सत्यार्थ प्रकाश मीमांसा


स्वामी दयानंद कृत अमर ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश पर रचना काल से ही स्वामी जी मान्यतायों के विषय में अनेक शंकाएं विभिन्न विभिन्न मतों के सदस्यों द्वारा समय समय पर प्रस्तुत की जाती रही हैं। स्वामी दयानंद जी महाराज सत्यार्थ प्रकाश की भूमिका में स्वयं लिखते हैं की

यद्यपि आजकल बहुत से विद्वान प्रत्येक मतों में हैं,वे पक्षपात छोड़ सर्व तंत्र सिद्धांत अर्थात जो जो बातें सब के अनुकूल सब में सत्य हैं, उनका ग्रहण और जो एक दूसरे से विरुद्ध बातें हैं, उनका त्याग कर परस्पर प्रीति से वर्ते वर्तावें तो जगत का पूर्ण हित होवे। क्यूंकि विद्वानों के विरोध से अविद्वानों में विरोध बढ़ कर अनेक विध दुःख की वृद्धि और सुख की हानि होती हैं। इस हानि ने, जो की स्वार्थी मनुष्यों को प्रिय हैं, सब मनुष्यों को दुःख सागर में डुबा दिया हैं। “

स्वामी दयानंद जी के इस आशय को न समझकर कुछ अज्ञानी लोग मतान्धता में सत्यार्थ प्रकाश पर आक्षेप करते रहते हैं। अंत में यही कहना श्रेयकर होगा की सर्वदा सत्य का विजय और असत्य का पराजय और सत्य ही से विद्वानों का मार्ग विस्तृत होता हैं।इस मीमांसा नामक लेखमाला से सत्यार्थ प्रकाश व स्वामी दयानंद द्वारा रचित अन्य ग्रंथों के ऊपर उठी अनेक शंकाओं का समाधान करने का प्रयास किया जायेगा।

डॉ विवेक आर्य

DOUBTS

शंका

स्वामी दयानंद द्वारा 24 वर्ष की कन्या से 48 वर्ष के पुरुष का विवाह करना बताया गया हैं। यह कितना उचित हैं?

समाधान

सत्यार्थ प्रकाश के चतुर्थ समुल्लास में स्वामी दयानंद जी लिखते हैं –

16 वें से लेके 24 वें वर्ष तक कन्या और 25वें वर्ष से लेके 48 वें वर्ष तक पुरुष का विवाह समय उत्तम हैं . इस में जो 16 और 25 में विवाह करे तो निकृष्ट , 18-20 वर्ष की स्त्री तथा 30-35 वा 40 वर्ष के पुरुष का मध्यम , 24 वर्ष की स्त्री और 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उत्तम हैं। जिस देश में इसी प्रकार विवाह की विधि श्रेष्ठ और ब्रहमचर्य विद्या अभ्यास अधिक होता हैं वह देश सुखी और जिस देश में ब्रहमचर्य, विद्या रहन रहित बाल्यावस्था और अयोग्यों का विवाह होता हैं वह देश दुःख में डूब जाता हैं।स्वामी जी ने 24 वर्ष की स्त्री के साथ 48 वर्ष के पुरुष का विवाह करने को क्यूँ कहा हैं इसका उत्तर सत्यार्थ प्रकाश के तृतीय समुल्लास में पठन-पाठन विधि में दिया गया हैं।

इस पाठ विधि में (संक्षेप में) स्वामी जी द्वारा व्याकरण के प्रारंभ में अष्टाध्यायी तदनन्तर धातुपाठ, उणादिगण, शंका ,समाधान वार्तिक, कारिका , परिभाषा तदनन्तर महाभाष्य, यास्क मुनि कृत निघंटु और निरुक्त, तदनन्तर छन्द ग्रन्थ,मनुस्मृति,वाल्मीकि रामायण और महाभारत,विदुरनीति, तदनन्तर पूर्व मीमांसा,वैशेषिक,न्याय,योग,सांख्य और वेदांत, ईश,केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, ऐतरेय , तैतरीय, छान्दोग्य और बृहद अरण्यक, तत्पश्चात ब्राह्मण ग्रन्थ ऐतरेय, शतपथ , साम और गोपथ के सहित चारों वेदों के स्वर, शब्द,अर्थ,सम्बन्ध तथा क्रियासाहित पढ़ना योग्य हैं। वेदों को पढ़ के आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्व वेद और अर्थवेद यह चार उपवेद पढ़े।

व्याकरण के महान विद्वान एवं स्वामी दयानंद के परम भक्त महामहोपाध्याय पंडित युधिष्ठर जी मीमांसक के अनुसार स्वामी दयानंद द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में वर्णित आर्ष पाठ विधि का चार भाग में विभागीकरण किया जा सकता हैं।

प्रथम कल्प – 24 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 16 वर्ष में तक निरन्तर व्याकरण में महाभाष्य पर्यन्त, निरुक्त, सामान्य कोष, छन्द शास्त्र साहित्य, ज्योतिष शास्त्र, कल्प सूत्र , धर्म सूत्र, उपनिषद् तथा एक वेद का अध्ययन हो सकता हैं।

द्वितीय कल्प- 32 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 24 वर्ष में तक निरन्तर – पहले लिखे गए पाठ्यक्रम को पढ़ कर यजुर्वेद का अध्ययन करने वाला व्यक्ति 4 वर्ष में शतपथ ब्राह्मण, आयुर्वेद को पढ़े व सामवेद को वादित्रवाहन ,सामगान, नाट्य शास्त्र के साथ अध्ययन करें। इस प्रकार वह दो वेदों का विद्वान बन जायेगा।

तृतीय कल्प – 40 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 32 वर्ष में तक निरन्तर – सम्पूर्ण ऋग्वेद को ऐतरेय ब्राह्मण के साथ, सामवेद को तांड्य ब्राह्मण के साथ , अथर्ववेद को गोपथ ब्राह्मण के साथ पढ़े।

चतुर्थ कल्प- 48 वर्ष तक ब्रहमचर्य पालन करने वाले के लिए-अर्थात 8 वर्ष की आयु में पठन पाठन आरंभ कर 40 वर्ष में तक निरन्तर – चारों वेदों का वेदांग और उपवेद सहित विद्वान होकर किसी भी विद्या क्षेत्र में विशेष योग्यता प्राप्त करे।

यहाँ 48 वर्ष की आयु में भी वेदों में पारंगत विद्वान अपने नैष्ठिक ब्रहमचर्य के बल पर, अपने सुविचारों के कारण और संयम विज्ञान के कारण युवा जैसे शरीर का मालिक होगा। और ऐसे विद्वान का विवाह 16 वर्ष की कन्या से करना भी उचित नहीं होगा क्यूंकि 16 वर्ष की कन्या की विद्या,गुण और बल में और 24 वर्ष की कन्या की विद्या,गुण और बल में भारी अंतर होने से विवाहित जीवन सुखी न होगा। अंत में यही कहना सत्य होगा की स्वामी दयानंद के मूल मंतव्य को समझकर कुतर्क देने से कोई लाभ नहीं हैं। विवाह के समय में आयु के अंतर के पीछे कारण मूल रूप से विद्या की प्राप्ति कर उचित पात्र के साथ सम्बन्ध स्थापित करना हैं।

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Posted on December 23, 2012, in Satyarth Prakash mimansa. Bookmark the permalink. 4 Comments.

  1. प्रिय डा,विवेक आर्य जी,नमस्ते,आप ने अच्छा समाधान किया है।लेकिन एक बात साफ़ नहीं होती कि 48 वर्ष के पुरुष का विवाह उससे आधी आयु की कन्या से होना व्यावहारिक नही लगता

    • 48 वर्ष के पुरुष के साथ 24 वर्ष की ही नारी के विवाह के पीछे एक कारण तो विद्या प्राप्ति का हैं जो इस लेख से स्पष्ट हैं दूसरा कारण हैं शारीरिक विज्ञान , 48 वर्ष की आयु में पुरुष संतान उत्पन्न करने में सब प्रकार से सक्षम हैं और एक विद्वान नैष्ठिक ब्रहमचारी से उत्तम संतान की उत्पत्ति होना संभव भी हैं परन्तु जहाँ तक नारी के शरीर की अवस्था हैं तो 24 वर्ष की आयु के पश्चात नारी का शरीर धीरे धीरे युवा अवस्था से प्रोढ़ अवस्था में जाने से शरीर की शक्ति न केवल कम होने लगती हैं अपितु प्रजनन क्षमता भी कम हो जाती हैं .साथ में अनुवांशिक रोग जैसे की down’s syndrome आदि की सम्भावना भी बढती आयु में माँ बनने से बढ़ जाती हैं।
      आज के परिपेक्ष में ऐसा कुछ असंभव प्रतीत होता हैं पर वैदिक काल में ऐसा कदापि असंभव नहीं था।

  2. Reblogged this on Duasahab's Blog.

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