यज्ञ के लाभ


डा.अशोक आर्य

हम प्रतिदिन अपने परिवार में यज्ञ करें | यज्ञ में बड़ी शक्ति होती है | यह सब प्रकार के रोग ,शौक को हर लेता है | किसी प्रकार की व्याधि एसे परिवार में नहीं आती ,जहाँ प्रतिदिन यज्ञ होता है | जब यज्ञ के पश्चात बड़ों का अभिवादन किया जाता है तो बड़ों की आत्मा तृप्त हो जाती है | तृप्त आत्मा से आशीर्वादों की बौछाड़ निकलती है , जिस से परिवार में खुशियों की वृद्धि होती है तथा परिवार में सुख ,शांति तथा धन एशवर्य बढ़ता है तथा पारिवार की ख्याति दूर दूर तक चली जाती है | दुसरे लोग इस परिवार के अनुगामी बनते है | इस प्रकार परिवार के यश व कीर्ति में वृद्धि होती है | इस तथ्य को अथर्ववेद में बड़े सुन्दर ढंग से समझाया गया है : –

यदा गार्ह्पत्यमसपर्यैत, पुर्वमग्निं वधुरियम |
अधा सरस्वत्यै नारि. पित्रिभ्यश्च नमस्कुरु || अथर्ववेद १४.२..२० ||

यह मन्त्र घर में आई नव वधु को दो उपदेश देता है :_
(१) प्रतिदिन यज्ञ करना : –
प्रतिदिन यज्ञ करने से व्यक्तिगत शुद्धि तो होती ही है , इसके साथ ही साथ परिवार की शुद्धि भी होती है | यज्ञ कर्ता के मन से सब प्रकार के संताप दूर हो जाते हैं | परिवार में किसी के प्रति कटुता है तो वह दूर हो जाती है | परिवार में यदि कोई रोग है तो यज्ञ करने से उस रोग के कीटाणुओं का नाश हो जाता है तथा रोग उस परिवार में रह नहीं पाता है | परिजनों में सेवाभाव का उदय होता है, जो सुख शान्ति को बढ़ाने का कारण बनता है , जहाँ सुख शान्ति होती है,वहां धन एशवर्य की वर्षा होती है तथा जहाँ धन एशवर्य है वहां यश व कीर्ति भी होती है | इसलिए प्रत्येक परिवार में प्रतिदिन यज्ञ होना अनिवार्य है |
जहाँ प्रतिदिन यज्ञ होता है , वहां की वायु शुद्ध हो जाती है तथा सात्विक भाव का उस परिवार में उदय होता है | यह तो सब जानते हैं कि यज्ञ से वायु मंडल शुद्ध होता है | शुद्ध वायु में सांस लेने से आकसीजन विपुल मात्रा में अन्दर जाती है, जो जीवन दायिनी होती है | शुद्ध वायु में किसी रोग के रोगाणु रह ही नहीं सकते , इस कारण एसे परिवार में किसी प्रकार का रोग प्रवेश ही नहीं कर पाता | पूरा परिवार रोग , रहित स्वस्थ हो जाता है | स्वस्थ शरीर में कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है | जब कार्य करने कि क्षमता बढ़ जाती है तो अधिक मेहनत करने का परिणाम अधिक अर्जन से होता है | अत: एसे परिवार के पास धन की भी वृद्धि होती है , जहाँ धन अधिक होगा, वहां सुखों के साधन भी अधिक होंगे | जब परिवार में सुख अधिक होंगे तो दान की , गरीबों की सहयता की भी प्रवृति बनेगी | जिस परिवार में दान की परम्परा होगी , उस का आदर सत्कार सब लोग करेंगे , उस परिवार को सम्मान मिलने लगेगा | सम्मानित परिवार की यश व कीर्ति स्वयमेव ही दूर दूर तक फ़ैल जाती है | अत: परिवार में प्रतिदिन यज्ञ आवश्यक है |जिस परिवार में प्रतिदिन यज्ञ होता है वहां सात्विक भाव का भी उदय होता है | सात्विक भाव के कारण किसी में भी झूठ बोलने , किसी के प्रति वैर की भावना रखने , इर्ष्या, द्वेष, वैर विरोध, शराब ,जुआ, मांस आदि के प्रयोग की भावना स्वयमेव ही नष्ट हो जाती है | यह सब व्यसन जहाँ परिवार के सदस्यों के शरीर में विकृतियाँ पैदा करने वाले होते है अपितु सब प्रकार के कलह क्लेश बढ़ाने वाले भी होते हैं | जब पारिवार में प्रतिदिन यज्ञ होता है तो परिवार से इस प्रकार के दोष स्वयमेव ही दूर हो कर सात्विक भावना का विस्तार होता है तथा परिवार उन्नति की ओर तेजी से बढ़ने लगता है | उन्नत परिवार की ख्याति के कारण लोग इस परिवार के अनुगामी बनने का यत्न करते है | इससे भी परिवार के यश व कीर्ति में वृद्धि होती है | इसलिए भी प्रतिदिन यज्ञ अवश्य करना वषयक है | यज्ञ करने से ह्रदय शुद्ध हो जाता है , शुद्ध ह्रदय होने से मन को भी शान्ति मिलती है | जब मन शांत है तो परिवार में भी सौम्यता की भावना का उदय होता है | एसे परिवार में कभी भी किसी प्रकार का द्वेष नहीं होता, किसी प्रकार की कलह नहीं होती | जो समय अनेक परिवारों में लड़ाई झगड़े में निकलता है , एसे परिवार उस समय को बचा कर निर्माणात्मक कार्यों में लगाते हैं , जिस से इस परिवार की आय में वृद्धि होती है तथा जो धन रोग पर अपव्यय होना होता है, वह भी बच जाता है ,जिससे इस परिवार के धन में अपार वृद्धि होने से सुखों की वृद्धि तथा दान की प्रवृति बढ़ने से परिवार दूर दूर तक चार्चा का विषय बन जाता है तथा अनेक परिवारों को मार्गदर्शन करता है | इसलिए भी प्रतिदिन यज्ञ करना आवश्यक हो जाता है | अत: प्रतिदिन यज्ञ करने की परंपरा हमारे परिवारों में ठीक उस प्रकार आनी चाहिए जिस प्रकार प्रतिदिन दोनों समय भोजन करने की परम्परा है , आवश्यकता है | जिस दिन यज्ञ न हो , उस दिन एसा अनुभव हो कि जैसे हमने कुछ खो दिया है | जब इस प्रकार के विचार होंगे तो हम निश्चय ही प्रतिदीन दो काल यज्ञ किये बिना रह ही नहीं सकेंगे |
(२) यज्ञ के पश्चात बड़ों का अभिवादन करना : –
मन्त्र अपने दूसरे खंड में हमें आदेश दे रहा है कि हम यज्ञोपरांत अपने बड़ों को प्रणाम करें | जहाँ अपने बड़े लोगों को प्रणाम करना , ज्येष्ठ परिजनों का अभिवादन करने से परिवार में विनम्रता कि भावना आती है , वहां इससे सुशीलता का भी परिचय मिलता है | जब हम हाथ जोड़ कर किसी के सम्मुख नत होते हैं तो निश्चय ही हम उसके प्रति नम्र होते है | इस से सपष्ट होता है कि हम उसके प्रति आदर सत्कार की भावना रखते हैं | शिष्टता तथा विनय उन्नति का मार्ग है | अत: जिस परिवार में जितनी अधिक शिष्टता व विनम्रता होती है , वह परिवार उतना ही उन्नत होता है | इस का कारण है कि जिस परिवार में शिष्टाचार का ध्यान रखा जाता है , उस परिवार में कभी किसी भी प्रकार का लड़ाई झगडा, कलह क्लेश आ ही नहीं सकता , किसी परिजन के प्रति द्वेष कि भावना का प्रश्न ही नहीं होता ,| जहाँ यह सब दुर्भावनाएं नहीं होती , उस परिवार की सुख समृद्धि को कोई हस्तगत नहीं कर सकता | एसे स्थान पर धन एश्वर्य की वर्षा होना अनिवार्य है | जब सुखों के साधन बढ़ जाते हैं तो दान तथा दान से ख्याति का बढना भी अनिवार्य हो जाता है | अत: उन्नति व श्रीवृद्धि के साथ एसे परिवार का सम्मान भी बढ़ता है | इसलिए इस सार्वोतम वशीकरण मन्त्र को पाने के लिए भी परिवार में प्रतिदिन यज्ञ का होना आवश्यक है |
जब हम किसी व्यक्ति को प्रणाम करते हैं तो उस व्यक्ति का ह्रदय द्रवित हो उठता है | द्रवित ह्रदय से प्रणाम करने वाले व्यक्ति के लिए अनायास ही शुभ आशीर्वाद के वचन ह्रदय से निकालने आरम्भ हो जाते हैं | यदि कोई व्यक्ति अपने परिवार के किसी व्यक्ति के प्रति किंचित सा द्वेष भी मन में संजोये है तो प्रणाम मिलते ही वह धुल जाता है तथा उसका हाथ उसे आशीर्वाद देने के इए स्वयमेव ही आगे आता है | इस प्रकार परिवार के सदस्यों का मालिनी धुल जाता है तथाह्रिदय शुद्ध हो जाता है \ परिवार से द्वेष भावना भाग जाती है तथा मिलाप की भावना बढाती है | मनुस्मृति में भी कुछ इस प्रकार की भावना मिलाती है |

मनुस्मृति में कहा है की :-

अभिवादानशिलस्य , नित्यं वृद्धोपसेदिन: |
चत्वारि तस्य वर्धन्ते , आयुर्विद्या य्शोबलम || मनुस्मृति २.१२१ ||

इस शलोक में बताया गया है कि प्रतिदिन अपने बड़ों को प्रणाम करने वाले के पास चार चीजें बढ़ जाती हैं :-
१) आयु –
जिस परिवार में प्रतिदिन एक दूसरे को प्रणाम करने की , नमस्ते करने की , अभिवादन करने की परम्परा है , उस परिवार के सदस्यों की आयु निश्चित रूप से लम्बी होती है क्योंकि वहां प्रतिदन बड़ों का आशीर्वाद , शुभकामनाएं उन्हें मिलती रहती है | बड़ों के आशीर्वाद में अत्यधिक शक्ति होती है | वह कभी निष्फल नहीं हो सकता | इस के साथ ही प्रणाम करने से जो विनम्रता की भावना आती है , उससे सुशीलता भी आती है तथा एक दूसरे के प्रति श्राद्ध भी बढती है | परिवार की खुशियाँ तथा यश बढ़ने से प्रसन्नता का वातावरण होता है , जहाँ प्रसन्नता होती है, वहां रोग नहीं आता, जहाँ रोग नहीं वहां के निवासियों की आयु का लम्बा होना अनिवार्य होता है | अत: एसे परिवार के सदस्यों कि आयु लम्बी होती है |
२) विद्या :-

जहाँ शान्ति का वातावरण होता है . लड़ाई झगडा आदि में समय नष्ट नहीं होता तथा प्रसन्नता होती है , वहां पढाई में भी मन लगता है | इस कारण एसे परिवार के लोग शीघ्र ही उच्च शिक्षा पाने में सक्षम हो जाते हैं | बेकार की बातों में उलझने के स्थान पर ऐसे परिवारों में बचे हुए समय को स्वाध्याय में लगाया जाता है , जिससे एसे परिवारों में विद्या की भी वृद्धि होती है | इसलिए भी प्रतिदिन प्रत्येक परिवार में यज्ञ का होना आवश्यक है |
३) यश : –
जिस परिवार के सदस्यों की आयु लम्बी होती है तथा प्रतिदिन स्वाध्याय करने से विद्वान होते है, उस परिवार से मार्गदर्शन पाने वालों की पंक्ति निरंतर र्लम्बी होती चली जाती है | इस कारण एसे परिवार का यश भी बहुत दूर तक चला जाता है | उनकी कीर्ति की चर्चाएँ करते हुए लोग अपने परिजनों को भी इस परिवार का अनुगामी बनने के लिए प्रेरित करते हैं | इस प्रकार यह यश निरंतर बढ़ता चला जाता है | विद्वानों की सभा में उन्हें उतम स्थान मिलता है | यह यश पाने के लिए भी प्रतिदिन यज्ञ करना आवश्यक है |
४) बल : –
जिस परिवार के सदस्यों की आयु लम्बी होती है | जिस परिवार के सदस्य विद्वान होते है तथा जिस परिवार की यश व कीर्ति दूर दूर तक होती है , उस परिवार को आत्मिक व शारीरिक दोनों प्रकार का बल मिलता है | दोनों प्रकार के बालों की उस परिवार में वृद्धि होती है | जब एसे परिवार को सब लोग सम्मान के रूप में देखते हैं , सम्मान देते हैं तो उनका आत्मिक बल बढ़ता है तथा जब वह लम्बी आयु प्राप्त करते हैं तो इस का कारण भी उनका शारीरिक बल ही होता है | इस प्रकार जिस यज्ञ को करने से दोनों प्रकार के बलों में वृद्धि होती है , उस यज्ञ को करना प्रत्येक परिवार के लिए अनिवार्य होता है |
इस सब से जो तथ्य उभर कर सामने आता है वह यह है कि जहाँ पर प्रतिदिन यज्ञ होता है , वहां के निवासियों की आयु बढती है, विद्या बढती है , उन्हें यश मिलता है तथा बल भी मिलता है | हम जानते हैं कि श्री रामचंद्र जी के काल में सब परिवारों में प्रतिदिन यज्ञ होता था इस कारण किसी को कोई रोग नहीं था, किसी के पिता के रहते बालक की मृत्यु नहीं होती थी , कभी अकाल नहीं पड़ता था , समय पर वार्षा होती थी, समय पर वृक्ष फल देते थे , कोई भूखा नहीं था , सब की आयु लम्बी थी, सब बलवान थे | इस कारण ही श्री राम जी को इतना यश मिला की हम आज भी उन्हें न केवल याद करते हैं अपितु उनके जीवन की लीला भी प्रतिवर्ष खेलते हैं | जिस यज्ञ के करने से इतने लाभ हैं , उसे हम क्यों न अपने जीवन का अंग बनावें तथा हम क्यों न प्रतिदिन अपने परिवार में करें ? अत: हमें प्रतिदन दोनों समय यज्ञ अपने परिवार में अवश्य ही करना चाहिए |

 

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Posted on August 28, 2012, in Philosophy. Bookmark the permalink. 2 Comments.

  1. Is it possible to provide proper kit comprising havan kund(mini),samidha,samagri etc as per yagya vidhi vidhan!This will enable individual to perform yagya every day.

  1. Pingback: 100 names of god | Arya Samaja

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