तीर्थ का वास्तविक अर्थ


डॉ विवेक आर्य

तीर्थ शब्द का अर्थ प्राय: लोग गंगा स्नान, पुष्कर, हरिद्वार, बाला जी,अमरनाथ,वैष्णो देवी,केदारनाथ ,बद्रीनाथ, तिरुपति बाला जी आदि की यात्रा अथवा सूर्य ग्रहण पर कुरुक्षेत्र आदि की यात्रा से करते हैं. तीर्थों में स्नान आदि से धार्मिक पुस्तकों में लाभों का वर्णन किया गया हैं जैसे जो सैकड़ों सहस्त्रों कोश दूर से भी गंगा-गंगा कहें, तो उसके पाप नष्ट होकर वह विष्णुलोक अर्थात वैकुण्ठ को जाता हैं (ब्रहम पुराण १७५/८२) (पदम् पुराण उत्तर खंड २३/२)

पुष्कर, कुरुक्षेत्र, गंगा और मगध देश में स्नान करके प्राणी अपनी सात पूर्व की और सात परली पीढ़ियों कप तार लेता हैं. गंगा नाम लेने से पाप से बचाती हैं, दिखने पर हर्ष देती हैं, स्नान करने और पीने से सातवें कुल तक पवित्र कर देती हैं. (महाभारत वन पर्व अ ७५)

कलियुग में गंगा दर्शन से सौ जन्मों के पाप, स्पर्श करने से दो सौ जन्मों के पाप और स्नान तथा पीने से हजारों पाप नष्ट करती हैं. (आदि पुराण पृ ७२)

जो मनुष्य पूर्व आयु में पाप करके पीछे से गंगा का सेवन करते, वे भी परमगति पाते हैं. (महाभारत अनु २६/३०)

जैसे गरुण के देखते ही साँप विषरहित हो जाते हैं , वैसे ही गंगा के देखते ही मनुष्य सब पापों से छुट जाते हैं (वही ४४)

हवा से उड़े हुए धूलिकण भी कुरुक्षेत्र में जिस किसी पर पड़ेगे, वे अति पापी को मोक्ष में पहुँचा देंगे. (महाभारत वनपर्व अ ८३)

इस प्रकार अनेक प्रमाण महाभारत ,पुराण आदि ग्रंथों में मिलते हैं जिनमे विभिन्न स्थानों में गंगा आदि में स्नान को तीर्थ कहाँ गया हैं .

स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाश के ११ वें समुल्लास में तीर्थ की परिभाषा करते हुए लिखते हैं

वेदादि सत्य शास्त्रों का पढना- पढाना, धार्मिक विद्वानों का संग, परोपकार धर्म अनुष्ठान योगाभ्यास, निर्वैर निष्कपट, सत्य भाषण सत्य का मानना, सत्य करना, ब्रहमचर्य, आचार्य अतिथि माता-पिता की सेवा, परमेश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना, शांति जितेन्द्रियता, सुशीलता, धर्मयुक्त पुरुषार्थ, ज्ञान-विज्ञान आदि शुभ गुण-कर्म दुखों से तारने वाले होने से तीर्थ हैं.अर्थात जितने भी संसार में श्रेष्ठ कर्म हैं उनको करने से मनुष्य को ज्ञान की प्राप्ति होती हैं और मनुष्य पुण्य का भागी बनकर सुख की प्राप्ति करता हैं इसलिए उन कर्मों को तीर्थ की संज्ञा दी गयी हैं.

मनुस्मृति ५/१०९ में मनु महाराज कहते हैं की जल से शरीर शुद्ध होता हैं, मन और आत्मा नहीं. मन तो सत्याचरण- सत्य मानने, सत्य बोलते सत्य ही करने से पवित्र होता हैं, जीवात्मा विद्या, योगाभ्यास और धर्माचरण से पवित्र होता हैं और बुद्धि पृथ्वी से लेकर परमेश्वर पर्यंत पदार्थों के ज्ञान से पवित्र होती हैं.

यजुर्वेद ४०/१४ में वेद भगवान कहते हैं अविद्या अर्थात कर्म उपासना से मृत्यु को तरके विद्या अर्थात यथार्थज्ञान से मनुष्य मोक्षलाभ करता हैं.

अब जो लोग गंगा स्नान अथवा गंगा गंगा बोलने से मुक्ति को मानते हैं उनसे से कई गंगा किनारे स्थित नगरों में रहते हैं जो अगर गंगा स्नान से, गंगा दर्शन से, गंगा के स्मरण से उनकी सभी पापों से निवृति हो जाती तो उनके किसी भी प्रकार का दुःख नहीं होना चाहिए था पर देखने में वे उसी प्रकार समान रूप से दुखी हैं जैसे और संसार के और लोग अपने पापकर्मों से दुखी हैं. इससे यह सिद्ध होता हैं की गंगा आदि के स्नान से किसी भी मनुष्य के पाप से बिना भोगे मुक्त नहीं हो सकते.यह निश्चित हैं की कर्म का फल भोगे बिना उससे कोई भी छुट नहीं सकता.

अनेक धार्मिक पुस्तकों में कर्म फल सिद्धांत के अनेक प्रमाण हैं जैसे

शुभ हो या अशुभ , किये हुए कर्म का फल भोगना ही पड़ता हैं.करोड़ों कल्प बीत जाने पर भी बिना भोगे उसका क्षय नहीं होता. (ब्रहमवैवर्त पुराण प्रकृति अ ३७)

जब ब्रह्मा का दिन समाप्त होने पर सृष्टि की प्रलय होती हैं, तो अभुक्त कर्म बीजरूप में बने रहते हैं, जब फिर नए सिरे से सृष्टी रचना होती हैं तो उसी कर्म बीज से अंकुर फूटने लगते हैं. पूर्व सृष्टि में जिस जिस प्राणी ने जो जो कर्म किये होंगे, फिर वे ही कर्म उसे बार बार प्राप्त होते रहेंगे (देवी भागवत पुराण)

जैसे बछड़ा हजारों गौयों के बीच अपनी माँ को ढूद लेता हैं, वैसे ही किया हुआ कर्म अपने करनेवाले को जा पकड़ता हैं. (महाभारत शांतिपर्व १५-१६)

मन से प्रकाशित ब्रहम ज्ञान रूप जल से जो मन के तीर्थ में स्नान करता हैं, तत्व दर्शियों का वही स्नान हैं. घर में या जंगल में जहाँ भी ज्ञानी लोग रहते हैं उसी का नाम नगर हैं, उसी को तीर्थ कहते हैं. हे भारत आत्मा नदी हैं, यही पवित्र तीर्थ हैं. इसमें सत्य का जल , धैर्य के किनारे तथा दया की लहरें हैं. इसमें स्नान करनेवाला पुण्यात्मा पवित्र हो जाता हैं. आत्मा पवित्र हैं, नित्य हैं एवं निर्लोभ हैं.

(महाभारत वन पर्व २००/९२ एवं उद्योग पर्व ४०/२१)

ब्रह्मा का ध्यान परम तीर्थ. इन्द्रिय का निग्रह तीर्थ हैं. मन का निग्रह तीर्थ हैं. भाव की शुद्धि परम तीर्थ हैं. ज्ञान रूप तालाब में ध्यान जल में जो मन के तीर्थ में स्नान करके रागद्वेष रूप मल को दूर करता हैं, वह परम गति को प्राप्त करता हैं. (गरुढ़ पूर्व अ ८१/ श्लोक २३-२४)

मन से प्रकाशित ब्रहम ज्ञान रूप जल से जो मन के तीर्थ में स्नान करता हैं, तत्व दर्शियों का वही स्नान हैं. घर में या जंगल में जहाँ भी ज्ञानी लोग रहते हैं उसी का नाम नगर हैं, उसी को तीर्थ कहते हैं. हे भारत आत्मा नदी हैं, यही पवित्र तीर्थ हैं. इसमें सत्य का जल , धैर्य के किनारे तथा दया की लहरें हैं. इसमें स्नान करनेवाला पुण्यात्मा पवित्र हो जाता हैं. आत्मा पवित्र हैं, नित्य हैं एवं निर्लोभ हैं.

(महाभारत वन पर्व २००/९२ एवं उद्योग पर्व ४०/२१)

यहाँ पाठकगन यह सोच रहे होगे की पुराणों में एक ही विषय में विरोधाभास क्यूँ हैं एक स्थान पर गंगा स्नान से मुक्ति का वर्णन हैं जबकि दुसरे स्थान पर केवल शुभ कर्म से मुक्ति हैं. इसका समाधान स्वामी दयानंद ने अत्यंत शोध और परिश्रम से निकाला था की उपनिषद्, दर्शन,ब्राह्मण ग्रन्थ, रामायण-महाभारत , पुराण आदि ग्रंथों में जो कुछ भी वेदानुकुल अर्थात वेद संगत हैं वह मानने योग्य हैं और जो भी वेद विपरीत हैं वह न मानने योग्य हैं.

इसलिए वेदों में वर्णित कर्म फल के अटूट सिद्धांत को मानते हुए पुराणों के उपरलिखित प्रमाण जिसमें केवल पुण्य कर्म से सुख प्राप्ति का होना बताया गया हैं सत्य हैं.

तीर्थ के नाम पर स्नान आदि से पुण्य की प्राप्ति एक अन्धविश्वास मात्र हैं और मानव मात्र को सत्य मार्ग से भ्रमित कर उसे अंधकार में लेकर जाने वाला हैं.

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Posted on July 18, 2012, in Philosophy. Bookmark the permalink. 1 Comment.

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