महर्षि दयानन्द सरस्वती की दृष्टि में इस्लाम


Swami Dayanand

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चौदहवें समुल्लास (अध्याय) में इस्लाम के धर्म ग्रंथ कुरान की १६१ आयतों या आयत समूहों की समीक्षा की है। यहाँ इन्हीं में से कुछ आयतों की समीक्षा सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, रामलीला मैदान, नई दिल्ली, द्वारा १९७५ में प्रकाशित, सत्यार्थ प्रकाश के पृष्ठ ५४३ से ६१२ तक से ली गई है जबकि कुरान की वे ही पूरी की पूरी आयतें ‘पवित्र कुरआन’ (अनुवादक मौलाना मुहम्मद फारूक रवां और डॉ.मुहम्मद अहमद, प्रकाशक मधुर संदेश संगम, जामियानगर, नई दिल्ली, २००५) में देखी जा सकती हैं। सन्दर्भ में पहले सूरा और बाद में आयत का संखया क्रम दिया गया है।

स्वामी जी ने कुरान की समीक्षा करने से पहले अपना मन्तव्य इस समुल्लास के प्रारम्भ में दी गई अनुभूमिका (४) में निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किया है-
”यह लेख केवल मनुष्यों की उन्नति और सत्यासत्य के निर्णय के लिए सब मतों के विषय का थोड़ा-थोड़ा ज्ञान होवे इससे मनुष्यों को परस्पर विचार करने का समय मिले और एक-दूसरे के दोषों का खण्डन कर, गुणों का ग्रहण करें, न किसी अन्य मत पर, न इस मत पर झूठ-मूठ बुराई व भलाई लगाने का प्रयोजन है किन्तु जो-जो भलाई है वही भलाई और जो बुराई है वही बुराई सबको विदित होवे”
”यह लेख हठ, दुराग्रह, ईर्ष्या, द्वेष, वाद-विवाद और विरोध घटाने के लिए किया गया है, न कि इनको बढ़ाने के अर्थ। क्योंकि एक दूसरे की हानि करने से पृथक्‌ रह, परस्पर को लाभ पहुंचाना हमारा मुखय कर्म है। अब यह चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों का मत विषय सब सज्जनों के सामने निवेदन करता हूँ, विचार कर इष्ट का ग्रहण, अनिष्ट का परित्याग कीजिए।” (पृ५४३)

१. कुरान

१. ”आरम्भ साथ नाम अल्लाह के क्षमा करने वाला दयालु ।” (१ : १)
समीक्षक-”मुसलमान लोग ऐसा कहते हैं कि यह कुरान खुदा का कहा है। परन्तु इस वचन से विदित होता है कि इसका बनाने वाला कोई दूसरा है क्योंकि जो परमेश्वर का बनाया होता तो ”आरम्भ साथ नाम अल्लाह के” ऐसा न कहता किन्तु ”आरम्भ वास्ते उपदेश मनुष्यों के” ऐसा कहता।” (पृ ५४४)
२. ”सब स्तुति परमेश्वर के वास्ते है जो परबरदिगार अर्थात्‌ पालन करने हारा है तब संसार का। क्षमा करने वाला दयालु है।” (१ : २)
समीक्षक-”जो कुरान का खुदा संसार का पालन करने हारा होता और सब पर क्षमा और दया करता है तो अन्य मत वाले और पशु आदि को भी मुसलमानों के हाथ से मरवाने का हुकम न देता। जो क्षमा करने हारा है तो क्या पापियों पर भी क्षमा करेगा ? और जो वैसा है तो अगे लिखेंगे कि ”काफ़िरों को कतल करो” अर्थात्‌ जो कुरान और पैगम्बर को न मानें वे काफ़िर हैं, ऐसा क्यों कहता है? इसलिए कुरान ईश्वरकृत नहीं दीखता।” (पृ. ५४४-५४५)
३. ”दिखा उन लोगों का रास्ता कि जिन पर तूनपे निआमत की॥ और उनका मार्ग मत दिखा कि जिनके ऊपर तू ने गज़ब अर्थात्‌ अत्यन्तक्रोध की दृष्टि की और न गुमराहों का मार्ग हमको दिखा।” (१ : ६)
समीक्षक-”जब मुसलमान लोग पूर्वजन्म और पूर्वकृत पाप-पुण्य नहीं मानते तो किन्हीं पर निआमत अर्थात्‌ फ़जल या दया करने और किन्हीं पर न करने से खुदा पक्षपाती हो जायेगा, क्योंकि बिना पाप-पुण्य, सुख-दुःख देना केवल अन्याय की बात है और बिना कारण किसी पर दया और किसी पर क्रोध दृष्टि करना भी स्वभाव से बहिः है। वह दया अथवा क्रोध नहीं कर सकता और जब उनके पूर्व संचित पुण्य पाप ही नहीं तो किसी पर दया और किसी पर क्रोध करना नहीं हो सकता। और इस सूरः की टिप्पणी पर ”यह सूरः अल्लाह साहेब ने मनुष्यों के मुखय से कहलाई कि सदा इस प्रकार से कहा करें” जो यह बात है तो ‘अलिफ्‌ बे” आदि अक्षर भी खुदा ही ने पढ़ाये होंगे। जो कहो कि बिना अक्षरज्ञान के इस सूरः को कैसे पढ़ सके ? क्या कण्ठ ही से बुलाए और बोलते गये ? जो ऐसा है तो सब कुरान ही कण्ठ से पढ़ाया होगा। इससे ऐसा समझना चाहिए कि जिस पुस्तक में पक्षपात की बातें पाई जायें वह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता, जैसा कि अरबी भाषा में उतारने से अरबवालों को इसका पढ़ना सुगम, अन्य भाषा बोलने वालों को कठिनहोता है इसी से खुदा में पक्षपात आता है और जैसे परमेश्वर ने सृष्टिस्थ सब देशस्थ मनुष्यों पर न्याय दृष्टि से सब देश भाषाओं से लिक्षण संस्कृत भाषा कि, जो सब देशवालों के लिए एक से परिश्रम से विदित होती है, उसी में वेदों का प्रकाश किया है, करता तो यह दोष नहीं होता।” (पृ. ५४५-५४६)
४. ”हे नबी ! तुम्हारे लिए अल्लाह और तुम्हारे ईमान वाले अनुयायी ही काफ़ी है। ‘हे रबी ! मोमिनों को जिहाद पर उभारो। यदि तुम्हारे पास पचास बीस आदमी जमें होंगे तो वे दो सौ पर प्रभावी होंगे और यदि तुममें से ऐसे सौ होंगे तो वे इंकार करने वालों में से एक हजार पर प्रभावी होंगे क्योंकि वे नासमझ लोग हैं।” (८ः६४-६५, पृ. १५५)
”अतः जो कुछ गनीमत (लूट) का माल तुमने प्राप्त किया है, उसे वैध-पवित्र समझकर खाओ और अल्लाह का डर रखो।” (८ : ६९, पृ. १५६)
समीक्षक-”भला ! यह कौन-सी न्याय, विद्धत्ता और धर्म की बात है कि जो अपना पक्ष करे और चाहे अन्याय भी करे उसी का पक्ष और लाभ पहुंचावे ? और जो प्रजा में शान्ति भंग करके लड़ाई करे, करावे और लूट मार के पदार्थों को हलाल बतलावे और फिर उसी कानाम क्षमावान्‌ दयालुलिखे यह बात खुदा की तो क्या किन्तु किसी भले आदमी की भी नहीं हो सकती। ऐसी-ऐसी बातों से कुरान ईश्वर वाक्य कभी नहीं हो सकता।” (पृ. ५७४)
५. ”और इसी प्रकार हमने इस (कुरआन) को एक अरबी फरमान के रूप में उतारा है। अब यदि तुम उस ज्ञान के पश्चात्‌ भी जो, तुम्हारे पास आ चुका है, उसकी इच्छाओं के पीछे चले तो अल्लाह के मुकाबले में न तो तुम्हारा कोई सहायक मित्र होगा औन न कोई बचाने वाला।” (१३ : ३७)
हम जो वादा उनसे कर रहे हैं चाहे उसमें से कुछ हम तुम्हें दिख दें या तुम्हें उठा लें। तुम्हारा दायित्व तो बस सन्देश का पहुंचा देना ही है, हिसाब लेना तो हमारे जिम्मे है।” (१३ः४०, पृ. २१२-२१३)
समीक्षक-”कुरान किधर की ओर से उतारा ? क्या खुदा ऊपर रहता है ? जो यह बात सच्च है तो वह एकदेशी होने से ईखश्वर ही नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर सब ठिकाने एकरस व्यापक है। पैगा़ाम पहुंचाना हल्कारे का काम है और हल्कारे की आवश्यकता उसी को होती है जो मनुष्यवत्‌ एकदेशी हो। और हिसाब लेना देना भी मनुष्य का काम है, ईश्वर का नहीं, क्योंकि वह सर्वज्ञ है। यह निश्चय होता है कि किसी अल्पज्ञ मनुष्य का बनाया कुरान है।” (पृ. ५७९)
६. ”और जो तौबा कर ले और ईमान लाए और अच्छा कर्म करे, फिर सीधे मार्ग पर चलता रहे उसके लिए निश्चय ही मैं अत्यन्त क्षमाशील हूँ।” (२०ः ८२, पृ. २७२)
समीक्षक-”जो तोबाः से पाप क्षमा करने की बात कुरान में है, यह सबको पापी कराने वाली है। क्योंकि पापियों को इससे पाप करने का साहस बहुत बढ़ जाता है। इससे यह पुस्तक और इसका बनाने वाला पापियों को पाप करने में हौसला बढ़ाने वाला है। इससे यह पुस्तक परमेश्वर कृत और इसमें कहा हुआ परमेश्वर भी नहीं हो सकता।” (पृ. ५८४)
७. ”(जो आयतें उतर ही हैं) वे तत्वज्ञान से परिपूर्ण किताब की आयतें हैं।” (३१.२)। ”उसने आकाशों को पैदा किया (जो थमे हुए हैं) बिना ऐसे स्तम्भों के जो तुम्हें दिखाई दें और उसने धरती में पहाड़ डाल दिए कि ऐसा न हो कि तुम्हें लेकर डावांडोल हो जाए।” …. (३१.१०) ”क्या तुमन देखा नहीं कि अल्लाह रात को दिन में प्रविष्ट करता है और दिन को रात में प्रविष्ट करता है”………….(३१ : २९) ”क्या तुमने देखा नहीं कि नौका समुद्र में अल्लाह के अनुग्रह से चलती हैं ताकि वह तुम्हें अपनी निशानियाँ दिखाए।” (३१ : ३१, पृत्र ३६०-३६२)
समीक्षक-वाह जी वाह ! हिक्मतवालीकिताब ! कि जिसमें सर्वथा विद्या से विरुद्ध आकाश की उत्पत्ति और उसमें खम्भे लगाने की शंका और पृथ्वी को स्थिर रखने के लिए पहाड़ रखना! थोड़ी-सी विद्या वाला भी ऐसा लेख कभी नहीं करता और न मानता और हिकमत देखो कि जहाँ दिन है वहाँ रात नहीं ओर जहाँ रात है वहाँ दिन नहीं, उसको एक दूसरे में प्रवेश कराना लिखता है यह बड़े अविद्यानों की बात है, इसलिए यह कुरान विद्या की पुस्तक नहीं हो सकती। क्या यह विद्या विरुद्ध बात नहीं है कि नौका, मनुष्य और क्रिया कौशलादि से चलती है वा खुदा की कृपा से ? यदि लोहे वा पत्थरों की नौका बनाकर समुद्र में चलावें तो खुदा की निशानी डूब जाय वा नहीं ? इसलिए यह पुस्तक न विद्यान्‌ ओर न ईश्वर का बनाया हुआ हो सकता है।” (पृ. ५९०-५९१)
२. अल्लाह

८. ”अल्लाह जिसे चाहे अपनी दयालुता के लिए खास कर ले ; अल्लाह बड़ा अनुग्रह करने वाला है।” (२ः१०५, पृ. १९)
समीक्षक- ”क्या जो मुखय और दया करने के योग्य न हो उसको भी प्रधान बनाता और उस पर दया करता है ? जो ऐसा है तो खुदा बड़ा गड़बड़िया है क्योंकि फिर अच्छा काम कौन करेगा ? और बुरे कर्म को कौन छोड़ेगा ? क्योंकि खुदा की प्रसन्नता पर निर्भर करतेहैं, कर्मफल पर नहीं, इससे सबको अनास्था होकर कर्मोच्छेदप्रसंग होगा।” (पृ. ५५४)
९. ”… और यह कि अल्लाह अत्यन्त कठोर यातना देने वाला है।” (२ : १६५) ”शैतान के पद चिन्हों पर मत चलो । निसन्देह वह तुम्हारा खुला शत्रु है ” (२ : १६८)।” वह तो बस तुम्हें बुराई और अश्लीलता पर उकसाता हे और इस पर कि तुम अल्लाह पर थोपकर वे बातें कहो जो तुम नहीं जानते।” (२ :  १६९, पृ. २६)
समीक्षक- ”क्या कठोर दुःख देने वाला दयालु खुदा पापियों पुण्यात्माओं पर है अथवा मुसलमानों पर दयालु और अन्य पर दयाहीन है ? जो ऐसा है तो वह ईश्वर ही नहीं हो सकता। और पक्षपाती नहीं है तो जो मनुष्य कहीं धम्र करेगा उस पर ईश्वर दयालु और जो अधर्म करेगा उस पर दण्ड दाता होगा, तो फिर बीच में मुहम्मद साहेब और कुरान को मानना आवश्यक न रहा। और जो सबको बुराई कराने वाला मनुष्य मात्र का शुत्र शैतान है, उसको खुदा ने उत्पन्न ही क्यों किया? क्या वह भविष्यत्‌ की बात नहीं जानता था ? जो कहो कि जानता था परन्तु परीक्षा के लिये बनाया, तो भी नहीं बन सकता, क्योंकि परीक्षा करना अल्पज्ञ का काम है, सर्वज्ञ तो सब जीवों के अच्छे बुरे कर्मों को सदा से ठीक-ठीक जानता है और शैतान सबको बहकाता है, तो शैतन को किसने बहकाया ? जो कहो कि शैतान आप बहमता है तो अन्य भी आप से आप बहक सकते हैं, बीच में शैतान का क्या काम ? और जो खुदा ही ने शैतान को बहकाया तो खुदा शैतान का भी शैतान ठहरेगा, ऐसी बात ईश्वर को नहीं हो सकती और जो कोई बहकाता है वह कुसुग तथा अविद्या से भ्रान्त होता है ” (पृ. ५५७)
१०. ”जब तुम ईमान वालों से कह रहे थे; ”क्या यह तुम्हारे लिए काफ़ी नहीं है कि तुम्हारा रब तीन हजार फरिश्ते उतारकर तुम्हारी सहायता करे।” (३ : १२४, पृ. ५८)
समीक्षक- ‘जो मुसलमानों को तीन हजार फरिश्तों के साथ सहाय देता था तो अब मुसलमानों की बादशाही बहुत-सी नष्ट हो गई और होती जाती है क्यों सहाय नहीं देता ? इसलिए यह बात केवल लोभ के दो मूखा्रें को फंसाने के लिये महा अन्याय की है।” (पृ. ५६४)
११. ‘‘अल्लाह बिगाड़ को पसन्द नहीं करता” (२ : २०५)/हे ईमानवालों ! तुम सब इस्लाम में दाखिल हो जाओ और शैतान के पद चिन्हों पर न चलो। वह तो तुम्हारा खुला शत्रु है।” (२ : २०८, पु. ३१)
समीक्षक-”जो झगड़े को खुदा मित्र नहीं समता तो क्यों आप ही मुसलमानों को झगड़ा करने में प्रेरणा करता ? और झगड़ालू मुसलमानों से मित्रता क्यों करता है ? मुसलमानों के मत में मिलने ही से खुदा राजी है तो वह मुसलमानों ही का पक्षपाती है, सब संसार का ईश्वर नहीं। इससे यहाँ यह विदित होता है कि न कुरान ईश्वरकृत और न इसमें कहा हुआ ईश्वर हो सकता है।” (पृ. ५५९)
१२. ”वह जिसको चाहे-नीति (तत्त्वदर्शिता) देता है।” (२ : १६९, पृ. ४२)
समीक्षक-”जब जिसको चाहता है उसको नीति देता है तो जिसको नहीं चाहता है उसको अनीति देता होगा, यह बात ईश्वरता की नहीं किन्तु जो पक्षपात छोड़ सबको नीति का उपदेश करता है वही ईश्वर और आप्त हो सता है, अन्य नहीं।” (पृ. ५६१)
१३. ”फिर वह जिसे चाहे क्षमा कर दे और जिसे चाहे यातना दे। अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ प्राप्त है।” (२ः२८४, पृ. ४४)
समीक्षक-”क्या क्षमा के योग्य पर क्षमा न करना, अयोग्य पर क्षमा करना गवरगंड राजा के तुल्य यह कर्म नहीं है ? यदि ईश्वर जिसको चाहता पापी वा पुण्यात्मा बनाता तो जीव को पाप पुण्य न लगना चाहिये। जब ईश्वर ने उसको वैसा ही किया तो जीव को दुःख सुख भी होना न चाहिए। जैसे सेनापति की आज्ञा से किसी भृत्य ने किसी को मारा वा रक्षा की उसका फलभागी वह नहीं होता, वैसे वे भी नहीं।” (पृ. ५६१-५६२)
१४. ‘‘निःसन्देह अल्लाह रत्ती भी जुल्म नहीं रकता और यदि कोई एक नेकी हो तो वह उसे कई गुना बढ़ा देगा और अपनी ओर से बड़ा बदला देगा।” (४ : ४०, पृ. ७२)
समीक्षक-”जो एक त्रसरेणु (तनिक) भी खुदा अन्याय नहीं करता तो पुण्य को द्विगुणा क्यों देता ? और मुसलमानों का पक्षपात क्यों करता है ? वास्तव में द्विगुण वा न्यून फल कर्मों का देवे तो खुदा अन्यायी हो जावे।” (पृ. ५६५)
१५. ”निश्चय ही अल्लाह कपटाचारियों और इनकार करने वालों-सबको जहन्नम में एकत्र करने वाला है।” (४ : १४०)…..”कपटाचारी अल्लाह के साथ धोखेबाज़ी कर रहे हैं हालांकि उसी ने उन्हें धोखे में डाल रखा है…”। (४ : १४२)। हे ईमानवालो ! ईमानवालों ! (मुसलमानों) को छोड़कर इन्कार करने वालों (काफ़िरों) को अपना मित्र न बनाओ।” (४ : १४४, पृ. ८५)
समीक्षक-”मुसलमानों के बहिश्त और अन्य लोगों के दोज़ख़ में जाने का क्या प्रमाण ? वाह जी वाह ! जो बुरे लोगों के धोखे में आता और अन्य को धोखा देता है ऐसा खुदा हम से अलग रहे, किन्तु जो धोखेबाज़ हैं उनसे जाकर मेल करे और वे उनसे मेल करें। क्योंकि-याद्‌टशी शीतलादेवी तादृश : खरवाहन :।
जैसे को तैसा मिले तभी निर्वाह होता है। जिसका खुदा धोखेबाज़ है उसके उपासक लोग धोखेबाज क्यों न हों ? क्या दुष्ट मुसलमान हो उससे मित्रता और अन्य श्रेष्ठ मुसलमान-भिन्न से शत्रुता करना किसी को उचित हो सकता है ?” (पृ. ५६७-५६८)
१६. ‘‘… जो पहले हो चुका उसे अल्लाह ने क्षमा कर दिया, परन्तु जिस किसी ने फिर ऐसा किया तो अल्लाह उससे बदला लेगा।” ०१८८५ : ९५, पृ. १०३)
समीक्षक-”किये हुए पापों का क्षमा करना जानो पापों को करने की आज्ञा दे के बढ़ाना है। पाप क्षमा करने की बात जिस पुस्तक में हो वह न ईश्वर और न किसी विद्वान्‌ का बनाया है किन्तु पापबर्द्धक है। हाँ, अगामी पाप छुड़वाने के लिये किसी से प्रार्थना और स्वयं छोड़ने के लिये पुरुषार्थ पश्चात्ताप करना उचित है, परन्तु केवल पश्चात्ताप करता रहे, छोड़े नहीं, तो भी कुछ नहीं हो सकता।” (पृ. ५६९)
१७. …………….”हालांकि अल्लाह चाहता था कि अपने वचनों से सत्य को सत्य कर दिखाए और इनकार करने वालों (काफ़िरों) की जड़ काट दें।” (८ : ७) (उसने कहा 🙂 ”…..मैं इनकार करने वालों के दिलों में रौब (भय)डाल देता हूँ। तो तुम उनकी गरदनें मारो और उनके पोर-पोर पर चोट लगाओ।” (८ : १२, पृ. १५०)
समीक्षक-”वाहजी वाह ! कैसा खुदा और कैसे पैंगम्बर दयाहीन, जो मुसलमानी मत से भिन्न काफ़िरों की जड़ कटवावे। और खुदा आज्ञा देवे उनको गर्दन मारो और हाथ पग के जोड़ों को काटने का सहाय और सम्पत्ति देवे ऐसा खुदा लंकेश से क्या कुछ कम है ? यह सब प्रपंच कुरान के कर्त्ता का है, खुदा का नहीं। यदि खुदा का हो तो ऐसा खुदा हमसे दूर और हम उससे दूर रहें।” (पृ. ५७२)
१८. ”उन्हें उनका रब़ अपनी दयालुता औ प्रसन्नता और ऐसे लोगों की शुभ सूचना देता है जिनमें उनके लिए स्थायी सुख-सामग्री है। उनमें वे सदैव रहेंगे। निःस्संदेह अल्लाह के पास बड़ा बदला है।”
(९ : २१-२२) ”हे ईमानवालो ! अपने बाप और अपने भाईयों को अपने मित्र न बनाओ यदि ईमान के मुकाबले में कुफ्र उन्हें पिय्र हो। तुममें से जो कोई उन्हें अपना मित्र बनाएगा, तो ऐसे ही लोग अत्याचारी होंगे।” (९ः२३) ”अन्नतः अल्लाह ने अपने रसूल पर और मोमिनों पर अपनी सकीनत (प्रशान्ति) उतारी और ऐसी सेनाएँ उतारीं जिनको तुमने नहीं देखा और इनकार करने वालों को यातनादी और यही इनकार करने वालों का बदला है।” (९ : २६) ”और इसके बाद अल्लाह जिसको चाहता है उसे तौबा : नसीब करता है।” (९ : २७) ”वे किताबवाले जो न अल्लाह पर ईमान रखते हैं और न अंतिम दिन पर और न अल्लाह और उसके रसूल के हराम ठहराए हुए को हराम ठहराते हैं और न सत्य धर्म का अनुपालन करते हैं, उनसे लड़ो, यहाँ तक कि वे सत्ता से विलग होकर और छोटे (अधीनस्थ) बनकर जिज्जया देने लगें।” (९ : २९, पृ. १५९-१६०)
समीक्षक-”भला ! जो बहिश्तवालों के समीप अल्लाह रहता है तो सर्वव्यापक क्यों कर हो सकता है ? जो सर्वव्यापक नहीं तो सृष्टिकर्त्ता और न्यायाधीश नहीं हो सकता। ओर अपने माँ, बाप, भाई और मित्र को छुड़वाना केवल अन्याय की बात है। हाँ जो वे बुरा उपदेश करें, न मानना परन्तु उनकी सेवा सदा करनी चाहिए। जो पहले खुदा मुसलमानों पर बड़ा सन्तोषी था और और उनके सहाय के लिये लश्कर उतारता था, सच हो तो अब ऐसा क्यों नहीं करता ? और जो प्रथम काफ़िरों को दण्ड देता और पुनः उसके ऊपर आता था तो अब कहाँ गया ? क्या बिना लड़ाई के ईमान खुदा नहीं बना सकता ? ऐसे खुदा को हमारी ओर से सदा तिलांजलि है, खुदा क्याहै, एक खिलाड़ी है।” (पृ. ५७४)
१९. ”निःसन्देह अल्लाह सारे ही गुनाहों को क्षमा कर देता है।” (३९ : ५३) ”हालांकि कियामत के दिन सारी की सारी धरती उसकी मुट्‌टी में होगी और आकाश उसके दाएँ हाथ में लिपटे हुए होंगे।” (३९ : ६७) ”और धरती अपने रब के प्रकाश से जगमगा उठेगी और किताब रखी जाएगी और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा और लोगों के हक़ के साथ फैसला कर दिया जाएगा। उन पर कोई जुल्म न होगा।” (३९ : ६९, पृ. ४१२-४१३)
समीक्षक-”यदि समग्र पापों को खुदा क्षमा करता है तो जानो सब संसार को पापी बनाता है और दयाहीन है, क्योंकि एक दुष्ट पर दया और क्षमा करने से वह अधिक दृष्टता करेगा और अन्य बहुत धर्मातओं को दुःख पहुंचावेगा। यदि किचिंत भी अपराध क्षमा कियाजावे तो अपराध ही अपराध जगत्‌ में छा जावे। क्या परमेश्वर अग्निवत्‌ प्रकाश वाला है ? और कर्मपत्र कहाँ जमा रहते हैं ? और कौन लिखता है ? यदि पैगम्बरों और गवाहों के भरोसे खुदा न्याय करता है तो वह असर्वज्ञ और और असमर्थ है। यदि वह अन्याय नहीं करता, न्या ही करता है तो कर्मों के अनुसार करता होगा। वे कर्म पूर्वापर वर्तमान जन्मों के हो सकताहैं। तो फिर क्षमा करना, दिलों पर ताला लगाना और शिक्षा न करना, शैतान से बहकवाना, दौरा सुपुर्द रखना, केवल अन्याय है।” (पृ. ५९७-५९८)
३. पैगम्बर मुहम्मद का अल्लाह का सहयोगी बनना

२०. ” अल्लाह ऐसा नहीं है कि वह तुम्हें परोक्ष की सूचना दे दे। …. किन्तु अल्लाह इस काम के लिये जिसको चाहता है, चुन लेता है और वे उसके रसूल होते हैं। अतः अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ।” (४ : १७९, पृ. ६४)
समीक्षक-”जब मुसलमान लोग सिवाय खुदा के किसी के साथ ईमान नहीं लाते और न किसी को खुदा का साझी मानते हैं तो पैगम्बर साहेब को क्यों ईमान में खुदा के साथ शरीक किया ? अल्लाह ने पैगम्बर के साथ इमानलाना लिखा इसी से पैगम्बर भी शरीक हो गया, पुन’ लाशरीक कहना ठीक न हुआ। यदि इसका अर्थ यह समझा जाए कि मुहम्मद साहेब के पैगम्बर होने पर विश्वास लाना चाहिए तो यह प्रश्न होता है कि मुहम्मद साहेब के पैमब्र होने की क्या आवश्यक है ? यदि खुदा उनको पैमब्र किये बिना अपना अभीष्ट कार्य नहीं कर सकता तो अवश्य असमर्थ हुआ।” (पृ. ५६४-५६५)
२१. ”ये अल्लाह की निश्चित की गई सीमाएं हैं जो कोई अल्लाह और उसके रसूल के आदेशों का पालन करेगा उसेअल्लाह ऐसे बागों में दाखिल करेगा जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वह सदैव रहेगा।” परन्तु जो अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करेगा और उसकी सीमाओं का उल्लंघन करेगा उसे अल्लाह आग में डालेगा जिसमें वह सदैव रहेगा और उकसे लिए अपमानजनक यातना है।” (४ : १३ – १४, पृ. ६९)
समीक्षक-”खुदा ही ने मुहम्मद साहेब पैगम्बर को अपना शरीक कर लिया है और खुद कुरान ही में लिखा है। और देखो ! खुदा पैगम्बर के साथ कैसा फंसा है कि जिसने बहिश्त में रसूल का साझा कर दिया हैं किसी एक बात में भी मुसलमानों का खुदा स्वतन्त्र नहीं तो लाश्रीक कहना व्यर्थ है। ऐसी-ऐसी बातें ईश्वरोक्त पुस्तक में नहीं हो सकती।” (पृ. ५६५)
२२. ”अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल की आज्ञा का पालन करो……….।” (५ : ९२, पृ. १०२)
”देखिये ! यह बात खुदा के शरीक होने की है, फिर खुदा को ”लाशरीक” मानना व्यर्थ है।” (पृ. ५६९)
४. इस्लाम

२३. ”और हमने मूसा को किताब दी थी और उसके पश्चात्‌ आगे-पीछे निरन्तर रसूल भेजते रहे और मरियम के बेटे ईसा को खुली-खुली निशानियां प्रदान की और पवित्र-आत्मा के द्वारा उसे शक्ति प्रदान की तो यही तो हुआ किजब भी कोई रसूल तुम्हारे पास वह कुछ लेकर आया जो तुम्हारे जी को पसन्द न थ, तो मि अकड़ बैठे, तो एक गिरोह को तो तुमने झुठलाया और एक गिरोह को कत्ल करते रहे ? (२ : ८७, पृ. १७)
समीक्षक-”जब कुरान में साक्षी है कि मूसा को किताब दी तो उसका मानना मुसलमानों को आवश्यक हुआ और जो-जो उस पुस्तक में दोष हैं वे भी मुसलमानों के मत में आ गिरे ओर ‘मौजिज़े’ अर्थात्‌ दैवी शक्ति की बातें सब अन्यथा हैं, भोले-भाले मनुष्यों को बहकाने के लिए झूठमूठ चला ली हैं क्योंकि सुष्टिक्रम और विद्या से विरुद्ध सब बातें झूठी ही होती हैं। जो उस समय ‘मौजिज़े’ थे तो इस समय क्यों नहीं ? जो इस समय भी नहीं, तो उस समय भी न थे, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं।” (पृ. ५५३)
२४. ”दीन (धर्म) तो अल्लाह की दृष्टि से इस्लाम ही है।” (३ : १९, पृ. ४६)
समीक्षक-“क्या अल्लाह मुसलमानों ही का है औरों का नहीं ? क्या तेरह सौ वर्षों के पूर्व ईश्वरीय मत था ही नहीं ? इसी से यह कुरान ईश्वर का बनाया तो नहीं, किन्तु किसी पक्षपाती का बनाया है।” (पृ. ५६२)
२५. ”प्रत्येक व्यक्ति को जो उसने कमाया होगा, पूरा-पूरा मिल जाएगा और उनके साथ कोई अन्याय नहोगा।” (३ : २५) कहो : ”ऐ अल्लाह, राज्य के स्वामी  ! जिसे चाहे राज्य दे और जिससे चाहे राज्य छीन ले और जिसे चाहे इज्जत (पभुत्व) प्रदान करे और जिसको चाहे अपमानित कर दे। तेरे ही हाथ में भलाइ है निसंदेह तुझे हर चीज़ की समर्थ्य प्राप्त है।” (३ : २६) ”तू रात को दिन में पिरोता है और दिन को रात में पिरोता है। तु निर्जीव से सजीव को निकालता है और सजीव से निर्जीव को निकालता है जिसे चाहता है बेहिसाब देता है।” (३ : २७) ”ईमानवालों (मुसलमानों) को चाहिए कि वे गैर-ईमानवालों (गैर-मुसलमानों) से हटकर इंकार करने वालों को अपना मित्र (राज़दार) न बनाएँ और कोई ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई सम्बन्ध नहीं।” (३ : २८) ”कह दो : यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह भी तुमसे प्रेम करेगा और तुम्हारे गुनाहों को क्षमा कर देगा।” ( ३ : ३१, पृ. ४७-४८)
समीक्षक-”जब प्रत्येक जीव को कर्मों का पूरा-पूरा फल दिया जावेगा तो क्षमा नहीं किया जाएगा और जो क्षमा किया जाएगा। तो पूरा फल नहीं दिया जाएगा और अन्याय होगा। जब बिना उत्तम कर्मों के राज्य देगा तो भी अन्याय हो जाएगा और बिना पाप के राज्य औरप्रतिष्ठा छीन लेगा तो भी अन्यायकारी हो जाएगा, भला जीवित से मृतक और मृतक से जीवित कभी हो सकता है ? क्योंकि ईश्वर की व्यवस्था अछे?-अभे? है, कभी अदल बदल हनीं हो सकती। अब देखिये पक्षपात की बातें कि जो मुसलमान के मजहब में नहीं हैं उनको काफ़िर ठहराना, उनमें श्रेष्ठों से भी मित्रता न रखने और मुसलमाना में दुष्टों से भी मित्रता रखने के लिए उपदेश करना ईश्वर को ईश्वरता से बिह : कर देता है। इससे यह कुरान, कुरान का खुदा ओर मुसलमान लोग केवल पक्षपात अविद्या के भरे हुए हैं इसीलिए मुसलमान लोग अन्धेरे में हैं और देखिए मुहम्मद साहेब की लीला कि जो तुम मेरा पक्ष करोगे तो खुदा तुम्हारा पक्ष करेगा और जो तुम पक्षपातरूप पाप करोगे उसको क्षमा भी करेगा। इससे सिद्ध होता हैं कि मुहम्मद साहेब ने कुरान बनाया या बनवाया, ऐसा विदित होता है।” (पृ. ३६३)
२६. ”तो यदि वे तुमसे अलग-अलग न रहें और तुम्हारी ओर सुलह का हाथ न बढ़ाएं और अपने हाथ न रोकें तो तुम उन्हें पकड़ों और कत्ल करो, जहाँ कहीं भी तुम उन्हें पाओ। उनके विरुद्ध हमने तुम्हें खुला अधिकर दे रखा है।” (४ : ९१) ”किसी ईमानवाले का यह काम नहीं कि वह किसीईमानवाले (मुसलमान) की हत्या करे। भूल-चूक की बात और है और कोई व्यक्ति यदि गलती से किसी ईमानवाले की हत्या कर दे तो एक मोमिन गुलाम को आजाद करना होगा।” (४ : ९२) ”और जो व्यक्ति जान-बूझकर किसी मोमिन की हत्या करे, तो उसका बदला जहन्नम है जिसमें वह सदा रहेगा, उस पर अल्लाह का प्रकोप और उसकी फिटकार है और उसके लिए अल्लाह ने बड़ी यातना तैयार कर रखी है।” (४ : ९३, पृ. ७९)
समीक्षक-”अब देखिए महापक्षपात की बात ! कि जो मुसलमान न हो उसको जहाँ पाओ मार डालों और मुसलमानों को न मारना । भूल से मुसलमान को मारने में प्रायश्चित और अन्य को मारने से बहिश्त मिलेगा। ऐसे उपदेश को कूप में डलना चाहिए। ऐसे-ऐसे पुस्तक, ऐसे-ऐसे पैग़म्बर, ऐसे-ऐसे खुदा और ऐसे-ऐसे मत से सिवाय हानि के लाभ कुछ भी नहीं ऐसों का न होना अच्छा और ऐसे प्रामादिक मतों से बुद्धिमानों को अलग रहकर वेदोक्त सब बातों को मानना चाहिए, क्योंकि उसमें असत्य किचिंमात्र भी नहीं हे, और मुसलमान को मारे उसको दोज़ख मिले और दूसरे मतवाले कहते हैं कि मुसलमान को मारे तो स्वर्ग मिले। अब कहो इन दोनों मतों में से किसको मानें, किसकोछोड़े ? किन्तु ऐसे मूढ़ प्रकल्पित मतों को छोड़कर वेदोक्त मत स्वीकार करने योग्य सब मनुष्यों के लिए है कि जिसमें आर्य मार्ग अर्थात्‌ श्रेष्ठ पुरुषों के मार्ग मं चलना और दस्यु अर्थात्‌ दुष्टों के मार्ग से अलग रहना लिखा है, सर्वोत्तम है।” (पृ. ५६६-५६७)
२७. ”उनसे युद्ध करो, यहाँ तक कि फ़ितना बाकी न रहे और दीन (धर्म) पूरा-का-पूरा अल्लाह ही के लिए हो जाए।” (८ : ३९) ”और तुम्हें मालूम हो कि जो कुछ गनीमत (लूट) के रूप में माल तुमने प्राप्त किया है, उसका पांचवा भाग अल्लाह का, रसूल का, नातेदारों का, अनाथों का, मुहताजों और मुसाफिरों का है।” ०१८८ः४१, पृ. १५२-१५३)
समीक्षक-”ऐसे अन्याय से लड़ने लड़ाने वाला मुसलमानों के खुदा से भिन्न शान्ति-भंगकर्त्ता दूसरा कौन होगा ? अब देखिये यह मज़हब कि अल्लाह और रसूल के वास्ते सब जगत्‌ को लूटना लुटवाना लुटेरों का काम नहीं है ? और लूट के माल में खुदा का हिस्सेदार बनना जानो डाकू बनना है और ऐसे लुटेरों का पक्षपाती बनना खुदा अपनी खुदाई में बट्‌टा लगाता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसा पुस्तक, ऐसा खुदा और ऐसा पैगम्बर संसार में ऐसी उपाधि और शान्ति भंग करके मनुष्यों को दुःख देने के लिए कहां से आया ? जो ऐसे-ऐसे मत जगत्‌ में प्रचलित न होते तो सब जगत्‌ आनन्द में बना रहता।” (पृ. ५७३)
५. इस्लाम में गैर-मुसलमानों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार

२८. ”जो लोग अल्लाह के मार्ग में मारे जाते हैं उनके लिए यह मत कहो कि ये मृतक हैं किन्तु वे जीवित हैं। परन्तु तुम्हें एहसास नहीं होता।” (२ : १५४, पृ. २५)
समीक्षक-”भला ईश्वर के मार्ग में मरने मारने की क्या आवश्यक है ? यह क्यों नहीं कहते हो कि यह बात अपने मतलब सिद्ध करने से न डरेंगे, लूटमार कराने से ऐश्वसर्य प्राप्त होगा, पश्चात्‌ विषयानन्द करेंगे इत्यादि। स्वप्रयोजन के लिए यह विपरीत व्यवहार किया है।” (पृ. ५५६-५५७)
२९. ”और अल्लाह के मार्ग में उन लोगों से लड़ों जो तुमसे लड़ें किन्तु ज्यादती न करो।” (२ : १९०) ”तुम उनसे लड़ों यहाँ तक कि फ़ितना शेष न रह जाए और दीन (धर्म) अल्लाह के लिए हो जाए।” (२ : १९३) …. ”अतः जो तुम पर ज्यादती करे तो जैसी ज्यादती वह तुम पर करे, तुम भी उसी प्रकार उससे ज्यादती का बदला लो।” (२ : १९४, पृ. २९-३०)
समीक्षक-”जो कुरान में ऐसी बातें न होतीं तो मुसलमान लोग इतना बड़ा अपराध जो कि अन्यमतवालों पर किया है, न करते, और बिना अपराधियों को मारना उन पर बड़ा पाप है। जो मुसलमान के मत का ग्रहण न करना है उसको कुफ़ कहते हैं अर्थात्‌ कुफ्ऱ से क़तल को मुसलमान लोग अच्छा मानते हैं। अर्थात्‌ जो हमारे दीन को न मानेगा उसको हम क़तल करेंगे, सो करते ही आये, मज़हब पर लड़ते-लड़ते आप ही राज्य आदि से नष्ट हो गये और उनका मत अन्य मत वालों पर अति कठोर रहता है। क्या चोरी का बदला चोरी है ? कि जितना अपराध हमारा चोर आदि करें क्या हम भी चोरी करें ? यह सर्वथा अन्याय की बात है। क्या कोई अज्ञानी हम को गालियां दे, क्या हम भी उसको गाली देवें ? यह बात न ईश्वर की और न ईश्वर के भक्त विद्वान्‌ की ओर न ईश्वररोक्त पुस्तक की हो सकती है। यह तो केवल स्वार्थी ज्ञानरहित मनुष्य की है।” (पृ. ५५८)
३०. ”अल्लाह तो उन लोगों से प्रेम रखता है जो उसके मार्ग में पंक्ति बद्ध होकर लड़ते हैं मानों वे सीसा पिलाई दीवार हैं।”
(६१ : ४, पृ. ५०७)
समीक्षक-वाह ठीक है ! ऐसी-ऐसी बातों का उपदेश करके बेचारे अरबवासियों को सबसे लड़ा के शत्रु बनाकर परस्पर दुख दिलाया और मजहब का झंडा खड़ा करके लड़ाई फैलावे, ऐसे कोई बुद्धिमान ईश्वरकभी नहीं मान कसते। जो मनुष्य जाति में विरोध बढ़ावे वही सबको दुखदाता होता है।” (पृ. ६०३)
३१. ”हे नबी ! इनकार करने वालों और कपटाचारियों से जिहाद करो और उनके साथ सखती से पेश आओ । उनका ठिकाना, जहन्नम है और वह अन्ततः पहुँचने की बुरी जगह है।” (६६ : ९, पृ. ५१८)
समीक्षक-”देखिए मुसलमानों के खुदा की लीला ! अन्य मत वालों से लड़ने के लिए पैगम्बर और मुसलमानों को उचकाता है। इसीलिए मुसलमान लोग उपद्रव करने में प्रवृत रहते हैं। परमात्मा मुसलमानों पर कृपा दृष्टि करे जिससे ये लोग उपद्रव करना छोड़ के सबसे मित्रता से बर्तें।” (पृ. ६०४)
३२. ”और जो व्यक्ति इसके पश्चात्‌ भी कि मार्गदर्शन खुलकर उसके सामने आ गया है, रसूल का विरोध करेगा और ईमानवालों के मार्ग के अतिरिक्त किसी और मार्ग पर चलेगा तो उसे हम उसी पर चलने देंगे जिसको उसने अपनाया होगा और उसे जहन्नम मं झोक देंगे और वह बहुत बुरा ठिकाना है।” (४ : ११५, पृ. ८२)
समीक्षक-”अब देखिए खुदा और रसूल की पक्षपात की बातें ! मुहम्मद साहेब आदि समझते थे कि जो खुदा के नाम से ऐसी हम न लिखेंगे तो अपना मज़हब न बढ़ेगा और पदार्थ न मिलेंगे,आनन्दभोग न होगा, इसी से विदित होता है कि वे अपने मतलब करने में पूरे थे और अन्य के प्रयोजन बिगाड़ने में। इससे ये अनाप्त थे। इनकी बात का प्रमाण आप्त विद्वानों के सामने कभी नहीं हो सकता”। (पृ. ५६७)
३३. ऐ ईमानवालों ! उन इंकार करने वालों से लड़ों जो तुम्होर निकट हैं और चाहिए कि वे तुम में सखती पाएं और जान रखो कि अल्लाह डर रखने वालों के साथ है” (९ : १२३), ”क्या वे देखते नहीं कि प्रत्येक वर्ष के एक या दो बार आज़माइश में डाले जाते हैं ? फिर भी न तो वे तौबा करते हैं, और न चेतते हैं।” (९ : १२६, पृ. १७१)
समीक्षक-”देखिए ! ये भी एक विश्वासघात की बातें, खुदा मुसलमानों को सिखलाता है कि चाहे पड़ोसी हों या किसी के नौकर हों जब अवसर पावें तभी लड़ाई वा घात करें। ऐसी बातें मुसलमानों में बहुत बन गई हैं इसी कुरान के लेख से। अब तो मुसलमान समझ के इन कुरानोक्त बुराइयों को छोड़ दें, तो बहुत अच्छा है।”  (प्.ृ ५७६)
६. भोग विलास के लिए जन्नत के प्रलोभन

३४. ”कहो : क्या मैं तुम्हें इनसे उत्तम चीज़ का पता दूँ ? जो लोग अल्लाह का डर रखेंगे उनके लिए उनके रब के पास बाग़ हैं जिनके नीचे नहरें बह रही होंगी। उनमें वे सदैव रहेंगे। वहाँ पाक-साफ़ (जोड़े, बीबियां) होंगे ओर अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त होगी।” (३ : १५, पृ. ४६)
समीक्षक-भला यह स्वर्ग है किंवा वेश्यावन ? इसको ईश्वर कहना वा स्त्रैण ? कोई भी बुद्धिमान ऐसी बातें जिसमें हों उसको परमेश्वर का किया पुस्तक मान सकता है ? यह पक्षपात क्यों करता है ? जो बीबियां बहिश्त में सदा रहती हैं वे यहाँ जन्म पाके वहाँ गई हैं वा वहीं उत्पन्न हुई हैं ? यदि यहाँ जन्म पाकर वहाँ गई हैं और जो क़यामत की रात से पहले ही वहाँ बीबियों को बुला लिया तो उनके खाविन्दों को क्यों न बुला लिया ? यदि वहीं जन्मी हैं तो क़यामत तक वे क्यों कर निर्वाह करती हैं ? जो उनके लिए पुरुष भी हैं तो यहाँ बहिश्त में जाने वाले मुसलमानों को खुदा बीबियां कहाँ से देगा ? और जैसे बीबियां बहिश्त में सदा रहने वाली बनाईं वैसे पुरुषों को वहाँ सदा रहने वाले क्योंकि नहीं बनाया ? इसलिए मुसलमानों का खुदा अन्यायकारी, बेसमझ है।” ( पृ. ५६२)
३५. ”उनके बीच विशुद्ध पेय का पात्र फिराया जाएगा, बिल्कुल साफ़ उज्ज्वल, पीने वालों के लिए सर्वथा सुस्वादु । न उसमें कोई खुमार होगा और न वे उससे निढ़ालऔर ममदहोश होंगे। और उनके पास निगाहें बचाए रखने वाली, सुन्दनर आँखों वाली स्त्रियां होगी मानों वे सुरक्षित अंडे हैं”, (३७ : ४५-४९) ”है ना अब ऐसा कि हम मरने के नहीं। हमें जो मृत्यु आनी थी वह बस पहले आ चुकी। और न हमें कोई यातना ही दी जाएगी।” (३७ : ५८, पृ. ३९४-३९५) ”और निश्चय ही लूत भी रसूलों में से था। याद करो, जब हमने उसे और उसके सभी लोगों को बचा लिया सिवाय एक बुढिऋया के जो पीछे रह जाने वालों में से थी। फिर दूसरों को हमने तहस-नहस करके रख दिया।” (३७ : १३३-१३६, पृ. ३९८-३९९)
समीक्षक-”क्योंजी, यहाँ तो मुसलमान लोग शराब को बुरा बतलाते हैं परन्तु इनके स्वर्ग में तो नदियाँ की नदियाँ बहती हैं। इतना अच्छा है कि यहाँ तो किसी प्रकार मद्य पीना छुड़ाया परन्तु यहाँ के बदले वहाँ उनके स्वर्ग में बड़ी खराबी है ! मारे स्त्रियों के वहाँ किसी का चित्त स्थिर नहीं रहता होगा ! और बड़े-बड़े रोग भी होंगे ! यदि शरीर वाले होते होंगे तो अवश्य मरेंगे और जो शरीर वाले न होंगे तो भोग विलास ही न कर सकेंगे फिर उनका स्वर्ग में जाना व्यर्थ है। यदि लूत को पैगम्बर मानते हो तो जो बाइबिल में लिखा हैकि उससे उसकी लड़कियों ने समागम करके दो लड़े पैदा किए इस बात को भी मानते हो वा नहीं ? जो मानते हो तो ऐसे को पैगम्बर मानना व्यर्थ है और जो ऐसे और ऐसे के संगियों को खुदा मुक्ति देता है तो वह खुदा भी वैसा ही है, क्योंकि बुढ़िया की कहानी कहने वाला और पक्षपात से दूसरों को मारने वाला खुदा कभी नहीं हो सकता। ऐसा खुदा मुसलमानों के ही घर में रह सकता है, अन्यत्र नहीं ।” (पृ. ५९५-५९६)
३६. ”सदैव रहने के बाग़ हैं जिनके द्वार उनके लिए खुले होंगे। उनमें वे तकिया लगाए होंगे। वहाँ वे बहुत-से मेवे और पेय मंगवाते होंगे और उनके पास निगाहें बचाए रखने वाली स्त्रियां होगी, जो समान अवस्था की होगी।” (३८ : ५०-५२) ”तो सभी फरिश्तों ने सजदा किया, सिवाय इबलीस के। उसने घमण्ड किया ओर इंकार करने वालों में से हो गया। कहा : ”ए इबलीस ! तुझे किस चीज़ ने उसके सजदा करने से रोका जिसे मैंने अपने दोनों हाथों से बनाया ? क्या तूने घमण्ड किया, या तू कोई ऊँची हस्ती है ? ” उसने कहा : ”मैं उससे उत्तम हूँ। तू ने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्‌टी से पैदा किया। कहा : ”अच्छा, निकल जा यहां से, क्योंकि तूधुत्कारा हुआ है। और निश्चय ही बदला दिए जाने के दिन तक तुझ पर मेरी लानत है।” उसने कहा : ”ऐ मेरे रब ! फिर तू मुझे उस दिन तक के लिए मुहलत दे, जबकि लोग (जीवित करके) उठाए जाएंगें।” कहा : ”अच्छा, तुझे ज्ञात एवं निश्चित समय तक मुहलत है।” (३८ : ७३-८२, पृ. ४०४-४०६)
समीक्षक-”यदि वहाँ, जैसे कि कुरान में बाग, बगीचे, नेहरें, मकानादि लिखे हैं, वैसे हैं तो वे न सदा से थे, न सदा रह सकते हैं, क्योंकि जो संयोग से पदार्थ होता है वह संयोग के पूर्व न था, अवश्यभावी वियोग के अन्त में न रहेगा। जब यह  हिश्त ही न रहेगा तो उसमें रहने वाले सदा क्योंकर रह सकते हैं ? क्योंकि लिख है कि गद्‌दी, तकिये, मेवे और पीने के पदार्थ वहाँ मिलेंगे, इससे यह सिद्ध होता है कि जिस समय मुसलमानों का मज़हब चला उस समय अरब देश विशेष धनाढ्‌य न था, इसलिए मुहम्मद साहिब ने तकिए आदि की कथा सुनाकर गरीबों को अपने मत में फंसा लिया और जहाँ स्त्रियाँ हैं, वहाँ निरन्तर सुख कहाँ ? ये स्त्रियाँ वहाँ-कहा से आई हैं ? अथवा बहिश्त की रहने वाली हैं ? यदि आईं हैं तो जायेंगी और जो वहीं की रहने वाली हैं तो क़यामत के पूर्व क्या करती थी ? क्या निकम्मी अपनीउम्र को बहा रही थीं?
अब देखिए खुदा का तेज कि जिसका हुक्म अन्य सब फरिश्तों ने माना और आदम साहेब को नमस्कार किया, और शैतान ने न माना। खुदा ने शैतान से पूछा, कहा कि मैंने उसको अपने दोनों हाथों से बनाया, तू अभिमान मत कर। इससे सिद्ध होता है कि कुरान का खुदा दो हाथों वाला मनुष्य था, इसलिए वह व्यापक वा सर्वशक्तिमान्‌ कभी नहीं हो सकता। और शैतान ने सत्य कहा कि मैं आदम से उत्तम हूँ। इस पर खुदा ने गुस्सा क्यों किया ? क्या आसमान ही में खुदा का घर है, पृथ्वी में नहीं ? तो काबे को खुदा का घर प्रथम क्यों लिखा है ? भला परमेश्वर अपने में वा सृष्टि में से लग कैसे निकाल सकता है ? और वह सृष्टि सब परमेश्वर की है। इससे स्पष्ट विदित हुआ कि कुरान का खुदा बहिश्त का जिम्मेदार था। खुदा ने उसको लानत धिक्कार दिया और कैद कर दिया। और शैतान ने कहा कि हे मालिक ! मुझको क़यामत तक छोड़ दे। खुदा ने खुशामद से क़यामत के दिन तक छोड़ दिया। जब शैतान छूटा तो खुदा ने कहा कि जितनों को तू बहकावेगा मैं उनको दोज़ख में डाल दूँगा और तुझको भी।
अब सज्जन लोगों ! विचारिये कि शैतान को बहकाने वाला खुदा है वाआपसे वह बहका ? यदि खुदा न ेबहकाया तो वह शैतान का शैतान ठहरा। यदि शैतान स्वयं बहका तो अन्य जीव भी स्वयं बहकेगे, शैतान की जरूरत नहीं। और जिससे इस शैतान बागी को खुदा ने खुला छोड़ दिया, इससे विदित हुआ कि वह भी शैतान का शरीक, अधर्म कराने में हुआ। यदि स्वयं चोरी कराके दण्ड देवे तो उसके अन्याय का कुछ भी पारावार नहीं।” (पृ. ५९६-५९७)
”जड़ित तखतों पर तकिया लगाए आमने-सामने होंगे। उनके पास किशोर होंगे जो सदैव किशोरावस्था ही में रहेंगे, प्याले और आफ़ताबे (जग) और विशुद्ध पेय से भरा हुआ पात्र लिए फिर रहे होंगे-जिस (के पीने) से न तो उन्हं सिर दर्द होगा ओर न उनकी बुद्धि में विकार आएगा। और (स्वादिष्ट) फल जो वे पसन्द करें और पक्षी का मांस जो वे चाहें और बड़ी आँखों वाली हूरें, मानों छिपाए हुए मोती हों।” (५६ : १५-२३, पृ. ४८९)
समीक्षक-”यदि वहाँ लड़के सदा रहते हैं तो उनके माँ बाप भी रहते होंगे और सास-श्वसुर भी रहते होंगे, तब तो बड़ा भारी शहर बसता होगा। फिर मलमूत्रादि के बढ़ने से रोग भी बहुत से होते होंगे। क्योंकि जब मेवे खावेंगे, गिलासों में पानी पीवेंगे ओर प्यालों सेमद्य पीवेंगे, न उनका शिर दूखेगा और न कोई विरुद्ध बोलेगा। यथेष्ट मेवा खावेंगे और जानवरों तथा पक्षियों के मांस भी खावेंगे तो अनेक प्रकार के दुःख, पक्षी, जानवर वहाँ होंगे, हत्या होगी और हाड़ जहाँ तहाँ बिारे रहेंगे और कसाईयों की दुकानें भी होंगी। वाह! क्या कहना इनके बहिश्त की प्रशंसा कि वह अरब देश से भी बढ़कर दीखती है !!! और जो मद्य मांस खा पी के उन्मत्त होते हैं इसलिए अच्छी-अच्छी स्त्रियां और लौंडे भी वहाँ अवश्य रहने चाहिए, नहीं तो ऐसे नशेबाजों के शिर में गर्मी चढ़ के प्रमत्त हो जावें। अवश्य बहुत स्त्री पुरुषों के बैठने सोने के लिए बिछौने बड़े-बड़े चाहिए। जब खुदा कुमासरियों को बहिश्त में उत्पन्न करता है तभी तो कुमारे लड़कों को भी उत्पन्न करतमा है। भला कुमारियों का तो विवाह जो यहाँ से उम्मेदवार होकर गये हैं उनके साथ खुदा ने लिखा। पर उन सदा रहने वाले लड़कों का भी किन्हीं कुमारियों के साथ विवाह न लिखा। तो क्या वे भी उन्हीं उम्मेदवारों के साथ कुमारीवत दे दिये जायेंगे ? इसकी व्यवस्था कुछ भी नहीं लिखी, यह खुदा से बड़ी भूल क्यों हुई ? यदि बराबर अवस्था वाली सुहागिन स्त्रियां पतियोंको पाके बहिश्त में रहती हैं, तो ठीक नहीं हुआ ; क्योंकि स्त्रियों से पुरुष का आयु दूना ढाईगुना चाहिए। यह तो मुसलमानों के बहिश्त की कथा है।”  (पृ. ६०२)
७. मुख्य निष्कर्ष

”अब इस कुरान के विषय को लिख के बुद्धिमानों के सम्मुख स्थापित करता हूँ कि पुस्तक कैसा है ? मुझसे पूछो तो यह किताब न ईश्वर, न विद्वान्‌ की बनाई और न विद्या की हो सती है। यह तो बहुत थोड़ा-सा दोष प्रकट किया, इसलिए कि लोग धोखे में पड़कर अपना जन्म व्यर्थ न गमावें। जो कुछ इसमें थोड़ा-सा सत्य है वह वेदादि विद्या पुस्तकों के अनुकूल होने से जैसे मुझको ग्राह्‌य है वैसे अन्य भी मज़हब के हठ और पक्षपातरहित विद्वानों और बुद्धिमानों को ग्राह्‌य है। इसके बिना जो कुछ इसमें है वह सब अविद्या, भ्रमजाल और मनुष्य के आत्मा को पशुवत्‌ बनाकर शान्तिभंग कराके उपद्रव मचा, मनुष्यों में विद्रोह फैला, परस्पर दुःखोन्नति करने वाला विषय है। और पुनरुक्त दोष का तो कुरान जानों भण्डार ही है।
परमात्मा सब मनुष्यों पर कृपा करे कि सबसे सब प्रीति, परस्पर मेल और एक-दूसरे के सुख की उन्नति करने में प्रवृत्त हों। जैसे मैं अपना वा दूसरे मतमान्तरों का दोष पक्षपात रहित होकरप्रकाशित करता हूँ इसी प्रकार यदि सब विद्वान्‌ लोग करें तो क्या कठिनता है कि परस्पर का विरोध छूट मेल होकर आनन्द में एकमत हो के सत्य की प्राप्ति सिद्ध हो। यह थोड़ा-सा कुरान के विषय में लिखा, इसको बुद्धिमान्‌ धार्मिक लोग ग्रन्थकार के अभिप्राय को समझ लाभ लेवें। यदि कहीं भ्रम से अन्यथा लखा गया हो तो उसको शुद्ध कर लेवें।” (पृ. ६१०)
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Posted on October 15, 2011, in Islam, Swami Dayanand. Bookmark the permalink. 1 Comment.

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