समाज की अग्रणी नेता नारी



डा.अशोक आर्य

नारी के जिन अनेक गुणों की चर्चा वेद में आती है , उनमें से एक नारी में नेतृत्व का बाहुल्य है नारी को माता भी कहा है | माता निर्माण का कार्य करती है | इस लिए वह माता है | नारी को गुरु भी कहा है क्योंकि वह प्रत्येक कदम पर पुरुष की सहयोगी बनकर उसे सन्मार्ग पर लाने के साथ ही साथ अपनी संतान को प्रथम उपदेश देने के अतिरिक्त प्रतिक्षण उसे नेता के समान मार्गदर्शन करती रहती है | नारी एक उत्तम उपदेशक भी है | जो उपदेश वर्षो तक कोई पुरुष देता रहे कितु किसी के गले से उतरता नहीं, वही उपदेश जब एक नारी देती है तो वह कुछ ही समय में दुसरे के जीवन का अंग बन जाता है | इस सब का कारण है नारी की नेतृत्व कला | नारी की नेतृत्व कला के सम्बन्ध में वेद में अनेक उद्दरण दिए हैं | कुछ एसा ही ऋग्वेद १०. १५९.२ में दिया ई , जो कि इस प्रकार है | : –
अहं केतुरहं मूर्धा – $हमुग्रा विवाचानी |
ममेदतु क्रतुं पति: , सेहानाया उपाचारेत || ऋग्वेद १०.१५९.२ ||
भावार्थ : –
ज्ञान में अग्रगण्य होने से मैं स्त्रियों में मूर्धन्य हूँ , उच्चकोटि की वक्ता हूँ | मुझ विजयिनी की इच्छानुसार ही मेरे पति का आचरण हो |
इस मन्त्र मैं शची के गुणों का विस्तृत वर्णन किया गया है | ऋग्वेद के इस सूक्त के छ: मन्त्र ही नारी के गौरव का गान कर रहे हैं |
बुद्धि के दो नाम गिनाये गए हैं
१) शची
२) इन्द्राणी
इस प्रकार ऋग्वेद के इस सूक्त में बुधि के गौरव का ही वर्णन मिलता है | जिसे शचीपति कहते हैं , उसे ही इंद्र कहा गया है | वास्तव में इंद्र से अभिप्राय जीवात्मा से ही है | अष्टाध्यायी ५.२.१३ “इन्द्रियम.” की व्याख्या करते हुए काशिका में इस तथ्य को स्पष्ट रुप् में ” इंद्र आत्मा ” कहा गया है | यह ” इंद्र ही आत्मा “है अर्थात इंद्र को ही आत्मा कहा गया है | इंद्र व शची को जब पति पत्नी कहा गया है तो स्पष्ट है कि जब इंद्र आत्मा है तो शची अर्थात उस की ही पत्नी निश्चय ही बुद्धि कहलाने की अधिकारी है | अत; शची ही बुद्धि है |
शारीर के संचालन तथा उसके सब क्रिया कलाप बुद्धि ही किया कराती है | | इंद्र आत्मा है , जो किसी शरीर में निवास कराती ई तथा उस आत्मा वाले श्री का सब प्रकार से संचालन बुद्धि से ही होता है | यदि बुद्धि न हो तो शरीर की व्यवस्था भंग हो जावेगी | व्यवस्था भंग होने से शरीर को हम  शरीर नहीं कह सकते | इस प्रकार से शरीर का सुव्यवस्थित संचालन करने वाली यह शची ही शरीर की अधिष्ठात्री बन जाती है | इस के बिना शरीर की कार्य व्यवस्था ठीक से नहीं हो पाती | यही शरीर का समग्र संचालन करती है तथा यही शरीर के सब कर्तव्यों की इतिश्री का मार्ग प्रशस्त करती है | इससे स्पस्ट होता है कि यह शची अर्थात बुद्धि ही आत्मा की अग्रणी होती है , अधिष्ठात्री होती है अथवा यूँ कहें कि बुद्धि के बिना शरीर का कोई भी क्रिया कलाप ठीक से नहीं चल सकता , इस कारण यह ही शरीर की आधार होती है तथा आत्मा अर्थात उसके पति इंद्र को तदनुरूप ही चलना होता है | अत: इंद्र को भी बुद्धि के आदेशों को मानना ही होता है | जिसे वह इंकार नहीं कर सकता | अत: आत्मा अर्थात इंद्र , बुद्धि अर्थात शची के ही अंतर्गत काम करती है | जिस प्रकार से एक नेता जो आदेश देता है, उसकी सेनायें या उसके सेवक उसमें बिना कुछ परिवर्तन किये ज्यों का त्यों मानते हैं, ठीक इस प्रकार ही बुद्धि जैसा कहती है , जैसा आदेश देती है वैसा निश्चय ही जीवात्मा करता है , बिना कुछ भी परिवर्तन किये करता है | इस से स्पष्ट है कि बुद्धि अर्थात शची की प्रत्येक आज्ञा को इंद्र अर्थात शची के पति इंद्र ज्यों का त्यों ही स्वीकार करते हैं | दुसरे शब्दों में हम यूँ कह सकते हैं कि माता परिवार में बुद्धि का काम करती है तो पिता परिवार का मुखिया होता है | मुखिया आजीविका के लिए अधिकांश समय घर से बाहर रहता है | इस कारण परिवार में क्या चल रहा है , क्या हो रहा है , इस तथ्य से वह अनभिज्ञ रहता है | अत: परिवार में लौटने पर यदि वह चल रहे क्रिया ल्लापों में अपनी दादा गिरी दिखाता है तो परिवार का ताना बाना बिखर जाता है | माता के आदेश का महत्त्व समाप्त हो जाता है तथा पिता प्रतिक्षण आदेश देने के लिए परिवार में विद्यमान ही नहीं होता इस कारण परिवार को वह प्रतिक्षण आदेश देने की स्थिति में नहीं होता | इसी अवस्था में पत्नी के आदेशों की अवहेलना कर वह एक प्रकार से संतान के सामने पत्नी को अपमानित कर देता है | संतान उसे हीन समझने लगती है तथा उसके आदेश स्वीकार नहीं करती | इस से परिवार में कोई अन्य भी एसी बुद्धि वाला प्राणी न होने से परिवार छिन भिन्न हो जाता है | इस लिए ही पत्नी को बुद्धि के स्थान पर बैठाया गया है तथा जो आदेश वह देती है समग्र परिवार तथा स्वयं उसका पति अर्थात जीवात्मा या इंद्र भी उसे ज्यों का त्यों ही स्वीकार कर उस पर चलता है |
इस सब से यह स्पष्ट होता है कि परिवार में आत्मा के रूप में इंद्र को जाना जाता है जो शची का पति होता है तथा शची उसकी पत्नी होती है | यह पत्नी ही बुद्धि के रूप में जानी जाती है तथा इस बुद्धि के आदेशों पर ही , इस बुद्धि के आदेशं के पालन पर ही परिवार का भविष्य निर्भर होता है | इस लिए पत्नी में नेतृत्व की अत्यधिक आवश्यकता होती है | अत: परिवार की नेता पत्नी ही होती है | भाव यह है की इस समाज की उद्धारक भी माता अथवा स्त्री ही होती है | एक अच्छे नेता के सब गुण इस पत्नी में होते हैं | इस लिए ही मन्त्र कह रहा है की माता एक उत्तम नेतृत्व देने वाली होती है | इस सब का कारण है इस बुद्धि या शची के गुण यह गुण हैं ; –
१. वह केतु होती है |
२) वह मूर्धा होती है
३) वह उग्रा विवाचनी होती है
४) वह सहाना होती है

Advertisements

About Fan of Agniveer

I am a fan of Agniveer

Posted on May 24, 2012, in Philosophy. Bookmark the permalink. Leave a comment.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: