ऋषि की ऐतिहासिक दूरदर्शिता


the aryan invasion theory a myth
श्री रघुवीर सिंह जी शास्त्री
महर्षि दयानन्द विद्वत्ता तथा अखण्ड ब्रह्मचर्य के दो महान् शस्त्रों से सुसज्जित होकर कार्यक्षेत्र में उतरे और शतियों से अवनति के गर्त में गिरे एवं जर्जरित समाज के उद्धार में लग गए। उन्होंने इस समाज के प्रत्येक रोग का ठीक निदान किया तथा उसके मूल पर कुठाराघात किया। इस दीर्घकालीन दैन्यावस्था मे यद्यपि समय-समय पर अनेक सुधारक महात्मा उत्पन्न हुए, परन्तु वे इसके पुराने रोगों की जड़ न पकड़ सके। ऋषि दयानन्द ही पहले ऐसे महापुरुष जन्में जिन्होंने इसकी सारी व्याधियों, त्रुटियों अथवा दुर्बलताओं का यथार्थ तथा स्थायी प्रतिकार प्रस्तुत किया।
 यहाँ मैं केवल राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में ऋषि की देन की ओर संकेत करना चाहता हूँ। लगातार कई सौ वर्ष तक विदेशियों का प्रभुत्व रहने के कारण भारतवासी दासता के गाढे़ रंग में रंगे जा चुके थे। अशिक्षित लोगों की बात छोड़िए, शिक्षित वर्ग के मस्तिष्क और हृदय दोनों पर भी दासता के संस्कार इतनी गहरी छाप लगा रहे थे कि उनमें अपनी कोई सूझ-बूझ न रह गयी थी। अपनी संस्कृति तथा साहित्य से उनका सम्बन्ध सर्वथा टूट चुका था, अतः विदेशियों द्वारा प्रचलित धारणाओं से ऊपर उठने की क्षमता उनमें न रह गयी थी।
इधर मुसलमानों के पश्चात् आने वाले विदेशी अंग्रेज प्रभु बडे़ ही कूटनीतिक तथा व्यापारिक बुद्धि वाले थे। उन्होंने भांप लिया कि कदाचित् कालान्तर में भारतवासियों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि अंग्रेज विदेशी हैं और हमारी जन्मभूमि का शोषण कर रहे हैं इसलिए अंग्रेज शिक्षाशास्त्रियों तथा इतिहासकारों ने पहले ही सावधानी कर ली और एक विचारधारा ऐतिहासिक सत्य के नाम पर फैलायी कि आर्य लोग भी इस देश के आदिवासी नहीं हैं, ये भी हमारी ही भांति विदेशी आक्रान्ता तथा शोषक हैं। आर्यों ने भी ईरान से चल इस भूखण्ड पर हमला किया और यहां की द्रविड़, सन्थाल आदि जातियों को मारपीट कर दक्षिण की ओर धकेल दिया। यहीं तक नहीं, उन्हें सामाजिक दृष्टि से सदा के लिए पतित, नीच, राक्षस आदि की संज्ञाएं देकर घृणित जीवन बिताने के लिए विवश कर दिया। क्रान्तदर्शी दयानन्द भारत की राष्ट्रियता पर इस निर्मम प्रहार को देखकर तिलमिला उठे।
उन्होंने विदेशियों की इस कूटनीति के दूरगामी दुष्परिणामों को भांप लिया और देशवासियों में सच्ची राष्ट्रियता के जगाने के लिए बडे़ ही विश्वासपूर्ण शब्दों में घोषणा की- आर्यावर्त इस देश का नाम इसलिए है कि सबसे पहले आर्यों ने ही इसे बसाया था और इससे पहले इस देश का कोई अन्य नाम नहीं था। कितना बड़ा ऐतिहासिक सत्य है। और उसे सिद्ध करने के लिए तर्क भी कितना अकाट्य उपस्थित किया कि आर्यावर्त से पहले इस देश का कोई अन्य नाम नहीं था। सचमुच बात बिलकुल सीधी-सादी है, यदि आर्यों से पहले इस देश में कोई अन्य जातियां बसती थीं तो इस देश का कोई नाम तो होना चाहिए था।
आज हमारे देश के जो नाम प्रचलित हैं उनमें से आर्यावर्त सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक नाम है। भारतवर्ष राजनीतिक नाम है जो कुरुवंश के एक राजा भरत के नाम पर पड़ा। यहां यह ऐतिहासिक तथ्य भी ध्यान में रखना चाहिए कि ‘भारतवर्ष’ की सीमा ‘आर्यावर्त्त’ के क्षेत्र से कहीं अधिक विस्तृत थी। तीसरा नाम ‘हिन्दुस्तान’ है। यह नाम विदेशियों ने रखा है। संस्कृत साहित्य में कहीं भी हमारा नाम हिन्दू नहीं मिलता, इसलिए देश का नाम हिन्दुस्तान होने का तो कोई प्रसंग ही नहीं। खेद है कि ऋषि के आगमन से पहले हम अपने लिए ये दोनों विदेशी नामकरण इस प्रकार स्वीकार कर चुके थे कि मानो सदा से हमारे ये ही नाम हैं। किसी को यह ध्यान रहा होगा कि हमारा वास्तविक नाम आर्य तथा हमारे देश का नाम आर्यावर्त है, यह नहीं कहा जा सकता। मुसलमान शासकों ने हिन्दुस्तान तथा अंग्रेजों ने इण्डिया हमारे देश का नाम रखा और हम इन्हीं दोनों नामों का साभिमान प्रयोग करते हैं। हमारी मस्तिष्क गत दासता ने हमें कितनी दयनीय दशा में धकेल दिया है!
आश्चर्य तो उन ऐतिहासिकों पर है जो यह समाद्दान करते हैं कि क्योंकि अफगानिस्तान तथा मध्य एशिया की भाषा में हमारी भाषा के ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है, जैसे सप्ताह के स्थान में हप्ताह आदि उच्चारण होते हैं। इसीलिए जब उधर से आक्रान्ता हमारी सीमाओं में घुसे तब उन्हें सबसे पहले सिन्धु नदी मिली और उसके तट पर बसने वालों को भी उन्होंने सिन्धु अर्थात हिन्दू ही कहकर पुकारा और उनके देश को हिन्दुस्तान कहने लगे। परन्तु उन ऐतिहासिकों के पास इस प्रश्न का क्या उत्तर है कि सिन्धु नदी तो आज तक सिन्धु ही कहलाती है, उसके स को ह नहीं हुआ। उसका प्रदेश भी आज तक सिन्धु कहलाता है, उसका ‘स’ भी ज्यों का त्यों बना है तो फिर हजारों मील आगे चल कर गंगा, ब्रह्मपुत्र अथवा नर्मदा, कावेरी के किनारे बसने वाले लोगों का नाम हिन्दू अथवा इन प्रदेशों का नाम कैसे हिंदुस्तान को गया।
यहाँ मानना पडे़गा कि ऋषि दयानन्द की खोज ही यथार्थ है। जब वे कहते हैं कि विदेशी भाषा में हिन्दू शब्द काफिर, पतित लोगों के लिए प्रयुक्त होता था, इसीलिए विदेशियों ने हमारा यह घृणास्पद नाम रखा जिसे हम बडे़ गर्व के साथ आत्मसात् किए बैठे हैं। विदेशियों द्वारा दिए गए इस प्रकार के एक अपमानजनक शब्द को किसी जाति ने यदि स्वीकार किया है तो वे हम भारतवासी ही हैं जो अपनी प्राचीनता का भी दम साथ ही भरते हैं।
यद्यपि अंग्रेज तथा उनका साम्राज्य यहां से चला गया, परन्तु उनका यह षड्यंत्र आज भी हमारे राष्ट्र के शरीर को क्षत-विक्षत कर रहा है। दक्षिण के बहुसंख्यक लोग अपने को आर्येतर मानकर हमारे शत्रु हो गए हैं। वे आर्यों को आक्रान्ता, शोषक तथा अत्याचारी मानने लगे हैं, साथ ही प्राचीन वैदिक साहित्य को भी ला×िछत कर रहे हैं। इधर भी अछूत कही जाने वाली जातियों में इसी प्रकार की भावना राजनीतिक-स्वार्थी भरने में लगे हैं। दक्षिण बिहार, उड़ीसा, मध्य-प्रदेश तथा आसाम के जंगलों में रहने वाली जातियों के लिए आदिवासी शब्द का सरकारी स्तर पर प्रयोग हो रहा है, जिसका सीधा अर्थ यही है अन्य सब लोग पीछे आने वाले विदेशी हैं। इस प्रकार राष्ट्र में वैमनस्य तथा बंटवारे के घृणित बीज अंकुरित हो रहे हैं। भारत-भूमि के खण्ड-खण्ड होने का खतरा मुंह बाए खड़ा दीख रहा है।
ऋषि की दूरदर्शी प्रतिभा ने यह खतरा पहले ही देख लिया था और इसीलिए इस भ्रमपूर्ण ऐतिहासिक दुरभिसन्द्दि का उन्होंने भंडाफोड़ किया। उन्होंने समझ लिया था कि जब तक प्रत्येक भारतवासी में यह भावना जाग्रत न होगी कि यह देश आदिकाल से हमारे पूर्वजों की क्रीड़ा-स्थली रहा है— ये वही सिन्धु, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र आदि हैं जो सदा से इसी प्रकार इस भारत भूमि को सस्यश्यामला बनाने में लगी हैं, तब तक सच्ची राष्ट्रियता या देशाभिमान पैदा नहीं हो सकता। जब देश के प्रति ही ममता बुद्धि नहीं तो फिर अभिमान की क्या चर्चा?
ऋषि देश को एक, अखंड तथा स्वतंत्र देखने की अदम्य साधना मन में लेकर चल रहे थे और इसीलिए उन्होंने जहाँ सारे देश के लिए एक भाषा, एक वेश, एक द्दर्म, एक देव, एक ग्रन्थ का विचार प्रस्तुत किया, वहीं एक जाति, एक उद्गम, एक नस्ल, एक ही संस्कृति का सिद्धांत स्थापित किया। यही कारण था कि उन्होंने जाति का पुराना नाम आर्य तथा देश का पुराना नाम आर्यावर्त प्रचलित करने का यत्न किया।
खेद है कि ऋषि द्वारा उद्घाटित यह ऐतिहासिक सत्य अभी तक पूरी तरह स्वीकार नहीं हो सका है और आज भी इतिहास के नाम पर दूषित भावनाएं हमारी सन्तति में भरी जा रही हैं। आर्य विद्वानों का कर्त्तव्य है कि वे इस ऋषिसम्मत मन्तव्य को स्वीकार कराने के लिए और अधिक अनुसंधान तथा परिश्रम करें। उससे जहाँ वे ऋषि ऋण से अनृण होंगे, वहीं अपने राष्ट्र की एक ठोस सेवा करने का श्रेय प्राप्त कर सकेंगे।
(गंगाप्रसाद उपाध्याय अभिनन्दन ग्रंथ)

साभार

शान्तिधर्मी मासिक हिंदी पत्रिका

संपादक- सहदेव समर्पित जी

756/3

आदर्श नगर पटियाला चौक

जींद हरियाणा 126102

चलभाष- 09416253826

(नोट-वैदिक सिद्धान्तों के विषय में जानने के लिए सर्व श्रेष्ठ पारिवारिक पत्रिका। वार्षिक शुल्क केवल 100/-

सभी पाठकों को इस उत्तम पत्रिका की इसकी सदस्यता ग्रहण करने का विशेष आग्रह हैं- डॉ विवेक आर्य )

Advertisements

About Fan of Agniveer

I am a fan of Agniveer

Posted on March 15, 2013, in Swami Dayanand. Bookmark the permalink. 3 Comments.

  1. bahut sunder aur sarvatha satya . aur hum naara lagate hain- GARV SE KAHO HUM HINDU HAIN.

  2. I am unable to understand why veer Savarkar in spite of being an admirer of Swami Dayanand and who called the latter as Nation-guide ferociously defended the term “HiNDU” and called this country as “HINDUSTAN’ . He wrote even a book called Hindutwa. I am unable to understand why the meaning given by Swami Dayanand to the term Hindu was not acknowledged by him. While he defended Satyarth Prakash, he differed with Dayanand on this issue. Following his obsession to the term Hindu, his followers and later RSS men have become the greatest defenders of this derogatory term. This is perplexing.

  3. shastri ji ne swami dyanand ke rashtr chintan pr sankshep me prakash dala hai. isse hmw yh samajh aa sakta hai ki kyon yogi arvindo ghash ne swamiji ko parvaton ruupi mhapurushon me sab se unchi choti kha tha. dhanyvad. keep it up!

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: