अहल्या उद्धार का रहस्य


 yogini

एक कथा प्रचलित कर दी गयी हैं की त्रेता युग में श्री राम ने जब पत्थर बनी अहिल्या को अपने चरणों से छुआ तब वह पत्थर से मानव बन गई और उसका उद्धार हो गया।

 प्रथम तो तर्क शास्त्र से किसी भी प्रकार से यह संभव ही नहीं हैं की मानव शरीर पहले पत्थर बन जाये और फिर चरण छूने से वापिस शरीर रूप में आ जाये।

दूसरा वाल्मीकि रामायण में अहिल्या का वन में गौतम ऋषि के साथ तप करने का वर्णन हैं कहीं भी वाल्मीकि मुनि ने पत्थर वाली कथा का वर्णन नहीं किया हैं। वाल्मीकि रामायण की रचना के बहुत बाद की रचना तुलसीदास रचित रामचरितमानस में इसका वर्णन हैं।

तीसरे दो विषयों पर विरोधाभास हैं एक की क्या अहिल्या इन्द्र द्वारा छली गयी थी अथवा दूसरा अहिल्या चरित्रवान नहीं थी?

इसका हल भी बालकाण्ड सर्ग 51 में गौतम के पुत्र शतानंद अपनी माता को यशस्विनी तथा देवों में आतिथ्य पाने योग्य कहा हैं।

 49/19 में लिखा हैं की राम और लक्ष्मण ने अहिल्या के पैर छुए। यही नहीं राम और लक्ष्मण को अहिल्या ने अतिथि रूप में स्वीकार किया और पाद्य तथा अधर्य से उनका स्वागत किया। यदि अहिल्या का चरित्र सदिग्ध होता तो क्या राम और लक्ष्मण उनका आतिथ्य स्वीकार करते।

सत्य क्या हैं ।

विश्वामित्र ऋषि से तपोनिष्ठ अहिल्या का वर्णन सुनकर जब राम और लक्ष्मण ने गौतम मुनि के आश्रम में प्रवेश किया तब उन्होंने अहिल्या को जिस रूप में वर्णन किया हैं उसका वर्णन वाल्मीकि ऋषि ने बाल कांड 49/15-17 में इस प्रकार किया हैं

स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव || ४९-१५

सस् हि गौतम वाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह |
त्रयाणाम् अपि लोकानाम् यावत् रामस्य दर्शनम् |४९-१६

तप से देदियमान रूप वाली, बादलों से मुक्त पूर्ण चन्द्रमा की प्रभा के समान तथा प्रदीप्त अग्नि शिखा और सूर्य से तेज के समान अहिल्या तपस्या में लीन थी।

सत्य यह हैं की देवी अहिल्या महान तपस्वी थी जिनके तप की महिमा को सुनकर राम और लक्ष्मण उनके दर्शन करने गए थे। विश्वामित्र जैसे ऋषि राम और लक्ष्मण को शिक्षा देने के लिए और शत्रुयों का संहार करने के लिए वन जैसे कठिन प्रदेश में लाये थे।

 किसी सामान्य महिला के दर्शन कराने हेतु नहीं लाये थे।

कालांतर में कुछ अज्ञानी लोगो ने ब्राह्मण ग्रंथों में इन्द्र के लिए प्रयुक्त शब्द “अहल्यायैजार” के रहस्य को न समझ कर इन्द्र द्वारा अहिल्या से व्यभिचार की कथा गढ़ ली। प्रथम इन्द्र को जिसे हम देवता कहते हैं व्यभिचारी बना दिया। भला जो व्यभिचारी होता हैं वह देवता कहाँ से हुआ?

द्वितीय अहिल्या को गौतम मुनि से शापित करवा कर उस पत्थर का बना दिया जो असंभव हैं।

तीसरे उस शाप से मुक्ति का साधन श्री राम जी के चरणों से उस शिला को छुना बना दिया।

मध्यकाल को पतन काल भी कहा जाता हैं क्यूंकि उससे पहले नारी जाति को जहाँ सर्वश्रेष्ठ और पूजा के योग्य समझा जाता था वही मध्यकाल में वही ताड़न की अधिकारी और अधम समझी जाने लगी।

 इसी विकृत मानसिकता का परिणाम अहिल्या इन्द्र की कथा का विकृत रूप हैं।

सत्य रूप को स्वामी दयानंद ने ऋग्वेदादीभाष्य भूमिका में लिखा हैं की यहाँ इन्द्र सूर्य हैं, अहिल्या रात्रि हैं और गौतम चंद्रमा हैं. चंद्रमा रूपी गौतम रात्रि अहिल्या के साथ मिलकर प्राणियो को सुख पहुचातें हैं. इन्द्र यानि सूर्य के प्रकाश से रात्रि अहिल्या निवृत हो जाती हैं अर्थात गौतम और अहिल्या का सम्बन्ध समाप्त हो जाता हैं.

इन सब तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध होता हैं की अहिल्या उद्धार की कथा काल्पनिक हैं। अहिल्या न तो व्यभिचारिणी थी न ही उसके साथ किसी ने छल किया था। सत्य यह हैं की वह महान तपस्विनी थी जिनके दर्शनों के लिए , जिनसे ज्ञान प्राप्ति के लिए ऋषि विश्वामित्र श्री राम और लक्ष्मण को वन में गए थे।

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Posted on March 1, 2013, in History. Bookmark the permalink. 6 Comments.

  1. Sanatan Dharma

    @respected Arya
    Again great research based and scholarly written post. A lot of thanks. Here I would like to request you please give the Shaloka/Verses also as I do not want to give any chance to fanatics to say nowhere written this what you said.

    • arya ji i have given references. please type and send me shaloks. i will add them in this article. lot of thanks for appreciation and help.

      • Sanatan Dharma

        Okey I Paste here

        When Rama see the Ahalya

        स तुषार आवृताम् स अभ्राम् पूर्ण चन्द्र प्रभाम् इव |
        मध्ये अंभसो दुराधर्षाम् दीप्ताम् सूर्य प्रभाम् इव || १-४९-१५
        she is hitherto practising an utmost ascesis subsisting on air alone, which ascesis alone made her like a flaring Ritual Fir, and Rama has seen such a highly glorious Ahalya.
        सस् हि गौतम वाक्येन दुर्निरीक्ष्या बभूव ह |
        त्रयाणाम् अपि लोकानाम् यावत् रामस्य दर्शनम् |१-४९-१६
        Ahalya is indeed indiscernible to all the three worlds by the very word of Gautama until the appearance of Rama.

        Corrupted verse or adulteration

        Next one Shaloka corrupted and adulteration
        Where she was shown cursed in form of stone.
        शापस्य अन्तम् उपागंय तेषाम् दर्शनम् आगता ||
        राघवौ तु ततः तस्याः पादौ जगृहतुः मुदा | १-४९-१७
        On reaching the end of curse she came into the view of Raghava-s, and they too gladly touched her feet in reverence.

      • Sanatan Dharma

        And Rama also was not God but we can say him great human being. Here Satanand (Son of Ahalaya & Goutam says to Rama you are fortunate to have company of Great Vishwa Mitra
        न अस्ति धन्यतरो राम त्वत्तो अन्यो भुवि कश्चन |
        गोप्ता कुशिक पुत्रः ते येन तप्तम् महत् तपः || १-५१-१५
        “None other than you is fortunate enough on earth, oh, Rama, as you are in the custodial care of Vishvamitra, the scion of Kushika, who has practised supreme ascesis. [1-51-15]
        स्वागतम् ते नरश्रेष्ठ दिष्ट्या प्राप्तो असि राघव |
        विश्वामित्रम् पुरस्कृत्य महर्षिम् अपराजितम् || १-५१-१३
        “Hail to thee! Oh, best one among men Rama, your arrival is a godsend, not only to Mithila but to entire humanity, and oh, Raghava, as an undefeatable great-sage Vishvamitra spearheads you, so shall your mission be undefeatable, thus hail to thee! [1-51-13]

  2. budhpal singhchandel

    ॐ,
    हम लेखक की अंतिम पंक्तियों एबम महा ऋषि दयानंद जी के रिग्वेदादिभाश्य में उध्रत परिभाषा से पूर्ण सहमत हूँ ,एबम यही सास्वत सत्य प्रतीत होता है!

  3. आर्य भारत

    आप का लेख पादः कर अच्छा लगा | ताड़न aur ताड़ना दोनो मे अन्तर होता हे
    ताड़न का अर्थ देखना (ध्यान रखना या शिक्षा देना भी हे) या नजर बये रखना होता हे और ताड़ना का अर्थ दण्ड देन होता हे और जो लिखा हे वो ताड़न लिखा

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