हिन्दू समाज की दुर्दशा


shani

आज शनिवार हैं। सुबह सुबह हिन्दू समाज के सदस्यों को मैंने आज शनि भगवान के मंदिर में जाते हुए देखा। मन में उत्सुकता हुई की यह शनि भगवान कौन हैं और ये लोग शनि मंदिर क्यूँ जा रहे हैं।

पूछने पर मुझे एक भले मानस से उत्तर मिला की शनि भगवान के क्रोध से बचने के लिए, उनके प्रकोप से बचने के लिए वे व्यक्ति शनि मंदिर जा रहे थे।

मैंने उनसे पूछा की शनि मंदिर में जाकर आप क्या करते हैं?

वे बोले की भक्त गन शनि भगवान की मूर्ति पर तेल चढ़ाते हैं और पैसे चढ़ाते हैं। इससे शनि भगवान का क्रोध शांत हो जाता हैं और हम उनके प्रकोप से बच जाते हैं।

मैंने उनसे पूछा अच्छा एक बात तो बताये की क्या भगवान क्रोध करते हैं और अगर करते भी हैं तो क्यूँ करते हैं?

वे सज्जन कुछ पल के लिए चुप से हो गए और अटकते हुए बोले की हम जो भी गलत कार्य करते हैं , भगवान् उसका हमें दंड देते हैं। उस दंड से बचने के लिए हम भगवान् की भक्ति करते हैं। भक्ति तो किसी भी रूप में हो सकती हैं। हम तेल से उनकी भक्ति करते हैं।

मैंने उनसे पूछा की यह कैसे भगवान हैं जो थोड़े से तेल और कुछ पैसो में ही भक्तों के पाप क्षमा कर देते हैं।

बड़ा बढ़िया तरीका हैं पूरे सप्ताह जमकर पाप करो और शनिवार को कुछ ग्राम तेल शनि मंदिर में आकर अर्पित कर दो

काम बन जायेगा।

वे सज्जन नमस्ते कर आगे बढ़ गए।

मैं अपने मन में ईश्वर के गुण, कर्म और स्वाभाव पर विचार करता रहा की वेदों में ईश्वर को दयालु एवं न्यायकारी कहा गया हैं।

ईश्वर दयालु इसलिए हैं की वो हर उस व्यक्ति को उसके द्वारा किये गए पाप कर्म का दंड अवश्य देते हैं जिससे वह व्यक्ति आगे उस पाप कर्म को न करे। इसे दयालुता ही तो कहेगे नहीं तो अगर पापी व्यक्ति को दंड ना मिले तो दिन प्रतिदिन बड़े से बड़ा पाप करने में वह सलंग्न रहेगा, जिससे की सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। और न्यायकारी इसलिए कहा गया हैं की किसी को भी उतना ही दंड मिलता हैं जितने उसने पाप किया हैं। न कम न ज्यादा।

आज कुछ अज्ञानियों ने ईश्वर की न्याय व्यवस्था को न समझ कर शनि की मूर्ति पर तेल चढ़ाने से पापों का क्षमा होना प्रचारित कर दिया हैं।

यह न केवल ईश्वर की कर्म फल व्यवस्था का अपमान हैं अपितु अपने आपको भी मुर्खता के घोर अंधकार में रखने के समान हैं।

तेल चढ़ाने से न तो कोई पाप कर्म क्षमा होता हैं और न ही पापों में सलिप्त होने से मनुष्य बच पाता हैं।

इसे हिन्दू समाज की दुर्दशा ही तो कहना चाहिए की वेदों की पवित्र शिक्षा को त्यागकर हिन्दू लोग इधर उधर धक्के खा रहे हैं।

पाठक अपनी तर्क शील बुद्धि का प्रयोग कर स्वयं निर्णय करे की वे सत्य का वरण करना चाहेंगे अथवा असत्य का वरण करना चाहेंगे।

डॉ विवेक आर्य

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Posted on April 6, 2013, in we condemn superstitions. Bookmark the permalink. 2 Comments.

  1. आदरणीय डाक्टर साहब इश्वर आपको दीर्घायु दे तथा स्वस्थ रखे बहुत बदिया

  2. विवेकजी जब आप का पैर किसी को लग जाता है या कोई गलती होती है तो आप क्या करते हैं आप उस व्यक्ति को सॉरी बोलते हैं या ऐसा सोचते हैं कि गलती तो हो चुकी अब तो सजा मिलनी ही है तो फिर सॉरी बोलकर क्या करना. सामने वाला मारना है तो मार लेगा डांटना है तो डांट लेगा या फिर क्या वह इतनी सी बात के लिए कोर्ट का सहारा लेगा जहाँ कोई केस बनता ही नहीं है. जनाब क्षमा मांगना और क्षमा करना भारतीय परम्परा का अब्भिन्न अंग है. जैन समाज में तो इसे क्षमावनी पर्व के रूप में मनाया जाता है. इसका अर्थ यह नहीं कि जैन समाज या दुनिया में सारे व्यक्ति जो क्षमा मांगते हैं बात बात पर सॉरी कहते हैं वो पाप करने में यकीं रखते हैं. अपितु वह इस तथ्य को जानते हैं कि इस संसार में इन्सान से कदम कदम पर जाने अनजाने गलतियाँ होती रहती हैं हमारे न चाहते हुए भी दूसरों का दिल दुःख जाता है अतः यह जीवन जीने का ढंग होता है कि इन्सान विनम्र होकर जीता है. वह पाप तो अन्थ्करण से नहीं करना चाहता पर फिर भी अनजाने में हुयी गलतियों के लिए पग पग पर क्षमा प्रार्थना को जीवन का हिस्सा बना लेता है. इसका अर्थ यह नहीं होता कि क्षमा मांगने वाला यह मानता है कि मैं दुनिया का सबसे बड़ा अपराध करके भी क्षमा मांगकर छुट जाऊंगा. दुनिया के जितने भी महापुरुष हुए हैं विनम्रता उनके जीवन का अभिन्न अंग रही है और क्षमा प्रार्थना विनम्रता का. अगर अभी भी आप नहीं समझे तो मैं विस्तार में समझाता हूँ. अगर आप के हिसाब से चलें तो दुनिया से क्षमा शब्द ही निकाल दिया जाना चाहिए. क्या आप ऐसा कोई रिश्ता बता सकते हैं जहाँ किसी से कोई छोटी मोटी गलती नहीं हुई हो और सॉरी नहीं कहना पड़ा हो चाहे वह पति पत्नी का हो या अन्य. और दुसरे पक्ष ने क्षमा न किया हो. क्या व्यक्ति को रिश्ते बनाये रखने के लिए क्षमा प्रार्थना नहीं करना चाहिए. क्या अपराधी को इस तथ्य को जानते हुए भी कि सज्जा मिलेगी दिल में प्रायश्चित की भावना नहीं रखना चाहिए. मानता हूँ हर अपराध क्षमा यौग्य नहीं होता किन्तु हर छोटी मोटी गलती दंडनीय भी नहीं होती. अब मैं बताता हूँ कि मंदिर जाकर प्रार्थना का क्या अर्थ है. जब व्यक्ति को अहसास होता है कि उससे कोई गलती हुई है या उसे पता नहीं क्या हुई है अतीत में आ पिछले जनम में और उसका नतीजा वह भुगत रहा होता है तो सीधी सी बात है वह जिसकी गलती हुई है या वह जो दंडाधिकारी है (यहाँ शनि देव) उनके पास जाकर क्षमा याचना करना है. अगर उसका पूर्ण अपराध क्षमा नहीं भी हुआ तो क्या उसकी प्रायश्चित की भावना का क्या कोई मूल्य नहीं है क्षमा मांगना प्रायश्चित का एक अंग है क्षमा निरंतर मांगते मांगते पाप अगर ख़त्म नहीं तो हल्का अवश्य हो जाता है. कोर्ट में भी इस बात को देखा जाता है कि अपराध प्रथम बार हुआ है या व्यक्ति आदतन अपराधी है अर्थात उसकी मानसिकता क्या है. इतना बेवकूफ तो सामान्य व्यक्ति भी नहीं होता कि कोई हर बार गलती करे और हर बार वह क्षमा करे तो क्या शनिदेव व्यक्ति की भावना नहीं देखेंगे क्या वह तेल का वजन देखकर किसी को क्षमा कर देंगे. ऐसे तो ज्यादा बडे अपराध के लिए व्यक्ति को ज्यादा तेल चडाने का विधान होता. विवेक जी हर जगह भौतिक क्रियाकलाप का ही मह नहीं होता भावनाओं का भी होता है. खासकर जब भगवान की बात आती है तो स्वयं भगवान ने कहा है मैं भावनाओ के वश में हूँ. अतः भौतिक क्रियाओं के साथ भावना और भावना के साथ क्रियाओं का भी होना बहुत जरूरी है. आशा करता हूँ जो जवाब आपको आप के मित्र नहीं दे पाए यहाँ मिल गया होगा और आप मंदिर जाकर तेल चडाने या अन्य पूजाओं का महत्त्व समझ गए होंगे.

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