वीर बालिका ताजकुंवरि


Tajkunwari

डॉ अशोक आर्य
कानपुर के निकट गंगा के तट पर किसोरा नामक राज्य था । इस राज्य के अन्दर वीरों का निवास था । अपनी वीरता के लिए सुप्रसिद्ध इस राज्य के शासक सज्जन सिंह अपने राज्य के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहते थे, इस कारण यह राज्य अब तक दिल्ली के शासकों के सम्मुख अपना मस्तक उंचा किए गौरव से स्थिर था । इस राज्य के शासक सज्जन सिंह की पुत्री ताजकुंवरी तथा राजकुमार लक्ष्मण सिंह भी अपनी अपनी वीरता के लिए दूर दूर तक चर्चित थे ।
एक बार दोनों बहिन भाई जंगल में आखेट को गये तो घोडों पर बैटे बैटे ही उनमें एक चर्चा आरम्भ हो गई । इस चर्चा को आरम्भ करते हुए भाई ने कहा कि ” क्यों बहिन ! तू कहती है कि तु मुझ से अधिक पठानों को मारेगी, उनका वध करेगी ।”
भाई का वचन सुनकर बहिन ने कहा कि ” निश्चय ही !” दोनों भाई – बहिन उत्तम शस्त्रों से सुसज्जित थे । दोनों की आकृति भी लगभग मिलती सी ही थी तथा दोनों घोडों पर सवार हो अपने शिकार की खोज में थे ।
इन की बातों को सुनकर झाड़ी में छुपे एक व्यक्ति ने ललकार कर कहा ” काफ़िर ! जुबान संभाल कर बोल !” झाड़ी में से किसी की इस प्रकार की कर्कश भरी आवाज निकली तथा इस के साथ ही दो बड़े बड़े पत्थर आये, जो युवक राजकुमार लक्ष्मण सिंह के घोडे की गर्दन को स्पर्श करते हुए दूर जा गिरे । इस स्वर को , इस लल्कार को सुन कर, इस सुन्सान जंगल में दोनॊ भाई – बहिन चकित से हो इधर उधर देखने लगे तथा एक दूसरे से बोले कि देखते हैं कि किसकी तलवार अधिक शत्रुओं का वध करती है । उन्हें समझते देर न लगी कि ज झाड़ी में कुछ शत्रु छुपे हैं ।
अब कुमार ललकारते हुए झाड़ी में घोडे सहित यह कहते हुए घुस गया कि राजपूत को काफ़िर कहने वाला तू कौन है ? सामने आ । लगता हैं अब तक तुम्हारा पाला किसी क्षत्रिय से नहीं पडा । घोड़े के झाड़ी में जाते ही कई पठान सैनिक एक साथ खडे हो गए, वह इस अवसर की ताक में ही छुपे हुए थे । शत्रु को देखते ही राजकुमार की तलवार चमक उठी तथा देखते ही देखते चार-पांच पठानों के सिर धुलि में जा गिरे । अब राजकुमारी की बारी थी । वह देख रही थी कि उसके भाई ने चार – पाच शत्रुओं को मार गिराया है , इस कारण कहीं वह शत्रु नाश करने में कहीं पिछड़ न जावे । अत: उसने भी भाले के वार आरम्भ कर दिए । उस के वारों से भी अनेक पठान सैनिक रुद्र नाद करते हुए धरती पर लौटने लगे , जबकि दो शत्रु सैनिक इस छोटे से संघर्ष से बच कर भागने में सफ़ल हो गए । इस प्रकार इन दो भाई बहिनों ने घात लगाकर बैटे इन आक्रमणकारियों के एक समूह को मिनटों में ही धूलि में लौटने को बाध्य कर दिया तथा उनका संहार कर सफ़लता का सेहरा बांधे अपने राज महल को लौट पडे ।
अपने देश पर मर मिटने को तैयार अपने सैनिकों के साहस तथा वीरता के परिणाम स्वरूप किसोरा राज्य के शासक सज्जन सिंह अब तक दिल्ली के मुस्लिम शासक के सम्मुख अपना सिर ऊंचा रखे हुए थे । इस नरेश ने आखेट से लौटे अपने प्रिय राजकुमार लक्ष्मण सिंह तथा राजकुमारी ताजकुंवरी से उनकी वीरता का समाचार सुना तो उनकी छाती आनन्द से फ़ूल गई । वह इस दिन की ही प्रतीक्षा में थे क्योंकि बड़े ही यत्न से उन्होंने अपने राजकुमार पुत्र के साथ ही साथ राजकुमारी को भी शस्त्र चलाने तथा सैन्य संचालन की शिक्षा दी थी , इस में पारंगत किया था अश्वारोहण की भी उत्तम शिक्षा उन्होंने दोनों को दी थी। इस सम्बन्ध में उन्होंने पुत्र व पुत्री में कभी भी कोई भेद न किया था । दोनॊं को समान युद्ध विद्या देने पर भी उन्हें अपनी पुत्री के युद्ध कौशल पर गर्व था ।
एक बार तो राजकुमारी ताजकुंवरी ने स्वयं सैन्य संचालन करते हुए मुस्लिम सेना को परास्त कर दिया था । इस युद्द मे राजकुमारी के एक हाथ में भाला चमक रहा था तो दूसरे हाथ में रक्त से सनी हुई खडग लिये राजकुमारी खून से सराबोर अपने घोडे पर बडी प्रसन्न किन्तु तेजस्वी मुद्रा में आसीन थी । इस प्रकार विजयी हो उसके नगर द्वार में प्रवेश करते ही अटालिकाओं में खड़े नगर के स्त्री पुरुषों ने इस विजयी बाला पर भारी पुष्प वर्षा करते हुए उसका स्वागत किया । सब मानने लगे कि यह राजकुमारी तो सशक्त सिंहनी है ।
दिल्ली बादशाह की इस युद्ध में बची खुची सेना ने दिल्ली दरबार में जाकर सब समाचार दिये तथा राजकुमारि ताजकुंवरि की वीरता तथा सुन्दरता की कथा सुनाई । बादशाह ने पहले से ही राजकुमारी के सौन्दर्य की कहानियां सुन रखीं थीं तथा उसे पाने का अभिलाषी था । अत: इस अवसर को बादशाह ने खोने न दिया तथा तत्काल किसोरा के शासक सज्जनसिंह को पत्र लिखा । पत्र मे उसने लिखा ” तुम्हारी पुत्री ने अकारण ही हमारे अनेक पठान सैनिकों को मारा है , इस लिए उसे दण्ड देने के लिए बिना कोई बहाना किए चुपचाप हमारे हवाले कर दो अन्यथा देखते ही देखते हमारी सेनायें किसोरा राज्य को धुल धुसरित कर देंगी । ”
पत्र को पाते ही महारज सज्जन सिंह का चेहरा लाल हो गया , अन्य सभासदों का खून भी खोलने लगा । उन्हों ने तत्काल बाद्शाह को अपने खून से पत्र लिखा कि ” राजपूत अपनी बहू बेटियों को बुरी दृष्टी से देखने वालों की आंखें निकालने के लिए , उनके सिर काटने के लिए सदा तैयार रहते हैं । किसोरा कोई मिटाई नहीं है, जिसे बादशाह गटक लेंगे । वे आवें, हमारे हाथों में भी खड्ग है । आतताईयों के वध में मेरी पुत्री ने कोई अन्याय नहीं किया ॥”
इस पत्र को पा आगबबूला हुए बादशाह ने विशाल सेना की सहायता से किसोरा पर आक्र्मण कर दिया । एक ओर किसोरा की छॊटी सी सेना थी तो दूसरी ओर दिल्ली की टिडी दल के समान विशाल सेना थी किन्तु राजपूतों ने बडी वीरता से इस विशाल सेना के साथ लोहा लिया किन्तु यह छोटी सी सेना एक विशाल सेना के साथ कब तक लड़ती । धीर धीरे यह सेना और भी छोटी होती चली जा रही थी । कुछ समय बाद नगर का द्वार टूट गया । नगर द्वार टूटते ही विशाल शत्रु सेना ने नगर मे प्रवेश किया । इस सीधे युद्ध में राजा सज्जन सिंह मारे गये, शहीद हो गये । पठान सेना पूरे नगर में फ़ैल कर कत्ले आम करने लगी ।
युद्ध में व्यस्त यवन सेनापति ने अकस्मात देखा कि एक बुर्ज पर खड़े दो राजपूत उसकी सेना पर बडी तेजी से बाण वर्षा कर रहे हैं । उसे समझते देर न लगी कि यह युद्ध में लगे हुए दोनों में से एक राजकुमार है तो दूसरी राजकुमारी है । उसने तत्काल अपने सैनिकों को आदेश दिया कि इन दोनों को किसी भी प्रकार जीवित ही पकड़ा जाये । वह यह आदेश अभी पूरा भी न कर पाया था कि एक तीर उसे भेदता हुआ निकल गया तथा यह निर्दयी शत्रु सेनापति वहीं जमीन पर लुटक गया । यह सर संधान ताजकुंवरी ने उस समय किया था जब उसे इंगित करते हुए वह अपनी सेना को आदेश दे रहा था । राजकुमारी के इस क्रत्य से पठान सेना अत्यन्त कुपित हो ऊटे तथा भारी संख्या में इन सैनिकों ने मिलकर उस बुर्ज पर धावा बोल दिया , जहां से यह दोनों भाई – बहिन युद्ध का संचालन कर रहे थे । शत्रु सेना को अपने समीप आते देख ताजकुंवरी समझ गयी कि अब वह स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकती । इस लिए उसने अपने भाई राजकुमार लक्शमण सिंह को कहा की भाई ! अब बहिन की रक्षा का समय आ गया है । जब भाई ने रोते हुए कहा कि बहिन ! क्या अब रक्षा सम्भव है ? तो बहिन ने फ़िर कहा कि ! राजपूत होकर रोते हो ! मेरे शरीर की रक्षा की अब आवश्यकता नहीं है । अब तो बहिन के धर्म की रक्षा का समय है, जिसे आप बखूबी कर सकते हॊ ।
ताजकुंवरी की प्रार्थना को सुनकर भाई ने कहा कि बहिन ! तेरी रक्षा करना मेरा कर्तव्य है, ,मेरा धर्म है । मैं इसे पूरा करूंगा . अवश्य करूँगा । लक्ष्मण सिंह , जो अब तक तीरों का ही प्रयोग कर रहा था , ने तत्काल म्यान से अपनी तलवार निकाली तथा यवन सैनिकों , पठान सैनिकों के निकट आने से पूर्व ही अपने हाथों उस सुन्दर प्रतिमा को दो भागों में बांट दिया, जिसे वह अपनी बहिन कहता था तथा जिससे वह बेहद प्रेम करता था । बहिन के धर्म की रक्षा करने के पश्चात राजकुमार ने रौद्र रूप धारण कर लिया । अब अकेले होते हुए भी यवन सेना को गाजर मूली समझ कर उसे काट रहा था । एक ओर वह अकेला था तो दूसरी ओर शत्रु की भारी सेना थी। कहां तक मुकाबला करता किन्तू जब तक उसके शरीर में रक्त की एक भी बूंद बाकी रही तब तक वह शत्रु सेनाओं को काटता ही चला गया । उसने अकेले ने एसी वीरता दिखाई कि जब वह बुरी तरह से घायल होकर अपनी बुर्ज पर गिरा तब तक शत्रु सेनायें घबरा कर भागती हुई दिखाई दे रही थी । इस प्रकार अपना बलिदान देकर एक भाई ने अन्त तक अपनी बहिन का धर्म नष्ट न होने दिया । ऐसे वीरों के बलिदानों से ही यह भारत भूमि आज तक बची हुई है ।

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Posted on February 13, 2013, in Legends. Bookmark the permalink. 3 Comments.

  1. आग धधकती है सीने मे,
    आँखोँ से अंगारे,
    हम भी वंशज है राणा के,
    कैसे रण हारे…?

    कैसे कर विश्राम रुके हम…?
    जब इतने कंटक हो,
    राजपूत विश्राम करे क्योँ,
    जब देश पर संकट हो.

    हर हर महादेव!
    ॐ!

  2. completely fake. . .rajput badsah ko apni beti dekar sman mhsus krte the … इतनी निर्लज्जता के साथ इतना बेबुनियाद वर्णन कोई कैसे कर सकता है सच्च मेँ आप जैसे लोग नैतिक रुप से पूरी तरह गर्त मेँ चल गये हो । उफ । जी घुट रहा है कोई आधारहीन वर्णन करने से पहले अपनी छवी का ख्याल रखा करो ।

    • दिनेश जी आपके कथन में जातिवाद के प्रति हेतावास स्पष्ट हो हैं। जातिवाद का समूल नाश होना चाहिए नाश कटुवचन से नहीं हो सकता। यह एतिहासिक तथ्य हैं की कायर और राजविलासी राजपूतों ने अपने विश्राम में बाधा न पड़े इसलिए अपनी बेटियों की डोलियाँ मुगलों के यहाँ पर पहुँचा दी थी पर वीर बाप्पा रावल जिन्होंने एक मुस्लिम लड़की से शादी की थी, वीर राणा हम्मीर जिन्होंने मुगलों की नाक के नीचे हिन्दू राज्य की स्थापना करी थी, महाराणा सांगा जिनसे बाबर आजीवन डरता था, महाराणा प्रताप जिनकी वीरता और देशभक्ति को अकबर ने भी सराहा था, वीर दुर्गा दास राठोड़ जिनके नाम और कार्य कुशलता से औरंगजेब जैसा व्यक्ति दबता था राजपूत समाज की ही देन हैं। सबसे बड़ी बात यह हैं की यह लोग इसलिए महान नहीं थे क्यूंकि यह राजपूत थे अपितु इसलिए थे क्यूंकि इन्होंने देश, धर्म और जाती की सेवा के लिए तप किया। यह भी चाहते तो आराम से रहकर जीवन यापन कर सकते थे। और यही बात ताजकुंवारी पर भी लागु होती हैं। उन्होंने मृत्यु का वरण किया चाहती तो मुगलों के हरम में मौज से भी रह सकती थी। उन वीर आत्माओं को हमारी यह छोटी सी श्रद्धांजलि हैं। इसमें जातिवाद का पोषण कहीं से भी नहीं हैं। डॉ विवेक आर्य

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