Kartar Singh Sarabha- martydom day


आज 16 नवम्बर एक ऐसे अमर शहीद का बलिदान दिवस है जिसका नाम भी हम में से बहुतों ने नहीं सुना होगा पर जिसने उस आयु में जब हम आप अपने परिवार के प्रति भी अपना उत्तरदायित्व नहीं समझते, खुद को देश पर बलिदान कर दिया| मात्र १८ वर्ष की आयु में मातृभूमि के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करने वाले इस हुतात्मा का नाम है- करतार सिंह सराबा| १८९६ में पंजाब में लुधियाना के सराबा गाँव में सरदार मंगल सिंह के घर जन्मे करतार ने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था और उनका लालन पालन उनके दादा जी द्वारा किया गया| जब वे केवल १५ वर्ष के थे, उन्हें काम करने के लिए अमेरिका भेज दिया गया जहाँ पहुँचने पर उन्होंने पाया कि जहाँ और देशों के नागरिकों से थोड़ी बहुत ही पूछताछ की जाती है, वहीँ भारतीयों से अपराधियों की तरह सवाल जवाब किये जाते हैं| किसी सहयात्री से पूछा तो बताया गया कि हम गुलाम देश के वासी हैं इसलिए हमारी यही इज्जत है| इस घटना ने उनके मन पर अमिट प्रभाव डाला और जब ग़दर पार्टी की स्थापना की गयी तो करतार सिंह इसके संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए और इसके मुख पत्र ग़दर में जी जान से काम किया| प्रथम विश्व युद्ध को अपने अनुकूल समझ उसका लाभ लेने एवं ब्रिटिश शासन की चूलें हिलाने की दृष्टि से करतार सिंह एवं अन्य कई साथी भारत आये और रास बिहारी बोस से मिलकर उपयुक्त योजना का निर्माण करने का प्रयास करने लगे| ब्रिटिश सरकार की नज़रों से ये प्रयास छुप ना सका और कुछ एक गद्दारों की वजह से काफी लोग पकड़े गये और मारे गए| हिम्मत ना हारते हुए करतार सिंह ने सरगोधा के पास सैनिक छावनी में विद्रोह का प्रचार करना शुरू कर दिया और जब तक वो अंग्रेज सरकार की गिरफ्त में आये, उनका नाम क्रांति का पर्याय बन गया| भगत सिंह जैसे महान क्रन्तिकारी ने उन्हें अपने गुरु, सखा और भाई के रूप में स्वीकार किया है और यही करतार सिंह के व्यक्तित्व को बताने के लिए काफी है| लाहौर षड़यंत्र केस के नाम पर माँ भारती के इस सच्चे सपूत को आज के ही दिन १९१५ में फाँसी दे दी गयी और माँ का ये रत्न माँ की ही वेदी पर बलिदान हो गया| इस महान हुतात्मा को शत शत नमन| कुछ पंक्तियाँ, जो कि यह विश्वास किया जाता है कि उनकी ही रचना है, को देने का लोभ संवरण मैं नहीं कर पा रहा हूँ, जो मातृभूमि के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को प्रकट करती है|

यही पाओगे महशर में जबाँ मेरी , बयाँ मेरा|

मैं बंदा हिंद वालों का हूँ, है हिन्दोस्ताँ मेरा|

मैं हिंदी, ठेठ हिंदी, खून हिंदी, जात हिंदी है,

यही मजहब, यही भाषा, यही है खानदाँ मेरा|

मैं इस उजड़े हुए भारत के खंडहर का इक जर्रा हूँ|

बस यही इक पता मेरा, यही नामोनिशाँ मेरा|

कदम लूँ मादरे भारत तेरे, मैं बैठते उठते|

कहाँ किस्मत मेरी ऐसी, नसीबा यह कहाँ मेरा|

तेरी किस्मत में ऐ भारत यह सर जाये, यह जाँ जाये|

तो मैं समझूंगा यह मरना हयात-ऐ-जादवां मेरा|

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Posted on November 16, 2012, in Legends. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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