अमर बलिदानी मास्टर सूर्यसेन


surya sen
आज प्रसिद्द क्रन्तिकारी अमर बलिदानी एवं अंग्रेजों को हिला कर रख देने वाले चटगाँव शस्त्रागार काण्ड के मुख्य शिल्पी मास्टर सूर्यसेन का जन्मदिवस है। (वर्तमान में बंगलादेश का जनपद) के नोआपारा में २२ मार्च १८९४ को जन्में सूर्यसेन व्यवसाय से एक शिक्षक थे और अपने विद्यार्थी जीवन में ही अनुशीलन समेत एवं युगांतर जैसे क्रांतिकारी संगठनों के संपर्क में आ चुके थे एवं उनके सक्रिय सदस्य थे| अपने विद्यार्थियों में मास्टर दा नाम से विख्यात सूर्यसेन ने विद्यार्थियों में उग्र राष्ट्रवाद की भावना को बलवती किया और उन्हें गुरिल्ला पद्धति से लड़ने को प्रशिक्षित किया क्योंकि वो समझते थे कि कम संसाधनों के चलते शक्तिशाली अंग्रेजी सरकार से आमने सामने की लड़ाई करना असंभव है| उनका पहला बड़ा सफल अभियान २३ दिसंबर १९२३ को चिटगांव में बंगाल आसाम रेलवे के ट्रेजरी आफिस में दिन दहाड़े डाका था| उनका सबसे बड़ा क्रांतिकारी अभियान था–१८ अप्रैल १९३० को चिटगांव शस्त्रागार पर हमला जिसने अंग्रेजी सरकार को हिला कर रख दिया और जिसने मास्टर सूर्यसेन का नाम सदा के लिए इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज कर दिया| इस हमले के बाद सूर्यसेन अनेकों प्रकार के वेश बना कर अपने को सरकार से बचाते रहे पर १६ फरवरी १९३३ को नेत्र सेन नामक व्यक्ति, जिसके यहाँ सूर्यसेन छिपे हुए थे, द्वारा दस हजार रूपये के इनाम के लालच में विश्वासघात किये जाने के कारण वे पकडे गये| नेत्र सेन भी इस इनाम के लेने से पहले ही सूर्यसेन के किसी साथी द्वारा नरक पहुंचा दिया गया और उसकी पत्नी ने, जिसके सामने ही नेत्र सेन को मारा गया था, अपने विश्वासघाती पति के हत्यारे की पहचान करने से इनकार करते हुए कहा कि ऐसे गद्दार की सधवा होने से अच्छा है विधवा होना| युगांतर दल के चटगाँव जनपद के नए प्रमुख तारकेश्वर दत्त ने सूर्यसेन को छुड़ाने के लिए जेल पर हमले कि योजना बनायीं पर वह सफल न हो सकी और तारकेश्वर दत्त, कल्पना दत्त एवं अन्य कई क्रांतिकारी पकडे गए और सब पर मुक़दमे चलाये गए| फांसी देने के पहले मास्टर सूर्यसेन पर भीषण अत्याचार किये गए| हथोडों के प्रहार से उनके सभी दांत, सभी जोड़ और हाथ-पैर तोड़ दिए गये और सारे नाखून उखाड़ दिए गए| रस्सी से बांध कर उन्हें मीलों घसीटा गया और 12 जनवरी 1934 को कुल 39 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी दे दी गयी। अंग्रेजी सरकार मास्टर दा से इतनी नफरत करती थी कि उनके शव को परिजनों को ना देकर बंगाल कि खाड़ी में फेंक दिया गया|
इस महान हुतात्मा की स्मृति में भारत सरकार ने १९७७ में और बंगलादेश सरकार ने १९९९ में डाक टिकट जारी किये| चिटगांव जेल के जिस स्थान पर सूर्यसेन को फांसी दी गयी थी, बंगलादेश सरकार ने उसे उनके स्मृति स्थान के रूप में समर्पित कर उनकी याद को सहेजने का प्रयास किया है| कोलकाता मेट्रो का एक स्टेशन भी उनके नाम पर है| कल्पना दत्त जो बाद में कल्पना जोशी हुयी की बहू मानिनी डे ने इस महान बलिदानी पर ‘डू ऑर डाई’ नामक पुस्तक की रचना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी है जिस पर अभी हाल ही में ‘खेले हम जी जान से’ नामक फिल्म का भी निर्माण किया गया था| हालिया प्रदर्शित चिटगांव नामक फिल्म में भी मास्टर सूर्यसेन की बहादुरी को बखूबी उकेरा गया था। इस महान क्रांतिकारी, हुतात्मा और अमर बलिदानी को उनके जन्मदिवस पर कोटि कोटि नमन एवं श्रद्दांजलि
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Posted on March 22, 2013, in Legends. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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