असमर्थ को समर्थ बनाना ही सही नजरिए से दान करना है


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निर्मल जैन

सेठजी हमेशा की तरह एक घंटे की पूजा की समाप्ति के बाद मंदिर के बाहर आए। चाल में अमीरों वाला रौबीलापन और चेहरे पर दानकर्ता होने का गर्व। जैसे साक्षात भगवान लोगों का दु:ख दूर करने उतर आए हों। मंदिर के बाहर भिखारियों की लंबी कतार लगी थी। सभी बड़ी आशा से सेठ जी की तरफ देख रहे थे। भिखारियों की उसी लंबी कतार में एक ऐसा भी आदमी खड़ा था जो भिखारी नहीं लगता लगता था।

उसकी आंखों में आत्मविश्वास और खुद्दारी झलक रही थी। सेठजी के साथ में कई पुश्तों से सभी धंधों का हिसाब-किताब रखते आए बूढ़े मुनीम भी थे। जो हाथ में पचास के नोटों की गड्डी लिए थे। बूढ़े मुनीम ने खड़े-खड़े हिसाब लगा लिया था कि कोई 100 भिखारी होंगे। उस हिसाब से सेठ जी 5000 रुपए तो हर हफ्ते बांट ही देते हैं। अत: उतने में काम हो जाएगा। मन ही मन हिसाब लगाकर मुनीम बहुत खुश हुआ।

हमेशा की तरह आगे-आगे सेठ जी भिखारियों तक बढ़ रहे थे। उनके साथ चल रहा मुनीम पचास की गड्डी में से एक-एक नोट सेठ जी को देता था। जिन्हें सेठ जी भिखारियों को बांटते जा रहे थे। सेठ जी भिखारियों की दुआओं से अभिभूत हुए जा रहे थे। फिर सेठ जी आंखों में आत्मविश्वास और खुद्दारी लिए उस आदमी के पास पहुंचे।

उसे पचास का नोट पकड़ाया तो उस आदमी ने हाथ पीछे करके जोड़ते हुए कहा- ‘सेठजी मुझे भीख नहीं चाहिए। मुझे कुछ रुपए उधार दे दें। बड़ी मेहरबानी होगी। सिर्फ 5000 रुपये से मेरा काम हो जाएगा। मुझ पर यह उपकार कर दीजिए।’ उधार का नाम सुनते ही सेठजी के चेहरे के भाव बदल गए थे। उनके चेहरे से धर्मात्मा और दानवीर होने का मुखौटा उतर चुका था।

अब वो पूरे सेठ लगने लगे थे।

बोले- ‘उधार चाहिए! कैसे देगा वापस?’ ‘मालिक, मेहनत करूंगा, साइकिल लूंगा, गांव से सब्जी लाकर यहां बेचूंगा।

अपना परिवार पालूंगा और कुछ ही महीनों में आपका पैसा भी लौटा दूंगा।’

सेठजी लगभग उसे दुत्कारते हुए आगे बढ़ गए। लेकिन मुनीम जी कुछ अटक गए थे। उनकी पारखी नजरों में उस युवक की आंखों में सच्चाई का हिसाब-किताब नजर आया।

सेठजी के साथ गाड़ी में बैठे तो बड़ी हिम्मत कर के बोले- ‘मालिक, दे देना था न उस गरीब को रुपया।’ ‘

पागल हो गए हो क्या मुनीम जी।

अगर वो भाग जाता और नहीं देता वापस तो?’

मुनीम ने बड़े धीरे से कहा- ‘पर मालिक, ऐसा आदमी लगता तो न था। और नहीं भी देता तो समझो की एक हफ्ता हमने दान नहीं किया या किसी एक ही भिखारी को दे दिया।

शायद कुछ उसका भला करके हमें पुण्य ही मिलता। बेचारा मेहनत करने की ही तो कहता था। ये मंदिर के बाहर के भिखारी तो सालों से बस आप जैसे सेठों के पैसे पे ऐश करते फिरते हैं, न काम न मेहनत। कभी आपने शाम के वक्त इन्हें देखा है। सब पास वाली ‘देसी कलाली’ के बाहर दिखाई देते हैं नशे में धुत्त। और रात को…….।’

सेठ जी को गुस्सा तो बहुत आया। कहने को बात सच थी।

बोले- ‘मुनीम जी, आप वाकई हिसाब में बहुत कच्चे हैं। इन्हीं गरीबों की दुआओं से तो हमारे पुण्यों का हिसाब बराबर होता है। अब यूं हर किसी की मदद करने लगे तो यहां मंदिर के बाहर लाइन कैसे लगेगी? हमें दुआएं कौन देगा?

5000 रुपये में हजारों दुआएं, वो भी हर हफ्ते।’

यह कथा सेठ जी की भावना को सामने रखती है। लेकिन दान करने वाला अगर प्रतिदान में असहायों की ही दुआ चाहता है तो उसका दान सफल नहीं कहा जा सकता। सेठ जी अगर उस मेहनत करने वाले इंसान की मदद करते तो उनका दान सफल हो जाता।

असमर्थ को समर्थ बनाना ही सही नजरिए से दान करना है।

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Posted on April 12, 2013, in daily gossips. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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