Agniveer Event


AGNIVEER EVENTS

Arya Samaj Rohini Sec-7, New Delhi, Invites you for “A Session with Agniveer”. Transform your life – Power of Vedas. May 13, 2012 • 7 pm – 9 PM. For details, contact Vivek Arya 09313359147, Rohini Sec-7 Arya Samaj.

 

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Posted on May 12, 2012, in Events. Bookmark the permalink. 5 Comments.

  1. साम- श्रद्धा : जीवन का अभिनय‌ (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज)
    ओ३म् इन्द्र इन्नो महोनां दाता वाजानां नृतु: |
    महाँ अभिझ‌वा यमत् |साम ७१५

    तुम झूमो गाओ नृत्य करो |
    शुभ अभिनय जीवन कृत्य करो ||

    शक्ति कहाँ से तुमने पाई |
    प्रभु महिमा क्या पड़ी दिखाई ||
    प्रभु ने दिया सहारा तुमको,
    उससे जगमग साहित्य करो ||

    प्रभु ने प्रकृति विहान दिया है |
    वेदों का विज्ञान दिया है |
    आदर्श पित्र पथ दर्शक लख,
    तुम भूमि उदय आदित्य करो ||

    लय ताल तनिक भी भंग न हो |
    घुटने टिकने का दण्ड न हो |
    अधिकार उधार मिला तुमको,
    उपलब्ध नृत्य से सत्य करो ||

    राजेन्द्र आर्य
    362- ए, गुरुनानक पुरा,
    सुनामी गेट, संगरूर- 148001 (पंजाब)

    09041342483

    ‹ साम श्रद्धा : सारस्वत पुकार‌ (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज) साम- श्रद्धा : ज्ञाता और विधाता (प्रणेता: पं. देव नारायण भारद्वाज) ›.By Rajendra P.Arya at 2012-02-07 16:43साम वन्दना

  2. सामवन्दना : विकास : विनाश‌
    विकास : विनाश

    ओ३म् कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत् ।
    कदा न: शुश्रवद । गिर इन्द्रो अङ्ग: ।।साम १३४३।।

    तुझको जिसने ऐश्वर्य दिया, उसको ही तुझने भुला दिया।
    इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तुने यज्ञ किया।।

    जो भी ऐश्वर्य कमाया है,
    वह प्रभुवर की ही माया है,
    पूर्व साधना तप प्रताप ने
    तुझको सम्पन्न बनाया है।

    तू ने अपना स्वामित्व किया, भ्रम अहंकार यह पाल लिया।
    इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तूने यज्ञ किया।।

    धनवान भोग अनुरागी है,
    यदि नहीं दान तप त्यागी है,
    यह वैभव त्याग उसे जाता
    रागी में लगती आगी है।

    प्रभु ने तो तुझे विकास दिया, तूने ही स्वयं विनाश किया।
    इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तूने यज्ञ किया।।

    कितनी ही बड़ी महत्ता है,
    क्षण में मिटती सब सत्ता है,
    ज्यों पैर तले कुचला करता
    लघु पादप कुकुरमुत्ता है।

    फिर भी जब तूने ध्यान किया, दु:ख सुना नहीं अनसुना किया।
    इतना सारा ऐश्वर्य लिया, पर कितना तूने यज्ञ किया ।।

    राजेन्द्र आर्य‌

    ‹ सामवन्दना : उपदेश तुम्हारा सामवन्दना : सोम प्रवाह‌ ›.By Rajendra P.Arya at 2011-08-08 08:49साम वन्दना

  3. सामवन्दना : उपदेश तुम्हारा
    उपदेश तुम्हारा

    ओ३म् नराशंसमिह प्रियमस्मिन्यज्ञ उपह्वये।
    मधुजिह्वं हविष्कृतम् ।। साम १३४९।।

    प्रिय हमने तुम्हें बुलाया है, तुमने उपदेश सुनाया है।
    उपदेश तुम्हारा भाया है, जिसको अपनाया है ।।

    अति प्यारा रूप तुम्हारा है,
    वाणी निर्भर रसधारा है,
    जैसी कथनी वैसी करनी
    सुखमय आचरण फुहारा है।

    तुमने जो शब्द सुनाया है, वह शब्द काम में आया है।
    उपदेश तुम्हारा भाया है, हमने जिसको अपनाया है।।

    व्यक्तित्व वही अति सुन्दर है,
    जिसका कृतित्व मनोहर है,
    जैसा ऊपर से भाषण है
    वैसा ही शासन अन्दर है ।

    भीतर जो रूप सुहाया है, बाहर उसकी ही छाया है।
    उपदेश तुम्हारा भाया है, हमने जिसको अपनाया है।।

    नेता वही सुनेता होता,
    जिसका भाषण सुनते श्रोता,
    अधरों के मीठे शब्दों को
    जो अपने कर्मों में बोता।

    ऐसा हर कार्य कराया है, समझो ज्यों यज्ञ रचाया है।
    उपदेश तुम्हारा भाया है, हमने जिसको अपनाया है।।

    ****राजेन्द्र आर्य*****

    ‹ सामवन्दना : रथ समरथ‌ सामवन्दना : विकास : विनाश‌ ›.By Rajendra P.Arya at 2011-08-08 09:02साम वन्दना

  4. सामवन्दना : रथ समरथ‌
    रथ समरथ

    ओ३म् अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईडित आ वह ।
    असि होता मनुर्हित:।।साम १३५०।।

    मेरे प्रभु प्यारे रथनायक।
    मेरा रथ करदो सुखदायक।।

    यह देह आत्मा का रथ है,
    अति दुष्कर जीवन् का पथ है,
    यात्रा का लक्ष्य तभी मिलता
    जब होता यह रथ समरथ है।

    हो जाये रथ प्रगति प्रदायक ।
    मेरा रथ करदो सुखदायक ।।

    सभी इन्द्रियाँ अङ्ग अङ्ग हो,
    चलते रथ के सङ्ग् सङ्ग् हो,
    यदि दिव्य गुणों का ईंधन हो
    तो उत्तम रथ के रङ्ग् ढङ्ग हों ।

    प्रभु के गुण रथ के उन्नायक।
    मेरा रथ करदो सुखदायक।।

    प्रभुवर मेरे रथ वाहक हैं,
    रथ दुर्गुण के वे दाहक हैं,
    वे रथी मनुज के हितकारी
    शुभ कर्मों के ही ग्राहक हैं ।

    प्रभु वन्दन रथ चाल सहायक।
    मेरा रथ करदो सुखदायक ।।

    राजेन्द्र आर्य‌

    ‹ सामवन्दना: स्वराज्य‌ सामवन्दना : उपदेश तुम्हारा ›.By Rajendra P.Arya at 2011-08-09 08:55साम वन्दना

  5. सामवन्दना: स्वराज्य‌
    स्वराज्य

    ओ३म् उत स्वराजो अदितिरदब्धस्य व्रतस्य ये ।
    महो राजान ईशते ।। साम १३५३ ।।

    यदि तुम्हें स्वराज्य वांछित है, पहले अपने पर राज्य करो।
    पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो।।

    संयम से जीवन बीता है,
    इन्द्रिय को जिसने जीता है,
    जो सूर्य चन्द्र सा मर्यादित
    उसको तो सभी सुभीता है।

    यदि तुम्हें सुप्रीति वांछित है, तो अपना सुखी समाज करो।
    पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो।।

    जिनके संकल्प अखण्डित हों,
    वे नहीं कहीं भी दण्डित हों,
    जिनके सुविचारित निश्चय हों
    वे ज्ञान कर्म के पण्डित हों।

    यदि तुम्हें सुनीति वांछित है, तो व्रतपालन तुम आज करो।
    पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो।।

    जो स्वयं प्रभा अपनाते हैं,
    वे जगत प्रभा फैलाते हैं,
    जो तारे स्वयं चमकते हैं
    वे ही नभ को दमकाते हैं।

    यदि तुम्हें सुराज वांछित है, तो तेज ओज सरताज धरो।
    पहले अपने पर राज करो, फिर भूमण्डल पर राज करो ।।

    राजेन्द्र आर्य‌

    ‹ सामवन्दना : पुण्य या कार्पण्य‌ सामवन्दना : रथ समरथ‌ ›.By Rajendra P.Arya at 2011-08-10 08:56साम वन्दना

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