हम सदा प्रसन्नचित रहते हुए जीवन बितावें


ओउम

डा. अशोक आर्य

वेद में जीवन को सुखदायक, प्रसन्नचित,आनंदपूर्वक बिताने का उपदेश दिया गया है | आज का मानव अपने जीवन में सुखों की भरमार चाहता है | वह प्रति क्षण सुख में डूबा रहना चाहता है | सुखी रहने के लिए मानव जीवन में बहुत सी सावधानियों की आवश्यकता होती है | कई प्रकार के तप व त्यागा की आवश्यकता होती है , जिन को अपनाने से मानव बचना चाहता है | आज का मानव पुरुषार्थ से बचना चाहता है | महानता तो आज के मानव को पसंद ही नहीं | इस आधार पर मै कह सकता हूँ कि आज का मानव निरंतर सुखों की खोज में है किन्तु कार्य व्यवहार, दिनचर्या उसकी ऐसी है की सुख उस के पास आना ही नहीं चाहते | जो कार्य वह करता है , जिनसे दू:खों की प्राप्ति होती है, तो फिर वह सुखों से साक्षात्कार कैसे करे ?

ऋग्वेद के अध्याय ४ सूक्त ४ के मन्त्र संख्या ९ में मानव को आदेश दिया गया है कि हम प्रसन्नचित रहते हुए जीवन बिताएं |

मूल मन्त्र इस प्रकार है : – इह तवा भर्या च्ररदुप तमन दोशावस्त र्दिदिवान्समणु | क्रीदंतस्तवा सुमनस: सपेमा $ – भि दयुम्ना तस्थिवांसो जनानाम || ऋग्वेद ४-४-९ || शब्दार्थ : – हे अग्नि ( इह) इस संसार मैं ( दोषावास्ता: ) दिन – रात, ( दीदिवांसम) प्रकाशमान (तवा) तुझको (अनु द्युन ) प्रतिदिन (तवं) स्वयं (भूरी ) भुत अधिक (उप आ चरेत) सेवा करे (जनानाम )लोगों के शत्रुओं के (दयुम्ना ) तेज को धनों को ( अभि तस्थिवांसा) अपने अधिकार में करते हुए अथवा अभिभूत करते हुए (कृदंत:) खेलते हुए (सुमनस: ) प्रसन्नचित (तवा) तेरी (सपेम) सेवा करें |

भावार्थ : – हे अग्नि देव ! इस संसार में रहते हुए हम दिन – रात , प्रकाशमान होते हुए प्रतिदिन तेरी सेवा करें | अन्य लोगों के तेज को अपने अधिकार में करते हुए, अभिभूत करते हुए , हम खेलते कूदते आनंद पूर्वक तेरी परिचर्या करें | मनुष्य प्रत्येक अवस्था में खुश रहना चाहता है |यह ख़ुशी हीहै जो उसे सुख की और ले जा सकती है | ख़ुशी ही मनुष्य के मित्र बनाने का साधन है | प्रसन्न चित मानव ही किसी भी कार्य व्यापार को सुचारू रूप से चला सकता है | अत: यह ख़ुशी ही है जिससे मनुष्य का जीवन सुखमय होता है, धन एश्वर्य प्राप्त करने में अधिक परिश्रम नहीं करना होता तथा सब ओर से प्रकाश ही प्रकाश दिखाई देता है | इस ख़ुशी को पाने का भरसक प्रयास आज का मानव करता है | दिन रात लगा रहता है किन्तु इसे पाने मैं सफल नहीं होता क्योंकि जिस ख़ुशी को वह पाना चाहता है, उसके अनुरूप पुरुषार्थ नहीं कर पाता | जब जाना तो दिल्ली से रोहतक की ओर है किन्तु गाडी बम्बई की पकड़ने से रोहतक कैसे पहुंच सकते है ? वेद सब समस्याओं का समाधान करता है | प्रस्तुत समस्या का समाधान भी ऋग्वेद अध्याय ४ सूक्त ४ के मन्त्र संख्या ९ में बड़े ही सुन्दर ढंग से दिया है | मन्त्र, उसके शब्दार्थ तथा भावार्थ ऊपर दिया गया है | भावार्थ के पश्चात तो मन्त्र की भावना स्पष्ट ही हो जाती है | अत: आओ हम अब मन्त्र के विस्तृत अर्थ का अध्ययन कर्रें |यह बात सब की चाहना है की जीवन में पवित्रता आवे, शरीर सदैव निरोग रहे तथा आयु लम्बी हो | लम्बी आयु के लिए शरीर का स्वस्थ व् रोगरहित होना आवश्यक है | यदि शारीर रोग ग्रस्त है , स्वस्थ नाम की वस्तु शरीर के पास आती ही नहीं , रोग रूपी संकट के कारण प्रतिक्षण कराहते रहते है ,तो ऐसी अवस्था में दु:खी मानव की म्रत्यु शीघ्र हो जाती है , इस प्रकार के मानव की चाहे कितनी ही आकांक्षा हो लम्बी आयु पाने की किन्तु उसकी आयु दीर्घजीवी नहीं हो सकती | अत: लम्बे समय तक प्रसन्नचित सूर्य- दर्शन, वसंत-दर्शन या दीपावली मनाने का अवसर पाने के लिए हमें ख़ुशी प्राप्त करनी होगी | ख़ुशी पाने के लिए ऐसे उपाय करने होंगे, जिससे शरीर स्वस्थ व रोग रहित रहे | इस निमित दिनचर्या में प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में जागरण, स्नान,आसन,प्राणायाम,यज्ञ ,सात्विक भोजन तथा बड़ों का आदर सत्कार करना होगा | आगंतुक का स्वागत व अतिथि सत्कार आदि गतिविधियाँ तथा धर्माचरण सुख के साधन हैं | इन गुणों को अपनाना होगा |

1वेद मन्त्र आगे कहता है कि यदि हम प्रसन्नचित रहेंगे तो हमारा जीवन सुखों से भरपूर होगा | प्रसन्नचित रहने के लिए मन का निर्मल होना भी आवश्यक है | छल, कपट, धोखा आदि प्रमाद मन के निर्मल होने में बाधक होते हैं| अत: निर्मलता के मार्ग में आने वाली इन बाधाओं से बचते हुए मन को निर्मल बनाने के साधन अपनाने होंगे | दु:ख या क्लेशों को दूर करने कि व्यवस्था करनी होगी | यदि हम दुःख आदि से बचना चाहते हैं तो हमें ऐसे उपाय करने होंगे, जिनसे मन खुश रहे क्योंकि सुखी जीवन के लिए मन का खुश , प्रसन्नचित होना आवश्यक है | अत: सदैव प्रसंनाहित रहने के प्रयास करते रहना आवश्यक है |

२. वेद मन्त्र में सुखी जीवन के लिए दूसरी बात बतायी गयी है कि यदि हम सुखी रहना चाहते है तो हमारी दृष्टि सुन्दर हो | दृष्टि को सुन्दर रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम बुरी बातों को , बुरे दृश्यों को न देखें | आँखों का स्वस्थ होना भी आवश्यक है | आँखों में शल्य होने से हम ठीक से नहीं देख सकते | शरीर को कष्ट भी होता है | यह कष्ट ही है जी हमारी ख़ुशी छीन लेता है | जब ख़ुशी नहीं होगी तो जीवन क़ी आशा भी धुंधली हो जाती है | अत: ख़ुशी व दीर्घ जीवन के लिए आँखों का , दृष्टि का ठीक होना भी आवश्यक है |

३. वेद मन्त्र सुखी जीवन का आधार सुसंतान को भी मानता है | मन्त्र कहता है कि यदि हम सुखी रहना चाहते है तो हमारे पास सुसंतान भी होना चाहिए | योग्य संतान ही हमारे सांसारिक सुखों को बढाती है | योग्य व परिवार की विचारधारा को अनवरत आगे बढाने वाली संतान न केवल परिवार के यश व कीर्ति को पूर्ववत बनाये रखती है अपितु इसे पहले से भी अधिक अर्जित करती है , अधिक बढ़ाती है | परिवार कि कीर्ति दूर – दूर तक फ़ैल जाती है | लोग अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए इस परीवार का उदहारण सम्मुख रखते है | जहाँ एसा सुन्दर परिवार होगा, ऐसी सुन्दर संतान होगी ,वहां आयु तो दीर्घ स्वयं ही हो जावेगी |

४. मन्त्र सुखी जीवन के लिए जिस अन्य बात कि ओर निर्देश करता है ,वह है निरोगता | मन्त्र कहता है कि सुखी जीवन के लिए निरोगता का होना भी आवश्यक है | जब हम निरोग हैं तो हम कम गुणवत्ता वाली वस्तु को भी सहर्ष स्वीकार कर लेते है, जब कि रुग्ण अवस्था में अच्छी गुणवत्ता वाली वस्तुएं भी हमें अच्छी नहीं लगती | अच्छी वस्तुओं को भी छूने या खाने को हम तैयार नहीं होते | इस अवस्था में हमारा जीवन आगे कैसे बढ़ सकता है ? अत: अच्छी ख़ुशी पाने के लिए शरीर का निरोग होना भी आवश्यक है | शरीर का निरोग होना भी जीवन क़ी एक बड़ी उपलब्धि है | एसा शरीर ही सुखों के उपभोग व मुक्ति के मार्ग को सुखमय बनाने का साधन है |

५. मन्त्र में जिस पंचम व अंतिम बात कि ओर निर्देश किया गया है , वह है कि हम पाप रहित हों | जीवन को सुखमय बनाने के लिए पाप रहित होना भी आवश्यक है | जब तक हम अपने जीवन को पापाचरण में लगाए हुए हैं , , जब तक हमारे जीवन में राग – द्वेष, मद – मोह तथा रोग शोक है , तब तक हमें सुख व् शान्ति नहीं मिला सकती | राग व द्वेष के चक्कर में हम भाई – भतीजा वाद के चक्कर में फंसे रहते हैं, सत्य न्याय से दूर होते चले जाते हैं | आज के राजनेताओं के अध:पतन का भी तो यही ही कारण है | मोह जीवन को कभी सुखी नहीं होने देता | मोह को एक सीमा से अधिक कभी पास नहीं आने देना चाहिए | यह सुखों के नाश का कारण बनता है | मद अर्थात नशा तो है ही नाश का कारण | | सुखों के अभिलाषी को कभी भी मद के चक्कर में नहीं आना चाहिए | मद अभिलाषी व्यक्ति न केवल अपने ही सुखों से दूर होता है अपितु परिजनों व पडौसियों के जीने को भी दूभर कर देते हैं | इस लिए मद से सदैव दूर रहना भी सुखों का आधार है | लम्बी आयु की अभिलाषा के लिए मद से दुरी बनाना अवशम्भावी है | इस प्रकार इस वेद मन्त्र में बताये इन पांच बिन्दुओं पर चलने से हम प्रसन्न रहेंगे, मन को शान्ति मिलेगी,प्रसन्न रहेंगे, स्वास्थ्य ठीक रहेगा तथा सब प्रकार के सुख मिलेंगे | इन गुणों को अपनाने से जीवन सुखी होगा तथा हमारी आयु लम्बी होगी | अत: सुख के अभिलाषी प्राणी को वेद के इस मन्त्र से दिए गए आदेश का पालन करना ही होगा | अन्य कोई मार्ग नहीं है, जिससे स्थायी सुख मिल सके |

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Posted on January 10, 2012, in Vedas. Bookmark the permalink. 5 Comments.

  1. • रक्त साक्षी पंडित लेख्रामजी का संस्मरण —–
    ‘ वैदिक धर्मं में परमेश्वर पिता ही नहीं माता, बन्धु, व सखा भी है ‘—- एक बार पंडितजी ने आर्य समाज पेशावर के मंत्री बाबू सुरजनमलजी के साथ अफगानिस्थान में इसाई मत के प्रचारक पादरी जोक्स से पेशावर छावनी में भेट की | पादरी ने कहा की बाईबल में ईश्वर को पिता कहा गया है | ऐसी उत्तम शिक्षा अन्यत्र किसी ग्रन्थ में नहीं |
    इस पर पंडितजी ने कहा, ” ऐसी बात नहीं है | वेद और प्राचीन आर्य ऋषियों की बात तो छोड़िये अभी कुछ सौ वर्ष पूर्व श्री नानकदेवजी महाराज ने भी बाईबल से बढकर शिक्षा दी है |” पादरी ने पूछा कहा है ? पंडित जी ने कहा देखीए —–
    तुम माता पिता हम बालक तेरे |
    तुमारी किरपा सुख घनेरे ||
    यहाँ ईश्वर को पिता ही नहीं माता भी कहा गया है | यह शिक्षा तो बाईबल से बढ-चढ़कर है | माता का प्रेम पिता के प्रेम से कही अधिक होता है | संभवत: इसी कारण ईसा मसीह को यूसुफ पुत्र न कहकर इबने मरियम ( मरियम पुत्र ) कहा जाता है | यह सुनकर पादरी निरुत्तर हो गया |

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