इशोपनिषद हिंदी पद्यानुवाद


ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।१ ।।

ईश, जगत में जो कुछ है सब में रमकर गति करता है ।
कण-कण को गतिमान बनाकर सकल सृष्टि वह रचता है।।
त्याग भाव से भोग करे नर , लोभ नहीं मन में लावे ।
धन किसका ?सब कुछ ईश्वर का, सदा ध्यान में यह आवे ।।१ ।।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छ्तम् समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२ ।।

करते हुए कर्म सौ वर्षों तक सुख का तू भोग करे ।
नहीं अन्य कोई पथ तेरा इसी मार्ग पर गमन करे।।
कर्मठ बनकर ही जीवन – यापन की इच्छा बनी रहे।
लिप्त कर्म नहिं होते नर में , भोग-भाव से विरत रहे।।२ ।।

असुर्य्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः ।
तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ।।३ ।।

पाप कर्म में पड़कर जो जन आत्म – हनन नित करते हैं।
भोग भाव में लिप्त हुए जो अधम मार्ग पर चलते हैं।।
मरकर अधम योनि में जाते दुःख सागर में गिरते हैं।
अन्धकार से घिरे हुए वे असुर लोक में पड़ते हैं ।।३ ।।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत् ।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ।।४ ।।

एक मात्र स्वामी जगती का नहीं कभी वह चलता है।
चक्षुरादि से प्राप्त न , मन से ,तीव्र गमन वह करता है।।
अचल ब्रह्म की धावन शक्ति से सब पीछे रह जाते।
ब्रह्म शक्ति से , वायु प्राण को , जीव कर्म , धारण करते ।।४ ।।

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके ।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ।।५ ।।

वह गतिहीन वही गतिदाता रचता और चलाता है।
अज्ञानी से दूर सदा ज्ञानी के हिय में बसता है।।
जड़ – चेतन सबके अन्तर में एक उसी की आभा है।
बाह्य जगत में मात्र चमकती उसी ब्रह्म की प्रतिभा है।।५ ।।

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति ।
सर्व भूतेषुचात्मानं ततो न विजुगुप्सते ।।६ ।।

जो लखता अपनी आत्मा में सभी भूत प्राणी समुदाय।
भौतिक प्राणि मात्र में अपनी आत्मा जिसको सदा लखाय।।
शांत भाव धारण कर लेता प्राणि मात्र से वैर विहाय।
निंदा स्तुति को छोड़ बने वह प्राणि मात्र का मित्र सहाय ।।६ ।।

यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः ।
तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः ।।७ ।।

भूत चराचर सबको अपने जैसा समझ लिया जिसने।
एक भाव से देख रहा है जड़ चेतन जगको जिसने।
उसे कहाँ से मोह सताए वह दुःख पाएगा कैसे?
शोक भाव से छूट जाएगा,विचरे सदा मुदित मन से।।७ ।।

स पर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरम् शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभू: स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्
व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।।८ ।।

परमात्मा सर्वत्र प्राप्त है ,शुद्ध स्वरुप अकाया है।
व्रण नस – नाड़ी रहित ईश वह शुद्ध स्वरुप सवाया है।।
पाप कर्म से रहित प्रभू है अखिल भुवन में छाया है।
वह कवि ज्ञानी है जग के अणु अणु में वही समाया है ।।८( क)।।

स्पष्ट रूप से वही मनीषी ,मन- प्रेरक बन जाता है।
अपनी ही सत्ता से स्थित , वह स्वयंभू : कहलाता है।।
सदा निरंतर युग – युग से वह रचना करता जाता है।
जगती के सारे पदार्थ वह याथातथ्य बनाता है।।८(ख )।।

अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाम् रताः ।।९ ।।

अंधकार से घिरे हुए जो लोक तुच्छ कहलाते हैं।
सदा अविद्या में रत रहते वे जन उनमें जाते हैं।।
उनसे घोर अन्धतम स्थिति में वे प्रवेश पा जाते हैं।
जो विद्या में रत हो अपनी पूरी आयु बिताते हैं।।९ ।।

अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणाम् ये नस्तद्विचचक्षिरे ।।१० ।।

विद्या और अविद्या का फल ऋषिगण हमें बताते हैं।
इनके फल हैं भिन्न – भिन्न वे यही हमें समझाते हैं।।
धीरों से विद्वानों से हम ऐसा सुनते आते हैं।
कृपाभाव – धारक ऋषिगण उपदेश हमें यह करते हैं।।१० ।।

विद्याम् चाविद्याम् च यस्तद्वेदोभयम् सह ।
अविद्यया मृत्युम् तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ।।११ ।।

विद्या और अविद्या को जो एक साथ लेता पहचान ।
उभय तत्व को धारण करता निज जीवन में एक समान ।।
धारण करे अविद्या तो नर , बचे मृत्यु से ,बने महान ।
विद्या के द्वारा पाता वह मोक्ष परमपद का वरदान।।११ ।।

अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याम् रताः ।।१२।।

अंधकार से घिरे हुए जो लोक तुच्छ कहलाते हैं ।
असम्भूति में ही रत रहते वे जन उनमें जाते हैं ।।
उनसे घोर अन्धतम स्थिति में वे प्रवेश पा जाते हैं ।
जो रत हो सम्भूति सदा ही पूरी आयु बिताते हैं।।१२।।

अन्यदेवाहु:संभवादन्यदाहुरसंभवात् ।
इति शुश्रुम धीराणाम् ये नस्तद्विचचक्षिरे ।।१३ ।।

असम्भूति – सम्भूति भिन्न हैं ऋषिगण हमें बताते हैं।
इनके फल हैं भिन्न – भिन्न वे यही हमें समझाते हैं।।
धीरों से विद्वानों से हम ऐसा सुनते आते हैं।
कृपाभाव – धारक ऋषिगण उपदेश हमें यह करते हैं।।१३ ।।

सम्भूतिम् च विनाशं च यस्तद्वेदोभयम् सह ।
विनाशेन मृत्युम् तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ।।१४।।

विनाश औ ‘ सम्भूति तत्व को एक साथ लेता पहचान।
उभय तत्व को धारण करता निज जीवन में एक समान।।
विनाश द्वारा बचे मृत्यु से ,मानव जीवन बने महान।
पाता नर सम्भूति धार कर मोक्ष परमपद का वरदान।।१ ४।।

हिरंमयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखं ।
तत्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ।। १५।।

भौतिक जगत सुनहला ढक्कन बन मनुष्य को भाता है ।
इससे ढके सत्य का मुख मानव भ्रम में पड़ जाता है ।।
हे पूषन् ! हो कृपा तुम्हारी स्वर्णिम ढक्कन हट जाए ।
सत्य धर्म का दर्शन कर लूँ जीवनपावन बन जाए ।। १५।।

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य्य प्राजापत्य व्यूहरश्मीन् समूह ।
तेजोयत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ
पुरुषः सोऽहमस्मि ।।१६।।

एक मात्र ऋषिवर यम पूषन् !सूर्य प्रजापति नमन करूँ।
शमन करो प्रभु स्वर्ण रश्मियाँ ,लोक – लोभ को शांत करूँ।।
दर्शन हो कल्याण रूप का ,तेजोमय का , पावन का।
हो कल्याण रूप मम जीवन बन जाए पावन तुझ सा ।।१६।।

वायुरनिलममृतमथेदम् भस्मान्तं शरीरं ।
ओ३म् क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ।।१७ ।।

प्राण वायु मिल जाय अनिल में आत्मा अमर व नित्य स्वरुप।
यह शरीर जलकर रह जाता मात्र अंत में भस्म स्वरुप।।
क्रतो सुमिर तू ओ३म् नित्य ही जीवन शुद्ध पवित्र करो।
किए कर्म को याद करो नर ,किए कर्म को याद करो ।।१७ ।।

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् ।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठांते नम उक्तिम् विधेम ।।१८ ।।

हे प्रकाश के पुंज प्रभो !तुम सब कर्मों के ज्ञाता हो।
चला सुपथ पर वैभव दो प्रभु कृपा भाव से दाता हो।।
कुटिल कर्म को , पाप कर्म को , हमसे दूर करो भगवन।
बार – बार हम इसी भाव से प्रभुवर करते तुझे नमन ।।१८ ।

श्री चिंतामणि वर्मा जी ,मांडले बर्मा

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Posted on July 9, 2012, in poems. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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