूं के पौधे के रूप में ही देता है खरबूजा कभी नहीं लगाता, खरबूजे के पौधे पर सदा खरबूजा ही लगाता है , आम कभी नहीं लगाता | इस प्रकार प्रभु का कार्य व न्याय सत्य है | इसे कोई कितना भी प्रयास करे बदल नहीं सकता | प्रभु सहायता उसकी ही करता है जो पुरुषार्थ, परिश्रम से अपनी सहायता करता है |

इस आलोक में मन्त्र का अर्थ हम इस प्रकार करते हैं :- मन्त्र में परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करते हुए मांग की गयी है की वह प्रभु हमारी आयु,प्राण.अपान.व्यान आदि सब प्रकार की वायुओं की रक्षा करो | प्रभु हम सब का रक्षक है, देवों का देव है | इस नाते हम जो कुछ भी उस प्रभु से माँगते है, वह हमें देता है किन्तु कुछ भी देने से पहले प्रभु एक शर्त लगाता है तथा हमें उपदेश देते हुए कहता है कि मैं यह सब तभी दूंगा, जब तुम अपने आप को कुछ लेने का अधिकारी बनोगे | कुछ लेने का अधिकारी बनने के लिए मेहनत करनी होगी , पुरुषार्थ करना होगा | जब मांग के अनुरूप पुरुषार्थ करोगे तब ही कुछ मिलेगा , यदि यह समझो की जो मांगेंगे,वह मिल तो जाना ही है, तो मेहनत की क्या आवश्यकता है ,तो ऐसे व्यक्ति को प्रभु भी कुछ देने वाला नहीं | हम ने प्रभु से शरीर की रक्षा करना तो माँगा लिया किन्तु शरीर की रक्षा के विरुद्ध शरीर को नस्ट करने का काम कर रहे हैं तो प्रभु हमारी प्रार्थना कैसे स्वीकार करेगा ? अत: जो हम माँगते हैं वह हमें हमारे पुरुषार्थ करने पर ही प्रभु देता है | इस मन्त्र में हमने प्रभु से हमारे शारीर की विभिन्न प्रकार की वायुओं की रक्षा की मांग की है | वायुओं की रक्षा के लिए प्राणायाम करना होता है | यह प्राणायाम ही है , जिससे हमारी सब प्रकार की वायुओं में पुष्टि आती है ,उनमें शक्ति आती है तथा शरीर भी निरोग बनाता है | हम प्राणायाम नहीं करते तो यह शक्तियां हम प्राप्त नहीं कर सकते | अत: प्रभु की प्रार्थना के साथ ही साथ पुरुषार्थ भी आवश्यक है | हमारे शरीर में पांच प्रकार की प्राण आदि वायुओं का निवास है | इन पाँचों वायुओं के स्थान व कार्य भी निश्चित हैं जो एक श्लोक में इस प्रकार बताये गए हैं : –

हृदि प्राणों, गुदे पान: , सामानों नाभिमंदाले | उदान: कंठदेशस्थो , व्यान: सर्वशरीरग: ||

 

हमारे शारीर में जो प्राणवायु चल रहा है, उसे ही प्राण शक्तिभि कहते है | यह दो नहीं हैं ,एक के ही दो नाम हैं | जिस प्रकार किसी रामलाल व्यक्ति को कोई तो रामलाल कहता है तो कोई पिता, मामा ,चाचा, ताया या किसी एनी नाम से संबोधन करता है || इस प्रकार शरीरस्थ वायु भी एक ही है किन्तु कार्य भेद से पांच नाम दिए गए हैं जो इस प्रकार हैं : –

 

१. प्राण वायु :- यह वायु ह्रदय की शुद्धि तथा रक्त को निर्धारित स्थान पर पहुँचाने का कार्य करती है | दूसरे शब्दों में हम कह सकते है की यह वायु शरीर की व्यवस्था का मुख्य भार अपने पास रखती है | शरीर का संचालन रक्त से ही होता है | रक्त को शरीर के सब भागों में पहुँचाने का कार्य यह वायु करती है | इस कारण इसे शरीर की संचालक वायु भी हम कह सकते हैं | सब जानते हैं की शरीर का संचालन ह्रदय से ही होता है | अत: हम कह सकते हैं कि इस वायु का मुख्य कार्य एक रसोईये के समान है,जो बनाता भी है तथा सब को बांटने का कार्य भी करता है | अत: हम कह सकते हैं की इस वायु का निवास ह्रदय में ही होता है | ह्रदय ही शरीर का केंद्र होने के कारण यहाँ से सब अवयवों का संचालन सरल हो जाता है | इस लिए यह वायु यहीं पर ही अपना निवास बनाती है |

२. अपान वायु : – शरीर में एकत्र हो रहे मल – मूत्र आदि शल्य पदार्थों को बाहर निकाल कर शारीर को शुद्ध रखना होता है | यह मल शुद्धि के माध्यम से शरीर की गन्दगी को शरीर से साफ़ कर बाहर निकालने का कार्य करती है | शरीर की मल्शुधि का मुख्य कार्य गुदा मार्ग से ही होता है , इस कारण इस का निवास स्थान गुदा को अर्थात नाभि के नीच के स्थान को ही माना गया है | यदि हमारे शरीर का शोधन न हो तो हमारे शरीर में रोग के कीटाणुओं की संख्या तेजी से बढ़ेगी ,जिससे हम किसी भी भयंकर रोग का ग्रास बन जावेंगे | इस लिए इस वायु का भी हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण योगदान है |

 

३. समान वायु : – इस वायु को कन्द्रीय वायु भी कहते हैं | जो भोजन हम करते हैं , यदि वह पचे नहीं तो हमारे शरीर को घोर कष्टों का सामना करना पड़ता है | यह वायु हमारे खाए भोजन को पचाने का कर्तव्य पूर्ण करने के साथ ही साथ इस भोजन से रक्त बना कर उस रक्त को शरीर के विभिन्न अवयवों को बांटने का कार्य करती है | इस का निवास शरीर के केंद्र में होने के कारण ,यह सदा नाभि में निवास करती है |

 

४. उदान वायु : – यह वायु मनुष्य को उर्ध्वारेता बनाने का कार्य करती है | यह ही वह वायु है जो ह्रदय तथा मस्तिष्क में सम्बन्ध बनाती है | यह वायु हमारे कंठ को भी शुद्ध करती है तथा मस्तिष्क को शक्ति अर्थात पुष्ट करने का कार्य भी करती है | इस वायु का मुख्य कार्य कंठ से होने के कारण इस का निवास भी कंठ ही होता है |

५. व्यान वायु : – यह वायु उपर्वर्णित चारों प्रकार की वायुओं में समन्वय बैठाने काम करती है | इस के साथ ही साथ शरीर के प्रत्येक अंग में प्राण का संचार करती है | इस वायु के बिना शरीर में चेतना नहीं आ सकती | सारे शरीर से सम्बन्ध होने के कारण यह वायु पूरे शरीर में व्याप्त रहती है , इस कारण इस का निवास भी पूरे शरीर में होता है| मन्त्र अंत मैं प्रार्थानाके माध्यम से कहता है की मेरी आत्मा की रक्षा करते हुए ज्योति देने की भी मांग करता है | अब हम देखें की आत्मा की रक्षा कैसे होती है ? जो मनुष्य अच्छे कार्य करताहै , शुभ कर्म करता है, दुसारों की सहायता करता है , उसकी आत्मा को जो ख़ुशी प्राप्त होती है , उसका वर्णन कलम से तो संभव नहीं है | बस ऐसे कार्य करने से ही आत्मा की रक्षा होती है | ऐसे कार्य करने वाले की ख्याति ही उसकी रक्षक बनती है | अत: प्रभु से प्रार्थना के साथ ही साथ अच्छे कार्य भी करते रहना चाहिए ताकि आत्मा भी तृप्त हो तथा उसकी रक्षा भी हो | यहाँ ज्योति देने या प्रकाश देने की भी मांग की गयी है| जब कोई मनुष्य शुभ काम करता है तो उसकी ख्याति तो दूर दूर तक जाती ही है साथ ही साथ उसके अन्दर एक सुखदायक प्रकाश भी उसे दिखाई देता है | यह ज्योति या प्रकाश ही तो हम प्रभु से माँगते हैं | यह ज्योति ही वास्तव में मानव के जीवन को पवित्र, सुखप्रद , प्रशास्तिपूर्ण व उन्नत बनाती है | इस ज्योति को पाने के किये मनुष्य जीवन पर्यंत भटकता रहता है , जब कि इसे पाने का साधन उसके अपने ही हाथ में होता है | इस प्रकार मन्त्र में शरीर के विभिन्न अवयवों को पुष्ट करने व उनकी रक्षा का उपाय वायुओं को बताया है तथा इन वायुओं की रक्षा स्वरूप प्राणायाम को अपनाने की प्रेरणा दी है | साथ ही आत्मा की रक्षा के लिए अच्छे काम कर एक विचित्र प्रकाश देने की प्रार्थना की गयी है , जिससे मानव का जीवन सफल बनता है |

 

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Posted on January 8, 2012, in Philosophy. Bookmark the permalink. 1 Comment.

  1. very informative post.

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