Category Archives: History

Myths and Facts about History

महर्षि दयानन्द और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम


ram

 

राम और कृष्ण मानवीय संस्कृति के आदर्श पुरुष हैं। कुछ बंधुओं के मन में अभी भी यह धारणा है कि महर्षि दयानन्द और उनके द्वारा स्थापित आर्यसमाज राम और कृष्ण को मान्यता नहीं देता है।
प्रत्येक आर्य अपनी दाहिनी भुजा ऊँची उठाकर साहसपूर्वक यह घोषणा करता है कि आर्यसमाज राम-कृष्ण को जितना जानता और मानता है, उतना संसार का कोई भी आस्तिक नहीं मानता। कुछ लोग जितना जानते हैं, उतना मानते नहीं और कुछ विवेकी-बंधु उन्हें भली प्रकार जानते भी हैं, उतना ही मानते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के संबंध में महर्षि दयानन्द ने लिखा है-
प्रश्न-रामेश्वर को रामचन्द्र ने स्थापित किया है। जो मूर्तिपूजा वेद-विरुद्ध होती तो रामचन्द्र मूर्ति स्थापना क्यों करते और वाल्मीकि जी रामायण में क्यों लिखते?
उत्तर- रामचन्द्र के समय में उस मन्दिर का नाम निशान भी न था किन्तु यह ठीक है कि दक्षिण देशस्थ ‘राम’ नामक राजा ने मंदिर बनवा, का नाम ‘रामेश्वर’ धर दिया है। जब रामचन्द्र सीताजी को ले हनुमान आदि के साथ लंका से चले, आकाश मार्ग में विमान पर बैठ अयोध्या को आते थे, तब सीताजी से कहा है कि-
अत्र पूर्वं महादेवः प्रसादमकरोद्विभुः।
सेतु बंध इति विख्यातम्।।
वा0 रा0, लंका काण्ड (देखिये- युद्ध काण्ड़, सर्ग 123, श्लोक 20-21)
‘हे सीते! तेरे वियोग से हम व्याकुल होकर घूमते थे और इसी स्थान में चातुर्मास किया था और परमेश्वर की उपासना-ध्यान भी करते थे। वही जो सर्वत्र विभु (व्यापक) देवों का देव महादेव परमात्मा है, उसकी कृपा से हमको सब सामग्री यहॉं प्राप्त हुई। और देख! यह सेतु हमने बांधकर लंका में आ के, उस रावण को मार, तुझको ले आये।’ इसके सिवाय वहॉं वाल्मीकि ने अन्य कुछ भी नहीं लिखा।
द्रष्टव्य- सत्यार्थ प्रकाश, एकादश समुल्लासः, पृष्ठ-303
इस प्रकार उक्त उदाहरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवान राम स्वयं परमात्मा के परमभक्त थे। उन्होंने ही यह सेतु बनवाया था। सेतु का परिमाप अर्थात् रामसेतु की लम्बाई- चौड़ाई को लेकर भारतीय धर्मशास्त्रों में दिए गए तथ्य इस प्रकार हैं-
दस योजनम् विस्तीर्णम् शतयोजन- मायतम्’ -वा0रा0 22/76
अर्थात् राम-सेतु 100 योजन लम्बा और 10 योजन चौड़ा था।
शास्त्रीय साक्ष्यों के अनुसार इस विस्तृत सेतु का निर्माण शिल्प कला विशेषज्ञ विश्वकर्मा के पुत्र नल ने पौष कृष्ण दशमी से चतुर्दशी तिथि तक मात्र पॉंच दिन में किया था। सेतु समुद्र का भौगोलिक विस्तार भारत स्थित धनुष्कोटि से लंका स्थित सुमेरू पर्वत तक है। महाबलशाली सेतु निर्माताओं द्वारा विशाल शिलाओं और पर्वतों को उखाड़कर यांत्रिक वाहनों द्वारा समुद्र तट तक ले जाने का शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध है। भगवान श्रीराम ने प्रवर्षण गिरि (किष्किंद्दा) से मार्गशीर्ष अष्टमी तिथि को उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र और अभिजीत मुहूर्त में लंका विजय के लिए प्रस्थान किया था।
महर्षि दयानन्द ने अपने ग्रंथों में राम, कृष्ण, शिवाजी, गुरु गोविन्दसिंह तथा वीर बघेलों (गुजरात) का गर्वपूर्वक उल्लेख किया है। इस प्रकार महर्षि दयानन्द के राम राजपुत्र, पारिवारिक मर्यादाओं को मानने वाले, ऋषि मुनियों के भक्त, परम आस्तिक तथा विपत्तियों में भी न घबराने वाले महापुरुष थे। श्रीराम की मान्यता थी कि विपत्तियॉं वीरों पर ही आती हैं और वे उन पर विजय प्राप्त करते हैं। वीर पुरुष विपत्तियों पर विपत्तियों के समान टूट पड़ते हैं और विजयी होते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् देश का यह दुर्भाग्य रहा कि पाश्चात्य शिक्षा, सभ्यता और संस्कारों से प्रभावित कुछ भारतीय नेताओं ने पोरस के हाथियों के समान भारतीय मानक, इतिहास और महापुरुषों के सम्बन्ध में विवेकहीनता धारण कर भ्रमित विचार प्रकट करने प्रारम्भ कर दिये। साम्यवादी विचारद्दारा से प्रभावित व्यक्तियों के अनुसार और ‘स्त्री एक सम्पत्ति है, इसमें आत्मतत्व विद्यमान नहीं है।’ ऐसे अपरिपक्व मानसिकता वाले तत्व यदि राम के अस्तित्व और महिमा के संबंध में नकारात्मक विचार रखें, तो उनके मानसिक दिवालियापन की बात ही कही जाएगी— किन्तु भारत में जन्मे, यहॉं की माटी में लोट-पोट कर बड़े हुए तथा बार-एट लॉ की प्रतिष्ठापूर्ण उपाधिधारी जब सन्तुष्टीकरण को आद्दार बनाकर ‘राम’ को मानने से ही इंकार कर दें, राम-रावण को मन के सतोगुण-तमोगुण का संघर्ष कहने लग जाएं तो हम किसे दोषी या अपराधी कहेंगे? अपनी समाधि पर ‘हे राम!’ लिखवाने वाले विश्ववंद्य गांधीजी ने राम के संबंध में ‘हरिजन’ के अंकों में लेख लिख कर कैसे विचार प्रकट किये, यह तो ‘हरिजन’ के पाठक ही जान सकते हैं। इस स्वतन्त्र राष्ट्रमें अपने आप्त महापुरुषों के अस्तित्त्व पर नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वालों की बुद्धि पर दया ही आती है और कहना पड़ता है- धियो यो नः प्रचोदयात्। महर्षि दयानन्द ने राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र राम के पौरुष तथा उनके गुणों का विचारणीय एवं महत्वपूर्ण वर्णन किया है। महर्षि दयानन्द ने राम को महामानव, ज्येष्ठ-श्रेष्ठ आत्मा, परमात्मा का परम भक्त, धीर-वीर पुरुष, विजय के पश्चात् भी विनम्रता आदि गुणों से विभूषित बताया है। महर्षि दयानन्द का राम एक ऐसा महानायक था, जिसने सद्गृहस्थ रहते हुए तपस्या द्वारा मोक्ष के मार्ग को अपनाया था। राम और कृष्ण; दोनों ही सद्गृहस्थ तथा आदर्श महापुरुष थे। आज राष्ट्र को ऐसे ही आदर्श महापुरुषों की आवश्यकता है, जिनके आदर्श को आचरण में लाकर हम अपने राष्ट्रª की स्वतन्त्रता, अखण्डता, सार्व भौमिकता तथा स्वायत्तता की रक्षा कर सकते हैं।

साभार

शांतिधर्मी मासिक हिंदी पत्रिका

सदस्य बनने के लिए संपर्क कीजिये

श्री सहदेव समर्पित
चलभाष -09416253826

Advertisements

वन्दे मातरम गीत और राष्ट्रीयता


 vande 2

अभी हाल ही में बसपा संसद शाफिकुर्रहमान बर्क द्वारा संसद में सत्र के समापन के दौरान वन्दे मातरम के गान के समय राष्ट्रीय गीत का बहिष्कार यह कहकर कर दिया गया की वन्दे मातरम का गान करना इस्लाम की मान्यताओं के खिलाफ हैं और मैं करोड़ो मुसलमानों की भावनाओं से खिलवाड़ नहीं कर सकता। गौरतलब हैं की उक्त सांसद का यह चौथा कार्यकाल हैं एवं वह इससे पहले ऐसे सत्रों में भाग लेते आये हैं। दुनिया में शायद भारत ही ऐसा पहल मुल्क होगा जिसमे राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रीय गान न केवल दोनों अलग अलग हैं अपितु ऐसा पहला मुल्क भी होगा जिसमें लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए सांसद ने भारतीय संविधान के अंतर्गत अपने पद और उसकी गरिमा की शपथ ग्रहण करने के बाद उसकी अवहेलना करने का दुस्साहस भी किया हैं। देखा जाये तो यह कदम भारतीय संविधान की अनुपालना न करने के कारण दंडनीय होना चाहिए। परन्तु हमारे देश सबसे बड़ा दुर्भाग्य अल्पसंख्यकों को प्रोत्साहन देने के नाम पर तुष्टिकरण का भी हैं। अगर उक्त सांसद के विरुद्ध कोई भी राजनितिक दल (भाजपा को छोड़कर) सख्त कदम उठाने की मांग करता हैं तो उसके अन्य मुस्लिम सांसद एवं मुस्लिम वोटों के नाराज होने का खतरा हैं। पर विषय यहाँ पर नाराज होने का नहीं हैं अपितु तुष्टिकरण के नाम पर हर नाजायज माँग को दूसरो के सर पर थोपने की मानसिक बीमारी का हैं चाहे उसके लिए भारतीय संविधान को भी नकार देना कहाँ तक जायज हैं।

भारत जैसे विशाल देश को हजारों वर्षों की गुलामी के बाद आजादी के दर्शन हुए थे। वन्दे मातरम वह गीत हैं जिससे सदियों से सुप्त भारत देश जग उठा और अर्ध शताब्दी तक भारत के स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरक बना रहा। इस गीत के कारण बंग-भंग के विरोध की लहर बंगाल की खाड़ी से उठ कर इंग्लिश चैनल को पार करती हुई ब्रिटिश संसद तक गूंजा आई थी। जो गीत गंगा की तरह पवित्र , स्फटिक की तरह निर्मल और देवी की तरह प्रणम्य हैं उस गीत की तुष्टिकरण की भेंट चढ़ाना राष्ट्रीयता का परिहास ही तो हैं जबकि इतिहास इस बात का गवाह हैं की भारत का विभाजन इसी तुष्टिकरण के कारण हुआ था। इस लेख के माध्यम से हम वन्दे मातरम के इतिहास को समझने का प्रयास करेगे।

bankim

वन्दे मातरम के रचियता बंकिम चन्द्र

बहुत कम लोग यह जानते हैं की वन्दे मातरम के रचियता बंकिम बाबु का परिवार अंग्रेज भगत था। यहाँ तक की उनके पैतृक गृह के आगे एक सिंह की मूर्ति बनी हुई थी जिसकी पूँछ को दो बन्दर खिंच रहे थे पर कुछ भी नहीं कर पा रहे थे। यह सिंह ब्रिटिश साम्राज्य का प्रतीक था जबकि बन्दर भारतवासी थे। ऐसा मानसिकता वाले घर में बंकिम जैसे राष्ट्रभक्त का पैदा होना निश्चित रूप से उस समय की क्रांति कारी विचारधारा का प्रभाव कहा जायेगा। आनंद मठ में बंकिम बाबु ने वन्देमातरम गीत को प्रकाशित किया। आनंद मठ बंगाल में नई क्रांति के सूत्रपात के रूप में उभरा था।

congress session 1885

congress session 1885

वन्दे मातरम और कांग्रेस

कांग्रेस की स्थापना के द्वितीय वर्ष १८८६ में ही कोलकाता अधिवेशन के मंच से कविवर हेमचन्द्र द्वारा वन्दे मातरम के कुछ अंश मंच से गाये गए थे। १८९६ में कांग्रेस के १२ वें अधिवेशन में रविन्द्र नाथ टैगोर द्वारा गाया गया था। लोक मान्य तिलक को वन्दे मातरम में इतनी श्रद्धा थी की शिवाजी की समाधी के तोरण पर उन्होंने इसे उत्कीर्ण करवाया था। १९०१ के बाद से कांग्रेस के प्रत्येक अधिवेशन में वन्दे मातरम गया जाने लगा।

६ अगस्त १९०५ को बंग भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में वन्दे मातरम को विरोध के रूप में करीब तीस हज़ार भारतीयों द्वारा गाया गया था। स्थान स्थान पर विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया गया और स्वदेशी कपड़ा और अन्य वस्तुओं का उपयोग भारतीय जनमानस द्वारा किया जाने लगा।

यहाँ तक की बंग भंग के बाद वन्दे मातरम संप्रदाय की स्थापना भी हो गई थी। वन्दे मातरम की स्वरलिपि रविन्द्र नाथ टैगोर जीने भी दी थी।

vande 1

राष्ट्र कवि/लेखक और वन्दे मातरम

राष्ट्रीय कवियों और लेखकों द्वारा अनेक रचनाएँ वन्दे मातरम को प्रसिद्द करने के लिए रची गई जो उसके महत्व की सिद्ध करती हैं।

स्वदेशी आन्दोलन चाई आत्मदान

वन्दे मातरम गाओ रे भाई – श्री सतीश चन्द्र

मागो जाय जेन जीवन चले

शुधु जगत माझे तोमार काजे

वन्दे मातरम बले- श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद

भइया देश का यह क्या हाल

खाक मिटटी जौहर होती सब

जौहर हैं जंजाल बोलो वन्दे मातरम-श्री कालि प्रसन्न काव्य विशारद

अक्टूबर १९०५ में ‘वसुधा’ में जितेंदर मोहम बनर्जी ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था।

१९०६ के चैत्र मास के बम्बई के ‘बिहारी अखबार’ में वीर सावरकर ने वन्दे मातरम पर लेख लिखा था।

२२ अप्रैल को मराठा में ‘तिलक महोदय’ ने वन्दे मातरम पर ‘शोउटिंग ऑफ़ वन्दे मातरम’ के नाम से लेख लिखा था।

कुछ ईसाई लेखक वन्दे मातरम की प्रसिद्धि से जल भून कर उसके विरुद्ध अपनी लेखनी चलते हैं जैसे

पिअरसन महोदय ने तो यहाँ तक लिख दिया की मातृभूमि की कल्पना ही हिन्दू विचारधारा के प्रतिकूल हैं और बंकिम महोदय ने इसे यूरोपियन संस्कृति से प्राप्त किया हैं।

अपनी जन्म भूमि को माता या जननी कहने की गरिमा तो भारत वर्ष में उस काल से स्थापित हैं जब धरती पर ईसाइयत या इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।

वेदों में इस तथ्य को इस प्रकार ग्रहण किया गया हैं –

वह माता भूमि मुझ पुत्र के लिए पय यानि दूध आदि पुष्टि प्रद पदार्थ प्रदान करे। – अथर्ववेद १२/१/२०

भूमि मेरी माता हैं और मैं उसका पुत्र हूँ। – अथर्ववेद १२-१-१५

वाल्मीकि रामायण में “जननी जन्मभूमि ” को स्वर्ग के समान तुल्य कहा गया हैं।

ईसाई मिशनरियों ने तो यहाँ तक कह डाला की वन्दे मातरम राजनैतिक डकैतों का गीत हैं।

english

वन्दे मातरम और बंगाल में कहर

बंगाल की अंग्रेजी सरकार ने कुख्यात सर्कुलर जारी किया की अगर कोई छात्र स्वदेशी सभा में भाग लेगा अथवा वन्दे मातरम का नारा लगाएगा तो उसे स्कूल से निकाल दिया जायेगा।

बंगाल के रंगपुर के एक स्कूल के सभी २०० छात्रों पर वन्दे मातरम का नारा लगाने के लिए ५-५ रुपये का दंड किया गया था।

पूरे बंगाल में वन्दे मातरम के नाम की क्रांति स्थापित हो गयी। इस संस्था से जुड़े लोग हर रविवार को वन्दे मातरम गाते हुए चन्दा एकत्र करते थे। उनके साथ रविन्द्र नाथ टैगोर भी होते थे। यह जुलुस इतना बड़ा हो गया की इसकी संख्या हजारों तक पहुँच गयी। १६ अक्टूबर १९०६ को बंग भंग विरोध दिवस बनाने का फैसला किया गया। उस दिन कोई भी बंगाली अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगा ऐसा निश्चय किया गया। बंग भंग के विरोध में सभा हुई और यह निश्चय किया गया की जब तक चूँकि सरकार बंगाल की एकता को तोड़ने का प्रयास कर रही हैं इसके विरोध में हर बंगाली विदेशी सामान का बहिष्कार करेगा। हर किसी की जबान पर वन्दे मातरम का नारा था चाहे वह हिन्दू हो, चाहे मुस्लिम हो, चाहे ईसाई हो।

वन्दे मातरम से आम जनता को कितना प्रेम हो गया था इसका उदहारण हम इस वाकया से समझ सकते हैं। किसी गाँव में, जो ढाका जिले के अंतर्गत था, एक आदमी गया और कहने लगा की में नवाब सलीमुल्लाह का आदमी हूँ। इसके बाद वन्दे मातरम गाने वाले और नारे लगाने वालो की निंदा करने लगा। इतना सुन्ना था की पास की एक झोपड़ी से एक बुढ़िया झाड़ू लेकर बहार आई और बोली वन्दे मातरम गाने वाले लड़को ने मुझे बचाया हैं। वे सब राजा बेटा हैं। उस वक्त तेरा नवाब कहाँ था?

फूलर के असफल प्रयास

फूलर उस समय बंगाल का गवर्नर बना। वह अत्यन्त छोटी सोच वाला व्यक्ति था। उसने का की मेरी दो बीवी हैं एक हिन्दू और दूसरी मुस्लिम और मुझे दूसरी ज्यादा प्रिय हैं। फुलर का उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता को तोड़ना था। फुलर के इस घटिया बयान के विपक्ष में क्रान्तिकारी और कवि अश्वनी कुमार दत ने अपनी कविता में लिखा

“आओ हे भारतवासी! आओ, हम सब मिलकर भारत माता के चरणों में प्रणाम करें। आओ! मुसलमान भाइयों, आज जाती पाती का झगड़ा नहीं हैं। इस कार्य में हम सब भाई भाई हैं।इस धुल में तुम्हारे अकबर हैं और हमारे राम हैं।”

फूलर ने बंगाल के मुस्लिम जमींदारों को भड़का कर दंगा करवाने का प्रयास किया पर उसके प्रयास सफल न हुए।

अंग्रेज सरकार के मन में वन्दे मातरम को लेकर कितना असंतोष था की उन्होंने सभी विद्यालाओं को सरकारी आदेश जारी किया की सभी छात्र अपनी अपनी नोटबुक में ५०० बार यह लिखे की “वन्दे मातरम चिल्लाने में अपना समय नष्ट करना मुर्खता और अभद्रता हैं। ”

वारिसाल में कांग्रेस का अधिवेशन और वन्दे मातरम

१४ अप्रैल १९०६ के दिन वारिसाल में कांग्रेस के जुलुस में वन्दे मातरम का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। शांतिपूर्वक निकल रहे जुलुस पर पुलिस ने निर्दयता से लाठीचार्ज किया। निर्दयता की हालत यह थी की एक मकान की खूंटी पर वन्दे मातरम लिखा था तो उस मकान को गिर दिया गया। १० -११ वर्ष का एक बालक रसोई में वन्देमातरम गा रहा था तो उसे घर से निकलकर कोर्ट के सामने चाबुक से पिता गया। दो हलवाइयों की दुकान पर यह नारा लिखा था तो उनके सर फोड़ दिए गए। सुरेंदर नाथ बनर्जी की गिरफ्तार कर २०० रुपये जुर्माने और अलग से कोर्ट की अवमानना पर २०० रुपये का दंड लेकर छोड़ दिया गया। इतनी निर्दयता के बावजूद भीड़ वन्दे मातरम का गान करते हुए अपने सभापति महोदयरसूल साहिब को लेकर सभास्थल पर पहुँच गई।

मंच पर हिन्दू नेताओं के साथ मुस्लमान नेताओं में सर्वश्री इस्माइल चौधरी, मौलवी अब्दुल हुसैन, मौलवी हिदायत बक्श, मौलवी हमिजुद्दीन अहमद, मौलवी दीन मुहम्मद, मौलवी मोथार हुसैन, मौलवी मोला चौधरी उपस्थित थे। वन्दे मातरम के गान से सभा का आरम्भ हुआ था। सभापति महोदय ने देश की आज़ादी के लिए सभी हिन्दू-मुसलमान को आपस में मिलकर लड़ने का आवाहन किया।

इतने में सुरेंदर नाथ बनर्जी अपने साथियों के साथ सभा स्थल पर जा पहुँचे जिससे वन्दे मातरम के गगन भेदी नारों के साथ सम्पूर्ण सभा स्थल गूँज उठा। सभा में ब्रिटिश सरकार के द्वारा वन्दे मातरम को लेकर किये जा रहे अत्याचार को घोर निंदा की गयी। जिस स्थान पर सुरेंदरनाथ बनर्जी को वन्दे मातरम गाने के लिए गिरफ्तार किया गया था उस स्थान पर वन्दे मातरम स्तंभ बनाने के प्रस्ताव को सभा में पारित किया गया। अगले दिन के सभी समाचार पत्र वरिसाल के वन्दे मातरम संघर्ष की प्रशंसा और अंग्रेज सरकार की निंदा से भरे पड़े थे। वारिसाल की घटना के कारण लार्ड कर्जन को भारत के वाइसराय के पद से त्याग देना पड़ा।

 bande matram

वन्दे मातरम और योगी अरविन्द

वन्दे मातरम के नाम से पत्र आरंभ हुआ जिसे पहले विपिन चन्द्र पाल ने सम्पादित किया बाद में श्री अरविन्द ने। श्री अरविन्द ने इस पत्र से यह भली भांति सिद्ध कर दिया की तलवार से ज्यादा तीखी लेखनी होती हैं और उसकी ज्वाला से क्रूर शाशन भी भस्मीभूत हो सकता हैं। अरविन्द के पत्र के बारे में स्टेट्समैन अखबार लिखता हैं की “अखबार की हर लाइन के बीच भरपूर राजद्रोह दीखता हैं पर वह इतनी दक्षता से लिखा होता हैं की उस पर क़ानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती। ”

श्री अरविन्द ने वन्दे मातरम गीत के बारे में कहा हैं की बंकिम ने ही स्वदेश को माता की संज्ञा दी हैं। वन्दे मातरम संजीवनी मंत्र हैं। हमारी स्वाधीनता का हथियार वन्दे मातरम हैं। उन्होंने कहा की वन्दे मातरम साधारण गीत नहीं हैं। बल्कि एक ऐसा मंत्र हैं जो हमें मातृभूमि की वंदना करने की सीख देता हैं। उनकें इस व्यक्तव्य के कारण ही बंग-भंग के क्रांतिकारियों के लिए वन्दे मातरम का यह नारा वह गीत मंत्र बन गया।

अपनी पत्नी को ३० अगस्त १९०८ को एक पत्र में श्री अरविन्द लिखते हैं “मेरा तीसरा पागलपन यह हैं की जहाँ दुसरे लोग स्वदेश को जड़ पदार्थ,खेत,मैदान,पहाड़, जंगल और नदी समझते हैं , वहां मैं अपनी मातृभूमि को अपनी माँ समझता हूँ। उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ और उसकी पूजा करता हूँ।माँ की छाती पर बैठ कर अगर कोई उसका खून चूसने लगे तो बीटा क्या करता हैं ? क्या वह चुपचाप बैठा हुआ भोजन करता हैं या स्त्री पुरुष के साथ रंगरलिया बनता हैं या माँ को बचाने के लिए दौड़ जाता हैं।”

श्री अरविन्द को गिरफ्तार कर लिया गया। उससे देश में वन्दे मातरम की लहर चल पड़ी।

१९०६ को धुलिया, महाराष्ट्र में वन्दे मातरम के नारे से सभा ही रूक गयी। नासिक में वन्दे मातरम पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। जिस जिस ने प्रतिबन्ध को तोडा तो उसे पीटा गया गया। कई गिरफ्तारियाँ हुई। इस कांड का तो नाम ही वन्दे मातरम कांड बन गया।

फरवरी १९०७ को तमिल नाडू में मजदूरों ने हड़ताल कर दी और ब्रिटिश नागरिकों को घेर कर उन्हें भी वन्दे मातरम के नारे लगाने को बाध्य किया।

मई १९०७ को रावलपिंडी में भी स्वदेशी के नेताओं की गिरफ़्तारी के विरोध में युवकों ने वन्दे मातरम के नारे को लगाते हुए लाठियाँ खाई।

२६ अगस्त ,१९०७ को वन्दे मातरम के एक लेख के कारण बिपिन चन्द्र पाल को अदालत में सजा हुई तो उनका स्वागत हजारों की भीड़ ने वन्दे मातरम से किया। यह देखकर पुलिस अँधाधुंध लाठीचार्ज करने लगी। यह देखकर एक १५ वर्षीय बालक सुशील चन्द्र सेन ने एक पुलिस वाले मुँह पर मुक्का मार दिया। उस वीर बालक को १५ बेतों की सजा सुनाई गई थी। सुशील की इस सजा की प्रशंसा करते हुए संध्या में एक लेख छपा “सुशील की कुदान भरी, फिरंगी की नानी मरी”

सुशील युगांतर पार्टी के सदस्य थे। उनकी चर्चा सुरेंदर नाथ बनर्जी तक पहुँची तो उन्होंने उसे सोने का तमगा देकर सम्मानित किया।

अब युगांतर पार्टी के सदस्यों ने सुशील को सजा देने वाले अत्याचारी किंग्स्फोर्ड को यमालय भेजने की ठानी। यह कार्य प्रफुल्ल चन्द्र चाकी और खुदी राम बोस को सोंपा गया।

षड़यंत्र असफल हो जाने पर चाकी ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम ने फाँसी का फन्दा चूम कर सबसे कम उम्र में शहीद होने का सम्मान प्राप्त किया। इसी केस में श्री अरविन्द को भी सजा हुई थी।

 vande

वन्दे मातरम और राष्ट्रीय झंडा

कांग्रेस का लम्बे समय तक कोई निजी झंडा नहीं था।कांग्रेस के अधिवेशन में यूनियन जैक को फहराकर भारत के अंग्रेज भगत प्रसन्न हो जाते थे। १९०६ में कोलकता में कांग्रेस के अधिवेशन में भगिनी निवेदिता ने सबसे पहले वज्र अंकित झंडे का निर्माण किया जिस पर वन्दे मातरम लिखा हुआ था। उसके बाद १८ अक्टूबर, १९०७ को जर्मनी के स्टुअर्ट नगर में मैडम बीकाजी कामा ने वन्दे मातरम गीत के बाद राष्ट्रीय झंडा फहराया जिस पर वन्दे मातरम अंकित था। अपने भाषण में मैडम कामा ने पहले अंग्रेजों द्वारा भारत में किये जा रहे अत्याचारों का विवरण दिया जिससे की सुनने वालो के रोंगटे खड़े हो गए। उसके बाद भारत का झंडा निकालती हुई वह बोली ” यह हैं भारतीय राष्ट्र का स्वतंत्र झंडा। यह देखिये फहरा रहा हैं। भारतीय देश भक्तों के रक्त से यह पवित्र हो चूका हैं। सदस्यगन, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ की आप खड़े होकर भारत की इस स्वतंत्र पताका का अभिवादन करे। ”

सर्व प्रथम झंडे पर वन्दे मातरम को अंकित करने से पाठक उस काल में वन्दे मातरम के भारतीय जन समुदाय पर प्रभाव को समझ सकते हैं।

वन्दे मातरम का भारत व्यापी प्रभाव

मोतीलाल नेहरु ने जवाहरलाल नेहरु को १९०५ में एक पत्र में लिखा था की हम ब्रिटिश भारत के इतिहास की सबसे संकट पूर्ण अवधि से गुजर रहे हैं। इलाहाबाद में भी वन्दे मातरम आम अभिनन्दन बन गया हैं। यदि अभियान चलता रहा तो यहाँ लौटने पर भारत को , जब तुम गये, उससे बिलकुल बदला पाओगे।

२५ नवम्बर १९०५ को ट्रिब्यून अखबार लिखता हैं “बंगाल में लोगो ने वन्दे मातरम का जयघोष शुरू किया हैं। इन शब्दों का अर्थ हैं माता की वन्दना। इसमें कुछ भी भयंकर नहीं हैं। फिर दमनशाही द्वारा वन्दे मातरम की मनाही क्यूँ हैं? अब तो पंजाब में सुशिक्षित लोग एक दुसरे से भेंट होने पर वन्दे मातरम कहकर अभिनन्दन करते हैं। इस प्रकार सारे हिंदुस्तान में असंख्य मुखों से निरन्तर निकलते वन्दे मातरम को बंद करने में सरकार को कितने सिपाहियों और अधिकारीयों की आवश्यकता होगी? पूर्वी बंगाल की जनता के साथ सारे हिंदुस्तान की सहानभूति हैं।

 जब हैदराबाद के निज़ाम के धर्मान्ध अत्याचारों के विरुद्ध आर्य समाज ने १९३९ में हैदराबाद सत्याग्रह किया था तब जेल में रामचन्द्र के नाम से एक आर्यवीर को बंद कर दिया गया था। अपनी क्रूरता की धाक जमाने के लिए जेल में आर्य सत्याग्रहियों पर अत्याचार किया जाता था। जेल में दरोगा जब भी वीर रामचंद्र को बेंत मारते तो उनके मुख से वन्दे मातरम का नारा निकलता था। दरोगा जब तक मरते रहते जब तक की रामचंद्र बेहोश न हो गए पर उनके मुख से बेहोशी में भी नारा निकलता रहा।

ऐसा अनुराग था देश और धर्म प्रेमियों को वन्दे मातरम के साथ।

वन्दे मातरम विदेश में

जुलाई १९०९ को मदन लाल धींगरा को लन्दन में जब फाँसी दी गई तो उनके अंतिम शब्द थे “वन्दे मातरम”।

१९०९ को जिनेवा से एक पत्रिका वन्दे मातरम का का प्रकाशन आरंभ हुआ। अपने प्रथम अंक में पत्रिका ने कहा ‘विदेशी अत्याचार के विरुद्ध हमारे बहादुर और बुद्धिमान नेताओं ने बंगाल में जो यशस्वी अभियान शुरू किया हैं, वन्दे मातरम के माध्यम से हम उसे पूर्ण शक्ति और दृढ़ता के साथ में चलायेगे ‘

कनाडा से आ रहे जहाज कमागातामारू के झंडे पर वन्दे मातरम, सत श्री अकाल और अल्लाह हो अकबर के नारे लिखे थे।

साउथ अफ्रीका से जब महात्मा गाँधी भारत लौटे तो उन्होंने भारत आकार वन्दे मातरम गीत की प्रशंसा करी थी।(हरिजन १ जुलाई १ ९९३८)

१९२२ में जब गोखले अफ्रीका गए तो हजारों भारत वासियों ने उनका स्वागत वन्दे मातरम से किया था।

१९३७ में तुर्की के अदान नगर में भारतीय मस्जिद पर वन्दे मातरम लिखा था। मस्जिद पर भारतीय तिरंगा लगा था और हर नमाज के साथ वन्दे मातरम का घोष किया जाता था।

vande 3

भारतीय क्रांतिकारी और वन्दे मातरम

सन १९२० में लाला लाजपत राय ने दिल्ली से दैनिक वन्दे मातरम का प्रकाशन शुरू किया था।

सन १९३० में चन्द्र शेखर आजाद अपने पिता को पत्र लिखने समय वन्दे मातरम सबसे ऊपर लिखते हैं।

सन १९२० का असहयोग आन्दोलन, नमक सत्याग्रह में भी वन्दे मातरम का बोलबाला था।

रामचंद्र बिस्मिल ने काकोरी कांड में फाँसी पर लटकने से पहले वन्दे मातरम कहा था।

चटगांव सशस्त्र संघर्ष में वीर सूर्यसेन को फाँसी देने से पहले जब भी मार पड़ती तो वे वन्दे मातरम का जय घोष करते थे। उन्हें इतना मार गया था की वे बेहोश हो गए और अचेत अवस्था में ही उन्हें फाँसी पर चढ़ा दिया गया था।

इसके अतिरिक्त अनेक सन्दर्भ हमे भारत की आज़ादी की लड़ाई में वन्दे मातरम को प्रेरणा के स्रोत्र के रूप में पाते हैं।

barq

वन्दे मातरम का विरोध

वन्दे मातरम का विरोध जो लोग कर रहे हैं उनका अरबी, फारसी भाषा के शब्द मादरे वतन (हे माता तुझे सलाम करता हूँ), उम्मु कौरा (ग्राम्य जननी),उम्मुल मोमेनीन (विश्वासियो की जननी) और उम्मुल कैताब (ग्रन्थ जननी) आदि शब्द के बारे में उनका क्या कहना हैं।

कुछ मुसलमानों ने जो नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नारे जय हिन्द का भी विरोध किया था पर वन्दे मातरम की तरह यह नारा धार्मिक नहीं अपितु देश भक्ति को बुलंद करने के लिए था।

अब बर्क साहब जीवन भर इस्लामिक टोपी के स्थान पर गाँधी टोपी लगाते आये हैं। क्या यह इस्लाम की अवमानना नहीं हैं? नहीं क्यूंकि गाँधी टोपी आज़ादी की लड़ाई की , संघर्ष के प्रतीक के रूप में हमारा मार्ग दर्शन करती हैं। उसी प्रकार वन्दे मातरम का गान भी इस्लाम की अवमानना नहीं हैं अपितु राष्ट्रीयता की भावना का सम्मान हैं जो की इस्लाम की मान्यताओं के कहीं से भी विपरीत नहीं हैं। और अगर ऐसा होता तो अपनी माँ का सम्मान करना भी इस्लाम की शिक्षा के विरुद्ध होता जो असत्य हैं।

ब्रिटिश काल में उन क्रांतिकारियों से पूछा जाये की वन्दे मातरम का उनके लिए क्या महत्व हैं तब वे यही कहेंगे की वन्दे मातरम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा हैं , उसके प्राण हैं और उसके लिए सर्वस्व अर्पण हैं।

डॉ विवेक आर्य

vande matram

नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।‍‍‌जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है,जिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है
जिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका है,उसी देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका है
तवारीख के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो । नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके पर्वत खेत घाटियों में अक्षय क्षमता है,जिसकी नदियों की भी हम पर माँ जैसी ममता है
जिसकी गोद भरी रहती है, माटी सदा सुहागिन,ऐसी स्वर्ग सरीखी धरती पीड़ित या हतभागिन ?
तो चाहे तुम रेशम धारो या पहने खादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके लहराते खेतों की मनहर हरियाली से,रंग-बिरंगे फूल सुसज्जित डाली-डाली से
इस भौतिक दुनिया का भार ह्रदय से उतरा है,उसी धरा को अगर किसी मनहूस नज़र से खतरा है
तो दौलत ने चाहे तुमको हर सुविधा लादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

अगर देश मर गया तो बोलो जीवित कौन रहेगा?और रहा भी अगर तो उसको जीवित कौन कहेगा?
माँग रही है क़र्ज़ जवानी सौ-सौ सर कट जाएँ,पर दुश्मन के हाथ न माँ के आँचल तक आ पाएँ
जीवन का है अर्थ तभी तक जब तक आज़ादी हो।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

चाहे हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिरी वासी हो, चाहे राजा रंगमहल के हो या सन्यासी हो
चाहे शीश तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे,चाहे मंदिर गुरूद्वारे में भक्ति तुम्हारी जागे
भले विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो। नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता हैं


end torture

बाबर और औरंगजेब ने अपने जीवन में हिन्दू जनता पर अनेक अत्याचार किये थे। हमारे मुस्लिम भाई उनकी धर्मान्ध निति का बड़े उत्साह से गुण गान करते हैं। पर सत्य यह हैं की अपनी मृत्यु से पहले दोनों को अपने जीवन में किये गए गुनाहों का पश्चाताप था। अपने पुत्रों को लिखे पत्रों में उन्होंने अपनी व्यथा लिखी हैं।

बाबर ने जीवन भर मतान्धता में हिन्दुओं पर अनेक अत्याचार किये। एक समय तो ऐसा आया की हिन्दू जनता बाबर के कहर से त्राहि माम कर उठी।

बाबर की मतान्धता को गुरु नानक जी की जुबानी हम भली प्रकार से जान सकते हैं।

भारत पर किये गये बाबर के आक्रमणों का नानक ने गंभीर आकलन किया और उसके अत्याचारों से गुरु नानक मर्माहत भी हुए। उनके द्वारा लिखित बाबरगाथा नामक काव्यकृति इस बात का सबूत है कि मुग़ल आक्रान्ता ने किस तरह हमारे हरे-भरे देश को बर्बाद किया था।

बाबरगाथा के पहले चरण में लालो बढ़ई नामक अपने पहले आतिथेय को संबोधित करते हुए नानकदेव ने लिखा है: हे लालो,बाबर अपने पापों की बरात लेकर हमारे देश पर चढ़ आया है और ज़बर्दस्ती हमारी बेटियों के हाथ माँगने पर आमादा है। धर्म और शर्म दोनों कहीं छिप गये लगते हैं और झूठ अपना सिर उठा कर चलने लगा है। हमलावर लोग हर रोज़ हमारी बहू-बेटियों को उठाने में लगे हैं, फिर जबर्दस्ती उनके साथ निकाह कर लेते हैं। काज़ियों या पण्डितों को विवाह की रस्म अदा करने का मौका ही नहीं मिल पाता। हे लालो, हमारी धरती पर खून के गीत गाये जा रहे हैं और उनमे लहू का केसर पड़ रहा है। लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि बहुत जल्दी ही मुग़लों को यहाँ से विदा लेनी पड़ेगी, और तब एक और मर्द का चेला जन्म लेगा।

कविता के दूसरे चरण में नानक ने लिखा: हे ईश्वर, बाबर के शासित खुरासान प्रदेश को तूने अपना समझ कर बचा रक्खा है और हिन्दुस्तान को बाबर द्वारा पैदा की गयी आग में झोंक दिया है। मुगलों को यम का रूप प्रदान कर उनसे हिन्दुस्तान पर हमला करवाया, और उसके परिणामस्वरूप यहाँ इतनी मारकाट हुई कि हर आदमी उससे कराहने लगा। तेरे दिल में क्या कुछ भी दर्द नहीं है?

तीसरे चरण का सारांश है: जिन महिलाओं के मस्तक पर उनके बालों की लटें लहराया करती थीं और उन लटों के बीच जिनका सिन्दूर प्रज्ज्वलित और प्रकाशमान रहता था, उनके सिरों को उस्तरों से मूंड डाला गया है और चारों ओर से धूल उड़ उड़ कर उनके ऊपर पड़ रही है। जो औरतें किसी ज़माने में महलों में निवास करती थीं उनको आज सड़क पर भी कहीं ठौर नहीं मिल पा रही है। कभी उन स्त्रियों को विवाहिता होने का गर्व था और पतियों के साथ वह प्रसन्नता के साथ अपना जीवन-यापन करती थीं। ऐसी पालकियों में बैठ कर वह नगर का भ्रमण करती थीं जिन पर हाथी दाँत का काम हुआ होता था। आज उनके गलों में फांसी का फन्दा पड़ा हुआ है और उनके मोतियों की लड़ियाँ टूट चुकी हैं।

चौथे चरण में एक बार फिर सर्वशक्तिमान का स्मरण करते हुए नानक ने कहा है: यह जगत निश्चित ही मेरा है और तू ही इसका अकेला मालिक है। एक घड़ी में तू इसे बनाता है और दूसरी घड़ी में उसे नष्ट कर देता है। जब देश के लोगों ने बाबर के हमले के बारे में सुना तो उसे यहाँ से भगाने के लिये पीर-फकीरों ने लाखों टोने-टोटके किये, लेकिन किसी से भी कोई फ़ायदा नहीं हो पाया। बड़े बड़े राजमहल आग की भेंट चढ़ा दिये गये, राजपुरूषों के टुकड़े-टुकड़े कर उन्हें मिट्टी में मिला दिया गया। पीरों के टोटकों से एक भी मुग़ल अंधा नहीं हो पाया। मुगलों ने तोपें चलायीं और पठानों ने हाथी आगे बढ़ाये। जिनकी अर्ज़ियाँ भगवान के दरबार में फाड़ दी गयी हों, उनको बचा भी कौन सकता है? जिन स्त्रियों की दुर्दशा हुई उनमें सभी जाति और वर्ग की औरतें थीं। कुछ के कपड़े सिर से पैर तक फाड़ डाले गये,कुछ को श्मशान में रहने की जगह मिली। जिनके पति लम्बे इन्तज़ार के बाद भी अपने घर नहीं वापस लौट पाये, उन्होंने आखिर अपनी रातें कैसे काटी होंगी?
ईश्वर को पुनः संबोधित करते हुए गुरू नानकदेव ने कहा था: तू ही सब कुछ करता है और तू ही सब कुछ कराता है। सारे सुख-दुख तेरे ही हुक्म से आते और जाते हैं, इससे किसके पास जाकर रोया जाये, किसके आगे अपनी फ़रियाद पेश की जाये? जो कुछ तूने लोगों की किस्मत में लिख दिया है, उसके अतिरिक्त कोई दूसरी चीज़ हो ही नहीं सकती। इससे अब पूरी तरह तेरी ही शरण में जाना पड़ेगा। उसके अलावा अन्य कोई पर्याय नहीं।

(सन्दर्भ- स्टॉर्म इन पंजाब – क्षितिज वेदालंकार)

बाबर मतान्धता में जीवन भर अत्याचार करता रहा। जब अंत समय निकट आया तब उसे समझ आया की मतान्धता जीवन का उद्देश्य नहीं हैं अपितु शांति, न्याय, दयालुता, प्राणी मात्र की सेवा करना जीवन का उद्देश्य हैं।

अपनी मृत्यु से पहले बाबर की आँखें खुली ,उसे अपने किये हुए अत्याचार समझ मैं आये। अपनी गलतियों को समझते हुए उसने अपने बेटे हुमायूँ को एक पत्र लिखा जिसे यहाँ उद्धृत किया जा रहा हैं।

“जहीर उद्दीन मोहम्मद बादशाह गाज़ी का गुप्त मृत्यु पत्र राजपुत्र नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायूँ के नाम जिसे खुद जिंदगी बक्शे सल्तनत की मजबूती के लिए लिखा हुआ।ए बेटे हिंदुस्तान की सल्तनत मुखत लीफ़ मज़हबों से भरी हुई हैं। खुद का शुक्र हैं की उसने तुझे उसकी बादशाही बक्शी हैं। तुझ पर फर्ज हैं की अपने दिल के परदे से सब तरह का मज़हबी तअस्सुब धो दाल। हर मज़हब के कानून से इंसाफ कर। खास क्र गौ की कुरबानी से बाज आ जिससे तू लोगों के दिल पर काबिज़ हो सकता हैं और इस मुल्क की रियाया तुझसे वफादारी से बंध जाएगी। किसी फिरके के मंदिर को मत तोड़ जोकि हुकूमत के कानून का पायबंद हो।इन्साफ इस तरह कर की बादशाह से रियाया और रियाया से बादशाह खुश रहे। उपकार की तलवार से इस्लाम का काम ज्यादा फतेयाब होगा बनिस्पत जुल्म की तलवार के।शिया और सुन्नी के फरक को नजरंदाज कर वरना इस्लाम की कमजोरी जाहिर हो जाएगी।औरमुख्तलिफ विश्वासों की रियाया को चार तत्वों के अनुसार (जिनसे एक इन्सानी जिस्म बना हुआ हैं) एक रस कर दे,जिससे बादशाहत का जिस्म तमाम बिमारियों से महफूज रहेगा।खुश किस्मत तैमुर का याददाश्त सदा तेरी आँखों के सामने रहे जिससे तू हुकूमत के काम में अनुभवी बन सके। ”

इस मृत्यु पत्र पर तारीख १ जमादिल अव्वल सन ३९५ हिज्री लिखा हैं।

(सन्दर्भ- अलंकार मासिक पत्रिका 1924 मई अंक )

हुमायूँ ने अपने पिता बाबर की बात को कई मायने में अनुसरण किया। उसके बाद अकबर ने भी इस बात को नजरअंदाज नहीं किया।

इसी से अकबर का राज्य बढ़ कर पूरे हिंदुस्तान में फैल सका था। बाद के मुग़ल शराब, शबाब के ज्यादा मुरीद बन गए थे। जब औरंगजेब का काल आया तो उसने ठीक इसके विपरीत धर्मान्ध निति अपनाई। पहले गद्दी पाने के लिए अपने सगे भाइयों को मारा फिर अपने बाप को जेल में डालकार प्यासा और भूखा मार डाला। मद में चूर औरंगजेब ने हिन्दुओं पर बाबर से भी बढ़कर अत्याचार किये। जिससे उसी के जीवन में अपनी चरम सीमा तक पहुँचा मुग़ल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया।

औरंगजेब के अत्याचार से हिन्दू वीर उठ खड़े हुए। महाराष्ट्र में वीर शिवाजी,पंजाब में गुरु गोविन्द सिंह , राजपूताने में वीर दुर्गा प्रसाद राठोड़, बुंदेलखंड में वीर छत्रसाल, भरतपुर और मथुरा में जाट सरदार। चारों ओर से औरंगजेब के विरुद्ध उठ रहे विद्रोह को दबाने में औरंगजेब की संगठित सारी शक्ति खत्म हो गयी। न वह जिहादी उन्माद में हिन्दुओं पर अत्याचार करता, न उसके विरोध में हिन्दू संगठित होकर उसका प्रतिरोध करती। उसका मज़हबी उन्माद ही मुगलिया सल्तनत के पतन का कारण बना।

अपनी मृत्यु से कुछ काल पहले औरंगजेब को अक्ल आई तो उसने अपने मृत्यु पत्र में अपने बेटों से उसका बखान इस प्रकार किया हैं।

शहजादे आज़म को औरंगजेब लिखता हैं

बुढ़ापा आ गया, निर्बलता ने अधिकार जमा लिया और अंगों में शक्ति नहीं रही।मैं अकेला ही आया, और अकेला ही जा रहा हूँ। मुझे मालूम नहीं की मैं कौन हूँ और क्या करता रहा हूँ। जितने दिन मैंने इबादत में गुजारे हैं, उन्हें छोड़कर शेष सब दिनों के लिए मैं दुखी हूँ। मैंने अच्छी हुकूमत नहीं की और किसानों का कुछ नहीं बना सका। ऐसा कीमती जीवन व्यर्थ ही चला गया। मालिक मेरे घर में था पर मेरी अन्धकार से आवृत आँखें उसे न देख सकी।

छोटे बेटे कामबख्श को बादशाह ने लिखा था -“मैं जा रहा हूँ और अपने साथ गुनाहों और उनकी सजा के भोझ को लिये जा रहा हूँ। मुझे आश्चर्य यही हैं की मैं अकेला आया था, परन्तु अब इन गुनाहों के काफिले के साथ जा रहा हू। मुझे इस काफिले का खुदा के सिवाय कोई रहनुमा नहीं दिखाई देता। सेना और बारबरदारीकी चिंता मेरे दिल को खाये जा रही हैं। ”

(सन्दर्भ मुग़ल साम्राज्य का क्षय और उसके कारण- इन्द्र विद्या वाचस्पति )

अलमगीर यानि खुदा के बन्दे के नाम से औरंगजेब को मशहूर कर दिया गया जिसका मुख्य कारण उसकी धर्मान्धता थी। पर सत्य यह हैं की हिंदुयों पर अत्याचार करने के कारण अपराध बोध उसे अपनी मृत्यु के समय हो गया था।

इस लेख को लिखने का मेरा उद्देश्य बाबर या औरंगजेब के विषय में अपने विचार रखना नहीं हैं अपितु यह सन्देश देना हैं की

“अत्याचारी व्यक्ति जीवन में दुःख का ही भागी बनता हैं ”

यही अटल सत्य हैं और सदा रहेगा।

डॉ विवेक आर्य

 

“आर्य” हिन्दू राजाओं का चारित्रिक आदर्श


26_ Maharana Pratap

 

भारत देश की महान वैदिक सभ्यता में नारी को पूजनीय होने के साथ साथ “माता” के पवित्र उद्बोधन से संबोधित किया गया हैं।

मुस्लिम काल में भी आर्य हिन्दू राजाओं द्वारा प्रत्येक नारी को उसी प्रकार से सम्मान दिया जाता था जैसे कोई भी व्यक्ति अपनी माँ का सम्मान करता हैं।

यह गौरव और मर्यादा उस कोटि के हैं ,जो की संसार के केवल सभ्य और विकसित जातियों में ही मिलते हैं।

महाराणा प्रताप के मुगलों के संघर्ष के समय स्वयं राणा के पुत्र अमर सिंह ने विरोधी अब्दुरहीम खानखाना के परिवार की औरतों को बंदी बना कर राणा के समक्ष पेश किया तो राणा ने क्रोध में आकर अपने बेटे को हुकुम दिया की तुरंत उन माताओं और बहनों को पूरे सम्मान के साथ अब्दुरहीम खानखाना के शिविर में छोड़ कर आये एवं भविष्य में ऐसी गलती दोबारा न करने की प्रतिज्ञा करे।

ध्यान रहे महाराणा ने यह आदर्श उस काल में स्थापित किया था जब मुग़ल अबोध राजपूत राजकुमारियों के डोले के डोले से अपने हरम भरते जाते थे। बड़े बड़े राजपूत घरानों की बेटियाँ मुगलिया हरम के सात पर्दों के भीतर जीवन भर के लिए कैद कर दी जाती थी। महाराणा चाहते तो उनके साथ भी ऐसा ही कर सकते थे पर नहीं उनका स्वाभिमान ऐसी इज़ाज़त कभी नहीं देता था।

 

औरंगजेब के राज में हिन्दुओं पर अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया था। हिन्दू या काफ़िर होना तो पाप ही हो गया था। धर्मान्ध औरंगजेब के अत्याचार से स्वयं उसके बाप और भाई तक न बच सके , साधारण हिन्दू जनता की स्वयं पाठक कल्पना कर सकते हैं। औरंगजेब की स्वयं अपने बेटे अकबर से अनबन हो गयी थी। इसी कारण उसका बेटा आगरे के किले को छोड़कर औरंगजेब के प्रखर विरोधी राजपूतों से जा मिला था जिनका नेतृत्व वीर दुर्गादास राठोड़ कर रहे थे।

 

कहाँ राजसी ठाठ बाठ में किलो की शीतल छाया में पला बढ़ा अकबर , कहाँ राजस्थान की भस्म करने वाली तपती हुई धुल भरी गर्मियाँ। शीघ्र सफलता न मिलते देख संघर्ष न करने के आदि अकबर एक बार राजपूतों का शिविर छोड़ कर भाग निकला। पीछे से अपने बच्चों अर्थात औरंगजेब के पोता-पोतियों को राजपूतों के शिविर में ही छोड़ गया। जब औरंगजेब को इस बात का पता चला तो उसे अपने पोते पोतियों की चिन्ता हुई क्यूंकि वह जैसा व्यवहार औरों के बच्चों के साथ करता था कहीं वैसा ही व्यवहार उसके बच्चों के साथ न हो जाये। परन्तु वीर दुर्गा दास राठोड़ एवं औरंगजेब में भारी अंतर था। दुर्गादास की रगो में आर्य जाति का लहू बहता था। दुर्गादास ने प्राचीन आर्य मर्यादा का पालन करते हुए ससम्मान औरंगजेब के पोता पोती को वापिस औरंगजेब के पास भेज दिया जिन्हें पाकर औरंगजेब अत्यंत प्रसन्न हुआ। वीर दुर्गादास राठोड़ ने इतिहास में अपना नाम अपने आर्य व्यवहार से स्वर्णिम शब्दों में लिखवा लिया।

 

वीर शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण जीवन आर्य जाति की सेवा,रक्षा, मंदिरों के उद्धार, गौ माता के कल्याण एवं एक हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के रूप में गुजरा जिन्हें पढ़कर प्राचीन आर्य राजाओं के महान आदर्शों का पुन: स्मरण हो जाता हैं। जीवन भर उनका संघर्ष कभी बीजापुर से, कभी मुगलों से चलता रहा। किसी भी युद्ध को जितने के बाद शिवाजी के सरदार उन्हें नजराने के रूप में उपहार पेश करते थे। एक बार उनके एक सरदार ने कल्याण के मुस्लिम सूबेदार की अति सुन्दर बीवी शिवाजी के सम्मुख पेश की। उसको देखते ही शिवाजी महाराज अत्यंत क्रोधित हो गए और उस सरदार को तत्काल यह हुक्म दिया की उस महिला को ससम्मान वापिस अपने घर छोड़ आये। अत्यंत विनम्र भाव से शिवाजी उस महिला से बोले ” माता आप कितनी सुन्दर हैं , मैं भी आपका पुत्र होता तो इतना ही सुन्दर होता। अपने सैनिक द्वारा की गई गलती के लिए मैं आपसे माफी मांगता हूँ”। यह कहकर शिवाजी ने तत्काल आदेश दिया की जो भी सैनिक या सरदार जो किसी भी ऊँचे पद पर होगा अगर शत्रु की स्त्री को हाथ लगायेगा तो उसका अंग छेदन कर दिया जायेगा।

कहाँ औरंगजेब की सेना के सिपाही जिनके हाथ अगर कोई हिन्दू लड़की लग जाती या तो उसे या तो अपने हरम में गुलाम बना कर रख लेते थे अथवा उसे खुले आम गुलाम बाज़ार में बेच देते थे और कहाँ वीर शिवाजी का यह पवित्र आर्य आदर्श।

इतिहास में शिवाजी की यह नैतिकता स्वर्णिम अक्षरों में लिखी गई हैं।

इन ऐतिहासिक प्रसंगों को पढ़ कर पाठक स्वयं यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं की महानता और आर्य मर्यादा व्यक्ति के विचार और व्यवहार से होती हैं। धर्म की असली परिभाषा उच्च कोटि का पवित्र और श्रेष्ठ आचरण हैं। धर्म के नाम पर अत्याचार करना तो केवल अज्ञानता और मुर्खता हैं।

डॉ विवेक आर्य

‘धर्म प्रचार’ – पण्डित लेखराम जी आर्य पथिक


lekhram

पंडित लेखराम शहीदी दिवस 6 मार्च के अवसर पर पंडित जी के लेखों का संग्रह “कुलयात आर्य मुसाफिर” से उनका प्रसिद्द लेख धर्म प्रचार प्रकाशित किया जा रहा हैं। यह लेख पंडित जी द्वारा 1890 के दशक लिखा गया था। यह लेख भारत देश में विधर्मी मत के इतिहास और उनके समाधान को एतिहासिक प्रमाण देकर हमें मार्ग दर्शन देता हैं। पंडित जी को सच्ची श्रद्धान्जलि उनके मिशन और उनके अंतिम सन्देश “तहरीर (लेखन) और तकरीर(शास्त्रार्थ) का कार्य बंद नहीं होना चाहिए” को यथार्थ करके ही होगी। आज के युवा देश का भविष्य हैं। आशा हैं पंडित जी के जीवन से धर्म, जाति और देश की सेवा का सभी युवा आज के दिन संकल्प लेगे।

धर्म प्रचार

हमारी आर्य जाति अविद्यान्धकार की निद्रा में सो गई है। अब इसे जागते हुए संकोच होता है कहां वह ऋषि मुनियों का पवित्र युग और कहाँ उनकी वर्तमान संतति की यह दुर्गति। त्राहि माम् त्राहि माम्।

प्रिय‌ भाईयो ! 4990 वर्ष हुए जबकि महाराजा युधिष्ठर का चक्रवर्ती धर्मराज पृथ्वी में वर्त्तमान था। उस समय कोई मुसलमान, कोई ईसाई, कोई बौद्ध, कोई जैन इस भारतवर्ष में विद्यमान नहीं था।प्रत्युत सारे संसार में भी कहीं उनका चिन्ह तक न था। समस्त प्रजा वैदिकधर्म और शास्त्रोक्त कर्म में संलग्न थी।सदियों पश्चात जब अविद्या के कारण मद्यमाँस, व्याभिचार आदि इस देश में बढ़ने लगा।तब 2490 वर्ष बीते कि नेपाल प्रान्त में एक साखी सिंह नामक व्यक्ति ने जो नास्तिक था बुद्धमत चलाया।राजबल भी साथ था। उसी लोभ से बहुत से पेट पालक ब्राह्मण उसके साथ हो गए जिससे बुद्धमत सारे भारत में फैल गया। काशी, कश्मीर, कन्नौज के अतिरिक्त कोई नगर भारत में ऐसा न रहा जो बौद्ध न हो गया हो।जब यह मत बहुत बढ़ गया और लोग वेदधर्म से पतित हुए। यज्ञोपवीत आदि संस्कार छोड़ बैठे।तब दो सौ वर्ष के लगभग हुए कि एक महात्मा शंकर स्वामी (जिसे लोग स्वामी शंकराचार्य भी कहते हैं) ने कटिबद्ध हो शिष्यों सहित बौद्धों से शास्त्रार्थ करने आरम्भ किये। भला नास्तिक लोगों के हेत्वाभास वेद शास्त्रज्ञ के सम्मुख क्या प्रभाव डाल सकते थे ?

एक दो प्रसिद्ध स्थानों पर विजयी होने के कारण शंकर स्वामी का सिंहनाद दूर 2 तक गुंजायमान हो उठा। बहुत से राजाओं ने वैदिक धर्म स्वीकार कर लिया। दस बारह वर्ष में ही शंकराचार्य के शास्त्राथों के कारण समस्त देश के बौद्धों में हलचल मच गई। शंकराचार्य के शास्त्रार्थों में यह शर्तें होती थीं कि :-

(1) जो पराजित हो अर्थात शास्त्रार्थ में हारे वह दूसरे का धर्म स्वीकार करे।

(2) यदि साधू हो तो संन्यासी का शिष्य हो जाए।

(3) यदि यह दोनों बातें स्वीकार नहीं तो आर्यावर्त देश छोड़ जाये।

इन तीन नियमों के कारण करोड़ों बौद्ध और जैन पुनः वैदिक धर्म में आए और प्रायश्चित किया। उनको शंकर स्वामी ने गायत्री बताई। यज्ञोपवीत पहनाए। जो बहुत हठी थे और पक्षपात की अग्नि में जल रहे थे। इस प्रकार के लाखों व्यक्ति आर्यावर्त्त से निकल गए।राजाओं की ओर से कश्मीर, नैपाल, केपकुमारी, सूरत, बंगाल आदि भारत के सीमान्त स्थानों पर संन्यासियों के मठ बनाए गए और वहाँ सेना भी रही जिससे बौद्ध वापिस न आ सकें।

इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि भारत, जिससे व‌ह धर्म उत्पन्न हुआ और एक समय ऐसा भी आया जबकि सारा भारत बौद्ध था परन्तु अब उस भारत में उस मत का व्यक्ति भी दृष्टिगोचर नहीं होता।| भारत के चारों ओर लंका, ब्रह्मा, चीन, जापान, रूस, अफगानिस्तान, बलोचिस्तान आदि में करोडों बौद्ध हैं। जैनी अब भी भारत में बहुत न्यून अर्थात् 6-7 लाख हैं। यह लोग छिप छिप कर कहीं गुप्तरूप से रह गए। महात्मा शंकराचार्य जी 32 वर्ष की अवस्था में परलोक सिधार गए। अन्यथा देखते कि वही ऋषि मुनियों का युग पुनः लौट आता।शंकराचार्य की ओर से जन्म के जैनियों और बौद्धों के लिये केवल यही प्रायश्चित था कि एक दो दिन व्रत रखवा कर उन्हें यज्ञोपवीत पहनाया जाए और गायत्री मन्त्र बताया जाए। परिणामस्वरूप 25 करोड़ मनुष्य प्रायश्चित कर, गायत्री पढ़, यज्ञोपवीत पहन वर्णाश्रम धर्म में आ गये। जब कि चार पांच सौ वर्षों तक वह बौद्ध और जैन रहे थे। बौद्ध लोग वर्णाश्रम को नहीं मानते। खाना पीना भी उनका वेद विरुद्ध है। वह सब प्रकार का माँस खा लेते हैं। चीन के इतिहास और ब्रह्मा के वृत्तान्त से यह बात सब लोग ज्ञात कर सकते हैं। 1200 वर्ष हुए कि यहां पर मुसलमानों ने सूरत और अफगानिस्तान की ओर से चढ़ाई की। आर्यावर्त्त में वैदिक धर्म छूट जाने और पुराणों के प्रचार के कारण सैकड़ों मत थे। इन वेद विरुद्ध मतों के कारण घर घर में फूट हो रही थी। धर्म के न रहने और वाममार्ग के फैलने से व्याभिचार भी बहुत फैला हुआ था। व्याभिचार प्रसार तथा अल्पायु के विवाहों के कारण बल, शक्ति, ब्रह्मचर्य और उत्साह का नाश हो रहा था। ऐसी अवस्था में एक जंगली जाति का हमारे देश पर विजयी होना कौन सा कठिन कार्य था ? हमारी निर्बलता का एक स्पष्ट प्रमाण यह है कि सोमनाथ के युद्ध में महमूद के साथ 10-15 हजार सेना थी और हिन्दु राजाओं के पास 10-15 लाख सेना थी। परन्तु हिन्दु ही पराजित हुए और महमूद विजयी हुआ। आप जानते हैं कि सौ हजार का एक लाख होता है। मानो एक अफगान के सम्मुख सौ हिन्दु थे। ऐसे अवसर पर पराजित होने का कारण ब्रह्मचर्य की हानि और धर्माभाव ही था और कारण इसके अतिरिक्त न था।आप ध्यान से विचार कर ले। तारीखे हिन्द में लिखा है कि इस देश में सर्वप्रथम बापा (राजा चित्तौड़) एक मुसलमानी पर आसक्त होकर मुसलमान हो गया। परन्तु लज्जा से खुरासान चला गया और वहाँ ही मर गया। उसके पीछे उसका हिन्दु बेटा राजगद्दी पर बैठा।

दूसरा इस देश में सुखपाल (राजा लाहौर‌) धन और राज्य के लोभ से महमूद के समय में मुसलमान हो गया। जिस पर महमूद उसको राजा बना कर चला गया। महमूद के जाने के पश्चात वह पुनः हिन्दु हो गया और ब्राह्मणों ने उसे मिला लिया।

कश्मीर एक बादशाह के अत्याचार से बलपूर्वक मुसलमान किया गया था। अभी तक उनकी उपजातियां भट्ट कौल आदि हैं।

ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र इन सब में से जो-जो मुसलमान हुए, प्रायः बल प्रयोग से हुए। कोई भी प्रसन्नता, आनन्द अथवा इसलाम को पसन्द करके मुसलमान‌ नहीं हुआ।

बहुत से लोग जागीर आदि के लोभ से मुसलमान हुए जिनकी वंशावलियां स्पष्ट बताती हैं कि पिता पितामह अथवा दो तीन पीढ़ी से ऊपर वे हिन्दु थे।

बहुत से हिन्दु युवक मुसलमानी वैश्याओं के प्रेमपाश में बन्दी हो कर विधर्मीं हुए। जो अपने प्रेमियों को इसी दीन की शिक्षा दिया करती हैं।जिनके पहले और अब भी सहस्त्रों उदाहरण प्रत्येक प्रान्त और भाग में मिलते हैं।

बड़े-बड़े योग्य पण्डित भी वेश्याओं के अन्धकूप में डूब गये। उदाहरणार्थ गंगा लहरी के रचयिता जगन्नाथ शास्त्री हैं।

लाखों सूरमा वीर हृदय वाले महात्मा जान पर खेल कर धर्म पर बलि दे गये। शीश दिये किन्तु धर्म नहीं छोड़ा। दाहरणार्थ देखो शहीदगंज और टाड राजस्थान।

आप जानते हैं जब मुसलमान नहीं आए थे। तो उनकी जियारतें, कबरें, मकबरे, खानकाहें और गोरिस्तान भी इस देश में न थे जब 8-9 सौ वर्ष से मुसलमान आए तब से ही भारत में कबरपरस्ती शुरू हुई। अत्याचारी मुसलमान हिन्दु वीरों के हाथ से मारे गए। मुसलमानों ने उनको शहीद बना दिया और हिन्दुओं को जहन्नुम (नारकीय) शोक। शत सहस्त्र शोक |

हमारे पिता पितामहों की रक्तवाहिनी असिधारा ने जिन अत्याचारियों का वध किया, हमारे पूर्वजों के हाथों से जो लोग मर कर दोजख (नरकाग्नि) में पहुँचाए गए। हम अयोग्य सन्तान और कपूत पुत्र उन्हें शहीद समझ कर उन पर धूपदीप जलाते हैं। इस मूर्खता पर शोकातिशोक! अपमान की कोई सीमा नहीं रही। परमेश्वर ! यह दुर्गति कब तक रहेगी ?

ऐ हिन्दु भाइयो ! सारे भारत में जहां पक्के और ऊँचे कबरिस्तान देखते हो, वह लोग तुम्हारे ही पूर्वजों के हाथों से वध किये गये थे। उनके पूजने से तुम्हारी भलाई कभी और किसी प्रकार सम्भव नहीं। थ‌म अच्छी प्रकार सोच लो।

अगर पीरे मुर्दा बकारे आमदे।
जि शाहीन मुर्दा शिकार आमदे।।

यदि मरा हुआ पीर काम आ सकता तो मृत बाज भी शिकार कर सकते। मुसलमानों ने मन्दिर तोड़े, बुत तोड़े। लाखों का वध किया। इस कठोर आघात के कारण लोग मुसलमान हुए। देखो तैमूर का रोजनामचा (डायरी)

परन्तु भारत ऐसा दुर्भाग्यशाली न था कि ईरान, रोम, मिश्र और अरब की भाँति कभी न जागता। च 2 में जगाने वाले उसे जगाते रहे।

मुसलमानों के अत्याचार से ही सती प्रथा प्रचलित हुई ताकि ऐसा न हो कि वे निर्दयी देवियों को पकड़ कर खराब करें। रानी पद्ममनी का सती होना और अलाउद्दीन का अत्याचार। स घटना से सम्बन्धित इतिहास ध्यान से पढ़ो।

पहला प्रायश्चित – सबसे प्रथम आर्यावर्त में शंकराचार्य जी ने 25 करोड़ बौद्धों का प्रायश्चित करा उनको वैदिक धर्म में प्रविष्ट कराया।

दूसरा प्रायश्चित – महाराजा चन्द्रगुप्त ने किया अर्थात सल्यूकस-बावल के अधिपति (युनान के राजा) की पुत्री से विवाह किया जिसको आज दो सहस्त्र एक सौ वर्ष हुए।

तीसरा प्रायश्चित – राना उदयपुर ने किया जिसने ईरान के राजा नौशेरवां पारसी की कन्या से, जो कि कुस्तुन्तुनिया के राजा सारस की दोहती (दुहित्री) थी, उस से विवाह किया जिसे 13 सौ वर्ष हुए हैं।

चौथा प्रायश्चित – लाहौर के पण्डितों ने राजा सुखपाल का कराया जिसको आठ सौ वर्ष हुए हैं।

पाँचवां प्रायश्चित – मरदाना मुसलमान का बाबा नानक जी ने कराया जिस को चार पाँच सौ वर्ष हुए और उस के शव को खुर्जा में अग्नि में जलाया।

छठा प्रायश्चित – पण्डित बीरबल और राजा टोडरमल ने अकबर बादशाह का कराया, और उसका नाम महाबलि रखा। गायत्री सिखाई, पढ़ाई, यज्ञोपवीत पहनाया और हिन्दु बनाया। गोवध निषेध और मांसाहार से घृणा हो गई। उसने दाड़ी के साथ इसलाम को सलाम कर दिया। फुट नोट : वर्तमान इतिहासकारों ने अकबर का हिन्दु होना कहीं नहीं माना – अनुवादक|]आज्ञा दी कि जो हिन्दू भूल से, अज्ञान से, प्रेमपाश में बन्ध कर अथवा लोभ से मुसलमान हो गया हो।यदि वह अपने हिन्दु धर्म में आना चाहता हो तो वह स्वतन्त्र है। उसे मत रोको। यदि कोई हिन्दु स्त्री किसी मुसलमान के फन्दे में मुसलमान होना चाहे तो उसे कदापि मुसलमानी न बनने दिया जाए। प्रत्युत सम्बन्धियों को सौंपी जाए। विस्तार से देखो।(दबिस्ताने मजाहिब पृ.334, 338 शिक्षादश नवल किशोर)

सातवाँ प्रायश्चित – गुरु गोविन्द सिंह जी ने कराया। अत्याचारी औरंगजेब के समय में उन्होंने समस्त मजहबियों को सिंह बना कर वैदिक धर्म में सम्मिलित किया। इस के अतिरिक्त उन के दो सिख एक बार मुसलमानों नें पकड़ कर बलात् मुसलमान कर दिये थे। जब समय पाकर वह उन के पास आए तो उन को पुनः हिन्दु बना लिया। सिंह बनाया और धर्म में मिलाया।

आठवाँ प्रायश्चित -प्रतापमल ज्ञानी ने कराया। यह कार्य भी औरंगजेब बादशाह के समय में हुआ। जबकि एक हिन्दु लड़का मुसलमान हो गया था। उस को शुद्ध कर के वैदिक धर्म में मिलाया।(देखो दबिस्तान मजाहिब शिक्षा 10 पृ.239 सन् 1296 हिजरी नवल किशोर)

नवाँ प्रायश्चित – महाराजा रणजीत सिंह ने कराया। अपने और अपने कई सरदारों के लिए मुसलमानों की लड़कियां लीऔर उनको हिन्दु बनाया।

दसवाँ प्रायश्चित – महाराजा रणवीर सिंह जम्मू कश्मीर ने किया जब कि तीन राजपूत सिपाही लद्दाख में मुसलमान हो गए थे | बड़ी प्रसन्नता पूर्वक तीनों को पुनः हिन्दु धर्म में सम्मिलित किया। जम्मू के विद्वान पण्डितों ने रणवीर प्रकाश एक ग्रन्थ बनाया, जिस की दृष्टि से चालीस पचास वर्ष से मुसलमान हुए लोगों को हिन्दुधर्म में सम्मिलित किया जा सकता है। काशी के पण्डितों ने भी इस से सहमति प्रकट की और व्यवस्था दी। एक बहुत बड़ी पुस्तक प्रत्येक सभा को जम्मु से बिना मूल्य मिल सकती है।

ग्यारहवाँ प्रायश्चित – श्रीमान् स्वामी दयानन्द जी महाराज ने कराया अर्थात काजी मुहम्मद उमर साहिब सहारनपुर निवासी को मुसलमान से आर्य बनाया और वैदिक धर्म पर चलाया।वह अब देहरादून में ठेकेदार है। जिनका नाम अलखधारी है, और वह देहरादून समाज के सदस्य हैं।

बारहवाँ प्रायश्चित – स्वामी जी के परलोक गमन के पश्चात श्रीमती परोपकारिणी सभा ने कराया अर्थात श्री अबदुल अजीज साहिब को जो पंजाब यूनिवर्सिटी की मौलवी कालिज की डिग्री प्राप्त कर चुके हैं और जो अब गुरदासपुर (पंजाब) में असिस्टैंट कमिश्नर हैं [फुट नोट -‍ यह घटना आर्य पथिक की अपने काल की है – अनुवादक] शुद्ध किया और आर्य बनाया जिन का शुभ नाम अब राय बहादुर हरदस राम जी है।

तेरहवाँ प्रायश्चित – सन्त ज्वाला सिंह जी ने कराया जिन्होंने न्यूनातिन्यून चालीस मुसलमानों को वैदिक धर्म में लाकर शुद्ध किया।

चौदहवाँ प्रायश्चित – 14 वर्ष हुए श्री रामजी दास ईसाई ने सात लड़कों को ईसाई बनाया था। कसूर के पण्डितों और महात्मा लोगों ने उनको शुद्ध किया। ब वे लड़के अच्छे 2 पदों पर हैं।

पन्द्रहवाँ प्रायश्चित – आर्य समाज के सदस्यों ने किया अर्थात राजपुताना, पंजाब, पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्तादि में न्यूनातिन्यून दो सहस्त्र मुसलमानों, ईसाईयों और जैनियों को शुद्ध करके वैदिक धर्म में लाकर आर्य बनाया। सन्ध्या, गायत्री सिखा कर प्रायश्चित्त कराया। गौ ब्राह्मण का हितैषी बनाया। अन्धकार से निकलवाया। क्योंकि यह संख्या प्रतिदिन उन्नति पर है। अतः ठीक संख्या बताना कठिन है।

प्रिय भाईयो ! इस विनम्र प्रार्थना को पढ़ कर पांच मिनिट तक हृदय में विचार करो कि यदि आप इसी प्रकार बेसुध रहे तो आप की क्या अवस्था होगी।

आठ सौ वर्ष के अन्दर आप 24 करोड़् से न्यून होते होते 20 करोड़ रह गए।आप गणित विद्या जानते हैं।अरब अ मुतनासिब को कार्य में लाएं :-
प्रश्न
चार करोड़ हिन्दु आठ सौ वर्षों में मुसलमान हो गए तो 20 करोड़ कितने वर्षों में होंगे ?
उत्त
800 वर्ष * 20 करोड़्/ 4 करोड़ = उत्तर 4000 वर्ष में .भाइयो ! अवश्य सम्भलो। आँखें खोल कर देख लो। कुम्भकरण की निद्रा मत सोवो। धर्म नष्ट हो रहा है।

लोग वेद के धर्म को नष्ट कर रहे हैं।लोभ, लालच, धोखे में फंसा कर तुम्हारे बच्चों को म्लेच्छ बना रहे हैं। यदि आप इसी प्रकार सोते रहे।करवट न बदली तो 4000 वर्ष के पश्चात एक भी वैदिक धर्म का अनुयायी न रहेगा .सब म्लेच्छ हो जाएंगे। केवल यही एक नदी आप के धार्मिक भवन को गिराने वाली नहीं है .एक और नद भी अभी जारी हुआ है। उसका नाम ईसाई धर्म है।

दो सौ वर्ष का समय हुआ कि ईसाई पादरियों ने यहां आकर इंजील सुनानी शुरू की। उस समय इस देश में एक भी ईसाई न था। तुम्हारे बहुत से अकाल पीड़ित लोगों को मद्रास और अन्य भिन्न भागों में इन पादरियों ने लोभ देकर ईसाई बना लिया। सामायिक जन गणना से ज्ञात हुआ कि इस समय इसाई बीस लाख हैं।

क्या कभी आपने सोचा कि इस समय तक कितने ईसाई हो चुके हैं ? भाईयो ! परमेश्वर के लिये आँखें खोलो। नींद से जागो।मुख प्रक्षालन करके स्नान करो। अपनी अवस्था सम्भालो। तुम्हारे धर्मरूपी पेड़ को दोनों ओर से दीमक लग रही है। अपने आप को बचा लो। अन्यथा तुम्हारा ठिकाना न मिलेगा। चिह्न तक न रहेगा।

मद्रास आज कल सौभाग्यशाली है। जहां सैंकड़ों घरों ने, जो अकाल के कारण ईसाई हो गये थे, ईसाई धर्म छोड़ दिया है। ब्राह्मणों ने न सहस्त्र व्यक्तियों को वैदिक धर्म में मिला लिया है। ईसाई रो रहे हैं। कुछ बस नहीं चलता। तुम्हें भी चाहिए। दया करो। कृपा करो। अपने भोले भाले बेसमझ बच्चों का जीवन व्यर्थ न गंवाओ। जो शरण आये उसे ठीक कर लो। प्रायश्चित करा के शास्त्रोक्त रीति से शंकर स्वामी की भाँति, बाबा नानक की भाँति, चाणक्य ऋषि की भाँति, महाराजा रणवीर सिंह की भाँति मिला लो। अन्यथा स्मरण रखो कि मुसलमान और ईसाई रह करके वे जितनी हत्यायें करेंगे, उन सब का पाप तुम्हारे गले पर होगा। परोपकारी बनो। जगत् का भला करो। पिछड़े हुए भाईयों को प्रायश्चित से शुद्ध करके मिलाओ।

सन्दर्भ ग्रन्थ- कुलयात आर्य मुसाफिर

प्राप्तिकर्ता-Agnikart.com

पंडित जी का संक्षिप्त जीवन चरित इस लिंक से पढ़ सकते हैं-

https://agniveerfan.wordpress.com/2011/07/11/lekhram/

स्वामी श्रद्धानंद जी की अमर लेखनी से लिखा गया पंडित लेखराम जी का जीवन चरित आर्य पथिक लेखराम इस लिंक से पढ़े

http://vedickranti.in/books-details.php?action=view&book_id=88

%d bloggers like this: