इतिहास का ठुकराया हीरा- वीर छत्रपति शम्भा जी


डॉ विवेक आर्य

(वीर शिवाजी के पुत्र वीर शम्भा जी को कोई अदूरदर्शी, कोई दुश्चरित्र, कोई राजा बनने के अयोग्य, कोई अपनी ही विमाता और भाई का वध करने वाला,कोई शराबी आदि आदि की संज्ञा देकर बदनाम करता हैं जबकि सत्य ये हैं की अगर वीर शम्भा जी कायर होते तो आसानी से औरंगजेब की दासता स्वीकार कर लेते और इस्लाम ग्रहण कर लेते तो न केवल अपने प्राणों की रक्षा कर लेते अपितु अपने राज्य को भी बचा लेते. वीर शम्भा जी का जन्म १४ मई १६५७ को हुआ था. आप वीर शिवाजी के साथ अल्पायु में औरंगजेब की कैद में आगरे के किले में बंद भी रहे थे.आपने ११मार्च१६८९ को वीरगति प्राप्त की. इस लेख के माध्यम से हम शम्भा जी के जीवन बलिदान की घटना से धर्म रक्षा की प्रेरणा ले सकते हैं. इतिहास में ऐसे उदहारण विरले ही मिलते हैं)

औरंगजेब के जासूसों ने सुचना दी की शम्भा जी इस समय आपने पांच-दस सैनिकों के साथ वारद्वारी से रायगढ़ की ओर जा रहे हैं.बीजापुर और गोलकुंडा की विजय में औरंगजेब को शेख निजाम के नाम से एक सरदार भी मिला जिसे उसने मुकर्रब की उपाधि से नवाजा था. मुकर्रब अत्यंत क्रूर और मतान्ध था. शम्भा जी के विषय में सुचना मिलते ही उसकी बांछे खिल उठी. वह दौड़ पड़ा रायगढ़ की और. शम्भा जी आपने मित्र कवि कलश के साथ इस समय संगमेश्वर पहुँच चुके थे.वह एक बाड़ी में बैठे थे की उन्होंने देखा कवि कलश भागे चले आ रहे हैं और उनके हाथ से रक्त बह रहा हैं, कलश ने शम्भा जी से कुछ भी नहीं कहाँ बल्कि उनका हाथ पकड़कर उन्हें खींचते हुए बाड़ी के तलघर में ले गए परन्तु उन्हें तलघर में घुसते हुए मुकर्रब खान के पुत्र ने देख लिया था.शीघ्र ही मराठा रणबांकुरों को बंदी बना लिया गया. शम्भा जी व कवि कलश को लोहे की जंजीरों में जकड़ कर मुकर्रब खान के सामने लाया गया. वह उन्हें देखकर खुशी से नाच उठा. दोनों वीरों को बोरों के समान हाथी पर लादकर मुस्लिम सेना बादशाह औरंगजेब की छावनी की और चल पड़ी.

औरंगजेब को जब यह समाचार मिला तो वह ख़ुशी से झूम उठा. उसने चार मील की दूरी पर उन शाही कैदियों को रुकवाया. वहां शम्भा जी और कवि कलश को रंग बिरंगे कपडे और विदूषकों जैसी घुंघरूदार लम्बी टोपी पहनाई गयी. फिर उन्हें ऊंट पर बैठा कर गाजे बाजे के साथ औरंगजेब की छावनी पर लाया गया. औरंगजेब ने बड़े ही अपशब्द शब्दों में उनका स्वागत किया. शम्भा जी के नेत्रों से अग्नि निकल रही थी परन्तु वह शांत रहे. उन्हें बंदी ग्रह भेज दिया गया. औरंगजेब ने शम्भा जी का वध करने से पहले उन्हें इस्लाम काबुल करने का न्योता देने के लिए रूह्ल्ला खान को भेजा.

नर केसरी लोहे के सींखचों में बंद था.कल तक जो मराठों का सम्राट था आज उसकी दशा देखकर करुणा को भी दया आ जाये. फटे हुए चिथड़ों में लिप्त हुआ उनका शरीर मिटटी में पड़े हुए स्वर्ण के समान हो गया था. उन्हें स्वर्ग में खड़े हुए छत्रपति शिवाजी टकटकी बंधे हुए देख रहे थे. पिता जी पिता जी वे चिल्ला उठे- मैं आपका पुत्र हूँ. निश्चित रहिये. मैं मर जाऊँगा लेकिन…..

लेकिन क्या शम्भा जी …रूह्ल्ला खान ने एक और से प्रकट होते हुए कहाँ.

तुम मरने से बच सकते हो शम्भा जी परन्तु एक शर्त पर.

शम्भा जी ने उत्तर दिया में उन शर्तों को सुनना ही नहीं चाहता. शिवाजी का पुत्र मरने से कब डरता हैं.

लेकिन जिस प्रकार तुम्हारी मौत यहाँ होगी उसे देखकर तो खुद मौत भी थर्रा उठेगी शम्भा जी- रुहल्ला खान ने कहाँ.

कोई चिंता नहीं , उस जैसी मौत भी हम हिंदुयों को नहीं डरा सकती. संभव हैं की तुम जैसे कायर ही उससे डर जाते हो. शम्भा जी ने उत्तर दिया.

लेकिन… रुहल्ला खान बोला वह शर्त हैं बड़ी मामूली. तुझे बस इस्लाम कबूल करना हैं, तेरी जान बक्श दी जाएगीशम्भा जी बोले बस रुहल्ला खान आगे एक भी शब्द मत निकालना मलेच्छ. रुहल्ला खान अट्टहास लगाते हुए वहाँ से चला गया.

उस रात लोहे की तपती हुई सलाखों से शम्भा जी की दोनों आँखे फोड़ दी गयी. उन्हें खाना और पानी भी देना बंद कर दिया गया.

आखिर ११ मार्च को वीर शम्भा जी की शहादत का दिन आ गया. सबसे पहले शम्भा जी का एक हाथ काटा गया, फिर दूसरा, फिर एक पैर को काटा गया और फिर दूसरा पैर . शम्भा जी कर पाद विहीन धड दिन भर खून की तल्य्या में तैरता रहा. फिर सायकाल में उनका सर कलम कर दिया गया और उनका शरीर कुत्तों के आगे डाल दिया गया. फिर भाले पर उनके सर को टांगकर सेना के सामने उसे घुमाया गया और बाद में कूड़े में फेंक दिया गया.

मरहठों ने अपनी छातियों पर पत्थर रखकर आपने सम्राट के सर का इंद्रायणी और भीमा के संगम पर तुलापुर में दांह संस्कार कर दिया गया.आज भी उस स्थान पर शम्भा जी की समाधी हैं जो की पुकार पुकार कर वीर शम्भा जी की याद दिलाती हैं की हम सर कटा सकते हैं पर अपना प्यारे वैदिक धर्म कभी नहीं छोड़ सकते.

tulapur arch place of shambha ji sacrifice

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Posted on February 15, 2012, in Legends. Bookmark the permalink. 14 Comments.

  1. नमस्ते श्री॰ विवेक जी,
    महाराज शिवाजी ने अपने पुत्र का नाम “शम्भू” रखा था । मराठी में थोडा सा प्रक्षिप्‍त करके “सम्भाजी” कहते है, जो स्वीकृत है । परन्तु “शम्भा जी” लिखकर आप ने और एक flavour जोड दिया । धन्यवाद …

  2. Kripa Karein.Is lekh ko Sharad Pawar jaur Vilas rao Deshmukh Jaise Naqli Marathaon ko Bhejein aur unse apne aap ko maratha naa kehna ke liye prerit kahein.

    Aur haan Pratibha Patil ko Kasab ko gale lagane athwa gaud ( Adopt) karne ke liye aavedan bhejein.

    Aapka savinya Dhanyavaad.

  3. salute to the forgotton hero..!!!

  4. VIJAY .k. KHATRI

    many many respectful salutes to this un known Hero.

  5. छत्रपति शिवाजी महाराज का बेटा है । उनसे धर्म की रक्षा में इसी की आशा थी। लेकिन अब समय आ गया है कि शिवाजी का स्वप्न पूर्ण करे। शिवाजी आज जिवित नही लेकिन मलेच्छ आक्रमणकर्ताओ से निपटने की आवश्यकता हमे है। एक दूसरा धर्मयुद्ध होने वाला है। आओ भ्राताओ – अब इन आततायी प्राणियो का वध करे।

  6. अनिल मिश्र

    शँभा जी , जैसे बीर हिन्दू हुतात्मा को कोटिशःनमन ।ऐसे ही वीरो की बदौलत ही हम सनातनधर्मी अभी जिन्दा हैँ ।

  7. इन वीरो की ही वजह से हम आज हिंदू है

  8. Narender Vashishth

    अिग्नवीर, ऐसे महान देशभक्त का पिरचय कराने हेतु कोिटशः धन्यवाद ।

  9. sambhaji maharaj is great. No doubt

  10. abhishek jagtap

    ye neta log aise veero ko bhulke mlencho k talwe chat rahe hai.

  11. prashant nagdeve

    ye baat to sahi hai ki sambhaji maharaj mahan the unhone auragjeb ke aage apna sir nahi zukaya aur muslim dharm nahi svikara, lekin apko batana chahunga ki aurangjeb ke jasus brahmins hi the jinhone maharaj ke baare me aurangjeb ko bataya gaya tha aur yah sabit ho chuka hai. aur haa maharaj ko galay prastut karnewale sirf aur sirf brahmins hi the jinhone galat baatein failai, wahi ek maharaj the jinhone buddhabhushan nam kagranth umar ke 14 ve saal me likha tha aur buddha ki aur prerit the, wah apne pitah ki tarah hi raj shashan chalate the jisme jatibhed aur varnashram bilkul hi nahi tha. bramhanoka to astitva hi nasht ho gaya tha, isiliye bramhins ne shadyantra karke maharaj ko auragjeb ko pakadwa diya

  12. prashant ji itihas lekhan kabhi bhi poorvagrah se nahi hota. humare desh mein sabse badi dikkat yeh hein ki sabhi mat apne apne drishtikaun se itihas ka lekhan karte hein jisse satya ko chupaya ja sake aur apne kudh ke mat ko badha chada kar pesh kiya jaa sake. brahmin ka matlab hota hein pandit arthat gyani aur vidwan. agar kisi brahmin ne agyan poorvak karya ko kiya to wh pandit kahan hua , wh to insan ke roop mein janwar kehlayega. veer shivaji ka 5crore se bho adhik kharch kar kshatriya ghoshit hona ati nindaniya hein aur hindu jaati ke mathe par kalank hein.

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