गायत्री चालीसा


( रचयिता —श्री चिन्ता मणि वर्मा जी )

गायत्री के जाप से बुद्धि सुधरती जाय।
सुख ,सम्पति ,यश , आयु , बल , मनुज शीघ्र ही पाय ॥
तेज , प्राण , धन प्राप्त हो मुक्ति सहज मिल जाय ।
गायत्री का गान कर भक्ति सहित मन लाय ॥
ओ३म् नाम जप नित ही प्यारे ।
सुख देने और रक्षण हारे ॥ १ ॥
जो है इस सृष्टि का करता ।
धारक , पालक और संहर्ता ॥ २॥
भू : है जीवन देने वाला ।
कार्य शक्ति का पुंज विशाला ॥ ३॥
भू : से ही हम जीवित रहते ।
प्राणों को हैं धारण करते ॥ ४ ॥
भू : से ही सृष्टि गतिमान ।
भू : से तू प्रभु को पहचान ॥ ५ ॥
भुवः दुख सबका ही हरता ।
कष्ट पास नहीं आने देता ॥ ६ ॥
विपत्ति व्याधि से वह छुटकाता ।
दुखदायक को दूर भगाता ॥ ७ ॥
भुवः शक्ति से आशिष पाएं ।
त्रिविध ताप से हम बच जाएं ॥ ८ ॥
स्वः की भक्ति सदा ही करना ।
सुख देने वाले को जपना ॥ ९ ॥
सुख दायक से हमें मिलाए ।
सभी सुखों का साज सजाए ॥ १० ॥
मुक्ति भी स्वः ही देता है ।
आनंद की वर्षा करता है ॥ ११ ॥
तत् का अर्थ वही ईश्वर है ।
कण -कण में जो रमा हुआ है ॥ १२ ॥
अंतरिक्ष तारा मंडल में ।
व्यापक है इस धरती तल में ॥ १३ ॥
सत् चित्त आनंद कहाता ।
जग में रम कर उसे चलाता ॥ १४ ॥
सवितु : ही ब्रह्मांड बनाया ।
अंतरिक्ष और लोक रचाया ॥ १५ ॥
सूर्य चन्द्र ग्रह नखत ये तारे ।
पशु – पक्षी – पौधे – जड़ सारे ॥ १६ ॥
जीव जंतु सब वही रचाया ।
सबसे उत्तम मनुज बनाया ॥ १७ ॥
भक्त वरेण्यम् उसको मानें ।
सबसे उत्तम प्रभु को जानें ॥१८ ॥
प्राणि मात्र और जड़ ये सारे।
सब से बढ़ कर ईश हमारे ॥१९ ॥
भर्गः शुद्ध स्वरुप प्रभु है ।
पावन परम पवित्र स्वभू है ॥२० ॥
परम पावमानी है स्वामी ।
घट-घट के उर अन्तर्यामी ॥२१ ॥
भर्गः से पवित्र हो बुद्धि ।
मन आत्मा की होवे शुद्धि ॥२२ ॥
दुष्कर्मों से हमें बचाता ।
पाप हमारे दूर भगाता ॥२३ ॥
दिव्य शक्ति है परमपिता में ।
दिव्य ज्ञान सद्गुण सविता में ॥२४ ॥
वेद ज्ञान का दाता प्रभु है ।
दिव्य भाव से त्राता विभु है ॥२५ ॥
उसी देव को हम सब ध्यावें ।
कृपा उसी की मंगल गावें ॥२६ ॥
धी महि हम ईश्वर को जानें ।
परमपिता के गुण पहिचानें ॥२७ ॥
बुद्धि से हम उसे विचारें ।
जान – बूझ कर हिय में धारें ॥२८ ॥
श्रद्धा भक्ति भाव बढ़ावें ।
हृदय पटल पर प्रभु को पावें ॥२९ ॥
हे प्रभु विनती यही हमारी ।
हम पर होवे कृपा तुम्हारी ॥३० ॥
बुद्धि हमारी पावन होवे ।
मंगलमय सुखदायक होवे ॥३१ ॥
शुभ कर्मों में हो द्रुतगामी ।
कृपा करो हे अंतर्यामी ॥३२ ॥
गायत्री का जप जो करता ।
परम पिता का आशिष पाता ॥३३ ॥
बुद्धि निर्मल बनती जाती।
लक्ष्मी चल उसके घर आती ॥३४ ॥
पुत्र – पौत्र से घर भर जाता ।
सौ से अधिक आयु वह पाता ॥३५ ॥
फहराती है कीर्ति पताका।
अनुपम कार्य शक्ति वह पाता ॥३६ ॥
वर्चस्वी तेजस्वी बनता।
उसे देखकर शत्रु डरता ॥३७॥
सुहृद देख उसको सुख पाते ।
धन्य -धन्य कह मोद मनाते ॥३८ ॥
जब नश्वर शरीर को तजता ।
परम धाम में विचरण करता ॥३९ ॥
सभी भक्त गण मिलकर आएं ।
जय जय जय गायत्री गाएं ॥४० ॥
परमपिता का आशिष पाएं ।
मानव जीवन सफल बनाएं ॥४१ ॥
भक्ति भाव से जो जपे नित गायत्री मंत्र ।
छूट जाय उससे सभी जग प्रपंच का तंत्र ॥ ॥

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Posted on May 19, 2012, in poems. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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