शुभ धन एश्वर्य की प्राप्ति जागृत को ही होती है


डा. अशोक आर्य

 

आज का मनुष्य जीवन में अतुल धन सम्पति की अभिलाषा रखता है | धन सम्पति की अभिलाषा ने उसका जीवन क्रम ही बादल दिया है | इस जीवन क्रम के परिवर्तन के साथ ही उसकी आवश्यकताएं भी निरंतर बढती व बदलती ही चली जा रही हैं | एक सामूहिक परिवार में जहाँ एक रसोई में केवल एक चाक़ू होता था ,वहां आज परिवारों के विभाजन के पश्चात भी एक रसोई में कम से कम बीस प्रकार के तो केवल चाक़ू ही हो गए हैं | एक छीलने वाला, एक काटने वाला , एक डबल रीती पर जैम लगाने वाला ………. इस प्रकार जहाँ केवल चाकुओं की ही इतनी संख्या बढ़ गयी है, वहां शेष सामग्री की गणना करें तो आज एक छोटे से परिवार के पास आकूत सामग्री की आवश्यकता हो गयी है | आवश्यकता की क्या कहें आज तो अनावश्यक सामग्री पर धन पानी की भाँती बहाया जा रहा है | इसी सामग्री की एक प्रतिस्पर्धा सी चल रही है | एक के पास एक कपडे धोने की मशीन है तो उसके पडौसी का प्रयास होता है कि वह ऐसी मशीन लावे, जिस में कपडे सूख भी जावे ताकि वह पडौसी को पीछे छोड़ सके | इस अवस्था में अन्य पडौसी चाहता है कि वह उसे भी पीछे छोड़ कर ऐसी मशीन लावे जो न केवल कपड़ों की धुलाई व सुखाने का कार्य करे अपितु प्रैस भी कर देवे | इस अंधी दौड़ ने धन की आवश्यकता को ओर भी बढ़ा दिया है | धन की इस अंधी दौड़ ने परिवार , पास – पडौस व रिश्तों को भी भुला दिया है | आज का मानव साम ,दाम , दंड , भेद का प्रयोग केवल धन प्राप्ति में ही करना चाहता है | धन की इस अंधी दौड़ के कारण संसार में आपसी लडाई, झगडा, कलह क्लेश में निरंतर वृद्धि हो रही है | इस से बचने का एकमेव उपाय है पवित्र धन | यदि हम ऋग्वेद व साम वेद में वर्णित विधि से शुद्ध धन को अपने उपभोग के लिए एकत्र करेंगे तो हम निश्चय ही शांत व सुखी जीवन व्यतीत कर सकेंगे | आओ हम वेद की इस भावना का अध्ययन करें |

वेद मन्त्र का मूल पाठ इस प्रकार है : –

 

अगिर्जागार तमृच: कामयन्ते , अग्निर्जागार समु सामानी यन्ति | अग्निर्जागार तमयं सोम आह, तवाह्मस्मी सख्ये न्योका: || ऋग्वेद ५.४४.१५ सामवेद १८२७ ||

 

वेद की ऋचाएं ऐसे व्यक्ति को ही पसंद करती हैं जो जागृत अवस्था में है | अग्नि जागता है तो उसके पास सामवेद कि रचाएं आती हैं | इस जागृत अग्नि को ही सोम कहता है कि मैं तेरी मित्रता में प्रसन्नचित व सुखपूर्वक निवास करूँ | मन्त्र तथा इसके भावार्थ से एक बात स्पष्ट होती है कि वह सोम रूप परमात्मा उसके साथ ही सम्बन्ध रखना चाहता है , जो सदा जागृत रहता है | जो दिन में भी सोया रहता है , उसका कोई साथी नहीं बनना चाहता | इस का कारण भी है | जो दिन में सोया रहता है अर्थात जो पुरुषार्थ से भागता है , मेहनत से भागता है, वह कभी धन एश्वर्य नहीं पा सकता | जिसके पासा धन एश्वर्य नहीं है ,उसके मित्र कभी प्रसन्न व सुखी नहीं रह सकते | इस कारण उसकी मित्र मंडली बन ही नहीं पाती | आज के युग में तो मित्र होते ही धन के स्वामी के हैं , गरीब को कौन चाहता है ? हितोपदेश्ब में भी यही बात बतायी गयी है कि :-

 

उद्योगिनं पुरुशासिन्हामुपैती लक्ष्मी: | हितोपदेशे प्रस्ता.३१

 

इसका भाव है कि संसार में वही सफल होता है, वही उन्नत होता है, वही आगे बढ़ता है, जो उद्योग करता है, जो पुरुषार्थ करता है | पुरुषार्थ ही सुखी जीवन का आधार है | जो पुरुषार्थी नहीं उसके पास धन नहीं , जिस के पास धन नहीं उसके पास मित्र नहीं , यह बात भी संस्कृत के शलोक में स्पष्ट कही गयी है :- आलसस्य कुतो विद्या , अविदस्य कुतो धनं | अधनस्य कुतो मित्रं अमित्रस्य कुतो सुखं || श्लोक से स्पष्ट है कि आलसी कभी अच्छी विद्या नहीं पा सकता | विद्या के बिना शुद्ध धन कि प्राप्ति नहीं होती , जिसके पास धन नहीं, उसके मित्र भी नहीं बनते तथा जिस के सुख़- दु:ख में साथ देने के लिए मित्र ही नहीं हैं, वह सुखी कैसे रह सकता है ? अर्थात वह सुखी कभी नहीं हो सकता | इस लिए हे मनुष्य ,उठ ! पुरुषार्थ कर तथा आकूत धन कमा | शुद्ध धन ही तुझे सच्चा सुख़ देगा | इस तथ्य का रामचरित मानस में भी बड़े ही सुन्दर शब्दों में इस प्रकार बताया गया है :- सकल पदार्थ हैं जग माहीं , करमहीन नर पावत नाहीं | रामचरित मानस रामचरित मानस भी तो यही ही क ह रही है कि धन ऐश्वर्यों का स्वामी वही व्यक्ति बन सकता है , जो कर्म करता है | बिना कर्म के, बिना पुरुषार्थ के कोई धन ऐश्वर्यों का स्वामी नहीं बन सकता | यहाँ भी कर्म करने, मेहनत करने , पुरुषार्थ करने पर बल दिया गया है | बिना मेहनत के हम कुछ भी नहीं पा सकते | यहाँ तक कि भोजन सामने पड़ा है, जब तक पुरुषार्थ कर हम उसे अपने मुंह में नहीं रख लेते तब तक हम उस भोजन से तृप्त नहीं हो सकते | हम जानते हैं कि मनुष्य उस परम प्रभु की सन्तान है | जिस परमात्मा की यह मानव सन्तान है, वह परमात्मा संसार के समस्त धन ऐश्वर्यों का स्वामी है , मालिक है, अधिपति है | इस आधार पर यह मानव उत्तराधिकार नियम के आधीन अपने पिता कि सर्व सम्पति को पाने का अधिकारी है | मानव केवल उतराधिकार के नियम के अधिकार को ही न समझे अपितु इस अधिकार के साथ उसका कुछ कर्तव्य भी जुड़ा है , उसे भी समझे | जब तक वह अपने कर्तव्य को नहीं समझता, तब तक उतराधिकार से प्राप्त इस सम्पति से उसका कुछ भी कल्याण नहीं होने वाला क्योंकि वह पुरुषार्थ से यदि इस सम्पति को नहीं बढाता, उस की यथोचित सुरक्षा नहीं करता तो कुछ ही समय में वह पुन: सम्पति विहीन हो जावेगा | इसलिए सम्पति देते हुए प्रभु ने मनुष्य को यह भी उपदेश दिया है कि यदि तूं ठीक ढंग से इस सम्पति का रक्षक बनेगा तथा इसे बढ़ाने के लिए परिश्रम करेगा तो तेरा व तेरे परिवार का जीवन सुखी होगा, यदि तू एसा पुरुषार्थ नहीं करेगा तो यह अतुल धन तेरे पास बहुत समय तक रहने वाला नहीं | मन्त्र के इस भाव से जो एक तथ्य उभर कर सामने आता है वह है की मनुष्य जन्म के साथ ही अपार धन एश्वर्य का स्वामी बन जाता है | उस परमपिता परमात्मा ने जन्म के साथ ही उसे जो धन दिया है , उसकी व्रद्धि करना इस मनुष्य का परम कर्तव्य भी है | इस सम्पति को वह कैसे सुरक्षित रखे, इस का भी उपाय इस वेद मन्त्र में दिया है | मन्त्र कहता है की इस सम्पति को सुरक्षित रखने के लिए उसे शद्ध वृतियों को अपनाना होगा, क्योंकि शुभ वृतियां धन को सुरक्षित रखती हैं तथा अशुभ वृतियां इस का नाश भी कर देती हैं | हम प्रतिदिन देखते भी हैं की जिस मनुष्य के पास उतराधिकार में कुछ सम्पति है, वह शुभ वृतियों में रहते हुए उस धन की रक्षा करने में सक्षम होता है तथा पुरुषार्थ से इसे बढाने में भी सफल होता है किन्तु धन पा कर जो व्यक्ति अभिमानी हो जाता है, इस धन से किसी की सहायता नहीं करता तथा रक्षक के स्थान पर भक्षक बनाकर बुरी वृतियों में लिप्त हो जाता है, मांस शराब का सेवन, वैश्या गमन आदि दुराचारों में फंस जाता है तो न केवल उसके परिवार में कलह बढती है अपितु कुछ ही समय में धन उसका साथ छोड़ जाता है | इस लिए ही तो मन्त्र कहता है की हे मानुष ! तुझे जो आकूत धन दिया है तू उस की रक्षा करते हुए उसे बढाने के भी उपाय कर, पुरुषार्थ कर | अत: इश्वर की इस दी सम्पति को, धन , को बचाए रखने के लिए तथा इसे बढ़ाने के लिए हमें अपने में शभ वृतियों को, अच्छी आदतों को बढ़ाना होगा , जितने भी शुभ विचार हैं , उन्हें अपने जीवन में धारण करना होगा | शुभ विचार, सत्य कर्म तथा शुभ वृतियां जहाँ हैं वहां ही लक्ष्मी अर्थात धन एश्वर्य का निवास है | पापाचरण, कुमार्ग गमन,मद्य मांस सेवन आदि अशुभ वृतियां लक्ष्मी अर्थात धन एश्वर्य के नाश का कारण होती हैं | यही कारण है की वेद हमें आदेश देता है कि हे मनुष्य ! अपने जीवन में पाप वृतियों को प्रवेश न करने देना शुभ वृतिओं को खूब फलने फूलने का अवसर देना | यदि तू अपने जीवन में एसा करेगा तो तू इश्वर से प्राप्त आकूत धन एश्वर्य से सुखी जीवन व्यतीत करेगा तथा तेरा परिवार व तुझ पर आश्रित लोग भी सुखी रहेंगे | यह धन सम्पदा पूर्णत: सुरक्षित रहेगी तथा यह निरंतर बढती ही चली जावेगी, जिससे तेरे सुख़ भी बढ़ते ही जावेंगे | यदि तू एसा नहीं कर इस के उलट पापाचरण की और बढेगा तो धीरे धीरे तू इस सम्पति से वंचित हो दु:खों के सागर में डूब जावेगा | अत: उठ शुभ विचारों को अपना, शुभ आचरण कर तथा इश्वर से प्राप्त इस सम्पति की वृद्धि के उपाय कर सुख़ का मार्ग पकड़ |

 

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Posted on January 11, 2012, in Philosophy. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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