मूर्ति पूजा वेद संगत नहीं हैं


say no to idol worship

जसवीर लोहान

आज हिन्दू समाज मुख्यत: मूर्ति पूजक समाज बन गया हैं … छोटे छोटे पत्थरों को ईश्वर की मूर्ती समझ कर पूजने से लेकर, बड़े बड़े मंदिरों में अनेकों स्वर्ण-मोती जड़ित मूर्तियों से लेकर मूर्ति पूजा का आधुनिक स्वरुप उन मुसलमानों की कब्रों का पूजन बन गया हैं

जो भारत पर आक्रमण करने आये थे और हमारे वीर पूर्वजों के हाथों दोज़ख में पंहुचा दिए गए थे.

कोई मूर्तियों को ईश्वर पर ध्यान केन्द्रित करने का साधन बताता हैं तो कोई यह तर्क देता हैं की प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात ईश्वर स्वयं मूर्तियों में विराजमान हो जाते हैं.

हमारी छोटी सी शंका सदा यहीं रहती हैं की क्यों मूर्ति में विराजमान ईश्वर मुसलमानों के आक्रमण के समय अपनी रक्षा नहीं कर पाते हैं. या तो सोमनाथ की तरह विध्वंश के शिकार हो जाते हैं अथवा काशी विश्वनाथ की तरह कुँए में छुपा दिए जाते हैं.वेदों में केवल और केवल एक ही ईश्वर की उपासना का विधान हैं.

स्वामी दयानंद सत्यार्थ प्रकाह्स के सप्तम सम्मुलास में प्रश्नोत्तर के रूप में इस विषय पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं.
प्रश्न- वेदों में जो अनेक देवता लिखे हैं, उसका क्या अभिप्राय हैं?

उत्तर- देवता दिव्या गुणों से युक्त होने के कारण कहाते हैं, जैसे की पृथ्वी परन्तु इसको कहीं ईश्वर वा उपासनीय नहीं माना हैं.

ऋग्वेद भाष्य मंत्र १.१६४.३९ में यहीं भाव इस प्रकार दिया हैं- उस परमात्मा देव में सब देव अर्थात दिव्य गुण वाले सुर्यादी पद्यार्थ निवास करते हैं, वेदों का स्वाध्याय करके उसी परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए. जो लोग उसको न जानते, न मानते और उसका ध्यान नहीं करते , वे नास्तिक मंदगति, सदा दुःख सागर में डूबे ही रहते हैं.

ऋग्वेद ६.४५.१६ में भी अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहाँ गया हैं की हे उपासक, जो एक ही हैं, उस परम ऐश्वर्या शाली प्रभु की ही स्तुति उपासना करो.

ऋग्वेद १०.१२१.१-९ ईश्वर को हिरण्यगर्भ और प्रजापति आदि नामों से पुकारते हुए कहाँ गया हैं की सुखस्वरूप और सुख देने वाले उसी प्रजापति परमात्मा की ही समर्पण भाव से भक्ति करनी चाहिए.
स्वामी दयानंद जी मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे. मूर्ति पूजा के विरुद्ध उनका मंतव्य वेदों में मूर्ति पूजा के विरुद्ध आदेश होने के कारण बना.

सत्यार्थ प्रकाश के एकादश समुल्लास में उन्होंने मूर्ति पूजा के विषय में लिखा की “वेदों में पाषाण आदि मूर्ति पूजा और परमेश्वर के आवाहन-विसर्जन करने का एक अक्षर भी नहीं हैं. ” एक स्थल पर स्वामी जी ने मूर्ति पूजा की 18 हानियाँ भी गिनाई हैं.
स्वामी जी की मूर्तिपूजा के विरोध में प्रबल युक्ति यह हैं की परमात्मा निराकार हैं, उसका कोई शरीर नहीं हैं, शरीर रहित निराकार परमात्मा की भला कैसे कोई मूर्ति हो सकती हैं?

इसलिए मूर्ति को ईश्वर मानकर उसकी पूजा करना नितांत अज्ञानता की बात हैं.
यजुर्वेद ३२.३ – “न तस्य प्रतिमा अस्ति “अर्थात उस परमात्मा की कोई प्रतिमा नहीं हैं का प्रमाण मूर्ति पूजा के विरुद्ध आदेश हैं.

वैदिक काल में निराकार ईश्वर की पूजा होती थी जिसे कालांतर में मूर्ति पूजा का स्वरुप दे दिया गया.
श्री रामचंद्र जी महाराज और श्री कृष्ण जी महाराज जो उत्तम गुण संपन्न आर्य पुरुष थे उन्हें परमात्मा का अवतार बनाकर उनकी मूर्तियाँ बना ली गयी.

ईश्वर जो अविभाजित हैं उनके तीन अंश कर ब्रह्मा, विष्णु और महेश पृथक पृथक कर दिए गए. यह कल्पना भी वेद विरुद्ध हैं.उनकी पृथक पृथक पत्नियों की भी कल्पना कर दी गयी. आगे सूर्य, गणेश, हनुमान, भैरव, काली. चंडी आदि की भी कल्पना कर उनकी मूर्तियाँ बना दी गयी जो की वेद विरुद्ध थी.स्वामी दयानंद ने अवतारवाद को भी वेद विरुद्ध मान कर उनका खंडन किया हैं.

यजुर्वेद ४०.८ मन्त्र में परमात्मा का वर्णन इस प्रकार किया गया हैं

“वह सर्वत्र व्यापक हैं, वह सब प्रकार से पवित्र हैं, वह कभी शरीर धारण नहीं करता, इसलिए वह अव्रण हैंअर्थात उनमें फोड़े-फुंसी और घाव आदि नहीं हो सकते, वह शरीर न होने से नस नाड़ी के बंधन से भी रहित हैं, वह शुद्ध अर्थात रजोगुण आदि से पृथल हैं, पाप उसे कभी बींध नहीं सकता अर्थात किसी प्रकार के पाप उसे कभी छु भी नहीं सकता, वह कवि अर्थात सब पदार्थों का गहरा क्रांतदर्शी ज्ञान रखने वाला हैं, वह मनीषी अर्थात अत्यंत मेधावी हैं अथवा जीवों के मानों की बातों को भी जानने वाला हैं, वह परिभू अर्थात पापियों का पराभव करने वाला हैं, स्वयंभू हैं अर्थात स्वयंसिद्ध हैं. उसका कोई कारण नहीं हैं , वह अनादिकाल से कल्प कल्पान्तारों में सृष्टि के पदार्थ की यथावत रचना करता आ रहा हैं” यजुर्वेद के इस मंत्र में परमात्मा का कोई भौतिक शारीर होने की बात का इतने प्रबल शब्दों में निषेध कर दिया गया हैं की इसे पढने के बाद ईश्वर को मानव रूप में अवतार लेना केवल दुराग्रह मात्र हैं.

इस प्रकार वेदों की साक्षी से यह प्रमाणित हो जाता हैं की ईश्वर एक हैं,निराकार हैं,अजन्मा हैं,नित्य हैं, अवतार नहीं लेता.

अब भी पाठक गन अगर इसके विपरीत ईश्वर का होना मानते हैं तो वे वेद रुपी पावन ज्ञान के दर्शन होने पर भी अज्ञान में ही रहना चाहते हैं. !!

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Posted on December 5, 2012, in Philosophy. Bookmark the permalink. 6 Comments.

  1. budh pal singh Chandel

    सत्यम

  2. Vedo me kaha gya h ki uski koi partima nhi h.iska yah matlab nhi h ki wo kisi MURTI me nhi h.ishwar sab jagah h.”wah insan bankar sochta h.janwaro me bicharan karta h.vanshpatio me swashan karta h.aur niejeev vastuo me shant h.

    • kya iska arth yehnhein ki aap ishwar ko pad ,pdohe,janwar,vanaspati mein poojoge athva apni atma mein ishwar ka chintan karoge.

      • Vedo me ye kaha gya h ki “KAN-KAN ME BHAGWAN H”.ye rigveda me h ya samved me h ye mujhe nhi pata.lekin isi line ko aadhar mankar Scintisto no ek pryog kiya tha Jiska naam “GOD PARTICLE” diya gya.is paryog ka uddesh yah janana tha ki kisi jeez me bhar(waight)kaisi aati h.isiliye jab wah kan-kan me virajman h to phir wo murtiyo me v isiliye murtio ki puja ki ja sakti h.
        …..Ab baat aati h ki wo Niraakar h yani uski koi aakar nhi h.TO yah sahi h qki wo kvi Vishnu h to kavi Ram h to kavi Krishan h to Avi Shiv h to kavi hanuman h.Wo suraj mev wo chand me v h wo agni me v h.Wo tulsi me h to wo Peepal me v h.Isliye unka koi fixed aakar nhi h isiliye wo NIRAKAR h.Ek bhakt k ander agar aashtha h to wo ghar k pillar se v bhagwan ko bahar nikal sakta h.(EX- Narshimha avtaar).

  3. मुझे इस प्रश्न का उत्तर दीजिये कि इश्वर सर्वत्र है यह वेदों में लिखा है..
    इसका अर्थ यह हुआ कि वह मूर्ती में भी है ..
    तो मूर्ती को ईश्वर ना मानकर मूर्ती में ईश्वर मानकर पूजा करना क्या गलत है ??

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