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नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।


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चाहे जो हो धर्म तुम्हारा चाहे जो वादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।‍‍‌

जिसके अन्न और पानी का इस काया पर ऋण है,जिस समीर का अतिथि बना यह आवारा जीवन है
जिसकी माटी में खेले, तन दर्पण-सा झलका है,उसी देश के लिए तुम्हारा रक्त नहीं छलका है
तवारीख के न्यायालय में तो तुम प्रतिवादी हो । नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके पर्वत खेत घाटियों में अक्षय क्षमता है,जिसकी नदियों की भी हम पर माँ जैसी ममता है
जिसकी गोद भरी रहती है, माटी सदा सुहागिन,ऐसी स्वर्ग सरीखी धरती पीड़ित या हतभागिन ?
तो चाहे तुम रेशम धारो या पहने खादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

जिसके लहराते खेतों की मनहर हरियाली से,रंग-बिरंगे फूल सुसज्जित डाली-डाली से
इस भौतिक दुनिया का भार ह्रदय से उतरा है,उसी धरा को अगर किसी मनहूस नज़र से खतरा है
तो दौलत ने चाहे तुमको हर सुविधा लादी हो ।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

अगर देश मर गया तो बोलो जीवित कौन रहेगा?और रहा भी अगर तो उसको जीवित कौन कहेगा?
माँग रही है क़र्ज़ जवानी सौ-सौ सर कट जाएँ,पर दुश्मन के हाथ न माँ के आँचल तक आ पाएँ
जीवन का है अर्थ तभी तक जब तक आज़ादी हो।नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

चाहे हो दक्षिण के प्रहरी या हिमगिरी वासी हो, चाहे राजा रंगमहल के हो या सन्यासी हो
चाहे शीश तुम्हारा झुकता हो मस्जिद के आगे,चाहे मंदिर गुरूद्वारे में भक्ति तुम्हारी जागे
भले विचारों में कितना ही अंतर बुनियादी हो। नहीं जी रहे अगर देश के लिए तो अपराधी हो ।

बिस्मिल का मशहूर उर्दू मुखम्मस


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हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर,
हमको भी पाला था माँ-बाप ने दुःख सह-सह कर ,
वक्ते-रुख्सत उन्हें इतना भी न आये कह कर,
गोद में अश्क जो टपकें कभी रुख से बह कर ,
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को !

अपनी किस्मत में अजल ही से सितम रक्खा था,
रंज रक्खा था मेहन रक्खी थी गम रक्खा था ,
किसको परवाह थी और किसमें ये दम रक्खा था,
हमने जब वादी-ए-ग़ुरबत में क़दम रक्खा था ,
दूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को !

अपना कुछ गम नहीं लेकिन ए ख़याल आता है,
मादरे-हिन्द पे कब तक ये जवाल आता है ,
कौमी-आज़ादी का कब हिन्द पे साल आता है,
कौम अपनी पे तो रह-रह के मलाल आता है ,
मुन्तजिर रहते हैं हम खाक में मिल जाने को !

नौजवानों! जो तबीयत में तुम्हारी खटके,
याद कर लेना कभी हमको भी भूले भटके ,
आपके अज्वे-वदन होवें जुदा कट-कट के,
और सद-चाक हो माता का कलेजा फटके ,
पर न माथे पे शिकन आये कसम खाने को !

एक परवाने का बहता है लहू नस-नस में,
अब तो खा बैठे हैं चित्तौड़ के गढ़ की कसमें ,
सरफ़रोशी की अदा होती हैं यूँ ही रस्में,
भाई खंजर से गले मिलते हैं सब आपस में ,
बहने तैयार चिताओं से लिपट जाने को !

सर फ़िदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफ़र करते हैं ,
जा के आबाद करेंगे किसी वीराने को !

नौजवानो ! यही मौका है उठो खुल खेलो,
खिदमते-कौम में जो आये वला सब झेलो ,
देश के वास्ते सब अपनी जबानी दे दो ,
फिर मिलेंगी न ये माता की दुआएँ ले लो ,
देखें कौन आता है ये फ़र्ज़ बजा लाने को ?

(बिस्मिल का मशहूर उर्दू मुखम्मस)

धर्म वीर हकीकत राय


haqiqat

धर्म वीर हकीकत राय

धन्य धन्य तुम वीर हकीकत , धन्य तुम्हारा था बलिदान।

प्राण गवाये धर्म न छोड़ा, रख ली आर्य जाती की शान।।

शस्त्र न कोई इस दुनिया में, जो आत्मा को काट सके।

यही हकीकत जिसे जान कर, तुमने दे दी अपनी जान।

दिए प्रलोभन थे यवनों ने, सांसारिक सुख संपत्ति के।

किन्तु डिगे नही धर्म मार्ग से, करते हम तेरा गुण गान।

तुम बालक थे नहि दुनिया को, कुछ भी तुमने देखा था।

मात किया पर ज्ञानी जनों को, पा आत्मा का सच्चा ज्ञान।

“लो काटो अपनी असिधारा, से तुम मेरी नश्वर देह।

पर न हकीक़त काट सको तुम” इन शब्दों में कैसी शान।

धर्म वेदी पर बलि दे करके, तुम न मरे पर अमर हुए।

कितनी ही सदिया बीती पर, तुमको याद करे मतिमान।।

वह वसंत उत्सव था जिसके, मद से मस्त हुई दुनिया।

पर तुमने जीवन वसंत का, अंत किया रखने को आन।

मात पिता गुरु बंधू सभी थे, तुम्हें डिगाने खड़े हुए।

पर न डिगे तुम सत्य मार्ग से, क्यूँ न करे हम तेरा मान।।

निर्भयता का पाठ पढ़ाया, तुमने डरती दुनिया को।

दृढ़ता का धर्म अनुराग था, रखा था आदर्श महान।

यही कामना तुमसे सारे, धर्म वीर जग में जनमें।

तुम से वीर सुतों को पाकर, भारत माता को अभिमान।।

रचियता-धर्मदेव जी विद्यामार्तण्ड

अल्लामा इकबाल और श्री रामचंद्र जी महाराज


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(रामनवमी के अवसर पर प्रकाशित)

लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द ।
सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।
ये हिन्दियों के फिक्रे-फ़लक उसका है असर,
रिफ़अत में आस्माँ से भी ऊँचा है बामे-हिन्द ।
इस देश में हुए हैं हज़ारों मलक सरिश्त,
मशहूर जिसके दम से है दुनिया में नामे-हिन्द ।
है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़,
अहले-नज़र समझते हैं उसको इमामे-हिन्द ।
एजाज़ इस चिराग़े-हिदायत का है ,
यहीरोशन तिराज़ सहर ज़माने में शामे-हिन्द ।
तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़र्द था,
पाकीज़गी में, जोशे-मुहब्बत में फ़र्द था ।

अल्लामा इकबाल
 
शब्दार्थ :लबरेज़ है शराबे-हक़ीक़त से जामे-हिन्द । सब फ़ल्सफ़ी हैं खित्ता-ए-मग़रिब के रामे हिन्द ।।= हिन्द का प्याला सत्य की मदिरा से छलक रहा है। पूरब के सभी महान चिंतक इहंद के राम हैं; फिक्रे-फ़लक=महान चिंतन; रिफ़अत=ऊँचाई; बामे-हिन्द=हिन्दी का गौरव या ज्ञान; मलक=देवता; सरिश्त=ऊँचे आसन पर; एजाज़=चमत्कार; चिराग़े-हिदायत=ज्ञान का दीपक; सहर=भरपूर रोशनी वाला सवेरा; शुजाअत=वीरता; फ़र्द=एकमात्र, अद्वितीय; पाकीज़गी= पवित्रता

अल्लामा इकबाल सियालकोट, पंजाब, ब्रिटिश भारत में पैदा हुआ था, एक कश्मीरी शेख परिवार में पांच भाई बहन की सबसे बड़ी इकबाल पिता शेख नूर मुहम्मद एक समृद्ध दर्जी, अच्छी तरह से अपने इस्लाम को मजबूत भक्ति, और के लिए जाना जाता था. परिवार गहरी धार्मिक ग्राउंडिंग के साथ अपने बच्चों को उठाया. अपने दादा सहज राम सप्रू श्रीनगर जो अपने परिवार के साथ इस्लाम में परिवर्तित कर दिया गया से एक कश्मीरी पंडित था, इस प्रक्रिया में शेख मुहम्मद रफीक के मुस्लिम नाम अपनाया. रूपांतरण के बाद, वह पंजाब के सियालकोट पश्चिम में अपने परिवार के साथ चले गए। अपनी प्रारंभिक उम्र में इकबाल के विचार सेक्युलर थे। कभी उन्होंने ही सारे जहाँ से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा गीत लिखा था और अपने शेष जीवन में उन पर इस्लाम का ऐसा रंग चढ़ा की जिन्ना को पाकिस्तान का पाठ पढ़ाने वालो में इकबाल का नाम सबसे ऊपर हैं।

इस धरा पर मालिक का वरदान हैं बेटी


beti
 
बाबुल की आन और शान हैं बेटी,
 
इस धरा पर मालिक का वरदान हैं बेटी,
 
जीवन यदि संगीत है तो सरगम  हैं बेटी,
 
रिश्तो के कानन में भटके इन्सान की मधुबन सी मुस्कान हैं बेटी,

जनक की फूलवारी में कभी प्रीत की क्यारी में,

रंग और सुगंध का महका गुलबाग हैं बेटी,

त्याग और स्नेह की सूरत है,

दया और रिश्तो की मूरत हैं बेटी,

कण– कण है कोमल सुंदर अनूप है बेटी,

ह्रदय की लकीरो का सच्चा रूप  हैं बेटी ,

अनुनय,विनय, अनुराग है बेटी,

इस वसुधा और रीत और प्रीत का राग है बेटी,

माता–पिता के मन का वंदन है बेटी,

भाई के ललाट का चंदन है बेटी.

SAVE GIRL CHILD-SAVE HUMANITY- A DRIVE BY AGNIVEER
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