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पुनर्जन्म या आगमन क्यों आवश्यक हैं?


rebirth
 
प्रातःकाल उद्यान में भ्रमण करते हुए आर्यजी और मौलाना साहब की भेंट हो गई। आर्य जी युनिवर्सिटी में प्राध्यापक थे व मौलाना साहब स्थानीय मस्जिद के इमाम। दोनों अच्छे मित्र थे। वार्तालाप करते हुए मौलाना साहब लाहौर स्थित मस्जिद पर आतंकवादी हमले का जिक्र कर बैठे तो आर्य जी बोले- मौलाना साहिब, निश्चित रूप से ये दरिंदे अगले जन्म में पशु बनेंगे।
मौलाना साहब: इस्लाम के अनुसार तो ये दोजख यानि नरक की आग में जलेंगे।
आर्य: मौलाना साहब, जरा ये तो बतायें कि यह दोजख कहाँ पर है !
मौ0 सा0: यह तो अल्लाह ही जानता है, पर इतना जरूर है कि बुरे काम करने वाला दोजख में जाता है।
आर्य: हमारे आसपास जो कुत्ता-सुअर आदि पशु हैं वे नरक का जीवन ही तो जी रहे हैं। जो जन्म से लंगड़े-लूले-अपाहिज हैं देखो उनका जीवन कितना कष्टदायक है! एक टूटी झोपड़ी में रहने वाले गरीब की तुलना अगर बंगलों में रहने वाले सेठ से की जाये तो पिछले जन्म में किये गये पापों का फल मिलना प्रत्यक्ष होता है।
मौ0सा0: परन्तु इस्लाम के अनुसार तो पुनर्जन्म होता ही नहीं है। अगर होता तो हमें पिछले जन्म की बात जरूर याद रहती– और किसी का अपाहिज या गरीब होना तो एक प्रकार से अल्लाह द्वारा उनकी परीक्षा लेना है कि विकट परिस्थितियों में वे अल्लाह ताला के ऊपर विश्वास बनाये रखते हैं और अपने आपको सच्चा मुसलमान साबित करते हैं या नहीं।
आर्य: अच्छा मौलाना जी जरा ये तो बताईए कि आप अपनी माता के गर्भ में नौ माह रहे थे। क्या आपको याद है? क्या अपने जन्म से लेकर पाँच वर्ष तक की आयु में किये गये कार्य आपको याद हैं? क्या आपरेशन के दौरान बेहोश किए गए मरीज को यह याद रहता है कि उसकी चिकित्सा किस प्रकार की गई थी? कभी बुढ़ापे में याददाश्त खो जाने पर व्यक्ति की इस जन्म की स्मृतियाँ तक लोप हो जाती हैं तो हमें पूर्वजन्मों की स्मृतियाँ किस प्रकार स्मरण रहेंगी? आगे अगर सभी व्यक्तियों को पूर्वजन्म का स्मरण हो जाये तो सांसारिक व्यवस्था भी अव्यवस्थित हो जायेंगी क्योंकि अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना अथवा कत्ल से हुई होगी इस जन्म में वह किस प्रकार अपने सामाजिक संबंधों को बनाए रखेगा? इसलिए जिस प्रकार पानी को देखकर वर्षा का, कार्य को देखकर कारण का विद्वान लोग अनुमान लगा लेते हैं उसी प्रकार जन्मजात बिमारियों को देखकर पूर्वजन्म में किये गये कर्मों का अनुमान हो जाता है।
मौ0सा0: आपकी बातों में दम तो है पर अल्लाह द्वारा परीक्षा लेने वाली बात में क्या बुराई है?
आर्य: ईश्वर को न्यायकारी कहा गया है। वह यूँ ही नहीं एक आत्मा को मनुष्य के शरीर से निकालकर सूअर आदि पशु के शरीर में प्रविष्ठ करा देते हैं। अगर ऐसा करने लगे तो ईश्वर की न्यायकारिता पर संशय उत्पन्न हो जायेगा। किसी मनुष्य ने चोरी नहीं की पर उसे कारागार में डाल दिया जाये, किसी मनुष्य ने पाप नहीं किया और उसकी आंखें निकाल ली जायें या उसे अपाहिज बना दिया जाये और उसे कहा जाये कि ऐसा तुम्हारी परीक्षा के लिए किया जा रहा है तो उसे अत्याचार ही कहा जायेगा। आप बताईये अगर आपको किसी दूसरे द्वारा किये गये कत्ल की सजा में आजीवन कारावास का दण्ड दिया जाये तो आप उसे परीक्षा कहेंगे या अत्याचार? अल्लाह या ईश्वर सर्वज्ञ हैं अर्थात् सब कुछ जानने वाला हैं तो क्या वह अपने द्वारा ली जाने वाली परीक्षा का परिणाम नहीं जानता है?
मौ0 सा0: बिल्कुल सही। इसी प्रकार ईश्वर भी न्यायकारी तभी कहलायेगा जब वह सज्जनों को सत्कार व दुर्जनो को दण्ड देगा। इसलिए जन्मजात बिमारियों में फंसे हुओं को देखकर इस बात का अनुमान लगाना सहज है कि ये पूर्वजन्म में किये गये पापों का फल है।
मौ0सा0: क्या कभी किसी का पुनर्जन्म से छुटकारा होता है?
आर्य: मनुष्य जब पूर्ण सत्यवादी, प्रभुभक्त, उपासक एवं संयमी जीवन जीते हुए, परमेश्वर की उपासना करते हुए अपने नित्य कार्य करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं, तब वे पुनर्जन्म से छुटकारा पा लेते हैं। पर बाईबिल वर्णित ईश्वर के दूत यीशु मसीह पर विश्वास लाने मात्रा से अथवा कुरान में वर्णित अल्लाह पर ईमान या विश्वास लाने मात्रा से पापों से मुक्ति नहीं मिलती। इसके लिए शुभ कार्य, मन की स्वच्छता, आत्मा की पवित्राता, श्रेष्ठ आचरण, प्राणीमात्र से प्रेमभाव अत्यंत आवश्यक हैं। मोक्ष के लिए कोई छोटा रास्ता भी नहीं है। आपको शॉर्टकट बताकर मूर्ख बनाने वाले अनेकों मिल जायेंगे पर उस सर्वज्ञ, सर्वहितकारी ईश्वर को प्राप्त करने के लिए आपको ही प्रयासरत रहना होगा। उसी से आत्मा शुद्ध होकर मोक्ष रूपी अनंत सुख की पात्र बनेगी।
मौ0सा0: पशु तो अपनी योनि में प्रसन्न रहते हैं। उनको किस प्रकार दण्ड योनि माना जा सकता है?
आर्य: पशु योनि में आत्मा अपनी उन्नति कर उच्च योनियों में प्रवेश नहीं कर सकती और आत्मिक आनंद को प्राप्त नहीं कर सकती। पशु योनि एक प्रकार से सुधार योनि है। उस योनि में पशु एक सीमा तक गतिविधियाँ कर सकता है पर पूर्णतः स्वतंत्रा नहीं होता। उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि वह प्रसन्न है पर यह भ्रम है। अगर पशु योनि इतनी ही अच्छी होती तो मनुष्यों को कभी ईश्वर से कुत्ता-गधा या सूअर बनने की प्रार्थना करते क्यों नहीं देखा जाता? तर्कशास्त्रा का सिद्धांत है कि मनुष्य और पशु में मूल रूप से अंतर बुद्धि का है। यदि मनुष्य बुद्धि से प्रतिकूल होकर चलता है तो वह पशु के समान काम करता है और वेद में बुद्धि को ईश्वर की सबसे बड़ी देन कहा गया है। आप ही देखें एक बुद्धिजीवी व्यक्ति समाज का कितना उपकार कर सकता है जबकि एक मंदबुद्धि व्यक्ति समाज में अपना सहयोग नहीं दे पाता। इसलिए बुद्धि सर्वोपरि है। मनन करने वाले को मनुष्य कहते हैं और मनन करने के लिए बुद्धि परम आवश्यक है इसलिए पशु योनि एक अभिशाप, एक दण्ड के समान हैं न कि प्रसन्न रहने की योनि है।
मौ0 सा0: अगर मोक्ष ही जीवन का मूल उद्देश्य है तो ईश्वर सभी आत्माओं को मोक्ष प्रदान करके उन्हें पुनर्जन्म के झंझट से ही क्यों नहीं मुक्ति दिला देता है?
आर्य: मौलाना जी, आपने बढ़िया प्रश्न किया है। ईश्वर, जीवात्माएँ एवं प्रकृति ये तीन अनादि (अर्थात् आरंभ से रहित) तत्व हैं। ईश्वर ने आत्माओं को उत्पन्न नहीं किया है। सृष्टि की रचना कर ईश्वर आत्माओं के लिए कर्म करने का अवसर प्रदान करते हैं। शरीर एवं आत्मा का मेल जन्म व अलग होना मृत्यु कहलाता है। सृष्टि की रचना के पश्चात् आत्माओं को वेद विद्या का ज्ञान देकर ईश्वर उन्हें दुःखों से छूट जाने अर्थात् मोक्ष की प्रेरणा प्रदान करते हैं। आत्माएं कर्म करने के लिए मुक्त हैं पर कर्मों के फल पाने के लिए बंधित है। जो जैसा कर्म करेगा वैसा फल पायेगा। इसलिए ईश्वर वेद ज्ञान द्वारा प्राणियों को मोक्ष प्राप्ति का ध्येय प्राप्त करने की प्रेरणा देते हैं। अगर आत्माएँ ईश्वर ने बनाई होतीं तो जैसा कि हम ईश्वर की सम्पूर्णता के विषय में जानते हैं कि उसकी बनाई किसी वस्तु में खोट नहीं होता तो जीवात्मा भी ईश्वर द्वारा बनाए जाने पर कभी पाप के लिए प्रवृत्त नहीं होती। अगर कोई कहे कि जीवात्माएँ ईश्वर का अंश है तो भी वह ईश्वर के अविभाजित (जिसके टुकड़े नहीं हो सकते।) गुण के विपरीत तर्क हैं। बाईबिल वर्णित ईश्वर पहले सृष्टि निर्माण करता है, फिर आदम और हव्वा को बनाता है, फिर पाप के फलों द्वारा वृक्ष बनाकर हव्वा को बहकाने के लिए शैतान को बनाता है, फिर हव्वा को पापी कहकर उसे प्रसव पीड़ा का दण्ड देता है। फिर दूत यीशु मसीह पर विश्वास लाने वाले की पापों से मुक्ति का प्रपंच करता है। आप ही बताईये सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) ईश्वर क्या शैतान, हव्वा और पापी फल वाले पेड़ को बनाने से पहले यह नहीं जानता था कि उनका क्या हश्र होगा? अगर कोई पिता किसी के यहाँ पर चोरी करें तो क्या उसकी सजा उसके बेटे को देंगे? यह कहाँ तक न्यायकारी होगा। अब कुरान वर्णित ईश्वर को लें। पहले वह ज्ञान से अनभिज्ञ मनुष्यों को उत्पन्न करता है, फिर लम्बे समय बाद उन्हें कभी तोरैत, कभी जबूर, कभी इंजिल और अंत में कुरान का ज्ञान देता है और केवल कुरान, अल्लाह व रसूल पर ईमान लाने वाले को जन्नत बख्शता है। भला कुरान व रसूल के उद्भव से पहले जिन रूहों ने यहाँ जन्म लिया उनका क्या बना और गैर मुसलमान कभी जन्नत नहीं जा पाएँगे क्योंकि वे कभी कुरान पर ईमान नहीं लाये तो फिर कुरान वर्णित अल्लाह ने गैर मुसलमानों को बनाया ही क्यों? इससे एक तो अल्लाह पक्षपाती सिद्ध हुआ दूसरा उसकी रचना में कमियाँ मिलती हैं जो अल्लाह के गुणों के विपरीत बात है।
अतः ईश्वर, जीवात्माएँ एवं प्रकृति तीनों अनादि हैं। सृष्टि प्रवाह से अनादि है। ईश्वर सृष्टि के आरंभ में ही वेद द्वारा जीवात्माओं को ज्ञान प्रदान कर श्रेष्ठ कर्म कर मोक्ष प्राप्त करने की प्रेरणा देता है, यही सिद्धान्त तर्कसंगत व एकमात्रा सत्य कथन है। यजुर्वेद 31/7 में ईश्वर स्पष्ट रूप से कहते हैं- सर्वान्तर्यामी और सर्वव्यापक परमात्मा ने जगत पर कृपा करके, इसकी भलाई के लिए वेदों का प्रकाश किया, जिससे कि अज्ञान से निकल कर, ज्ञान की ओर अग्रसर हों और आध्यात्मिक प्रकाश से मन की आँखों को सुप्रकाशित करें।
मौ0सा0: वेदों में वर्णित ईश्वर पाप करने पर पशु योनि में जन्म देता है जबकि कुरान वर्णित अल्लाह ईमान लाने पर पापों को क्षमा कर जन्नत बख्शता है। इससे तो अल्लाह ज्यादा रहमदिल हुआ।
आर्य जी: मौलाना साहब। मैं हैरान हूँ कि आप पाप क्षमा होने वाली बात पर कैसे विश्वास कर सकते हैं! आप स्वीकारते हैं कि अल्लाह ताला न्यायकारी है। न्याय उसी को कहते हैं कि जो जितना करे, उसको वैसा और उतना ही फल देना। फिर क्षमा कैसी? हजरत! क्षमा, सिफारिश और रिश्वत ये सब ऐसे मन्तव्य हैं कि जिनसे सर्वेश्वर और सर्वज्ञ परमात्मा पर अन्याय व अत्याचार का दोष लगता है और अगर बाईबल व कुरान वर्णित पाप क्षमा होने की बात को माना जाये तो यह संसार में पापों की प्रवृत्ति को बढ़ाने वाली बात है। जरा बताईये अगर कोई व्यक्ति किसी का कत्ल कर दे व गिरिजाघर में जाकर यीशु मसीह के समक्ष अपने पाप का बखान कर क्षमा माँग ले तो क्या वह दण्ड से मुक्त हो जायेगा। अगर हाँ तो अगली बार वह इससे दुगुना पाप करेगा और फिर जाकर क्षमा माँग लेगा। अगर ऐसा होने लगा तो समाज में अराजकता फैल जायेगी व हर कोई पाप करेगा और माफी मांगकर फिर पाप करते रहेंगे। ईश्वर उसी को जन्नत अर्थात सुख देता है जो उसके बताये मार्ग पर चलता है। जो भी पाप कर्म छोड़कर पुण्य कर्म कर सदाचारी बनेगा ईश्वर उस पर निस्संदेह कृपादृष्टि करेगा।
मौ0सा0: अगर मनुष्य का जन्म पूर्व जन्म में किये गये पुण्यों से होता है तो एक विद्यार्थी को शिक्षा ग्रहण करने में कितने दुःख उठाने पड़ते हैं। इससे तो ईश्वर अन्यायकारी सिद्ध हुआ जो पूर्वजन्म में किये गये पुण्यों के बदले उसे इस जन्म में दुःख रूपी कष्ट दिया।
आर्य: सर्वप्रथम विद्यार्थी को शिक्षा ग्रहण करने में परिश्रम करना पड़ता है वह दुःख नहीं अपितु तप है। श्रेष्ठ कार्यों को करने में जो कष्ट उठाने पड़ते हैं उसे दुःख नहीं अपितु तप कहते हैं। तप करने से व्यक्ति उन्नति करता है। और हमारे कर्मों के करने पर जो दुःख होता है उन्हें ईश्वर दूर नहीं करता बल्कि हमें उनसे लड़ने के लिए धैर्य या आत्मबल प्रदान करता है। इसलिए विद्यार्थी को विद्याग्रहण करने के समय होने वाले तप को दुःख कहना ही गलत है। इसे पूर्व जन्म में किये गए पुण्यों का फल ही मानना चाहिए जो इस जन्म में व्यक्ति को तप कर महान बनने का अवसर प्रदान करते हैं अन्यथा एक गुणरहित, आलसी, मूर्ख व संस्कारहीन व्यक्ति की संसार में कोई भी प्रशंसा नहीं करता।
मौ0 सा0: यहाँ तक तो ठीक है, आर्य जी! पर क्या आपके धर्मग्रंथ जिसमें रामायण-महाभारत, वेद आदि पुनर्जन्म के विषय में प्रकाश डालते हैं?
आर्य: बिल्कुल वेदादि शास्त्रों के प्रमाण तो स्वयं वेदों के प्रकाण्ड पण्डित स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ में दिये हैं जैसे:-
1- हे सुखदायक परमेश्वर! आप कृपा करके पुनर्जन्म में हमारे बीच में उत्तम नेत्रा आदि सब इन्द्रियाँ स्थाप कीजिये। (ऋग्वेद 8/1/23/6)
2- परमेश्वर कृपा करके सब जन्मों में हमको सब दुःख निवारण करने वाली पथ्यरूप स्वस्ति को देवे। (ऋग्वेद 8/1/23/7)
3- परमेश्वर सब बुरे कामों और सब दुःखों से पुनर्जन्म में अलग रखें। (यजुर्वेद 4/15)
4- हे जगदीश्वर! आपकी कृपा से पुनर्जन्म में मन आदि ग्यारह इन्द्रियाँ मुझको प्राप्त हों। (अथर्ववेद 7/6/67/1)
5- जो मनुष्य पूर्वजन्म में धर्माचरण करता है उस धर्माचरण के फल से अनेक उत्तम शरीरों को धारण करता है। (अथर्ववेद 5/1/1/2)
6- जीव अपने पाप और पुण्यों के आधार पर मनुष्य या पशु आदि अगले जन्म में बनते हैं। (यजुर्वेद 19/47)
7- श्री रामचन्द्र जी श्रीलक्ष्मण जी से कहते हैं:- लक्ष्मण! पूर्वजन्म में मैंनें अवश्य ही बारम्बार ऐसे कर्म किये हैं, जिनके कारण मैं आज दुःख में फंस गया हूँ। राज से भ्रष्ट हुआ, इष्ट मित्रों से बिछुड़ गया, पिता की मृत्यु हुई, माता-पिता से वियोग हुआ, हे लक्ष्मण! हमें ये सब शोक पूर्वजन्म के पापों के फलस्वरूप ही प्राप्त हुए हैं।
(वाल्मीकि रामायण, अरण्यकाण्ड, सर्ग 63, श्लोक 4,5)
8- हे अर्जुन! मेरे और तेरे अनेक जन्म हो चुके हैं। मैं योग विद्या के बल से उन सबको जानता हूँ। परन्तु तू नहीं जानता। प्रत्येक मनुष्य को अपने-अपने शुभ या अशुभ कर्मों का फल तो अवश्य ही भोगना पड़ता है। (गीता)
मौ0 सा0: आर्यजी, आपने अपनी धर्मपुस्तकों से तो प्रमाण दे दिये परन्तु हम तो केवल कुरान को मानते हैं और कुरान में पुनर्जन्म का कोई भी प्रमाण नहीं है।
आर्य जी: ऐसा नहीं है मौलाना साहब! कुरान में पुनर्जन्म के अनेक प्रमाण हैं। किन्तु स्वार्थवश लोग उनको नहीं देखते हुए भी नहीं देखते। बिना विद्या के पूर्वाग्रहों और धारणाओं को तोड़ना आसान नहीं होता। देखिये पुनर्जन्म ेके विषय में कुरान शरीफ में क्या कहा है-
(1) सूरा 22, अल-हज, आयत 66- और वही है जिसने तुम्हें जीवन प्रदान किया। फिर वही तुम्हें मृत्यु देता है और वही तुम्हें जीवित करने वाला है। पेज- 292
(2) सूरा 23, अल-मोमिनून-आयत 15, 16। पेज 294
(3) सूरा 23, अल मोमीनून- आयत 100। पेज 300
(4) सूरा 7, अल आराफ, आयत 29, पेज 129
संस्करण (मधु संदेश संगम) अनुवादक: मौलाना-मुहम्मद फारूक खाँ व डॉ0 मुहम्मद अहमद)
मौलाना – बस बस आर्य जी, मुझे पता नहीं क्या हो गया है, लगता है जैसे आज तक बालू में से तेल निकालने का प्रयास करता रहा। मैं आपकी इन बातों पर मन से विचार करूँगा। इस्लामी विद्वानों से शंका समाधान करना बहुत मुश्किल है क्योंकि उनका अंधविश्वास हैं कि मजहब में अक्ल का दखल नहीं। लेकिन आपकी बातों से मेरी आंखें खुल रही हैं। आप बस कहीं से मुझे सत्यार्थ-प्रकाश उपलब्ध करा दीजिये।
आर्य – अरे नहीं मौलाना साहब, आप सात्त्विक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। इसलिए आपके अन्दर जिज्ञासा उत्पन्न हो रही है। यह परमेश्वर की कृपा है। मेरा आपसे कोई आग्रह नहीं है। बस आप मेरे मित्रा हैं इसलिए मैं अपने आप को आपको सत्य मार्ग बतलाने से रोक नहीं सका। अगली भेंट में मैं आपको स्वामी दयानन्द द्वारा लिखित सत्यार्थ- प्रकाश भंेट करूँगा। परमात्मा हम सब की बुद्धियों को प्रकाशित करे ताकि हम सत्य और असत्य को जानकर सत्य को ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सक्षम हो सकें।
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Khwaja Muinuddin Chisti / Nizamuddin Auliya – The Real Face


ajmer sharif

Khwaja Muinuddin Chisti  is regarded as foremost preacher of Sufism among Sufis of India. the belief of Akbar , the mughal emperor that it was his  blessings which lead him a  son and the heir for the mughal throne started trend among people for fulfilling wishes by offering prayer at his mazar. Though people sings more about his miracles but very few are aware of the fact about real stand of last Hindu ruler of our country Prithviraj Chauhan and Khwaja Muinuddin Chisti. Stories have been exaggerated to show Khwaja as mystic with high spiritual powers but truth is nonthe else. The belief of Khwaja in shariat and support to Muslim invader Muhammad Gori in establishment of Islamic rule in India clearly outlines his inclination towards Islam. We will take few examples from his life which will create doubts in our mind about his so called secular? Stand. The fawaidu’l –fu’ad says that when Khwaja arrived in Delhi from Lahore seven hundred people (Hindus), besides hamidu’din – din dihlawi, embrace Islam (ref- page 117 vol. 1 a history of Sufism in India –Saiyid Athar Abbas Rizvi).

Khwaja Ajmer visit is mentioned as full of miracles (exaggerated stories). Since Khwaja arrival in Ajmer caused lot of disputes with prithviraj.

1.    Reaching there he decided to sit under a tree, but camel keepers ordered him away as the area belonged to the raj.

(The truth was that camels keeping area was Prithviraj army area in which locals were not allowed. A story has been propagated that due to Khwaja wished that none of the camels were able to stand on their legs. It was only when raI’s officials came and pleaded for guilty Khwaja made them well.  )

2.     The Khwaja and his followers moved to a place near the Anasagar Lake. His servants killed a cow and cooked kebabs for him. Some members of the khwaja’s party went to anasagar and the others to Pansela Lake for ablutions. There were one thousand temples on the two lakes. The Brahmans stopped the ablutions and the party complained to the Khwaja. He sent his servant to bring water for his ewer. As soon as the ewer touched the Pansela Lake, all the lakes, tanks and wells around became dry. The Khwaja went to the anasagar lake temple and asked the name of the idol. He was told it was called sawi deva. The Khwaja asked whether the idol had talked to them. On receiving a negative reply he made the idol recite kalmia and converted it into a human being, naming it sa’di. This caused a sensation in the town. Prithviraj ordered his Prime Minister Jaipal who was also a magician, to avert the evil influence of the Khwaja. Jaipal proceeded to fight the Khwaja with 700 magical dragons, 1500 magical discs and 700 disciples. The Khwaja drew a circle bringing his party within it under his protection , and succeeded in killing all the dragons and disciples. Pithaura and jaipal begged the Khwaja forgiveness. The Khwaja prayer restored water to the lakes, tanks and wells. A large number of people accepted Islam. Pithaura refused tom accept Islam and the Khwaja prophesied he would be handed over to the Islamic army.(ref- ali asghar chisti- jawahir-I faridi , Lahore 1884, pp.155-160 )

(The truth was that This area was considered as sacred by Hindus and killing cow who is also considered as sacred  was heinous crime. the visit of Khwaja to anasagar lake temple caused many controversies as Hindus were not in favor of cow meat eater. second if Khwaja was so powerful then why Muhammad Gori was defeated in first war against Prithviraj Chauhan, it was only in the second war and that also along with combined forces of King Jaichand, father of Prithviraj wife’s Sayogita helped Mohammad Gori  than only Prithviraj lost the war. Rest all stories are myths in which no wise person will belief.  )

3.    Sheikh Nizamuddin-din Auliya believed that when Khwaja Muinuddin reached Ajmer, India was ruled by Pithaura rai’s (Prithvi Raj Chauhan) and his capital was Ajmer. Pithaura and his high officials resented the sheik’s presence in their city, but the latter’s eminence and his apparent power to perform miracles, prompted them to refrain from taking action against him. A disciple of the Khwaja’s was in the service of Prithviraj Raj’s. After the disciple began o receive hostile treatment from the rajs, the Khwaja sent a message to Pithaura in favor of the Muslim. Pithaura refused to accept the recommendation, thus indicating his resentment of, the khwaja’s alleged claims to understand the secrets of the unseen. When Khwaja mu’inu’d-din heard of this reply he prophesied: “We have seized Pithaura alive and handed him over to the army of Islam.” about the same time sultan Muhammad Gori arrived from ghazna, attacked the forces of Pithaura and defeated them. Pithaura was taken alive and thus the khwaja’s prophesy was fulfilled. (Ref- amir khwurd, siyaru’l – auliya, delhi,1885,pp.45-47)

(The above reference is by a renowned Sufi nizamuddin auliya for another Sufi clears their stand for Islam. they are considered as preachers of brotherhood and humanity. The above reference exposes their attitude towards Hindus.)

दरगाह अजमेर शरीफ और हिन्दुओं की अज्ञानता


डॉ विवेक आर्य

पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी की भारत यात्रा का नया शगूफा अजमेर की यात्रा और ख्वाजा गरीब नवाज़ की दरगाह पर जाकर मन्नत मांगना. इस यात्रा के दो मुख्य पहलु हैं एक राजनैतिक जो इस लेख का विषय नहीं हैं दूसरा धार्मिक जिसमें विशेष रूप से अजमेर की यात्रा हैं. यह ख्वाजा मुइनुद्दीन चिस्ती जिन्हें गरीब नवाज़ भी कहा जाता हैं कौन थे? यह इतने प्रसिद्ध कैसे हो गए? क्या उनकी दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने से हिंदुयों का भला होता हैं? क्या उनकी दरगाह पर मन्नत मांगने वालो की सभी मन्नते पूरी होती हैं?

कहाँ से आये थे? इन्होने हिंदुस्तान में क्या किया और इनकी कब्र पर चादर चदाने से हमे सफलता कैसे प्राप्त होती हैं? गरीब नवाज़ का जन्म ११४१ में अफगानिस्तान में हुआ था .गरीब नवाज़ भारत में लूटपाट करने वाले , हिन्दू मंदिरों का विध्वंश करने वाले ,भारत के अंतिम हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान को हराने वाले व जबरदस्ती धर्म परिवर्तन करने वाले मुहम्मद गौरी के साथ भारत में शांति का पैगाम? लेकर आये थे.पहले वे दिल्ली के पास आकर रुके फिर अजमेर जाते हुए उन्होंने करीब ७०० हिन्दुओ को इस्लाम में दीक्षित किया(Ref- page 117 vol. 1 a history of Sufism in India –Saiyid Athar Abbas Rizvi). अजमेर में वे जिस स्थान पर रुके उस स्थान पर तत्कालीन हिन्दू राजा पृथ्वी राज चौहान का राज्य था. ख्वाजा के बारे में चमत्कारों की अनेको कहानियां प्रसिद्ध हैं की जब राजा पृथ्वी राज के सैनिको ने ख्वाजा के वहां पर रुकने का विरोध किया क्योंकि वह स्थान राज्य सेना के ऊँटो को रखने का था तो पहले तो ख्वाजा ने मना कर दिया फिर क्रोधित होकर शाप दे दिया की जाओ तुम्हारा कोई भी ऊंट वापिस उठ नहीं सकेगा. जब राजा के कर्मचारियों नें देखा की वास्तव में ऊंट उठ नहीं पा रहे हैं तो वे ख्वाजा से माफ़ी मांगने आये और फिर कहीं जाकर ख्वाजा ने ऊँटो को दुरुस्त कर दिया. दूसरी कहानी अजमेर स्थित आनासागर झील की हैं. ख्वाजा अपने खादिमो के साथ वहां पहुंचे और उन्होंने एक गाय को मारकर उसका कबाब बनाकर खाया.कुछ खादिम पनसिला झील पर चले गए कुछ आनासागर झील पर ही रह गए .उस समय दोनों झीलों के किनारे करीब १००० हिन्दू मंदिर थे, हिन्दू ब्राह्मणों ने मुसलमानों के वहां पर आने का विरोध किया और ख्वाजा से शिकायत करी.ख्वाजा ने तब एक खादिम को सुराही भरकर पानी लाने को बोला.जैसे ही सुराही को पानी में डाला तभी दोनों झीलों का सारा पानी सुख गया. ख्वाजा फिर झील के पास गए और वहां स्थित मूर्ति को सजीव कर उससे कलमा पढवाया और उसका नाम सादी रख दिया.ख्वाजा के इस चमत्कार की सारे नगर में चर्चा फैल गयी. पृथ्वीराज चौहान ने अपने प्रधान मंत्री जयपाल को ख्वाजा को काबू करने के लिए भेजा. मंत्री जयपाल ने अपनी सारी कोशिश कर डाली पर असफल रहा और ख्वाजा नें उसकी सारी शक्तिओ को खत्म कर दिया. राजा पृथ्वीराज चौहान सहित सभी लोग ख्वाजा से क्षमा मांगने आये. काफी लोगो नें इस्लाम कबूल किया पर पृथ्वीराज चौहान ने इस्लाम कबूलने इंकार कर दिया. तब ख्वाजा नें भविष्यवाणी करी की पृथ्वी राज को जल्द ही बंदी बना कर इस्लामिक सेना के हवाले कर दिया जायेगा..(Ref- ali asghar chisti- jawahir-I faridi , Lahore 1884, pp.155-160 ) .बुद्धिमान पाठकगन स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं की इस प्रकार के करिश्मो को सुनकर कोई मुर्ख ही इन बातों पर विश्वास ला सकता हैं

निजामुद्दीन औलिया जिसकी दरगाह दिल्ली में स्थित हैं ने भी ख्वाजा का स्मरण करते हुए कुछ ऐसा ही लिखा हैं. उनका लिखना हैं की न चाहते हुए भी ख्वाजा की चमत्कारी शक्तियों के कारण पृथ्वीराज चौहान को ख्वाजा का अजमेर में रहना स्वीकार करना पड़ा. ख्वाजा का एक खादिम जो की मुस्लिम था से पृथ्वीराज किसी कारण से असंतुष्ट हो गया. तब ख्वाजा ने पृथ्वीराज को उस पर कृपा दृष्टि बनाये रखने के लिए कहा जिसे पृथ्वीराज ने मना कर दिया. इस पर ख्वाजा ने भविष्यवाणी कही की कुछ ही समय में पृथ्वीराज को पकड़ कर इस्लाम कि सेना के हवाले कर दिया जायेगा और कुछ समय बाद मुआम्मद गोरी ने आक्रमण कर पृथ्वीराज के राज्य का अंत कर दिया.(Ref- amir khwurd, siyaru’l – auliya, delhi,1885,pp.45-47)

भारत से सदा सदा के लिए हिन्दू वैदिक धर्म का राज्य मिताने वाले ख्वाजा गरीब नवाज़ कि दरगाह पर जाकर मन्नत मांगने वालों से , पूरे देश में स्थान स्थान पर बनी कब्रों पर हर वीरवार को जाकर मन्नत करने वालों से मेरे कुछ प्रश्न हैं-

१.क्या एक कब्र जिसमे मुर्दे की लाश मिट्टी में बदल चूँकि हैं वो किसी की मनोकामना पूरी कर सकती हैं?

२. सभी कब्र उन मुसलमानों की हैं जो हमारे पूर्वजो से लड़ते हुए मारे गए थे, उनकी कब्रों पर जाकर मन्नत मांगना क्या उन वीर पूर्वजो का अपमान नहीं हैं जिन्होंने अपने प्राण धर्म रक्षा करते की बलि वेदी पर समर्पित कर दियें थे?

३. क्या हिन्दुओ के राम, कृष्ण अथवा ३३ करोड़ देवी देवता शक्तिहीन हो चुकें हैं जो मुसलमानों की कब्रों पर सर पटकने के लिए जाना आवश्यक हैं?

४. जब गीता में श्री कृष्ण जी महाराज ने कहाँ हैं की कर्म करने से ही सफलता प्राप्त होती हैं तो मजारों में दुआ मांगने से क्या हासिल होगा?

५. भला किसी मुस्लिम देश में वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, हरी सिंह नलवा आदि वीरो की स्मृति में कोई स्मारक आदि बनाकर उन्हें पूजा जाता हैं तो भला हमारे ही देश पर आक्रमण करने वालो की कब्र पर हम क्यों शीश झुकाते हैं?

६. क्या संसार में इससे बड़ी मुर्खता का प्रमाण आपको मिल सकता हैं?

७. हिन्दू जाति कौन सी ऐसी अध्यात्मिक प्रगति मुसलमानों की कब्रों की पूजा कर प्राप्त कर रहीं हैं जो वेदों- उपनिषदों में कहीं नहीं गयीं हैं?

८. कब्र पूजा को हिन्दू मुस्लिम एकता की मिसाल और सेकुलरता की निशानी बताना हिन्दुओ को अँधेरे में रखना नहीं तो क्या हैं ?

आशा हैं इस लेख को पढ़ कर आपकी बुद्धि में कुछ प्रकाश हुआ होगा . अगर आप आर्य राजा राम और कृष्ण जी महाराज की संतान हैं तो तत्काल इस मुर्खता पूर्ण अंधविश्वास को छोड़ दे और अन्य हिन्दुओ को भी इस बारे में बता कर उनका अंध विश्वास दूर करे.

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कट्टरपंथी टीपू सुल्तान- एक जेहादी गिध्ध


(कुलदीप सिंह)

टीपू सुल्तान (१७८६-१७९९)

तथाकथित अकबर महान के पश्चात हमारे मार्किसस्ट इतिहासज्ञों की दुष्टि में सैक्यूलरवाद, प्रजातंत्र, उपनिवेशवाद विरोधी व सहिष्णुता का निष्कर्ष निकालने के लिए टीपू सुल्तान एक जीता जागता, सशरीर सुविधाजनक उदाहरण या नमूना हैं किन्तु सामयिक प्रलेखों (सुरा ९ आयत ७३) से पूर्णतः स्पष्ट है कि धार्मिक आदेशों से प्रोत्साहित कुर्ग और मलाबार के हिन्दुओं पर टीपू के अत्याचार और यातानाएं उन क्षेत्रों के इतिहास में अनुपम एवम्‌ अद्वितीय ही थे। उपर्लिखित इतिहासज्ञों (मार्किसस्टों) की, नस्ल ने, टीपू को, उसके द्वारा किये गये बर्बर अतयाचारों को पूर्णतः दबा, छिपा कर, आतताई को सैक्यूलरवादी, राष्ट्रवादी, देवतातुल्य, प्रमाणित व प्रस्तुत करने में कोई भी, कैसी भी, कमी नहीं रखी है, ताकि हम, मूर्ति पूजकों की पृथक-पृथक मूर्ख जाति, जो छद्‌म देवताओं की भी पूजा कर लेते हैं,उसे वैसा ही मान लें। और सत्य तो यह है कि बहुतांश में ये इतिहासकार अपने इस कुटिल उद्‌देश्य में, भले को पूरी तरह नहीं, सफल भी हो गये हैं, किन्तु महा महिम टीपू सुल्तान बड़े, कृपालु और उदार थे कि उन्होंने अपने द्वारा हिन्दुओं पर किय गये अत्याचारों का वर्णन, और अन्य सामयिक प्रलेखों में दक्षिण भारत के इस मुजाहिद का वास्तविक स्वरूप, पूर्णतः प्रकाशित हो जाता है।

टीपू के पत्र

टीपू द्वारा लिखित कुछ पत्रों, संदेशों, और सूचनाओं, के कुछ अंश निम्नांकित हैं। विखयात इतिहासज्ञ, सरदार पाणिक्कर, ने लन्दन के इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी से इन सन्देशों, सूचनाओं व पत्रों के मूलों को खोजा था।

(i) अब्दुल खादर को लिखित पत्र २२ मार्च १७८८

“बारह हजार से अधिक, हिन्दुओं को इ्रस्लाम से सम्मानित किया गया (धर्मान्तरित किया गया)। इनमें अनेकों नम्बूदिरी थे। इस उपलब्धि का हिन्दुओं के मध्य व्यापक प्रचार किया जाए। स्थानीय हिन्दुओं को आपके पास लाया जाए, और उन्हें इस्लाम में धर्मान्तरित किया जाए। किसी भी नम्बूदिरी को छोड़ा न जाए।”
(भाषा पोशनी-मलयालम जर्नल, अगस्त १९२३)

(ii) कालीकट के अपने सेना नायकको लिखित पत्र दिनांक १४ दिसम्बर १७८८

”मैं तुम्हारे पास मीर हुसैन अली के साथ अपने दो अनुयायी भेज रहा हूँ। उनके साथ तुम सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लेना और वध कर देना…”। मेरे आदेश हैं कि बीस वर्ष से कम उम्र वालों को काराग्रह में रख लेना और शेष में से पाँच हजार का पेड़ पर लटकाकार वध कर देना।”
(उसी पुस्तक में)

(iii) बदरुज़ समाँ खान को लिखित पत्र (दिनांक १९ जनवरी १७९०)

”क्या तुम्हें ज्ञात नहीं है निकट समय में मैंने मलाबार में एक बड़ी विजय प्राप्त की है चार लाख से अधिक हिन्दुओं को मूसलमान बना लिया गया था। मेरा अब अति शीघ्र ही उस पानी रमन नायर की ओर अग्रसर होने का निश्चय हैं यह विचार कर कि कालान्तर में वह और उसकी प्रजा इस्लाम में धर्मान्तरित कर लिए जाएँगे, मैंने श्री रंगापटनम वापस जाने का विचार त्याग दिया है।”
(उसी पुस्तक में)
टीपू ने हिन्दुओं के प्रति यातनाआं के लिए मलाबार के विभिन्न क्षेत्रों के अपने सेना नायकों को अनेकों पत्र लिखे थे।

”जिले के प्रत्येक हिन्दू का इस्लाम में आदर (धर्मान्तरण) किया जाना चाहिए; उन्हें उनके छिपने के स्थान में खोजा जाना चाहिए; उनके इस्लाममें सर्वव्यापी धर्मान्तरण के लिए सभी मार्ग व युक्तियाँ- सत्य और असत्य, कपट और बल-सभी का प्रयोग किया जाना चाहिए।”
(हिस्टौरीकल स्कैचैज ऑफ दी साउथ ऑफ इण्डिया इन एन अटेम्पट टूट्रेस दी हिस्ट्री ऑफ मैसूर- मार्क विल्क्स, खण्ड २ पृष्ठ १२०)

मैसूर के तृतीय युद्ध (१७९२) के पूर्व से लेकर निरन्तर १७९८ तक अफगानिस्तान के शासक, अहमदशाह अब्दाली के प्रपौत्र, जमनशाह, के साथ टीपू ने पत्र व्यवहार स्थापित कर लिया था। कबीर कौसर द्वारा लिखित, ‘हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान’ (पृ’ १४१-१४७) में इस पत्र व्यवहार का अनुवाद हुआ है। उस पत्र व्यवहार के कुछ अंग्रेजश नीचे दिये गये हैं।

टीपू के ज़मन शाह के लिए पत्र

(i) ”महामहिल आपको सूचित किया गया होगा कि, मेरी महान अभिलाषा का उद्देश्य जिहाद (धर्म युद्ध) है। इस युक्ति का इस भूमि पर परिणाम यह है कि अल्लाह, इस भूमि के मध्य, मुहम्मदीय उपनिवेश के चिह्न की रक्षा करता रहता है, ‘नोआ के आर्क’ की भाँति रक्षा करता है और त्यागे हुए अविश्वासियों की बढ़ी हुई भुजाओं को काटता रहता है।”

(ii) ”टीपू से जमनशाह को, पत्र दिनांक शहबान का सातवाँ १२११ हिजरी (तदनुसार ५ फरवरी १७९७): ”….इन परिस्थितियों में जो, पूर्व से लेकर पश्चित तक, सूर्य के स्वर्ग के केन्द्र में होने के कारण, सभी को ज्ञात हैं। मैं विचार करता हूँ कि अल्लाह और उसके पैगम्बर के आदेशों से एक मत हो हमें अपने धर्म के शत्रुओं के विरुद्ध धर्म युद्ध क्रियान्वित करने के लिए, संगठित हो जाना चाहिए। इस क्षेत्र के पन्थ के अनुयाई, शुक्रवार के दिन एक निश्चित किये हुए स्थान पर सदैव एकत्र होकर इन शब्दों में प्रार्थना करते हैं। ”हे अल्लाह! उन लोगों को, जिन्होंने पन्थ का मार्ग रोक रखा है, कत्ल कर दो। उनके पापों को लिए, उनके निश्चित दण्ड द्वारा, उनके शिरों को दण्ड दो।”
मेरा पूरा विश्वास है कि सर्वशक्तिमान अल्लाह अपने प्रियजनों के हित के लिए उनकी प्रार्थनाएं स्वीकार कर लेगा और पवित्र उद्‌देश्य की गुणवत्ता के कारण हमारे सामूहिक प्रयासों को उस उद्‌देश्य के लिए फलीभूत कर देगा। और इन शब्दों के, ”तेरी (अल्लाह की) सेनायें ही विजयी होगी”, तेरे प्रभाव से हम विजयी और सफल होंगे।

लेख

टीपू की बहुचर्चित तलवार’ पर फारसी भाषा में निम्नांकित शब्द लिखे थे- ”मेरी चमकती तलवार अविश्वासियों के विनाश के लिए आकाश की कड़कड़ाती बिजली है। तू हमारा मालिक है, हमारीमदद कर उन लोगों के विरुद्ध जो अविश्वासी हैं। हे मालिक ! जो मुहम्मद के मत को विकसित करता है उसे विजयी बना। जो मुहम्मद के मत को नहीं मानता उसकी बुद्धि को भृष्ट कर; और जो ऐसी मनोवृत्ति रखते हैं, हमें उनसे दूर रख। अल्लाह मालिक बड़ी विजय में तेरी मदद करे, हे मुहम्मद!”

(हिस्ट्री ऑफ मैसूर सी.एच. राउ खण्ड ३, पृष्ठ १०७३)
*ब्रिटिश म्यूजियम लण्डल का जर्नल

हमारे सैक्यूलरिस्ट इतिहासज्ञों की रुचि, प्रसन्नता व ज्ञान के लिए श्री रंग पटनम दुर्ग में प्राप्त टीपू का एक शिला लेख पर्याप्त महत्वपूर्ण है। शिलालेख के शब्द इस प्रकार हैं- ”हे सर्वशक्तिमान अल्लाह! गैर-मुसलमानों के समस्त समुदाय को समाप्त कर दे। उनकी सारी जाति को बिखरा दो, उनके पैरों को लड़खड़ा दो अस्थिर कर दो! और उनकी बुद्धियों को फेर दो! मृत्यु को उनके निकट ला दो (उन्हें शीघ्र ही मार दो), उनके पोषण के साधनों को समाप्त कर दो। उनकी जिन्दगी के दिनों को कम कर दो। उनके शरीर सदैव उनकी चिंता के विषय बने रहें, उनके नेत्रों की दृष्टि छी लो, उनके मुँह (चेहरे) काले कर दो, उनकी वाणी को (जीभ को), बोलने के अंग को, नष्ट कर दो! उन्हें शिदौद की भाँति कत्ल करदो जैसे फ़रोहा को डुबोया था, उन्हें भी डुबो दो, और भयंकरतम क्रोध के साथ उनसे मिलो यानी कि उन पर अपार क्रोध करो। हे बदला लेने वाले! हे संसार के मालिक पिता! मैं उदास हूँ! हारा हुआ हूँ,! मुझे अपनी मदद दो।”
(उसी पुस्तक में पृष्ठ १०७४)

टीपू का जीवन चरित्र

टीपू की फारसी में लिखी, ‘सुल्तान-उत-तवारीख’ और ‘तारीख-ई-खुदादादी’ नाम वाली दो जीवनयिाँ हैं। बाद वाली पहली जीवनी का लगभग यथावत (हू बू हू) प्रतिरूप नकल है। ये दोनों ही जीवनियाँ लन्दन की इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी में एम.एस. एस. क्र. ५२१ और २९९ क्रमानुसार रखी हुई हैं। इन दोनों जीवनयिों में हिन्दुओं पर उसके द्वारा ढाये अत्याचारों, और दी गई यातनाओं, का विस्तृत वर्णन टीपू ने किया है। यहाँ तक कि मोहिब्बुल हसन, जिसने अपनी पुस्तक, हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान, टीपू को एक समझदार, उदार, और सैक्यूलर शासक चित्रित व प्रस्तुत करने में कोई कैसी भी कमी नहीं रखी थी, को भी स्वीकार करना पड़ा था कि ”तारीख यानी कि टीपू की जीवनियों के पढ़ने के बाद टीपू का जो चित्र उभरता है वह एक ऐसे धर्मान्ध, पन्थ के लिए मतवाले, या पागल, का है जो मुस्लिमेतर लोगों के वध और उनके इस्लाम में बलात परिवर्तन करान में ही सदैव लिप्त रहा आया।”
(हिस्ट्री ऑफ टीपू सुल्तान, मोहिब्बुल हसन, पृष्ठ ३५७)

प्रत्यक्ष दर्शियों के वर्णन

इस्लाम के प्रोत्साहन के लिए टीपू द्वारा व्यवहार में लाये अत्याचारों और यातनाओं के प्रत्यक्ष दर्शियों में से एक पुर्तगाली यात्री और इतिहासकार, फ्रा बारटोलोमाको है। उसने जो कुछ मलाबार में, १७९० में, देखा उसे अपनी पुस्तक, ‘वौयेज टू ईस्ट इण्डीज’ में लिख दिया था- ”कालीकट में अधिकांश आदमियों और औरतों को फाँसी पर लटका दिया जाता था। पहले माताओं को उनके बच्चों को उनकी गर्दनों से बाँधकर लटकाकर फाँसी दी जाती थी। उस बर्बर टीपू द्वारा नंगे (वस्त्रहीन) हिन्दुओं और ईसाई लोगों को हाथियों की टांगों से बँधवा दिया जाता था और हाथियों को तब तक घुमाया जाता था दौड़ाया जाता था जब तक कि उन सर्वथा असहाय निरीह विपत्तिग्रस्त प्राणियों के शरीरों के चिथड़े-चिथड़े नहीं हो जाते थे। मन्दिरों और गिरिजों में आग लगाने, खण्डित करने, और ध्वंस करने के आदेश दिये जाते थे। यातनाओं का उपर्लिखित रूपान्तर टीपू की सेना से बच भागने वालेऔर वाराप्पुझा पहुँच पाने वाले अभागे विपत्तिग्रस्त व्यक्तियों से सुन वृत्तों के आधार पर था… मैंने स्वंय अनेकों ऐसे विपत्ति ग्रस्त व्यक्तियों को वाराप्पुझा नहीं को नाव द्वारा पार कर जोने के लिए सहयोग किया था।”
(वौयेज टू ईस्ट इण्डीजः फ्रा बारटोलोमाको पृष्ठ १४१-१४२)

टीपू द्वारा मन्दिरों का विध्वंस

दी मैसूर गज़टियर बताता है कि ”टीपू ने दक्षिण भारत में आठ सौं से अधिक मन्दिर नष्ट किये थे।”

के.पी. पद्‌मानाभ मैनन द्वारा लिखित, ‘हिस्ट्री ऑफ कोचीन और श्रीधरन मैनन द्वारा लिखित, हिस्ट्री ऑफ केरल’ उन भग्न, नष्ट किये गये, मन्दिरों में से कुछ का वर्णन करते हैं- ”चिन्गम महीना ९५२ मलयालम ऐरा तदुनसार अगस्त १७८६ में टीपू की फौज ने प्रसिद्ध पेरुमनम मन्दिर की मूर्तियों का ध्वंस किया और त्रिचूर ओर करवन्नूर नदी के मध्य के सभी मन्दिरों का ध्वंस कर दिया। इरिनेजालाकुडा और थिरुवांचीकुलम मन्दिरों को भी टीपू की सेना द्वारा खण्डित किया गया और नष्ट किया गया।” ”अन्य प्रसिद्ध मन्दिरों में से कुछ, जिन्हें लूटा गया, और नष्ट किया गया, था, वे थे- त्रिप्रंगोट, थ्रिचैम्बरम्‌, थिरुमवाया, थिरवन्नूर, कालीकट थाली, हेमम्बिका मन्दिरपालघाट का जैन मन्दिर, माम्मियूर, परम्बाताली, पेम्मायान्दु, थिरवनजीकुलम, त्रिचूर का बडक्खुमन्नाथन मन्दिर, बैलूर शिवा मन्दिर आदि।”

”टीपू की व्यक्तिगत डायरी के अनुसार चिराकुल राजा ने टीपू सेना द्वारा स्थानीय मन्दिरों को विनाश से बचाने के लिए, टीपू सुल्तान को चार लाख रुपये का सोना चाँदी देने का प्रस्ताव रखा था। किन्तु टीपू ने उत्तर दिया था, ”यदि सारी दुनिया भी मुझे दे दी जाए तो भी मैं हिन्दू मन्दिरों को ध्वंस करने से नहीं रुकूँगा”
(फ्रीडम स्ट्रगिल इन केरल : सरदार के.एम. पाणिक्कर)

टीपू द्वारा केरल की विजय के प्रलयंकारी भयावह परिणामों का सविस्तार सजीव वर्णन, ‘गजैटियर ऑफ केरल के सम्पादक और विखयात इतिहासकार ए. श्रीधर मैनन द्वारा किया गया है। उसके अनुसार, ”हिन्दू लोग, विशेष कर नायर लोग और सरदार लोग जिन्होंने इस्लामी आक्रमणकारियों का प्रतिरोध किया था, टीपू के क्रोध के प्रमुखा भाजन बन गये थे। सैकड़ों नायर महिलाओं और बच्चों को भगा लिया गया और श्री रंग पटनम ले जाया गया या डचों के हाथ दास के रूप में बेच दिया गया था। हजारों ब्राह्मणों, क्षत्रियों और हिन्दुओं के अन्य सम्माननीय वर्गों के लोगों कोबलात इस्लाम में धर्मान्तरित कर दिया गया था या उनके पैतृक घरों से भगा दिया गया था।”

कृण्वन्तो विश्वमार्यम !

 

Victory for Vegetarian Muslims


source :- http://www.vegetarianmuslim.org/

Victory for Vegetarian Muslims

Dear Brothers and Sisters in Islam,

Assalam-e-aliekum!

Islam teaches us compassion and mercy. When we take the name of Allah, we end it with “compassionate and merciful”.

Amongst many teachings religious in Islam, one of the things we have deviated ourselves from is compassion and mercy, to mankind, as well as to other sentient fellow beings( animals).

Today we muslims are referred to as a meat eating community. What does our religious belief and “ iman” has to do with eating meat? Nothing, if you see it from the religious point of view, but much ,if you see it from the community practice point of view.

Today almost every muslim household, all over the world, has at least one meat diet a day. Thing has come to such a pass that even during a small celebration,a cow or a goat/sheep or a few hens are slaughtered for the celebration,mostly in the name of religion.

During Eid-e- Adha , the cow, sheep or camel are procured instantly and slaughtered the next day. When someone has to flaunt his wealth within the community, he makes it a point to sacrifice several such animals .

The pinning down of the animal on the ground with a “ thud” is applauded by those standing by before the knife of sacrifice runs over the animals neck.

Must we make meat our staple diet and must we sacrifice animals during Eid-e-Adha?. As a muslim, we need to see these two questions from a different perspective, instead of deviating from the principles of Islam.

 

1. When Allah himself is “compassionate and merciful” then why do not we look up to his example and spare the lives of the poor animals and instead use that money to help our muslim brothers and sisters in distress . There are so many brothers and sisters who need financial assistance. Better still would be, if with so much money each year, factories and businesses would be set up with the employment exclusively for muslims.

2. Sacrificing animal is not a “Farz” or compulsory on the day of Eid-e-Adha.

3. Avoid ye the seven obnoxious things {deadly sins}: polytheism; magic; the killing of breathing beings(humans and animals! Which God has forbidden except for rightful reason. (Narrated by Abu Huraira. Sahih Mulim – Kitab-ul-Imam [Ref. No. 46]; Chapt. XXXIX, Vol.I; p. 52. Bukhari, 4:23. Also Awn [Ref. No. 32]; Hadith No. 2857)

4. Being merciful for all creatures, the Prophet of Islam (the religion of mercy) has shown us through his commandments and teachings, how to tend and care for these creatures. Thus he said, “The merciful are shown mercy by the All-Merciful. Show mercy to those on earth, and He Who is in heaven will show mercy unto you.”

5. [6:38] All the creatures on earth, and all the birds that fly with wings, are communities like you. We did not leave anything out of this book(Quran). To their Lord, all these creatures will be summoned. The Quran tells us that animals are communities and nations unto their own and that they are more than mere resources. However, animals are treated as nothing but machines on today’s “factory farms.” Not only are these factory farms found all over the world, they are also becoming the dominant means of meat, egg, and milk production throughout the world. More than 20 billion animals are slaughtered for food each year worldwide. These billions of animals are confined to extremely small spaces so that producers can raise as many animals as possible. Ninety percent of U.S. eggs come from chickens who are crammed together up to five to a cage the size of a record album cover, and this method of egg production is spreading throughout the globe.

6. Muslims are exhorted to eat good, pure, and wholesome food. But we now know that eating animal products is implicated with a host of diseases. People who consume animal products are 10 times more susceptible to heart disease, 40 percent more susceptible to cancer, and at increased risk for many other illnesses, including stroke, obesity, appendicitis, osteoporosis, arthritis, diabetes, and food poisoning. Additionally, meat contains accumulations of pesticides and other chemicals up to 14 times more concentrated than those found in plant foods.When the animal is being slaughtered it is frightened and in pain, it then releases poisonous glandular secretions such as adrenalin which is extremely harmful to us. We also consume the blood of such animals with a completely different DNA which is processed in our liver. Our intestine is longer than carnivores animals , as such, it takes a long time for protein food such as meat to expel from our system . This allows the meat to be lodged for a very long time in our intestine which is the cause for cancer and other diseases in humans ,besides, it is responsible for quick ageing and age related diseases.

7. The habitat of animals are always smelling foul and obnoxious and one cannot stand at that place for a long time , also the raw meat of the animals have obnoxious odour ,which sends an alarm to our brain that these are unclean and should not be consumed. Even after this we consume it camouflaging the bad odour with spices and aromatics. The ultimate result is Mad cow disease, Foot and mouth disease, Swine flue and bird flue, to name a few.

8. Bury a handful of beans in the ground it will give you small plants to eat. Bury a handful of meat it will give you foul smell of carcass and maggots(worms). Then should we muslims eat of such unclean foods?

9. When you slaughter the animal,bacteria immediately start multiplying within it. Even when you freeze the meat the bacteria is alive and when you eat it you eat the bacteria too.

10. “O Believers! Eat of the good and pure (lawful) that We have provided you with and be grateful to Allah, if you truly worshipHim.”[surah al-Baqarah; 2:172] Muslims are exhorted to eat good, pure, and wholesome food.

11.Meat eating is not a criteria to be a Muslim, a pure veg. eating person also can be a good muslim. For any person to be a good muslim he/she must have strong faith on Allah and follow the commandments of Allah. There are 6 Pillars of iman (faith) to be a good Muslim: 1) believing in Allah, the creator of this universe. 2) believing in his Angels 3) believe in his books The Torah, Bible and the Holy Quran, 4) Believe in his messengers, Jesus, Abraham, Moses, And the last and final messenger Mohammed, peace be upon them all, 5) Believing in destiny. 6) believe in the here-after, (day of judgment, Heaven Hell etc,)

Eid -Ul -Adha is an happy occasion for all muslims around the world to celebrate and rejoice. We would rejoice more if we spend that much time with our family and friends rather than in procuring the animals for sacrifice and spending days in cutting and distributing its flesh and donating its skin. When you spare the lives of animals you show your mercy towards them and Allah is happy with your action . The money that would otherwise have gone to buy the animals may be given to charity for the deserving poor muslim brothers and sisters,this action too will make Allah happy . This way you earn two points to make Allah happy. You will also feel happy when you spare the lives of helpless living beings. Better still, the huge amount of money that is collected worldwide in not buying and slaughtering any animal could go into making large factories and business houses employing muslim brothers and sisters across the world. Finance the study of deserving muslim scholars. Build international quality schools,colleges and professional educational centres around the world. Build hospitals and free state of the art medical centres for the community and free for the aged.

Those of us who would like to flaunt their wealth within the community will have their names written in big letters towards the amount of contribution for the noble cause. This way the name of that person will remain on the board forever.

Muslims should in any case avoid the eating of flesh. Meat, like wine, is habit forming and dangerous for health. The after effect in old age is pathetic. Most of us blame it on ageing process. This is not so, meat causes arthritis, uric acid accumulation in the joints, cancer, kidney liver, heart and other terminal illnesses are caused due to consuming meat in any form. Allah has made our body to remain young for at least a 100 year. We can live up to 150 year if we do not get angry all for nothing, eat in moderation, consume pure, clean and wholesome food, refrain from meat, wine and other vices. Think pure, eat pure and be of service to mankind.

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