‘धर्म प्रचार’ – पण्डित लेखराम जी आर्य पथिक


lekhram

पंडित लेखराम शहीदी दिवस 6 मार्च के अवसर पर पंडित जी के लेखों का संग्रह “कुलयात आर्य मुसाफिर” से उनका प्रसिद्द लेख धर्म प्रचार प्रकाशित किया जा रहा हैं। यह लेख पंडित जी द्वारा 1890 के दशक लिखा गया था। यह लेख भारत देश में विधर्मी मत के इतिहास और उनके समाधान को एतिहासिक प्रमाण देकर हमें मार्ग दर्शन देता हैं। पंडित जी को सच्ची श्रद्धान्जलि उनके मिशन और उनके अंतिम सन्देश “तहरीर (लेखन) और तकरीर(शास्त्रार्थ) का कार्य बंद नहीं होना चाहिए” को यथार्थ करके ही होगी। आज के युवा देश का भविष्य हैं। आशा हैं पंडित जी के जीवन से धर्म, जाति और देश की सेवा का सभी युवा आज के दिन संकल्प लेगे।

धर्म प्रचार

हमारी आर्य जाति अविद्यान्धकार की निद्रा में सो गई है। अब इसे जागते हुए संकोच होता है कहां वह ऋषि मुनियों का पवित्र युग और कहाँ उनकी वर्तमान संतति की यह दुर्गति। त्राहि माम् त्राहि माम्।

प्रिय‌ भाईयो ! 4990 वर्ष हुए जबकि महाराजा युधिष्ठर का चक्रवर्ती धर्मराज पृथ्वी में वर्त्तमान था। उस समय कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई बौद्ध, कोई जैन इस भारतवर्ष में विद्यमान नहीं था।प्रत्युत सारे संसार में भी कहीं उनका चिन्ह तक न था। समस्त प्रजा वैदिकधर्म और शास्त्रोक्त कर्म में संलग्न थी।सदियों पश्चात जब अविद्या के कारण मद्यमाँस, व्याभिचार आदि इस देश में बढ़ने लगा।तब 2490 वर्ष बीते कि नेपाल प्रान्त में एक साखी सिंह नामक व्यक्ति ने जो नास्तिक था बुद्धमत चलाया।राजबल भी साथ था। उसी लोभ से बहुत से पेट पालक ब्राह्मण उसके साथ हो गए जिससे बुद्धमत सारे भारत में फैल गया। काशी, कश्मीर, कन्नौज के अतिरिक्त कोई नगर भारत में ऐसा न रहा जो बौद्ध न हो गया हो।जब यह मत बहुत बढ़ गया और लोग वेदधर्म से पतित हुए। यज्ञोपवीत आदि संस्कार छोड़ बैठे।तब दो सौ वर्ष के लगभग हुए कि एक महात्मा शंकर स्वामी (जिसे लोग स्वामी शंकराचार्य भी कहते हैं) ने कटिबद्ध हो शिष्यों सहित बौद्धों से शास्त्रार्थ करने आरम्भ किये। भला नास्तिक लोगों के हेत्वाभास वेद शास्त्रज्ञ के सम्मुख क्या प्रभाव डाल सकते थे ?

एक दो प्रसिद्ध स्थानों पर विजयी होने के कारण शंकर स्वामी का सिंहनाद दूर 2 तक गुंजायमान हो उठा। बहुत से राजाओं ने वैदिक धर्म स्वीकार कर लिया। दस बारह वर्ष में ही शंकराचार्य के शास्त्राथों के कारण समस्त देश के बौद्धों में हलचल मच गई। शंकराचार्य के शास्त्रार्थों में यह शर्तें होती थीं कि :-

(1) जो पराजित हो अर्थात शास्त्रार्थ में हारे वह दूसरे का धर्म स्वीकार करे।

(2) यदि साधू हो तो संन्यासी का शिष्य हो जाए।

(3) यदि यह दोनों बातें स्वीकार नहीं तो आर्यावर्त देश छोड़ जाये।

इन तीन नियमों के कारण करोड़ों बौद्ध और जैन पुनः वैदिक धर्म में आए और प्रायश्चित किया। उनको शंकर स्वामी ने गायत्री बताई। यज्ञोपवीत पहनाए। जो बहुत हठी थे और पक्षपात की अग्नि में जल रहे थे। इस प्रकार के लाखों व्यक्ति आर्यावर्त्त से निकल गए।राजाओं की ओर से कश्मीर, नैपाल, केपकुमारी, सूरत, बंगाल आदि भारत के सीमान्त स्थानों पर संन्यासियों के मठ बनाए गए और वहाँ सेना भी रही जिससे बौद्ध वापिस न आ सकें।

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि भारत, जिससे व‌ह धर्म उत्पन्न हुआ और एक समय ऐसा भी आया जबकि सारा भारत बौद्ध था परन्तु अब उस भारत में उस मत का व्यक्ति भी दृष्टिगोचर नहीं होता।| भारत के चारों ओर लंका, ब्रह्मा, चीन, जापान, रूस, अफगानिस्तान, बलोचिस्तान आदि में करोडों बौद्ध हैं। जैनी अब भी भारत में बहुत न्यून अर्थात् 6-7 लाख हैं। यह लोग छिप छिप कर कहीं गुप्तरूप से रह गए। महात्मा शंकराचार्य जी 32 वर्ष की अवस्था में परलोक सिधार गए। अन्यथा देखते कि वही ऋषि मुनियों का युग पुनः लौट आता।शंकराचार्य की ओर से जन्म के जैनियों और बौद्धों के लिये केवल यही प्रायश्चित था कि एक दो दिन व्रत रखवा कर उन्हें यज्ञोपवीत पहनाया जाए और गायत्री मन्त्र बताया जाए। परिणामस्वरूप 25 करोड़ मनुष्य प्रायश्चित कर, गायत्री पढ़, यज्ञोपवीत पहन वर्णाश्रम धर्म में आ गये। जब कि चार पांच सौ वर्षों तक वह बौद्ध और जैन रहे थे। बौद्ध लोग वर्णाश्रम को नहीं मानते। खाना पीना भी उनका वेद विरुद्ध है। वह सब प्रकार का माँस खा लेते हैं। चीन के इतिहास और ब्रह्मा के वृत्तान्त से यह बात सब लोग ज्ञात कर सकते हैं। 1200 वर्ष हुए कि यहां पर मुसलमानों ने सूरत और अफगानिस्तान की ओर से चढ़ाई की। आर्यावर्त्त में वैदिक धर्म छूट जाने और पुराणों के प्रचार के कारण सैकड़ों मत थे। इन वेद विरुद्ध मतों के कारण घर घर में फूट हो रही थी। धर्म के न रहने और वाममार्ग के फैलने से व्याभिचार भी बहुत फैला हुआ था। व्याभिचार प्रसार तथा अल्पायु के विवाहों के कारण बल, शक्ति, ब्रह्मचर्य और उत्साह का नाश हो रहा था। ऐसी अवस्था में एक जंगली जाति का हमारे देश पर विजयी होना कौन सा कठिन कार्य था ? हमारी निर्बलता का एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि सोमनाथ के युद्ध में महमूद के साथ 10-15 हजार सेना थी और हिन्दु राजाओं के पास 10-15 लाख सेना थी। परन्तु हिन्दु ही पराजित हुए और महमूद विजयी हुआ। आप जानते हैं कि सौ हजार का एक लाख होता है। मानो एक अफगान के सम्मुख सौ हिन्दु थे। ऐसे अवसर पर पराजित होने का कारण ब्रह्मचर्य की हानि और धर्माभाव ही था और कारण इसके अतिरिक्त न था।आप ध्यान से विचार कर ले। तारीखे हिन्द में लिखा है कि इस देश में सर्वप्रथम बापा (राजा चित्तौड़) एक मुसलमानी पर आसक्त होकर मुसलमान हो गया। परन्तु लज्जा से खुरासान चला गया और वहाँ ही मर गया। उसके पीछे उसका हिन्दु बेटा राजगद्दी पर बैठा।

दूसरा इस देश में सुखपाल (राजा लाहौर‌) धन और राज्य के लोभ से महमूद के समय में मुसलमान हो गया। जिस पर महमूद उसको राजा बना कर चला गया। महमूद के जाने के पश्चात वह पुनः हिन्दु हो गया और ब्राह्मणों ने उसे मिला लिया।

कश्मीर एक बादशाह के अत्याचार से बलपूर्वक मुसलमान किया गया था। अभी तक उनकी उपजातियां भट्ट कौल आदि हैं।

ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन सब में से जो-जो मुसलमान हुए, प्रायः बल प्रयोग से हुए। कोई भी प्रसन्नता, आनन्द अथवा इसलाम को पसन्द करके मुसलमान‌ नहीं हुआ।

बहुत से लोग जागीर आदि के लोभ से मुसलमान हुए जिनकी वंशावलियां स्पष्ट बताती हैं कि पिता पितामह अथवा दो तीन पीढ़ी से ऊपर वे हिन्दु थे।

बहुत से हिन्दु युवक मुसलमानी वैश्याओं के प्रेमपाश में बन्दी हो कर विधर्मीं हुए। जो अपने प्रेमियों को इसी दीन की शिक्षा दिया करती हैं।जिनके पहले और अब भी सहस्त्रों उदाहरण प्रत्येक प्रान्त और भाग में मिलते हैं।

बड़े-बड़े योग्य पण्डित भी वेश्याओं के अन्धकूप में डूब गये। उदाहरणार्थ गंगा लहरी के रचयिता जगन्नाथ शास्त्री हैं।

लाखों सूरमा वीर हृदय वाले महात्मा जान पर खेल कर धर्म पर बलि दे गये। शीश दिये किन्तु धर्म नहीं छोड़ा। दाहरणार्थ देखो शहीदगंज और टाड राजस्थान।

आप जानते हैं जब मुसलमान नहीं आए थे। तो उनकी जियारतें, कबरें, मकबरे, खानकाहें और गोरिस्तान भी इस देश में न थे जब 8-9 सौ वर्ष से मुसलमान आए तब से ही भारत में कबरपरस्ती शुरू हुई। अत्याचारी मुसलमान हिन्दु वीरों के हाथ से मारे गए। मुसलमानों ने उनको शहीद बना दिया और हिन्दुओं को जहन्नुम (नारकीय) शोक। शत सहस्त्र शोक |

हमारे पिता पितामहों की रक्तवाहिनी असिधारा ने जिन अत्याचारियों का वध किया, हमारे पूर्वजों के हाथों से जो लोग मर कर दोजख (नरकाग्नि) में पहुँचाए गए। हम अयोग्य सन्तान और कपूत पुत्र उन्हें शहीद समझ कर उन पर धूपदीप जलाते हैं। इस मूर्खता पर शोकातिशोक! अपमान की कोई सीमा नहीं रही। परमेश्वर ! यह दुर्गति कब तक रहेगी ?

ऐ हिन्दु भाइयो ! सारे भारत में जहां पक्के और ऊँचे कबरिस्तान देखते हो, वह लोग तुम्हारे ही पूर्वजों के हाथों से वध किये गये थे। उनके पूजने से तुम्हारी भलाई कभी और किसी प्रकार सम्भव नहीं। थ‌म अच्छी प्रकार सोच लो।

अगर पीरे मुर्दा बकारे आमदे।
जि शाहीन मुर्दा शिकार आमदे।।

यदि मरा हुआ पीर काम आ सकता तो मृत बाज भी शिकार कर सकते। मुसलमानों ने मन्दिर तोड़े, बुत तोड़े। लाखों का वध किया। इस कठोर आघात के कारण लोग मुसलमान हुए। देखो तैमूर का रोजनामचा (डायरी)

परन्तु भारत ऐसा दुर्भाग्यशाली न था कि ईरान, रोम, मिश्र और अरब की भाँति कभी न जागता। च 2 में जगाने वाले उसे जगाते रहे।

मुसलमानों के अत्याचार से ही सती प्रथा प्रचलित हुई ताकि ऐसा न हो कि वे निर्दयी देवियों को पकड़ कर खराब करें। रानी पद्ममनी का सती होना और अलाउद्दीन का अत्याचार। स घटना से सम्बन्धित इतिहास ध्यान से पढ़ो।

पहला प्रायश्चित – सबसे प्रथम आर्यावर्त में शंकराचार्य जी ने 25 करोड़ बौद्धों का प्रायश्चित करा उनको वैदिक धर्म में प्रविष्ट कराया।

दूसरा प्रायश्चित – महाराजा चन्द्रगुप्त ने किया अर्थात सल्यूकस-बावल के अधिपति (युनान के राजा) की पुत्री से विवाह किया जिसको आज दो सहस्त्र एक सौ वर्ष हुए।

तीसरा प्रायश्चित – राना उदयपुर ने किया जिसने ईरान के राजा नौशेरवां पारसी की कन्या से, जो कि कुस्तुन्तुनिया के राजा सारस की दोहती (दुहित्री) थी, उस से विवाह किया जिसे 13 सौ वर्ष हुए हैं।

चौथा प्रायश्चित – लाहौर के पण्डितों ने राजा सुखपाल का कराया जिसको आठ सौ वर्ष हुए हैं।

पाँचवां प्रायश्चित – मरदाना मुसलमान का बाबा नानक जी ने कराया जिस को चार पाँच सौ वर्ष हुए और उस के शव को खुर्जा में अग्नि में जलाया।

छठा प्रायश्चित – पण्डित बीरबल और राजा टोडरमल ने अकबर बादशाह का कराया, और उसका नाम महाबलि रखा। गायत्री सिखाई, पढ़ाई, यज्ञोपवीत पहनाया और हिन्दु बनाया। गोवध निषेध और मांसाहार से घृणा हो गई। उसने दाड़ी के साथ इसलाम को सलाम कर दिया। फुट नोट : वर्तमान इतिहासकारों ने अकबर का हिन्दु होना कहीं नहीं माना – अनुवादक|]आज्ञा दी कि जो हिन्दू भूल से, अज्ञान से, प्रेमपाश में बन्ध कर अथवा लोभ से मुसलमान हो गया हो।यदि वह अपने हिन्दु धर्म में आना चाहता हो तो वह स्वतन्त्र है। उसे मत रोको। यदि कोई हिन्दु स्त्री किसी मुसलमान के फन्दे में मुसलमान होना चाहे तो उसे कदापि मुसलमानी न बनने दिया जाए। प्रत्युत सम्बन्धियों को सौंपी जाए। विस्तार से देखो।(दबिस्ताने मजाहिब पृ.334, 338 शिक्षादश नवल किशोर)

सातवाँ प्रायश्चित – गुरु गोविन्द सिंह जी ने कराया। अत्याचारी औरंगजेब के समय में उन्होंने समस्त मजहबियों को सिंह बना कर वैदिक धर्म में सम्मिलित किया। इस के अतिरिक्त उन के दो सिख एक बार मुसलमानों नें पकड़ कर बलात् मुसलमान कर दिये थे। जब समय पाकर वह उन के पास आए तो उन को पुनः हिन्दु बना लिया। सिंह बनाया और धर्म में मिलाया।

आठवाँ प्रायश्चित -प्रतापमल ज्ञानी ने कराया। यह कार्य भी औरंगजेब बादशाह के समय में हुआ। जबकि एक हिन्दु लड़का मुसलमान हो गया था। उस को शुद्ध कर के वैदिक धर्म में मिलाया।(देखो दबिस्तान मजाहिब शिक्षा 10 पृ.239 सन् 1296 हिजरी नवल किशोर)

नवाँ प्रायश्चित – महाराजा रणजीत सिंह ने कराया। अपने और अपने कई सरदारों के लिए मुसलमानों की लड़कियां लीऔर उनको हिन्दु बनाया।

दसवाँ प्रायश्चित – महाराजा रणवीर सिंह जम्मू कश्मीर ने किया जब कि तीन राजपूत सिपाही लद्दाख में मुसलमान हो गए थे | बड़ी प्रसन्नता पूर्वक तीनों को पुनः हिन्दु धर्म में सम्मिलित किया। जम्मू के विद्वान पण्डितों ने रणवीर प्रकाश एक ग्रन्थ बनाया, जिस की दृष्टि से चालीस पचास वर्ष से मुसलमान हुए लोगों को हिन्दुधर्म में सम्मिलित किया जा सकता है। काशी के पण्डितों ने भी इस से सहमति प्रकट की और व्यवस्था दी। एक बहुत बड़ी पुस्तक प्रत्येक सभा को जम्मु से बिना मूल्य मिल सकती है।

ग्यारहवाँ प्रायश्चित – श्रीमान् स्वामी दयानन्द जी महाराज ने कराया अर्थात काजी मुहम्मद उमर साहिब सहारनपुर निवासी को मुसलमान से आर्य बनाया और वैदिक धर्म पर चलाया।वह अब देहरादून में ठेकेदार है। जिनका नाम अलखधारी है, और वह देहरादून समाज के सदस्य हैं।

बारहवाँ प्रायश्चित – स्वामी जी के परलोक गमन के पश्चात श्रीमती परोपकारिणी सभा ने कराया अर्थात श्री अबदुल अजीज साहिब को जो पंजाब यूनिवर्सिटी की मौलवी कालिज की डिग्री प्राप्त कर चुके हैं और जो अब गुरदासपुर (पंजाब) में असिस्टैंट कमिश्नर हैं [फुट नोट -‍ यह घटना आर्य पथिक की अपने काल की है – अनुवादक] शुद्ध किया और आर्य बनाया जिन का शुभ नाम अब राय बहादुर हरदस राम जी है।

तेरहवाँ प्रायश्चित – सन्त ज्वाला सिंह जी ने कराया जिन्होंने न्यूनातिन्यून चालीस मुसलमानों को वैदिक धर्म में लाकर शुद्ध किया।

चौदहवाँ प्रायश्चित – 14 वर्ष हुए श्री रामजी दास ईसाई ने सात लड़कों को ईसाई बनाया था। कसूर के पण्डितों और महात्मा लोगों ने उनको शुद्ध किया। ब वे लड़के अच्छे 2 पदों पर हैं।

पन्द्रहवाँ प्रायश्चित – आर्य समाज के सदस्यों ने किया अर्थात राजपुताना, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्तादि में न्यूनातिन्यून दो सहस्त्र मुसलमानों, ईसाईयों और जैनियों को शुद्ध करके वैदिक धर्म में लाकर आर्य बनाया। सन्ध्या, गायत्री सिखा कर प्रायश्चित्त कराया। गौ ब्राह्मण का हितैषी बनाया। अन्धकार से निकलवाया। क्योंकि यह संख्या प्रतिदिन उन्नति पर है। अतः ठीक संख्या बताना कठिन है।

प्रिय भाईयो ! इस विनम्र प्रार्थना को पढ़ कर पांच मिनिट तक हृदय में विचार करो कि यदि आप इसी प्रकार बेसुध रहे तो आप की क्या अवस्था होगी।

आठ सौ वर्ष के अन्दर आप 24 करोड़् से न्यून होते होते 20 करोड़ रह गए।आप गणित विद्या जानते हैं।अरब अ मुतनासिब को कार्य में लाएं :-
प्रश्न
चार करोड़ हिन्दु आठ सौ वर्षों में मुसलमान हो गए तो 20 करोड़ कितने वर्षों में होंगे ?
उत्त
800 वर्ष * 20 करोड़्/ 4 करोड़ = उत्तर 4000 वर्ष में .भाइयो ! अवश्य सम्भलो। आँखें खोल कर देख लो। कुम्भकरण की निद्रा मत सोवो। धर्म नष्ट हो रहा है।

लोग वेद के धर्म को नष्ट कर रहे हैं।लोभ, लालच, धोखे में फंसा कर तुम्हारे बच्चों को म्लेच्छ बना रहे हैं। यदि आप इसी प्रकार सोते रहे।करवट न बदली तो 4000 वर्ष के पश्चात एक भी वैदिक धर्म का अनुयायी न रहेगा .सब म्लेच्छ हो जाएंगे। केवल यही एक नदी आप के धार्मिक भवन को गिराने वाली नहीं है .एक और नद भी अभी जारी हुआ है। उसका नाम ईसाई धर्म है।

दो सौ वर्ष का समय हुआ कि ईसाई पादरियों ने यहां आकर इंजील सुनानी शुरू की। उस समय इस देश में एक भी ईसाई न था। तुम्हारे बहुत से अकाल पीड़ित लोगों को मद्रास और अन्य भिन्न भागों में इन पादरियों ने लोभ देकर ईसाई बना लिया। सामायिक जन गणना से ज्ञात हुआ कि इस समय इसाई बीस लाख हैं।

क्या कभी आपने सोचा कि इस समय तक कितने ईसाई हो चुके हैं ? भाईयो ! परमेश्वर के लिये आँखें खोलो। नींद से जागो।मुख प्रक्षालन करके स्नान करो। अपनी अवस्था सम्भालो। तुम्हारे धर्मरूपी पेड़ को दोनों ओर से दीमक लग रही है। अपने आप को बचा लो। अन्यथा तुम्हारा ठिकाना न मिलेगा। चिह्न तक न रहेगा।

मद्रास आज कल सौभाग्यशाली है। जहां सैंकड़ों घरों ने, जो अकाल के कारण ईसाई हो गये थे, ईसाई धर्म छोड़ दिया है। ब्राह्मणों ने न सहस्त्र व्यक्तियों को वैदिक धर्म में मिला लिया है। ईसाई रो रहे हैं। कुछ बस नहीं चलता। तुम्हें भी चाहिए। दया करो। कृपा करो। अपने भोले भाले बेसमझ बच्चों का जीवन व्यर्थ न गंवाओ। जो शरण आये उसे ठीक कर लो। प्रायश्चित करा के शास्त्रोक्त रीति से शंकर स्वामी की भाँति, बाबा नानक की भाँति, चाणक्य ऋषि की भाँति, महाराजा रणवीर सिंह की भाँति मिला लो। अन्यथा स्मरण रखो कि मुसलमान और ईसाई रह करके वे जितनी हत्यायें करेंगे, उन सब का पाप तुम्हारे गले पर होगा। परोपकारी बनो। जगत् का भला करो। पिछड़े हुए भाईयों को प्रायश्चित से शुद्ध करके मिलाओ।

सन्दर्भ ग्रन्थ- कुलयात आर्य मुसाफिर

प्राप्तिकर्ता-Agnikart.com

पंडित जी का संक्षिप्त जीवन चरित इस लिंक से पढ़ सकते हैं-

https://agniveerfan.wordpress.com/2011/07/11/lekhram/

स्वामी श्रद्धानंद जी की अमर लेखनी से लिखा गया पंडित लेखराम जी का जीवन चरित आर्य पथिक लेखराम इस लिंक से पढ़े

http://vedickranti.in/books-details.php?action=view&book_id=88

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Posted on March 6, 2013, in History. Bookmark the permalink. 1 Comment.

  1. अपने इतिहास का प्रामाणिक लेखा जोखा पढ़कर मन को बड़ी प्रसन्नता हुई.
    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी.
    धन्यवाद

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